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Showing posts from June, 2020

उद्धरण - 1000

लेकिन एक दिन मैंने पाया कि अरे, मैं इनको जो नहीं बनाना चाहता था वही बना रहा हूं। हुआ यह कि एक बार मेरा लीवर क़ाफ़ी बिगड़ गया और मैंने बिस्तर पकड़ लिया पर इन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। ये उसी तरह चाऊमिन, मुर्गा, बर्गर चाभते रहे और डीवीडी लगा कर पिक्चर देखते रहे। तुम्हारी चाची का बाज़ार जाना और थैला भर भर कर आना भी नहीं रुका।

उद्धरण - 999

शक्ति अपने को बाँधने में नहीं, अपने को सीमाओं से उन्मुक्त करने में है ।

उद्धरण - 998

वे ग़ायब नहीं हुई हैं। चाचा हंसे-“वे अपनी अपनी जगह से धकेल दी गयी हैं। मैं समझ रहा हूं तुम्हारी बात। ये देसी आम, ये बरतन, ढिबरी, लालटेन, ये सिकहर, ये सिल लोढ़ा, ये सब इसी भारत देश में हैं पर अपनी अपनी जगह से धक्का दे दिये गये हैं। ये ऐसे अंधेरे में गिर गये हैं कि तुम लोगों को दिखायी नहीं देते। पर ये हैं।

उद्धरण - 997

तुम्हारा जीवन कितना सूना है- जैसे रेगिस्तान में अनभ्र अमावस्या की रात

उद्धरण - 996

चाचा कहते- जिस ज्ञान की आंख में आंसू नहीं और माथे पर पसीना नहीं वह ज्ञान नहीं, ज्ञान का मायामृग है। चाचा की फ़ैमिली को ऐन्जाय, मस्ती, होज्जाय, चक दे सरीखे शब्द और मेरी अपनी लाइफ है, ‘आय डोण्ट केयर‘ जैसे वाक्य बड़े प्रिय थे जबकि इनके उच्चारण को सुन कर चाचा की भृकुटि टेढ़ी हो जाती थी।

उद्धरण - 995

मनुष्य जब पतन की ओर अग्रसर होता है तो कितनी जल्दी कितनी दूर पहुँच जाता है ।

उद्धरण - 994

कटोरा भर पेशाब करो और बाल्टी भर पानी बहाओ। यह कहां की अक़्लमंदी है! यह बेवक़फी तब तो नाइन्साफ़ी हो जाती है जब हमारे देश में जल का इतना बड़ा संकट है और दुनिया का अगला विश्वयुद्ध पानी के लिए लड़ा जायेगा।

उद्धरण - 993

प्रेम प्रेम तभी है, जब उसके पथ में काँटे हों, उपेक्षा हो, तिरस्कार हो और हो भयंकर विद्वेष ।

उद्धरण - 992

इन्हीं चक्करों में घर के लिए वाशिंग मशीन, बड़ा टीवी, वैक्यूम क्लीनर, इनवर्टर, डबल बडे, गुदगुदा सोफ़ासेट आये। और एक बम्पर दीपावली धमाका के अंतर्गत घर में कार ख़रीद ली गयी। परिवार किसी छुट्टी के दिन मोटर में सवार होकर लखनऊ पहुंच जाता जहां दिन भर घूम कर, कोई नयी फ़िल्म देख कर रात को अपने घर आ जाता। अगले दिन चाची प्लास्टिक के थैलों से सामान निकाल कर पड़ोसियों को दिखाती थीं। चाची अपने परिवेश की अकेली महिला थीं जो ‘गुप्ता मोटर ड्राइविंग ट्रेनिंग स्कूल‘ से प्रशिक्षण लेकार कार चलाने थीं। लखनऊ स्थिर सहारागंज माल मे बिग बाज़ार का दर्शन करके लौटने में भी उन्हें शहर की प्रथम महिला होने का दर्जा प्राप्त था।

उद्धरण - 991

पाप करने में अक्ल खर्च होती है ।

उद्धरण - 990

दुकानों के सामने भी ठेले या पटरी पर कोई कुछ बेच रहा था। थाह लेने पर पता चला कि शहर मोबाइल कम्पनियों के विज्ञापनों से रंगा हुआ था। इनको टक्कर देने वाला कोई अन्य पदार्थ पृथ्वी पर था तो वह शीतल पेय। दोनों एक दूसरे से कम न थे लेकिन दोनों में कोई मुक़ाबला या जीत हार का जोश नहीं था। दोनों जैसे एक ही नृत्य संरचना की नृत्यांगनाएं हो। दोनो एक साथ थिरक, झूम रहे थे।

उद्धरण - 989

कहानी जीवन की प्रतिच्छाया है और जीवन स्वयं एक अधूरी कहानी है ।

उद्धरण - 988

सबसे दिलचस्प बात यह थी कि दादी ने जिंदगी में बुरे की तुलना में अच्छाई काफ़ी की थी किंतु उन्हें स्वर्ग के सपने कभी नहीं आते थे जबकि नर्क को प्रायः देखती थीं और और डर कर उठ जाती थीं। आंख खुलने के बाद भी कुछ देर वह थर थर कांपती रहती थीं। उन्हें न जीवन भयभीत कर पाता था न मृत्यु का उन्हें ख़ौफ़ था। वह जीवन को खींचे जाने की प्रार्थना नहीं करती थीं और मौत को पुकारती भी नहीं थीं। हर सुबह का जागना उनके लिए जीवन का आगमन था और आंखों में नींद भरने के क्षण वह जीवन मृत्यु के अनिश्चय में आत्मसमाधि ले लेती थीं। “इस उमिर में जी कर क्या कर लूंगी और मर कर भी।“ शायद उनकी मौजूदगी की यह सर्वाधिक अचूक व्याख्या थी।

उद्धरण - 987

भूखा मानव भूखे कुत्ते से भी कमजोर होता है

उद्धरण - 986

“डांस का कोई ‘महाप्रोग्राम‘ आने वाला था, सारा परिवार दादी को बिठा कर इस यक़ीन के साथ वहां था कि आज दादी का मनोरंजन होकर रहेगा। उन्होंने टिप्पणी की : “ ये नाच है कि सरकस हो रहा है।“ फिर बोलीं-“कसरत कर रही है गंड़खुल्ली।“ और-“ हरामी पेल रहा है।“ कह कर वह हंसने लगी जैसे कोई लतीफ़ा सुन लिया हो।

उद्धरण - 985

बुझते समय दीपक का आलोक सहसा दीप्त हो उठता है, किन्तु दीपक आजीवन उसी प्रखरतर दीप्ति से नहीं जल सकता ।

उद्धरण - 984

यह न कर सको तो अतीत में जाकर छिप जाओ। कणाद, पतंजलि, गौतम में अजन्ता, एलोरा, ऐलिफ़ेंटा में, कोणार्क और खजुराहों में, शाल-भंजिक-सुर-सुन्दरी-अलसकन्या के स्तनों में, जप-तप-मंन्त्र में, सन्त-समागम-ज्योतिष-सामुद्रिक में-जहाँ भी जगह मिले, जाकर छिप रहो। भागो, भागो, भागो। यथार्थ तुम्हारा पीछा कर रहा है।

उद्धरण - 983

ये तो है। गांव वालों को लगता है शहर चलो, शहर वाले को बड़े शहर में चांस दिखता हैं। बड़े शहर वाला बहुत बड़े शहर का इरादा रखता है और बहुत बड़े शहर वाला विदेश में बसना चाहता हैं। यही दस्तूर है आज का-कोई अपनी जगह पर नहीं टिकना चाहता।

उद्धरण - 982

हम लोग जंगल में पहुँच गए। पहले गीली-गीली; धरी-धरी ओस से दुधिया घास- उससे भी मैंने चलते-चलते बात कर ली कि वाह, ऊपर से तो चिपटी-चिपटी दूध-धुली साधु बाबा, भीतर ही-भीतर उमंगों से कितनी हरी हो रही है, क्या कहा है किसी ने, अरमान मचलते हैं- फिर झाड़ियाँ शुरू हो गयीं, फिर छोटे पेड़, फिर न जाने कब जंगल चुपके से घना हो गया ।

उद्धरण - 981

तुम मँझोली हैसियत के मनुष्य हो और मनुष्यता के कीचड़ में फँस गए हो। तुम्हारे चारों ओर कीचड़-ही-कीचड़ है। कीचड़ की चापलूसी मत करो। इस मुग़ालते में न रहो कि कीचड़ से कमल पैदा होता है। कीचड़ में कीचड़ ही पनपता है। वही फैलता है, वही उछलता है।

उद्धरण - 980

नूपुर संसार की उन चुनिन्दा स्त्रियों में थी जो अपने पति के मस्तिष्क और दृश्य में लगातार एक रहस्य की तरह बनी रहती हैं। जिनका शरीर सुंदरता और भेद का ऐसा कथासरित्सागर होता है जिसमें प्रसाधन की कोई कथा पूरी होने के पूर्व नयी कथा की सुष्टि कर देती है।

उद्धरण - 979

मैं जहाँ हूँ, वहाँ से कभी हिली नहीं । एक बार, कभी किसी ने मुझे बना दिया था, तब से मैं वैसे ही चली आ रही हूँ । कभी-कभी लोग आकर में अलंकार-भूषण बदल जाते हैं अवश्य, मुझे नई कड़ियाँ, नई श्रृंखलाएँ ओर नये पट दे जाते हैं, मेरे मुँह और वक्ष पर नया आलेप कर जाते हैं, पर इससे मौलिक और प्रत्यक्ष एक रूपता नहीं बदलती- वैसे ही जैसे स्त्री के आवरण और अलंकार बदल देने पर भी उसका रूप वही रहता है........पर ऐसा होते हुए भी मैंने दुनिया देखी है और देखती हूँ, दुनिया के अनुभव सुने हैं और सुनती हूँ और इसके अतिरिक्त अपने प्रगाढ़ अकेलेपन में मैंने एक और शक्ति पाई है- मैं आत्माएँ पढ़ती हूँ । मेरे पास जो आता है, मैं उसे आर-पार देख-पढ़ और समझ लेती हूँ ।

उद्धरण - 978

हमारी योजनाओं में जैसे काग़ज, वैसे ही हमारी गन्दगी का महत्वपूर्ण तत्त्व थूक है। थूक-उत्पादन में वहाँ पान की दस-बीस दुकानें, कुछ स्थिर और कुछ गश्ती-प्राइवेट सेक्टर की सरकारी-मान्यता प्राप्त फ़ैक्टरियों की तरह काम करती थीं। थूक का उत्पादन ज़ोर पर था।

उद्धरण - 977

प्यार के पथ पर उनका दिमाग़ कुलाचें भरने लगता था। और कल्पना ही कल्पना में वह उस लड़की के लिए अपनी जान दे देते थे। इस प्रकार वह जाने कितनी बार गुंडों से लड़ते हुए शहीद हो चुके थे और जाने कितनी बार प्रेमिका सर्पदंश की शिकार बनने पर उसका ज़हर ख़ुद चूस कर मरे थे। यह सही है कि तब वह बलवंत कौर से विछोह से उत्पन्न दुख, उसके प्यार, उसकी विदाई से बिंध कर तड़प उठते थे, उन्हें जीवन निस्सार तथा भार महसूस होने लगता था लेकिन वह इसी भावनात्मक यातना में रहना भी चाह रहे थे। इस पीड़ा में उन्हें एक अवर्णनीय तृप्ति की अनुभूति होती थी। उन्हें असहायता के साथ साथ एक विलक्षण आनंद भी प्राप्त होता था। इसलिए उन्होंने वैसे ही जीवन का वरण कर लिया था।

उद्धरण - 976

शेखर उस पहाड़ी रास्ते से उतरता हुआ चला जा रहा था। उसके कदम अपनी अभ्यस्त साधारण गति से पड़ रहे थे, वह किसी प्रकार की जल्दी नहीं कर रहा था, क्योंकि यद्यपि वह अपने में में उसे स्वीकार नहीं कर रहा था, तथापि उसके भीतर कहीं उसकी आत्मा के छिपे-से-छिपे स्तर में लिपटी हुई कहीं, इस बात की पूर्ण अनुभूति थी कि वह व्यर्थ जा रहा है, कि उसी माँ तो मर चुकी है, कि अब डॉक्टर आकर कुछ नहीं कर सकता- सिवाय इसके कि एक क्रिया को, जो पूर्ण हो चुकी है, अपने विशेष ज्ञान द्वारा एक और पूर्णता, एक अन्तिमत्व दे दे, एक विशिष्ट महत्व जिसे जानकर वे सब- शेखर, शेखर के पिता, शेखर के भाई रो पड़ें।

उद्धरण - 975

रामायण धारावाहिक प्रसारण के वक़्त सारे मनुष्य मूक हो जाते थे, सभी का व्यक्तित्व सिमट कर उनकी आंखों में क़ैद हो जाता था। क्यों देखूं इस मुंहझौसे को। आदमी अभी यहां है, अगले पल वहां है। अभी कोई बोल रहा है अगले मिनट में कोई और दिख रहा है। और ये बीच बीच में न जाने कौन बौरा कर मंजन, क्रीम, पाउडर, बिस्कुट, की फिलिम चलाने लगता है। समस्या यह थी कि दादी आख्यान की दूसरी संरचना की अभ्यस्त थीं जिसमें कहानी एक के बाद एक-इसके बाद यह-करके आगे बढ़ती है। इसी ढंग के अनगिनत क़िस्से, गाथाएं उनको याद भी थीं जिन्हें वह अपने छोटे भाई बहनों से लेकर सूर्यकांत नुपूर तक-तीन पीढ़ियों के बीच-सुनाती आ रही थीं।

उद्धरण - 974

मुझमें जीवन नहीं है, किन्तु मैं जीवन देने की उतनी ही क्षमता रखती हूँ, जितनी उसे छीन लेने की, विनष्ट करने की, मेरा काम है तोड़ना, मेरा आविष्कार ही इसीलिए हुआ है । किन्तु जब मैं बनाती हूँ, तब जो कुछ मैं बनाती हूँ, वह अखण्ड और अजेय होता है। मैं स्वयं पत्थर की हूँ, वज्रहृदया हूँ, इसलिए मेरी रचनाएँ भी वज्र की सहिष्णुता रखने वाली होती हैं।

उद्धरण - 973

वह जिसमें संयम नहीं है, जिसने पानी का बहने और बहाने का धर्म तो अपना लिया है, पर सींचने का काम नहीं सीखा........ दूसरों का दुख, दूसरों की वेदना उसने जानी नहीं, जानने की सम्भावना नहीं छोड़ी।

उद्धरण - 972

लड़ना किसानों, मज़दूरों, व्यापारियों, भूतपूर्व ज़मींदारों आदि की ही बपौती नहीं, प्राणिमात्र का सहज गुण है। लड़ने की योग्यता इस पेशे या उस पेशे पर निर्भर नहीं है। अगर तुम लड़ने का नतीजा झेलने को तैयार हो तो तुम्हारी लड़ने की योग्यता पर बहस नहीं की जा सकती।

उद्धरण - 971

वे दोनों स्थितियों में ख़ुश रहने वाले लोग थे। चाचा ख़ूब दहेज लेकर आते तो ये लोग गर्व से बताते कि इतना अधिक मिला हैं। अब वे ठाठ से बता रहे थे कि चाचा ने सिद्धांतों के आगे लालच को लात मार दी।

उद्धरण - 970

कितनी गहरी है नीलिमा आकाश की- उस आकाश की जो आँखों के भीतर समा जाता है, कितनी स्निग्ध है तरलता जल की- उस जल की जिसमें चेतना डूब जाती है, कितना सुन्दर है जलकुम्भी का खोया हुआ फूल, वह फूल जो जीवन का प्रतीक है, कितना रसमय, स्फूर्तिमय है विस्तार अवचेतन का ।

उद्धरण - 969

तुममें मेरा वह जीवन है, जो मैं हूँ जो मेरा मैं है। और अमूर्त होकर मैं- तुम्हारा अपना आप हूँ, जिसे तुम नहीं दोगे।

उद्धरण - 968

यदि तुम्हारे हाथ में शक्ति है तो उसका उपयोग प्रत्यक्ष रूप से उस शक्ति को बढ़ाने के लिए न करो। उसके द्वारा कुछ नई और विरोधी शक्तियाँ पैदा करो और उन्हें इतनी मज़बूती दे दो कि वे आपस में एक-दूसरे से संघर्ष करती रहें। इस प्रकार तुम्हारी शक्ति सुरक्षित और सर्वोपरि रहेगी। यदि तुम केवल अपनी शक्ति के विकास की ही चेष्टा करते रहे और दूसरी परस्पर-विरोधी शक्तियों सृष्टि, स्थिति और संहार के नियन्त्रक नहीं बने तो कुछ शक्तियाँ किसी अज्ञात अप्रत्याशित कोण से उभरकर तुम पर हमला करेंगी और तुम्हारी शक्ति को छिन्न-भिन्न कर देंगी।

उद्धरण - 967

गुरु ने मंतर सिखा दिया था कि माफ़ करना सीख लो तो ग़ुस्सा नहीं आयेगा। सबको माफ़ कर देना चाहिए सिवा ख़ुद के। गुरु जी ने बताया ख़ुद को कभी क्षमा नहीं करना चाहिए, अपने को कठोर से कठोर सज़ा दो। अपने को सज़ा देने से बेहतर होता है प्रायश्चित कर लेना। दूसरी बात, हमेशा माफ़ करने में ही बड़प्पन नहीं होता है कभी कभी माफ़ी मांगना ज़्यादा बड़ी बात होती है।

उद्धरण - 966

यदि हम इस उद्यान के रंग-बिरंगे, सूखे-गीले, चल-अचल विस्तार से परे देख सकते, तो शायद इसके भीतर भी हमें किसी के पैर के आकार की प्रतिकृति दीख पड़ती, इस पर भी किसी के हाथों की छाप पहचानी जा सकती। किसी भी बड़े कवि का जीवन ले लो, उसकी सारी जिन्दगी एक खोज है जिसका नतीजा केवल इतना है कि ‘नहीं । यह नहीं । यह भी नहीं । यह भी नहीं ।’

उद्धरण - 965

वह उसकी सगी बहिन नहीं है। पर उस संबंध से उसे यदि कोई अन्तर जान पड़ता भी तो दूरी का नहीं, बल्कि और अधिक समीपत्व का, एक निर्बाध सखा-भाव का। वह भाव जैसे प्रातःकालीन शारदीय धूप की तरह है, जिसमें वह उस घर की ही नहीं, अपने अन्तर की भी छायाओं को सुला लेता है।

उद्धरण - 964

जीवन वैचित्र्य का दूसरा नाम है। जिनके जीवन एकरूपता के बोझ से कुचले जाकर नष्ट हो गये हैं, उनके जीवन में भी इतनी घटनाएँ हुई होंगी कि एक सुन्दर उपन्यास बन सके। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपनी जीवनी लिखने लगे, तो संसार में सुन्दर पुस्तकों की कमी न रहे।

उद्धरण - 963

इस बार उस नौजवान ने, देश के औसत नौजवानों की तरह जो प्रेम अपने साथ पढ़नेवाली लड़कियों से और ब्याह अपने बाप के द्वारा दहेज की सीढ़ी से उतारकर लायी गई लड़की से करता है, कहा, मैं कुछ नहीं जानता। पिताजी जैसा हुक्म देंगे, करूँगा।

उद्धरण - 962

इस घर से मेरे निष्कासन के वक़्त वह वर्चस्व, वह चीख मेरी बाहों पर उस कलाई की सख़्त बेरहम पकड़, वह रुआब, वह शारीरिक बल, वरिष्ठता का वह दम्भ- उन सभी की अब लाचारी, रुग्णता, निर्बलता में यह परिणति- मेरा इंतकाम, मेरी गौरी के अपमान का बदला पूरा हुआ। वह ख़ुश और विजेता होने की अनुभूति में उतर ही रहा था कि उसे लगा : इनकी यह स्थिति मेरे इंतक़ाम की वजह से नहीं है, यह मेरे प्रतिशोध नहीं कुदरत के नियम से है। वह हताशा से भर उठा और उसमें भावनात्मक हिंसा की प्रबल भावना उभरीं

उद्धरण - 961

हमारा अधिक तीव्रता के साथ जीना, क्या एक ही स्तर पर अधिक गति या विस्तार की अपेक्षा अधिक या नये स्तरों का हठात् जागा हुआ बोध ही नहीं है? धीरज हमें एक साथ ही अनेक स्तरों की चेतना देता है, अधैर्य एक प्रकार का चेतना का धुआँ है जिससे बोध का एक-एक स्तर मिटता जाता है और अन्त में हमारी आँखें कड़ुआ जाती हैं हमें कुछ दीखता नहीं ।

उद्धरण - 960

फिर एक सूनापन उसके मन में छा गया, आँखें अनदेखती हो गईं.....उस शून्य में वह धीरे-धीरे शशि से सुने शब्द गुनगुनाने लगा- ‘दुख साड्डा समझनगे, दो पत्थर पहाडाँ दे-- ‘पत्थर क्यों समझेंगे दुख’- शायद यही अभिप्राय है कि उस दुख को कोई नहीं समझ सकता, दो पत्थर पहाड़ाँ दे ......किन्तु पत्थर पहाड़ों के हैं, जिन्होंने सदियों तक बर्फीली ऑधियों के प्यासे प्यार के नीचे चोटियों को छीजते देखा है।

उद्धरण - 959

अगर यही मेरे जीवन का अन्त है, तो उस जीवन का मोल क्या है, अर्थ क्या है, सिद्धि क्या है- व्यक्ति के लिए, समाज के लिए, मानव के लिए?

उद्धरण - 958

तुम्हें खाने-पीने-पहनने-ओढ़ने का कष्ट तभी तक है जब तक कि तुम जनता हो और अगर तुम इन कष्टों से छुटकारा चाहते हो तो जनतापन छोड़कर बड़प्पन हथियाने की कोई तरकीब निकालो।

उद्धरण - 957

रिक्शावान ने बताया कि गांवों में छोटी जाति वाले खेतिहर भी ट्रैक्टर से खेत की जुताई कराते हैं इसलिए बैल बेकार की चीज़ हो गये हैं। यही हाल गाय भैसों का हैं। देशी वाली सेर भर से ज़्यादा दूध नहीं देती तो उनको बैठा कर कोई क्यों खिलायेगा।

उद्धरण - 956

मैं कहता हूँ, सच्चाई अमाया, जितनी बार नैतिक बल से उत्पन्न होती है, उतनी ही बार नैतिक दुर्बलता, कायरता से भी...

उद्धरण - 955

जो रोष आदर्श के लिए है, वह धर्म है, यह तो तय है। रहा यह कि आदर्श क्या है, सो उसके बारे में साधारण नियम कठिन है, पर कहा जा सकता है कि जो भी भावना मानव और मानव के भेद मिटाने की, उसकी सीमाओं और बन्धनों को अधिकाधिक प्रसारित करने की चेष्टा करती है, वह आदर्श है।

उद्धरण - 954

घनीभूत वेदना की केवल एक रात में देखे हुए विज़न को शब्द बद्ध करने का प्रयत्न है। इतना और ऐसा निजी वह नहीं है कि उसके दावे को आप ‘एक आदमी की निजू बात’ कहकर उड़ा सकें, मेरा आग्रह है कि उसमें मेरा समाज और मेरा युग बोलता है कि वह मेरे और शेखर के युग का प्रतीक है।

उद्धरण - 953

प्रिंसिपल साहब उस दिन की बहस से समझ गए कि आदर्शवाद की तारीफ़ हम आदर्श के अन्तर्निहित मूल्य पर नहीं, उसके पीछे सहे जानेवाले त्याग, बलिदान और कष्ट के कारण करते हैं।

उद्धरण - 952

... जब सुबह घर से निकले हुए परिन्दों को देखने की हमें फु़र्सत नहीं फिर शाम को घर लौटती उनकी क़तारों पर निगाह डालने का इतमीनान कहां से आयेगा। उसका मन कांप गया : क्या मेरे घर छोड़ने के बाद भी रोज़ वरुणा के समय पर किवाड़ खुले रखे जाते होंगे। भीतर घर की फ़र्शें उसके क़दमों की प्रतीक्षा करती होंगी।

उद्धरण - 951

मानव समझते हैं, अहिंसा एक नकारात्मक परिस्थिति है - हिंसा का न करना मात्र। वे यह नहीं समझते कि संसार में कोई भी नकारात्मक परिस्थिति कभी नहीं टिक सकती- हिंसा न करना, पीड़ा न पहुँचाना, घृणा न करना, बिल्कुल निरर्थक, नहीं असम्भव है, तब तक जब तक कि हम शान्ति नहीं फैलाते, सुख नहीं देते, प्रेम नहीं करते, शक्ति अपने को बाँधने में नहीं, अपने को सीमाओं से उन्मुक्त करने में है...

उद्धरण - 950

......लेकिन जो बहुत सुन्दर है, वह भव्य, बहुत विशाल, बहुत पवित्र-इतना पवित्र कि शेखर को लगा कि वह उसके स्पर्श के योग्य नहीं है, वह मैला है, मल में आवृत है, छिपा हुआ है.......उसी सम्मोहन में उसने एक-एक करके अपने सब कपड़े उतार डाले, नीचे फेंक दिये और आँखें मूँदकर खड़ा हो गया, बिल्कुल नंगा, आकाश के सामने और उस पवित्र के, उस पवित्र से परिपूर्ण, उसके स्पर्श से रोमांचित।

उद्धरण - 949

ईश्वर ने सृष्टि की। सब ओर निराकार शून्य था, और अनन्त आकाश में अन्धकार छाया हुआ था। ईश्वर ने कहा ‘प्रकाश हो’ और प्रकाश हो गया। उसके आलोक में ईश्वर ने असंख्य टुकड़े किये और प्रत्येक में एक-एक तारा जड़ दिया। तब उसने सौर-मण्डल बनाया, पृथ्वी बनाई। और उसे जान पड़ा कि उसकी रचना अच्छी है। तब उसने वनस्पति, पौधे, झाड़-झंखाड़, फल-फूल, लता-बेलें लगाई, और उन पर मंडराने को भौंरे और तितलियाँ, गाने को झींगुर भी बनाए।..... लेकिन उसे शान्ति न हुई। तब उसने जीवन में वैचित्र्य लाने के लिए दिन-रात, आँधी-पानी, बादल-मेह, धूप-छाँह इत्यादि बनाये और फिर कीड़े-मकोड़े, मकड़ी-मच्छर, बर्रे-बिच्छू और अंत में साँप भी बनाए। लेकिन फिर भी उसे सन्तोष नहीं हुआ। तब उसने ज्ञान का नेत्र खोलकर सुदूर भविष्य में देखा। अन्धकार में पृथ्वी और सौर-लोक पर छाई हुई प्राणहीन धुन्ध में कहीं एक हलचल, फिर उस हलचल में धीरे-धीरे एक आकार, एक शरीर जिसमें असाधारण कुछ नहीं है, फिर भी सामर्थ्य है, एक आत्मा जो निर्मित होकर भी अपने आकार के भीतर बँधती नहीं, बढ़ती ही जाती है। एक प्राणी जो जितनी बार धूल को छूता है, नया ही होकर, अधिक प्राणवान होकर उठ खड़ा होता...

उद्धरण - 948

ब्राह्मण उम्मीदवार ने सवर्णों के बीच ऋग्वेद के पुरूष-सूक्त का कई बार पाठ किया और समझाया कि ब्राह्मण ही पुरूष-ब्रह्म का मुँह है। उसने यह भी बताया कि शूद्र पुरूष-ब्रह्म का पैर है। प्रधान के पद के बारे में उसने कई उदाहरण देकर बताया कि उसका सम्बन्ध मेधा और वाणी से है जो पैर में नहीं होती, सिर में होती है, जिसमें मुँह भी होता है। अतः ब्राह्मण को स्वाभाविक रूप से प्रधान बनना चाहिए, न कि शूद्र को।

उद्धरण - 947

गौरैया, बुलबुल, कबतूर, मैना, तोता, कोयलें सामूहिक संहार के लिए कहीं इकट्ठा की जा रही हैं या वे सामूहिक ख़ुदकुशी के लिए किसी निर्जन स्थान में जमा हो रही हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि गर्मी में झुलस कर, जाड़े में ठिठुर कर या बरिश में भीग कर परिन्दों ने जान गंवा दी हो। क्योंकि बेघर परिन्दों के घोंसलों के लिए ब्रह्यांड में जगहें ख़त्म होती जा रही हैं। जब वृक्ष, उनकी शाखें, उनके पत्ते नहीं होंगे तो चिड़ियां चहकेंगी कहां, फुदकेंगी कहां और रहेंगी कहां?

उद्धरण - 946

सारी मोटरगाड़ियां बेकार हो गईं। बड़ी-बड़ी इमारतों में लिफ्ट न चल पाने के कारण और पानी न पहुंच पाने के कारण उनमें रहना असंभव हो गया। अब सबसे सुखी सबसे गरीब आदमी बन गया जिसे धरती पर ही रहने और पैदल चलने की आदत थी।

उद्धरण - 945

साधारण व्यक्ति एक व्यक्ति, एक इकाई होता है, जो अपने आपको खोजती हुई अपनी निष्पत्ति की ओर बढ़ती है, किन्तु खोयी रहती है संसार की समष्टि में; विद्रोही होता है एक समष्टि में छिपी हुई प्रेरणा, एक विराट् समूह में वितरित शक्ति, किन्तु होता है अत्यन्त आत्मसन्निहित और अकेला....

उद्धरण - 944

दूर से देखा जाय तो मानवता का सारा विकास ही, कम से कम अभी तक यही है। मानवता कुछ चाहती है, लेकिन जानती नहीं कि क्या और उसे जानने की खोज में अनेक रास्तों पर एक साथ ही भटक रही है.... मानो सारी मानवता, अपने जीवन की गति में किसी दीर्घ वयःसन्धि पर खड़ी है और अपने से उलझ रही है, उसका यौवन, उसके कृतित्व के दिन अभी आगे हैं।

उद्धरण - 943

किसान को, जैसा कि ’गोदान’ पढ़नेवाले और ’दो बीघा ज़मीन’ जैसी फ़िल्में देखनेवाले पहले से ही जानते हैं, जमीन ज़्यादा प्यारी होती है। यही नहीं, उसे अपनी ज़मीन के मुक़ाबले दूसरे की ज़मीन बहुत प्यारी होती है और वह मौक़ा मिलते ही अपने पड़ोसी के खेत के प्रति लालायित हो उठता है।

उद्धरण - 942

कि वह ही नहीं उसका पूरा परिवार डिप्रेशन का मरीज़ है। उसका छोटा भाई ट्रेन से सफ़र नहीं करता। क्योंकि तब पूरी यात्रा ट्रेन के दुर्घटनाग्रस्त होने की फ़िल्में उसके दिमाग़ में चलने लगती है। पिता ने पच्चीस वर्षो से घर के बाहर का बना भोजन नहीं किया। उन्हें लगता है कि किसी ने ज़हर मिला दिया हो। वह रोज़ बीस बीड़ा पान खाते हैं किंतु दुकान पर नहीं स्वयं अपने हाथ से चूना, कत्था, सुपारी, तमाकू डाल कर। बड़े भाई कभी अकेले नहीं सोते, कभी सो भी गये तो पंखा नहीं चलायेंगे। उन्हें हमेशा पंखे के या छत पर रेंग रही छिपकली के गिर जाने का ख़तरा महसूस होता रहता है, अकसर सोते समय घर में सर्किट से आग लग जाने के ख़्याल से जाग जाते हैं।

उद्धरण - 941

ठीक है सब रास्ते उस एक ईश्वर की ओर ही जाते होंगे पर अपने जाने हुए रास्ते पर ही चलना ज्यादा ठीक लगता है। अब जिंदगी के दिन ही कितने बचे हैं कि नए-नए रास्तों पर चलकर देखा जाए।

उद्धरण - 940

स्मृति मानो एक अफीम की तरह का एक सम्मोहक विष है, वह एक विचित्र, थकी हुई-सी तन्द्रा लाती है, और ज्यों-ज्यों हम उसके आगे नमित होते जाते हैं, त्यों-त्यों विष का प्रभाव द्रुततर होता जाता है ।

उद्धरण - 939

अगर आत्म-पीड़न, आत्म-बलिदान अहिंसा है, तब हम इस परिणाम पर पहुँचते हैं कि ‘अहिंसात्मक’ रक्तपात भी हो सकता है। इस बात को मान लेने पर फिर यह क्यों कहा जाए कि सब रक्तपात हिंसा है?

उद्धरण - 938

.....उस विस्तीर्ण, अत्यन्त निस्तब्ध रात में इस दृश्य को देखते हुए बोध की लहरें सी उसके शरीर में दौड़ने लगीं मानो वह इस जीवन के स्वप्न से उद्बुद्ध होकर किसी ऊँची यथार्थता के लोक में चला जा रहा है......उसे रोमांच हो आया। उसने आँखें मूँद लीं मानो आँखें मूँदकर ही वह इस दृश्य को बनाये रख सकता है, खुली आँखों के आगे वह छिन्न हो जाएगा।’

उद्धरण - 937

सारे देश की तरह शिवपालगंज में भी, किसी भी तरकीब से हो, केवल अमीर बन जाने से ही आदमी सम्मानपूर्ण बन जाता था और वहाँ भी, सारे देश की तरह, किसी संस्था का फोकट में पैसा खा लेने-भर से आदमी का सम्मान नष्ट नहीं होता था।

उद्धरण - 936

उसने सुन रखा था कि ईश्वर दुनिया के हर जीव को कोई एक ख़ास नेमत प्रदान करता है और साथ ही उसको कोई बुराई दे देता है। किसी जानवर को अथाह ताक़त देता है तो उसे आलसी बना देता है। किसी को तेज़ दिमाग़ देता है तो उसे कायर और दब्बू बना देता है। किसी को अपरम्पार सुंदरता देता है तो उसकी अक़्ल कम कर देता है। इस तरह वह दुनिया में संतुलन बनाता है और दुनिया को तबाही से बचाने का जतन करता है।

उद्धरण - 935

पर भारतवर्ष में ‘धर्म‘ किसी भी हिटलर से बड़ी शक्ति है और इस बात को समझकर भी न समझनेवाले हमेशा औंधे मुंह ही गिरते हैं।

उद्धरण - 934

क्योंकि जीवन और अशान्ति एक ही क्रिया के दो नाम हैं। शान्ति तो उस तूफान के पहले होती थी - जब वह बिल्कुल ही निर्लिप्त, बिल्कुल निरीह, एक गतिमान अचेतन- सा हो जाता था। मरणासन्न मानव का मानसिक जीवन पहले से अधिक गतिमान हो जाता है, किन्तु मानव आजीवन उसी तल पर नहीं रह सकता...

उद्धरण - 933

जो रोष आदर्श के लिए है, वह धर्म है, यह तो तय है। पर कहा जा सकता है कि जो भी भावना मानव और मानव के भेद को मिटाने की, उसकी सीमाओं और बन्धनों को अधिकाधिक प्रसारित करने की चेष्टा करती है, वह आदर्श है।

उद्धरण - 932

फाँसी! यौवन के ज्वार में समुद्र-शोषण। सूर्योदय पर रजनी के उलझे हुए और घनी छायाओं से भरे कुन्तल। शारदीय नभ की छटा पर एक भीमकाय काला बरसाती बादल। इस विरोध में, इस अचानक खण्डन में निहित अपूर्व भैरव कविता ही में इसकी सिद्धि है...... सिद्धि कैसी-काहे की, मेरी मृत्यु की क्या सिद्धि होगी। मेरे जीवन की क्या थी।

उद्धरण - 931

उससे यह भी साबित होता है कि समाजवादी समाज की स्थापना के सिलसिले में हमने पहले तो घोड़े और मनुष्य के बीच भेदभाव को मिटाया है और अब मनुष्य के बीच भेदभाव को मिटाने की सोचेंगे। खाद्य-विज्ञान का सिद्धान्त है कि आदमी की अक़्ल तो घास खाकर ज़िन्दा रह लेती है, आदमी खुद इस तरह नहीं रह सकता।

उद्धरण - 930

उनमें कई शोहदे थे, कई मनोविकारग्रस्त, कई सच्चे आशिक़ थे। चाचा सच्चे आशिक़ थे वह पास से बलवंत कौर के गुज़र जाने पर ख़मोश उसके पीछे पीछे साइकिल घसीटते हुए चलते रहते थे। बलवंत की चाल धीमी होती चाचा की चाल धीमी हो जातीं। वह तेज़ चलने लगती चाचा भी तेज़ चलने लगते। वह रुकी चाचा रुके।

उद्धरण - 929

गौरा, कोई किसी के जीवन का निर्देशन करे, यह मैं सदा से गलत मानता आया हूँ। तुम जानती हो! दिशा-निर्देशन भीतर का आलोक ही कर सकता है, तुम्हें जो राह दिखती है, उस पर चलो गौरा।

उद्धरण - 928

इस देश की मिट्टी की तासीर ही शायद कुछ ऐसी है कि बड़े-से-बड़े क्रांतिकारी और धर्म को अफीम माननेवालों तक की नाव अंत में इसी ठांव पर आ लगती है। किशोर बाबू इन दिनों सिर्फ एक ही पुस्तक का अध्ययन-पठन-मनन कर रहे है और वह है -‘श्रीमद्भगवत्गीता।‘

उद्धरण - 927

जो ‘स्वभावतः विद्रोही’ होते हैं, उनकी विद्रोह-चेष्टा बौद्धिक नहीं होती, उसका मूलोद्भव एक भावुकता से होता है । कभी वह भावुकता बौद्धिक विद्रोह से परिपुष्ट भी होती है, तब वह विद्रोही अपनी छाया देश और काल पर बिठा जाता है ।

उद्धरण - 926

एक गुस्सा कमजोरी होता है, एक गुस्सा कर्तव्य होता है। अगर अपने राष्ट्र का अपमान होता है, तो उस पर रोष राष्ट्र के और समाज के प्रति कर्तव्य होता है- वह रोष हमें देश को देना ही है। नहीं तो हममें भीतर कहीं प्राणों की जगह कचरा भरा हुआ है।

उद्धरण - 925

मेरे मन में एक विचित्र भाव उठता है। चाँद एक कन्या है और यह पृथ्वी का काला सौन्दर्य उसका आवरण। किन्तु चाँद इतना सुन्दर है कि इस आवरण को उसे ढँक रखने का अधिकार नहीं है। इसलिए चाँद ने उसे उतार फेंका है और निरावरण होकर क्षितिज से ऊपर आ गया है।

उद्धरण - 924

कीड़े-मकोड़े और भुनगे, मक्खियाँ और मच्छर-परिवार-नियोजन की उलझनों से उन्मुक्त-वहाँ करोड़ों की संख्या में पनप रहे थे और हमें सबक़ दे रहे थे कि अगर हम उन्हीं की तरह रहना सीख लें तो देश की बढ़ती हुई आबादी हमारे लिए समस्या नहीं रह जाएगी।

उद्धरण - 923

शुबहा था कि इसमें सचाई बिल्कुल नहीं है, यह दूसरे कॉलेजों के लड़कों की शरारत भर है लेकिन यह वह समय था जब सत्य और अफ़वाह, किस्से और हक़ीक़त, जनसेवक और दमनकर्ता, शरीर और उसकी परछाई का भेद मिट गया था। आंतक अंतश्चेतना में इस क़दर प्रवेश कर गया था कि युवा एक हाथ से साइकिल चलाने का अभ्यास करने लगे थे। भतीजा चूंकि कैंची चलाता था इसलिए एक हाथ से साइकिल दौड़ाने के रियाज़ में बार बार गिर जाता था। चाचा और भतीजा जल्द ही इतना भयभीत हो गये कि वे सोते समय, खाते समय,नहाते समय-हर समय अपना एक हाथ लिंग की रक्षा में तैनात किये रहते।

उद्धरण - 922

.....मानों पूरा दृश्य अजायब घर के कॉच के शो-केश में रखा हुआ एक मॉडल हो। केवल पहाड़ उभरकर बड़े भारी और तीखे हो जाते हैं, जैसे आकाश के तेवर चढ़ गए हों,....... यह अलसाना भाव ही पहाड़ के शरदारम्भ का पहला और सबसे प्रीतिकर चिन्ह होता है- सबसे प्रीतिकर भी, लेकिन साथ ही एक विशेष प्रकार की व्याकुलता लिए हुए.....उस व्याकुलता को रेखा नाम देना नहीं चाहती, नाम देना आवश्यक भी नहीं है, क्योंकि धमनियों में उसकी अकुलाहट के साथ मन में जो विचार या वांछा चित्र उठते हैं, वे अपने आपमें सम्पूर्ण होते हैं।

उद्धरण - 921

अपना ज्ञान प्रकट कर देंगे, तो बेकार संसार के चक्कर में पड़ेगे। कोई मान देगा, तो अहंकार होगा। कोई अपमान करेगा, तो अहंकार को कष्ट होगा। इससे अच्छा है कि पागल की तरह रहा जाए। पागल से न कोई उम्मीद करता है, न कोई उसकी बात का बुरा मानता है। जो पागल नहीं है उसे हर समय सतर्क रहना पड़ता है कि वह जो बोल रहा है, उसका क्या असर होगा। पागल आदमी अपनी मौज में रह सकता है। न किसी का डर, न कोई खटका।

उद्धरण - 920

परिधियाँ, बन्धन, बहुत व्यक्तियों को अधोगामी बनाते हैं, किन्तु कुछ ऐसे भी होते हैं, जो उसकी स्फूर्तिदायिनी उत्तेजना के बिना जी ही नहीं सकते ...

उद्धरण - 919

दुख की छाया एक तरह की तपस्या ही है- उससे आत्मा शुद्ध होती है। दुख उसी की आत्मा को शुद्ध करता है, जो उसे दूर करने की कोशिश करता है और किसी का नहीं।

उद्धरण - 918

हम लोग खूब बढ़िया इमारत बनाते हैं, एक एक पत्थर जोड़कर मन्दिर सजाते हैं, लेकिन अन्त में जब पलस्तर होने लगता है, तब सारा घटाघोप पैरों की धूल हो जाता है, मिट्टी में मिल जाता है.......यह क्यों, यह इसलिए कि हमारे आदर्श डर की भीत पर कायम हैं, हमारे विशाल भवनों की नींव खोखली है और जैसा कि शास्त्र भी कहते हैं, हमारे देवताओं के पैर भूमि पर नहीं टिकते हैं, समाज की सड़ती हुई हड्डियों को भड़कीले लाल रेशम में लपेटकर हम कहते हैं- देखो, हमारा युवक समुदाय....।

उद्धरण - 917

तो बुद्धिजीवी, पर विलायत का एक चक्कर लगाने के लिए यह साबित करना पड़ जाय कि हम अपने बाप की औलाद नहीं हैं, तो साबित कर देंगे चौराहे पर दस जूते मार लो, पर एक बार अमरीका भेज दो-ये हैं बुद्धिजीवी!

उद्धरण - 916

उनका वेतन कई महीनों से स्थगित था। क्योंकि वह केस नहीं ला सके थे। केस नसबंदी कराने वाले का कहते थे। आपातकाल में सरकार का सबसे केन्द्रीय कार्यक्रम था-परिवार नियोजन। इसके लिए हर जनपद हर तहसील में नसबंदी की ज़ोराज़ोरी थी। प्रत्येक सरकारी मुलाज़िम के लिए नसंबदी का केस लाने का फ़रमान था। यदि वह अपने कोटे के केस नहीं ला पाता था तो उसकी तनख़्वाह रोक दी जाती थी।

उद्धरण - 915

हाँ ! सत्य सापेक्ष्य ही है। निरपेक्ष वह हो ही कैसे सकता है? निरपेक्ष तो चीजें हैं-पदार्थ। पदार्थ सत्य नहीं है, निरा पदार्थ। सत्य तो पदार्थ का हमारा बोध है- और बोध व्यक्तिगत है।

उद्धरण - 914

लोग तो पता नहीं, क्या क्या कर लेते हैं। नकली कंपनी बनाकर बाजार से करोड़ों रुपए शेयर उठा लेते हैं। कहीं कारखाना बनता नहीं, लेकिन गवर्नमेंट से करोड़ों रुपए ‘लोन‘ पर ले लेते हैं। यह सी आर भंसाली का कांड हुआ था न, उसने मेरे बंबईवाले दोस्त को अढ़ाई सौ करोड़ रुपए गवर्नमेंट से लोन दिलाया था। इसीलिए तो मारवाड़ी बदनाम हैं। उन्हें ऐसे ही भारत के ‘ज्यूज‘ (यहूदी) थोड़े ही कहा जाता रहा है। और एक बात सुन लीजिए पापा पहले जमाने में इस तरह आदमी शांति से रह सकता था। आज नहीं रह सकता।

उद्धरण - 913

जो एक बार अपनी इच्छा से पतित होता है, उसका उत्थान होना असम्भव है । कोई उसका मित्र नहीं होता, कोई उसकी सहायता नहीं करता । मेरे लिए यही जीवन है-- यही जिसे एक दिन मैंने इतनी व्यग्रता से अपनाया था, और जिसने आज साँप की तरह मुझे अपने पाश में बाँध लिया है!

उद्धरण - 912

दुख संसर्ग-जन्य है, वह उदात्त और शोषक भी है। दुख का संसर्ग परिवर्ती को भी शुद्ध और उदात्त बनाता है।

उद्धरण - 911

मूल समस्या सामंजस्य की है, प्यार एक आकर्षण है, एक शक्ति है, जिससे जीवन की स्थितिशीलता विचलित हो जाती है, यह विचलन की समस्या है, क्योंकि वह व्यापक है, मौलिक है, जीवन के तलवार की धार पर-असंख्य धारों पर सधे हुए समतोल को डगमगा जाती है-

उद्धरण - 910

वजह यह है कि जैसे बुद्धिमत्ता एक वैल्यू है, वैसे ही बेवकूफ़ी भी अपने-आप में एक वैल्यू है। बेवकूफ़ की बात चाहे तुम काट दो, चाहे मान लो, उससे उसका न कुछ बनता है, न बिगड़ता है।

उद्धरण - 909

बाद में जब इमरजेन्सी हटी तो नाइयों की दुकानों पर ऐसी भीड़ उमड़ी कि लग रहा था कि तानाशाही के ख़ात्मे का जश्न मनाने वालों के जुलूस निकलें हों। सैलूनों के सामने लम्बी लम्बी लाइनें इतनी जोशीली, अनुशसित और उमंगभरी थीं कि भ्रम होता था कि पंक्तियों में खड़े इन्सान बाल कटाने नहीं मतदान के लिए लाइन में खड़े है।

उद्धरण - 908

जीवन में आनन्द सब-कुछ नहीं है, पर बहुत बड़ी चीज है, और वह सुखों में नहीं है, है वह मन की एक प्रवृत्ति।

उद्धरण - 907

सुनील गावस्कर से कमेंटेटर पूछता है- ”आपके पास लिखने का ‘फ्लेयर‘ (सहज प्रवृति) कहां से आया?” सुनील गावस्कर जेब से ‘फ्लेयर कंपनी का पेन निकालकर कहता है- ”क्योंकि मैं फ्लेयर पैन से लिखता हूँ।”

उद्धरण - 906

लोग कहते हैं, जब तक विकल्प रहता है, तब तक अशान्ति रहती है, जब आदमी किसी ध्रुव पर पहुँच जाता है तो उसे शान्ति मिल जाती है ।

उद्धरण - 905

जो युद्धमुख से भागता है, अपनी पराजय से भागता है, उसके लिए कदम-कदम पर और युद्ध है, और पराजय है, जब तक कि वह जान न ले कि अब और भागना नहीं है, टिककर लड़ने न लगे...जीवन से भागना? आगे और जीवन है, जीवन तो रुक नहीं सकता, उसका तो विस्तार समाप्त नहीं हो सकता....

उद्धरण - 904

प्रायः लोग संतान पर माँ के प्रभाव की बात कहा करते हैं। बहुतों को विश्वास है कि सभी असाधरण व्यक्तियों पर उनकी माँ का प्रभाव, पुत्रियों पर पिता के प्रभाव की तरह नकारात्मक होता है। वह स्थिरता देता है, उत्थान में भी उतना ही बाधक होता है, जितना कि पतन में। यों कहना चाहिए, माँ की ओर आकर्षित पुत्र और पिता की ओर आकर्षित कन्या साधारणता की ओर, सामान्यता की ओर जाते हैं, और पिता की ओर आकृष्ट पुत्र, माता की ओर आकृष्ट कन्या असाधारण होते हैं।.....

उद्धरण - 903

देश में पेशेवर कोशकारों और उनकी समितियों का जाल बिछा है जो अंग्रेजी शब्दों के लिए हिन्दी और दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं के शब्द रच रहे हैं। यह काम काफ़ी दिलचस्प है क्योंकि एक ओर कमरे के भीतर एक नयी भाषा का निर्माण हो रहा है, दूसरी ओर इतना वक़्त भी लग रहा है कि निर्माणकर्ता पेंशन पाने-भर की नौकरी पूरी कर लें।

उद्धरण - 902

पीटने की धम्म धम्म आवाज़ें ज़रुर हो रही थीं पर वे मुझे नहीं मैं उनको पीट रही थी। मुझ पर ख़ून सवार हो गया था। जाने कहां की हिम्मत आ गयी थी। लेकिन उन्होंने दरवाज़ा नहीं खोला और न दूसरे को खोलने दिया। कहा किसी ने दरवाज़ा खोला तो वह अपने पेट में चाकू घोंप लेंगे। बस यहीं मैं हार गयी। वह मुझे मार डालेंगे, इस धमकी से डर लगता है पर इससे बहुत ज़्यादा ख़ौफ़नाक है यह धमकी कि वह अपने को मार डालेंगे।

उद्धरण - 901

ऐसे वाद्यों का महत्व यह है कि मौलिक प्राकृतिक शक्तियों से, प्रकृति के क्रीड़ा-कल्लोल से, सम-स्वरता वे ही सब से अच्छी तरह कर सकते हैं- हवा, बादल, आँधी, पानी, बिजली, लहर, दावानल, जलप्रपात-ढोल-मार्दल-मृदंग-तबले की थाप मानव को जिस सहज भाव से इनके निकट ले जा सकती है, इन के साथ एकतानता स्थापित कर सकती है, और वाद्य नहीं कर सकते.......

उद्धरण - 900

‘डायरेक्ट एक्शन डे‘ के दिन दोपहर को मुसलमानों की एक बड़ी रैली ‘ऑक्टरलोनी मोन्यूमेंट‘ के पास सारे शहर के विभिन्न भागों से आकर होनेवाली थी। सरदार पटेल ने अपनी निर्मल शैली में इस घटना का उपसंहार इन शब्दों में किया - ”इसमें हिंदुओं का पलड़ा भारी रहा।” इस दंगे की अवधि एक साल से अधिक दिनों तक जाती है, जिसमें कलकत्ता में लगातार खून-खराबा होता रहा। सोलह अगस्त का ही परिणाम नोआखली और बिहार के दंगे थे। इस दंगे को इतिहास में द ग्रेट कैलकटा किंलिग के नाम से जाना जाता है। इसी ‘किंलिग‘ ने देश और बंगाल के विभाजन पर एक तरह से मुहर लगा दी।

उद्धरण - 899

कहानी जीवन की प्रतिच्छाया है, और जीवन स्वयं एक अधूरी कहानी है, अधूरी कहानियों का संग्रह है, एक शिक्षा है, जो आयु-भर मिलती रहती है और समाप्त नहीं होती ।

उद्धरण - 898

स्त्री हमेशा से अपने को मिटाती आयी है। ज्ञान सब उसमें संचित है, जैसे धरती में चेतना संचित है। पर बीज अंकुरित होता है, धरती को फोड़कर, धरती अपने आप नहीं फूलती-फलती। मेरी भूल हो सकती है, पर मैं इसे अपमान नहीं समझती कि सम्पूर्णता की ओर पुरुष की प्रगति में स्त्री माध्यम है- और वही एक माध्यम है।

उद्धरण - 897

....जो भी शिक्षित हैं, जो संस्कारी जीवन के सूक्ष्मतर स्पन्दनों को पहचानते हैं, वे स्पन्दन जो निरे शिष्ट लोकाचार से कुछ गहरे हैं, वे जीवन के महान क्षणों में-प्रेम के या किसी भी गहरे भाव के विलोड़न के क्षण में सहसा पाते हैं कि उसमें पूर्णता नहीं है, तन्मयता, चूड़ान्त तद्गति नहीं है, है एक अद्भुत असंगत तटस्थता, स्वयं अपने भावों से एक प्रकार का अलगाव, जो कर्ता को ही कर्म का दर्शक और आलोचक बना देता है--अर्थात अपने को अपनेपन की सम्पूर्णता से बहिष्कृत कर देता है......

उद्धरण - 896

हमारा देश भुनभुनानेवालों का देश है। दफ़्तरों और दुकानों में, कल-कारखानों में, पार्कों और होटलों में, अख़बारों में, कहानियाँ और अ-कहानियों में चारों तरफ़ लोग भुनभुना रहे हैं। यही हमारी युग-चेतना है और इसे वह अच्छी तरह से जानता था। लगभग सभी किसी-न-किसी तकलीफ़ में थे और कोई भी तकलीफ़ की जड़ में नहीं जाता था। तकलीफ़ का जो भी तात्कालिक कारण हाथ लगे, उसे पकड़कर भुनभुनाना शुरू कर देता था।

उद्धरण - 895

दरअसल औरत, जाति और धर्म- इन तीनों के नाम पर बुज़दिल, नरमदिल, नेकदिल भी ख़ौफ़नाक बन जाता है। एक डरपोक इन्सान अपनी स्त्री के सामने बाघ बना रहता है। इसी तरह धर्म के नाम पर होने वाले दंगों में देखो, जो लोग रोज़मर्रा की ज़िदगी में घायल परिन्दों देख कर दुखी हो जाते हैं चींटियों को आटा खिलाते हैं, बंदरों को चना- वे भी दंगों में इन्सान के ख़ून की होली खेलने की बात करने लगते हैं तो ये है वो ख़ुदा का बंदा, परमेश्वर का सपूत जो दूसरे मज़बह के लोगों की लाशों को धरती का बिछौना बनाना चाहता है। और जो जाति है न शोर कम मचाती है ख़ून भी कम बहाती है पर भीतरी हिंसा करती है। ये मामूली से मामूली बात में मौजूद रहती है और बड़ी से बड़ी बात में भी। वाक़ई इसकी हिंसा दिखे भले न पर होती हर जगह है। जन्म से मौत तक यह चिपकी रहती है।

उद्धरण - 894

यह सीखना होगा कि नीति से अलग विज्ञान बिना सवार का घोड़ा है, बिना चालक का इंजनः वह विनाश ही कर सकता है। और संस्कृति से अलग विज्ञान केवल सुविधाओं और सहूलियतों का संचय है, और वह संचय भी एक को वंचित कर के दूसरे के हक में, और इस अम्बार के नीचे मानव की आत्मा कुचली जाती है, उस की नैतिकता भी कुचली जाती है।

उद्धरण - 893

मरने के भय से आदमी मौत के पहले ही मर जाता है और मरा हुआ आदमी उत्साह, खुशी, कृतज्ञता कैसे अनुभव कर सकता है?

उद्धरण - 892

आत्मा है, तो सारे शरीर में व्याप्त है, या किसी एक अंग में रहती है? अगर सारे शरीर में, तो अंग कट जाने पर क्या आत्मा भी उतनी ही कट जाती है? अगर एक अंग में, तो अंग कट जाने पर क्या होता है?.......जब कोई अंग कटता है, तो उसमें से आत्मा सिमटकर बाकी शरीर में आ जाती है, पंगु नहीं होती ।

उद्धरण - 891

सबमें शाश्वत नीति के नाम पर तीन समान सूत्र- कि सन्तोष कर, सत्य बोल, और अगम्य-गमन न कर। गहरे जाकर देखें तो ये क्या हैं? तीन बड़े निषेध- पहला मानव की स्वाभाविक लोभवृत्ति का निषेध, दूसरा उसके सहज भय का निषेध, और तीसरा उसकी सहज द्वन्द्व वृत्ति का वर्जन!

उद्धरण - 890

साहित्यकार को निर्माण करके और लाभ भी तो क्या, रचयिता होने का सुख भी नहीं मिलता, क्योंकि काम पूरा होते ही वह देखता है, ‘अरे, यह तो वह नहीं है जो मैं बनाना चाहता था, वह मानों क्रियाशीलता का नारद है, उसे कहीं रुकना नहीं है -- उसे सर्वत्र भड़काना है, उभारना है, जलाना है और कभी शान्त नहीं होना है - कहीं रुकना नहीं है।

उद्धरण - 889

उन्होंने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में पिछली शताब्दी की यह एक असाधारण उपलब्धि है कि हम इतनी जल्दी जान गए कि हमारी शिक्षा-प्रद्धति ख़राब है।

उद्धरण - 888

हर दो स्टेशनों के बीच अनेक गांव होते हैं। दो बड़े स्टेशनों के बीच सैकड़ों गांव होते हैं। इन गांवों के बहुत से लोग अपना ठिकाना छोड़ शहर में आ बसते हैं। उस दिन क्या होगा जब गांव ख़ुद अपने बाशिन्दों के साथ या उनके बग़ैर शहरों में आ जायें।

उद्धरण - 887

असल में सब सिद्धान्त क्षतिपूरक होते हैं- आप जो हैं, जैसे हैं, उस से ठीक उल्टा सिद्धान्त गढ़ कर उस का प्रचार करते फिरते हैं। इस से एक तो आप अपने लिए एक सन्तुलन स्थापित कर लेते हैं, दूसरे औरों को गलत लीक पर ढाल देते हैं ताकि आप को ठीक-ठीक कोई पकड़ न पा सके।

उद्धरण - 886

हम सब मरे हुए लोग हैं। तभी हम जी पा रहे हैं - खा रहे हैं हंस-बोल रहे हैं, खरीद रहे हैं भविष्य की योजनाएं बना रहे हैं।

उद्धरण - 885

क्या यह कलाकार का दम्भ ही नहीं है कि वह पराजय को भी सुघर रूप देना चाहे! अन्त का सौन्दर्य उसकी सुचारुता में, सुघराई में नहीं है, करुणा में भी नहीं है, वह उसके अपरिहार्य अन्तिमपन और काठिन्य में है.......अन्त सुन्दर है क्योंकि वह महान है, क्योंकि हम उसका कुछ नहीं कर सकते, उसे केवल स्वीकार कर सकते हैं.......

उद्धरण - 884

आपके चेहरे पर दीखता है। नया चेहरा हमेशा प्रश्नों से भरा हुआ होता है- वह जानना चाहता है। पुराने पानी तो ताक में रहते हैं कि कोई सुनने वाला मिले। जीवन समाप्त होने पर एक ही बात बची रहती है-उसकी कहानी!

उद्धरण - 883

करोड़ों वर्षों से मानव की एक ही चेष्टा रही है- कि या तो सुख पा ले, या उसकी कामना को खो दे, और इन दोनों में ही वह असफल रहा है.....

उद्धरण - 882

एक पुराने श्लोक में भूगोल की एक बात समझाई गई है कि सूर्य दिशा के अधीन होकर नहीं उगता। वह जिधर ही उदित होता है, वही पूर्व दिशा हो जाती है। उसी तरह उत्तम कोटि का सरकारी आदमी कार्य के अधीन दौरा नहीं करता, वह जिधर निकल जाता है, उधर ही उसका दौरा हो जाता है।

उद्धरण - 881

धार्मिक नगरी से राजधानी के इस रास्ते पर डीजल गाड़ियां फर्राटा लेकर दौड़ती थीं जबकि सांस्कृतिक और बौद्धिक नगरी इलाहाबाद रास्ते पर एक भी डीजल वाली ट्रेन नहीं चलती थी।

उद्धरण - 880

हर व्यक्ति एक अद्वितीय इकाई है, और हर कोई जीवन का अन्तिम दर्शन अपने जीवन में पाता है, किसी की सीख में नहीं। पर दूसरों के अनुभव वह खाद हो सकते हैं जिस से अपने अनुभव की भूमि उर्वरा हो....

उद्धरण - 879

अब पता चल रहा है कि न जाने कितनी लड़कियों ने इसलिए आत्महत्या की है क्योंकि उनके पास शरीर ढंकने तक को कपड़े नहीं थे। कितनी लड़कियों ने अपने आप को इसलिए बेंचा कि उनके पेट की भूख उनकी अंतड़ियों को खाने लगी थी।

उद्धरण - 878

अगर एक दिन के लिए, कालिदास, या रवि ठाकुर, या माइकेल एंजेलो, या शेषन्ना हो सकता, तो मुझे जितना आनन्द, जितना अभिमान होता, उतना एक समूचे राष्ट्र का विधाता होकर भी नहीं हो सकता । परन्तु उस जीवन का, उस जीवन के सौ वर्षों का, मैं देश की सेवा में बिताए हुए एक क्षण के लिए प्रसन्नता से उत्सर्ग कर दूँगा, क्योंकि मुझे अपने उत्तरदायित्व का ज्ञान है, मैं जानता हूँ कि एक दासताबद्ध देश को कवियों और कलाकारों की अपेक्षा योद्धाओं की अधिक आवश्यकता है....

उद्धरण - 877

उनका मौन उनकी व्यथा को धर दे देगा, जिस पर मैं हर समय कटती रहूँगी.....मैं अपना युद्ध लड़ सकती हूँ, पर मुझे क्या अधिकार है, मैं उनसे अपना युद्ध लड़वाऊँ?......और अगर किसी को मूक होकर जलना ही है, तो वह कोई मैं ही क्यों नहीं होऊँ?

उद्धरण - 876

मानव-स्वभाव विश्वासी तो है ही। और जब विश्वासी है, तब पक्षपात लेकर चलता ही है। प्रिजुडाइस्ड होता ही है। तब क्यों न हम संसार को अच्छा ही समझ कर चलें? तर्कसिद्ध तो कोई भी बात नहीं है, पर एक से हम प्रसन्न तो रह सकते हैं, आराम से जी तो सकते हैं, हर वक्त बिस्तर पर तो नहीं पड़े रहते!

उद्धरण - 875

सनीचर को देखकर यह साबित हो जाता था कि अगर हम खुश रहें तो गरीबी हमें दुखी नहीं कर सकती और ग़रीबी को मिटाने की असली योजना यही है कि हम बराबर खुश रहें।

उद्धरण - 874

एक जनपद दूसरे जनपद की गतिविधियों से नावाक़िफ़ हो रहा था लेकिन शहर शहरों से जुड़ रहे थे। विचार, संस्कृतियां और भावनाएं यात्रा नहीं कर रही थीं मगर मुसाफ़िरों को इस पार से उस पार उतारने का अभियान छिड़ गया था।

उद्धरण - 873

व्यक्तित्व की अपनी लीकें होती हैं- एक रूझान होता है। और उस के आगे, व्यक्ति अपने वर्तमान और भविष्य के बारे में जो समझता है, जो कल्पना करता है, मनसूबे बाँधता है, उन से भी तो एक लीक बनती है- लीक कहिए, चौखटा कहिए, ढाँचा कहिए। या कह लीजिए दुनिया में अपना एक स्थान।

उद्धरण - 872

किसी फकीरी, साधुपने की किसी प्रणाली में सत्य नहीं छुपा है। प्रणाली तो एक सहारा है पर अक्सर सहारा ही लत बन जाता है। और फिर कहीं कोई नहीं पहुंचता।

उद्धरण - 871

उड़ जाने वाली चीजों को प्यार नहीं करना चाहिए। छोड़कर चली जाती हैं तो दुःख होता है।

उद्धरण - 870

आप हमारे दुख में आकर मिल गए, हमें उसमें सांत्वना भी मिली, पर आपका कर्तव्य क्या वहीं तक था? दुख सब जगह है। आप उसे एक ही जगह समझ कर उसकी छाया में रहना चाहते हैं, और आपका जो काम है, उसमें अनिच्छा दिखा रहे हैं। आप कालेज जाइए

उद्धरण - 869

उसने देख-समझ लिया-कि कोई किसी का नहीं है, यानी इतना नहीं है कि उसका स्वामी निर्देशक, भाग्य-विधायक बन सके। कोई ऐसा नहीं है जिस पर निर्भर किया जा सके, जिसे प्रत्येक बात में पूर्ण, अचूक माना जा सके। यदि किसी का कोई है, तो उसकी अपनी बुद्धि, मनुष्य को उसी के सहारे चलना है, उसी के सहारे जीना है, ऐसे स्थान अवश्य है जहाँ बुद्धि जवाब दे जाती है, लेकिन इसमें वह ईमानदारी है जो बात नहीं जानती, वहाँ पर चुप रहती है, गलत उत्तर नहीं देती।

उद्धरण - 868

हिन्दुस्तान में पढ़े-लिखे लोग कभी-कभी एक बीमारी के शिकार हो जाते हैं। उसका नाम ‘क्राइसिस ऑफ़ कांशस‘ है। कुछ डॉक्टर उसी में ‘क्राइसिस ऑफ़ फे़थ‘ नाम की एक दूसरी बीमारी भी बारीकी से ढूँढ़ निकालते हैं। यह बीमारी पढ़े-लिखे लोगों में आमतौर से उन्हीं को सताती है जो अपने को बुद्धिजीवी कहते हैं और जो वास्तव में बुद्धि के सहारे नहीं, बल्कि आहार-निद्रा-भय-मैथुन के सहारे जीवित रहते हैं (क्योंकि अकेली बुद्धि के सहारे जीना एक नामुमकिन बात है)

उद्धरण - 867

जब सूर्य मुझसे मिला था तब उसमें कितने सारे अपनों का प्यार, इज़्ज़त और आशीष था, उसके अंदर कितने सारे पुरखे थे और उनका संचित था। स्मृतियों की ऊंची तथा अभेद्य दीवारों के भीतर तमाम रिश्तों के ज़िरहबख्तर से लैस था वह। पर कैसे वे समस्त मिल कर मेरी एक चितवन के सामने कारगर न हुए- सूर्य मेरा हो गया।

उद्धरण - 866

अन्तिम समय में मानव को अनुताप होता है, तो अपने किये हुए पाप पर नहीं, पुण्य करने के अवसरों की चूक पर नहीं, अनुताप होता है किये हुए नीरस पुण्यों पर, रसीले पाप कर सकने के खोये हुए अवसरों पर......

उद्धरण - 865

जब हम एक बार ‘रूप‘ को स्वीकार कर लेते हैं, तो हम कुछ भी फेंक नहीं सकते। न जाने सत्य किस ‘रूप‘ में छुपा हो। हर एक रूप का एक नाम है और एक गुण भी। बस तब हम रूप की इतनी भीड़ में उलझे रह जाते हैं। लेकिन अफसोस हर रूप की आत्मा हमसे ओझल रहती है।

उद्धरण - 864

एक हम हैं कि आते हैं तब रोना-चिल्लाना और दर्द; जाते हैं तब रोना, पीटना और तड़पन; रहते हैं तब झींकना, कलपना और हो हल्ला। पर इनका जीवन कितना सरल होता है! दिन-भर भूखे रहते हैं, दुःख झेलते हैं, रोते-कलपते हैं; किन्तु जब रात को सोने लगते हैं, तब शान्त और सन्तुष्ट! इनका जीवन कैसा सदा प्रेम से भरा रहता होगा- इनके जीवन में तो एक ही भावना होती होगी-- प्रेम की । लोभ, मोह और क्रोध के लिए इनमें स्थान कहाँ होगा?

उद्धरण - 863

हम लोग तकल्लुफ नहीं चाहते-आदमी-आदमी के सीधे सम्बन्ध में वह विघ्न है। हम इन्सान को इन्सान कहकर जानना चाहते हैं, समाज के लिपे-पुते ‘स्केयर क्रो’ (डरौना) के रूप में नहीं।

उद्धरण - 862

दूर से देखा जाए, तो मानवता का सारा विकास ही कम से कम अभी तक, यही है। मानवता कुछ चाहती है, लेकिन जानती नहीं कि क्या, और उसे जानने की खोज में, अनेक रास्ते पर एक साथ ही भटक रही है....मानो सारी मानवता, अपने जीवन की गति में, किसी दीर्घ वयःसन्धि् पर खड़ी है और अपने से उलझ रही है, उसका यौवन उसके कृतित्व के दिन अभी आगे हैं।

उद्धरण - 861

लड़के भी खुश थे। वे जानते थे कि जितनी देर में एक गोल से दूसरे गोल तक एक ढेले-बराबर गेंद के पीछे हाथ में स्टिक पकड़े हुए वे पागलों की तरह भागेंगे, उतनी ही देर में वे ताड़ी का एक कच्चा घड़ा पी जाएँगे, या लग गया तो दाँव लगाकर चार-छः खींच लेंगे।

उद्धरण - 860

ये सूर्यकांत अपनी नवब्याहता को लेकर जहां अपने कमरे पर जायेगा वह कमरा गंदगी से अधमरा होगा। वह युद्धभूमि की तरह होगा जहां कपड़े एंव किताबें रणभूमि में शवों, घायलों और नरमुंडों की तरह इधर उधर बिखरी पड़ी होंगी। सिगरेट के टुकड़ों से भरे हुए गिलास इस प्रकार लग रहें होंगे जैसे पराजित सेना के बंदी योद्धाओं की उंगलियां काट कर इन बरतनों में ठूंस ठूंस कर रख दी गयी हों।

उद्धरण - 859

जीवन एक बार का वरण नहीं है, वह अनन्त वरण है, प्रत्येक क्षण हम स्वीकार और परिहार करते चलते हैं।

उद्धरण - 858

जिस हंसी के पीछे कारण होता है, वह कोई हंसी नहीं होती। कभी धूर्तता होती है, कभी हिंसा, कभी अभिमान। किशोर और शांतनु स्वामीजी के साथ जैसे हर घड़ी हंसने के लिए तैयार रहते हैं। बेमतलब हंसी। पद्मा नदी की तरह अनवरत बहती हंसी।

उद्धरण - 857

अगर हममें विनय नहीं है, हमें स्वीकार नहीं है, तो स्मृति केवल एक कीड़ा है जिसके दंश से फोड़े होते हैं, और हम केवल अपने फोड़े चाटते रहते हैं ।

उद्धरण - 856

यह भी मैं कह चुका हूँ कि जेल में आदमी स्वाभाविक ढंग से नहीं रहता या सोचता, उसका तर्क विकृत होता है। तब मेरी बात का क्या मोल? मेरे तो कुछ एक सूत्र हैं, जो मैनें अपनी तसल्ली के लिए गढ़ लिए हैं।

उद्धरण - 855

नग्नता का सत्य, सत्य की तरह नंगा, उसके जगत में नहीं था, आने नहीं दिया गया था, उसके लिए नग्नता झूठी थी, भद्दी थी, अवांछनीय और अदर्शनीय थी।

उद्धरण - 854

प्रजातन्त्र के बारे में उसने यहाँ एक नयी बात सुनी थी, जिसका अर्थ यह था कि चूँकि चुनाव लड़नेवाले प्रायः घटिया आदमी होते हैं, इसलिए एक नये घटिया आदमी द्वारा पुराने घटिया आदमी को, जिसके घटियापन को लोगों ने पहले से ही समझ-बूझ लिया है, उखाड़ना न चाहिए।

उद्धरण - 853

सूर्यकांत का उत्तर था- “गांधी जी की तरह मगर बग़ैर लाठी के।“

उद्धरण - 852

भुवन ने आनाकानी की। स्वयं उसने सफ़र एक दिन टाल जाने की बात सोची थी, पर रेखा को वैसा करते देख न जाने क्यों एक प्रतीप-भाव उस के मन में उमड़ आया- कि जो निश्चय किया सो किया, अब बदलना ढुलमुलपन है और ढुलमुलपन बुरी चीज है, आदमी की संकल्प-शक्ति दृढ़ होनी चाहिए, ऐसी दृढ़ कि बस फौलाद।

उद्धरण - 851

रोज सूर्योदय से पहले उठना। एक घंटे तारों की छांव के नीचे चलते हुए धीरे-धीरे होती उजास को देखते हुए उगते सूर्य को देखना। ‘दस मिनट शांत हो कर ध्यान‘। किसका ?- किसी का भी किसी ईश्वर के चित्र या ऊँ ध्वनि का। या अपने ही अंदर चलते रक्त प्रवाह के अनवरत संगीत का। चिड़ियों के कलरव का। गंगा के प्रवाह का। जिससे भी मन प्रसन्नता का अनुभव करे। टिके। ‘दो मिनट प्रार्थना‘। धन्यवाद-परक प्रार्थना। किस चीज का धन्यवाद। किस चीज की कृतज्ञता ? और किसके प्रति ?- जो भी अच्छा लगा था, लग रहा है, उसके स्रोत को धन्यवाद। ईश्वर है तो ठीक, नहीं तो प्रकृति, स्वयं अपने आप को। यही अहोभाव है। प्रार्थना कोई मांग नहीं -तन-मन-धन, परिवार किसी के लिए मांगना नहीं।

उद्धरण - 850

जब कोई आत्मीय मरता है, तब हम उसे याद करके रोते हैं, पर शीघ्र ही आत्मीय की स्मृति तो खो जाती है, किन्तु एक कोमल-सी कसक रह जाती है । हम रोते रहते हैं, पर पीड़ा के उद्रेक से नहीं, केवल अभ्यास के वश.....

उद्धरण - 849

अपने विचारों को इस चारदीवारी से बाहर मत भटकने दो। अपने सगों का विचार करके तुम उनकी यातना नहीं घटा सकते, न उन्हें कोई सुख पहुँचा सकते हो। उल्टे हर समय उनके क्लेश की याद से तुम अपनी दृढ़ता की नींव खोद रहे हो!

उद्धरण - 848

धोखा? एक धोखा क्या एक समूची जीवनी को, एक समूचे संघ को अनुप्रमाणित कर सकता है? धोखे में क्या शक्ति हो सकती है? धोखे के लिए मर सकते हैं, किन्तु क्या धोखे के लिए जिया भी जा सकता है?

उद्धरण - 847

उन्होंने देखा कि प्रजातन्त्र उनके तख़्त के पास ज़मीन पर पंजों के बल बैठा है। उसने हाथ जोड़ रखे हैं। उसकी शक्ल हलवाहों-जैसी है और अग्रेंज़ी तो अग्रेंज़ी, वह शुद्ध हिन्दी भी नहीं बोल पा रहा है। फिर भी वह गिड़गिड़ा रहा और वैद्यजी उसका गिड़गिड़ाना सुन रहे हैं। वैद्यजी उसे बार-बार तख्त पर बैठने के लिए कहते हैं और बार-बार समझाते हैं कि तुम ग़रीब हो तो क्या हुआ, हो तो हमारे रिश्तेदार ही, पर प्रजातन्त्र उन्हें बार-बार हुजूर और सरकार कहकर पुकारता है। बहुत समझाने पर प्रजातन्त्र उठकर उनके तख़्त के कोने पर आ जाता है और जब उसे इतनी सान्त्वना मिल जाती है कि वह मुँह से कोई तुक की बात निकाल सके, तो वह वैद्यजी से प्रार्थना करता है मेरे कपड़े फट गए हैं, मैं नंगा हो रहा हूँ। इस हालत में एक मुझे किसी के सामने निकलते हुए शर्म लगती है, मैं इसलिए, हे वैद्य महाराज, मुझे एक साफ़-सुथरी धोती पहनने को दे दो।

उद्धरण - 846

उस अपवित्र भूमि पर देवता पवित्र होने के लिए आते हैं। लंका युद्ध के बाद तमाम हत्याओं के पाप से मुक्त होने के लिए राम मेरे ज़िले के धोपाप नामक स्थान में आये थे। असलियत में धोपाप उस सरोवर का नाम है जिसमें स्नान करने पर सारे पाप धुल जाते हैं।

उद्धरण - 845

बाहर घूमते हुए उसे लगा, रेखा ने न केवल उसे क्षमा कर दिया है बल्कि उस के निकट भी आ गई है। उसे अचम्भा भी नहीं हुआ, क्योंकि स्त्रियों में यह होता ही है, जब बहुत अधिक दुत्कार देती हैं तब भीतर द्रवित भी हो जाती हैं। रेखा लाख असाधारण हो, पर स्त्री तो है?

उद्धरण - 844

दूसरी तरफ नेहरू ने कहा है कि यदि सुभाष बाबू जापानियों के साथ आए तो मैं हाथ में तलवार लेकर खुद उनका विरोध करूंगा। कम्युनिस्ट तो सुभाष बाबू को ‘क्विसंलिग‘ (गद्दार) कह ही रहे हैं। चारों तरफ घबराहट फैल गई। इसमें मेंहदी रचे हाथों की किसे फिक्र है ?

उद्धरण - 843

यह मानव हृदय की कमजोरी है, या सभ्यता से उत्पन्न एक गहरा विपन्न दुःखवाद या पीड़ा की व्यापकता और सार्वजनिक अनुभूति कि जहाँ हम आनन्द को एक भंगुर भावना मानते हैं, वहीं पीड़ा को अवश्यम्भावी और चिरन्तन समझते हैं...

उद्धरण - 842

मैंने चाहा था, तुम मुझे हँसता ही देखो- संसार मुझे हँसता ही देखे, पर ऐसे भी दर्द होते हैं, जो अभिमान से भी बडे़ हों। यही मैं आज सीख रहा हूँ- अच्छा हुआ कि इतना तीखा दर्द मुझे मिला! जाओ।

उद्धरण - 841

मैं क्यों हार माँनू? कोई विश्वास नहीं करता, न करे। मैं योग्य हूँ। योग्य बनूँगा, रहूँगा। इस चोट को चुपचाप सहूँगा, इस अपमान को पिऊँगा। अच्छा होता कि मैं कुत्ता होता, चूहा होता, दुर्गन्धमय कीड़ा-कृमि होता- बनिस्बत इसके कि मैं वैसा आदमी होता, जिसका विश्वास नहीं।

उद्धरण - 840

अदालत के एक पंच उन राजनीतिज्ञों की तरह थे जो यू एन ओ में समस्या से हटकर सिद्वान्त की बात करते हैं और इस तरह वे किसी का विरोध नहीं करते और बदले में कोई उनका विरोध नहीं करता। ’जनता शान्ति चाहती है’ हमारी सभ्यता की नींव विश्वबन्धुत्व और प्रेम पर पड़नी चाहिए’ आदि-आदि किताबी बातें सुनकर कमीना-से-कमीना देश भी सिर हिलाकर ’हाँ’ करने से बाज़ नहीं आता और उस राजनीतिज्ञ का भ्रम और भी फूल जाता है कि उसने कितनी सच्ची बात कही है।

उद्धरण - 839

जैसे कोई नक़ली सूर्य, गौरव घर से दूर हों- असली उसके पास रह गये हों। वह उनकी गिरफ़्त से आज़ाद नहीं हो पाती थी। वह उन दोनों की ख़ुशी, रुचियों, अनिच्छाओं, नाराज़गी इत्यादि की चहलपहल में जा गिरती थीं और उस गहरी खाईं से तभी उबर पाती थी जब वे घर वापस आ जाते थे।

उद्धरण - 838

भुवन, मर्द के आँसू मैंने पहले भी देखे हैं। बड़ी व्यथा के आँसू- इसलिए कि उस पुरूष ने मुझे खो दिया है। बड़ी ग्लानि के आँसू- इसलिए कि वह पुरूष मुझे पा लेना चाहता है और पा नहीं सकता। पर तुम्हारे आँसू- किसी पर छाँह करते हुए उस के लिए रोना नामर्दी नहीं है, भुवन....

उद्धरण - 837

आदमी को धीरज रखना होता है। किसी जगह आदमी अपनी साख एक दिन में नहीं जमा सकता। इसी बीच धीरज खो दे तो उससे बड़ी बेवकूफी कुछ नहीं। वक्त बड़ी चीज है।

उद्धरण - 836

ऐसी की तैसी दुनिया की। सोच ही सब रोगों की जड़ है, वही तो है जिससे छुटकारा लेना चाहिए । पाप-पुण्य क्या है? सोचें तो चोरी है, सोचें तो ठीक है । सब चोर हैं, सब भले हैं ।

उद्धरण - 835

रोगी की सुश्रूषा एक विज्ञान है, बुद्धि पर आश्रित है, उसमें भावना के लिए स्थान नहीं है। पाश्चात्य सभ्यता से आक्रान्त लोग उस भारतीय माँ पर हँसते हैं, जो रोगी बच्चे को डॉक्टर के पास नहीं ले जाती, छाती से चिपटा कर रात भर सुन्न बैठी रहती है......निरा प्रवृत्तिजन्य प्रेम- पशु-माता की आहट शिशु के लिए निर्बुद्धि व्याकुलता- ये वैज्ञानिक सुश्रूषा नहीं है, पर अनिवार्य तो है- कम से कम विज्ञान सी अनिवार्य- धमनी के स्पन्दन सी अनिवार्य.....और जहाँ विज्ञान अपनी लाचारी जानता है, वहाँ इस मूलवृत्ति की शक्ति ही एक शक्ति है, जो लाचार नहीं है- मृत्यु के आगे भी नहीं, क्योंकि मृत्यु सबसे पहले मृत्यु-भय है, और प्यार के वातावरण से घिरे हुए प्राण को वह भय छू नहीं पाता।

उद्धरण - 834

इतना अनुमान उसका अवश्य है कि उस दिन उसके भीतर जो जिज्ञासु असुर जागा था, उसके लिए कुछ भी असम्भव नहीं था, कुछ भी जघन्य नहीं था, कुछ भी नीतिभ्रष्ट नहीं था, क्योंकि वह असुर जघन्य और अनुकरणीय नीति और अनीति के विचार से, विचार-शक्ति मात्र से, कहीं अधिक पुराना था.....

उद्धरण - 833

इतिहास सबसे बड़ा मूर्तिभंजक है।

उद्धरण - 832

उस पेंटिंग में एक गांव था। जैसाकि गांव में होना चाहिए था : मिट्टी के घर, फूस की झोपाड़ियां, वृक्ष, मवेशी, तालाब, फ़सल भरे खेत, खलिहान आदि पेंटिंग के गांव में थे। खेतों में ख़ूब फ़सलें थी, पेड़ों पर ख़ूब फल थे, स्वस्थ तगड़े मवेशी थे और प्रसन्नचित मनुष्य थे। एक कुएं की जगत पर पानी भरती हुई स्त्री थी। इस पेंटिंग में विशेष यह था : सब बारिश के भीतर था। सांवरे बादलों से झमाझम बारिश हो रही थी।

उद्धरण - 831

मैं नहीं सोच सकता कि मैं कैसे किसी भी प्रकार की हिंसा कर सकता हूँ, या उस में योग दे सकता हूँ- पर अगर कोई काम मैं आवश्यक मानता हूँ, तो कैसे उसे इसलिए दूसरों पर छोड़ दूँ कि मेरे लिए वह घृण्य है? मुझे मानना चाहिए कि वह सभी के लिए- सभी सभ्य लोगों के लिए- एक-सा घृण्य है, और इसलिए सभी का समान कर्तव्य है.....

उद्धरण - 830

हर्षद मेहता, नरसिंह राव, चंद्रास्वामी, सुखराम, लालूप्रसाद यादव, जयललिता के नामों की एक सूची बनाकर एक बड़े लिफाफे में वे कतरनें जमा कर रहे हैं। एक दूसरे लिफाफे में बोसनिया का युद्ध, इराक-ईरान युद्ध, रूस में पावरोटी के लिए लंबी लाइन, इथोपिया के भूखे मरते बच्चों के चित्र उन्होंने डाल रखे हैं। तीसरे लिफाफे में बंगलूर की विश्वसुंदरी प्रतियोगिता, माइकल जैक्सन, देवराला सती के मामले में अभियुक्तों के दोषमुक्त होकर छूटने की सूचनाएं इकट्ठी की हुई हैं।

उद्धरण - 829

हम लोग मानते हैं कि पृथ्वी और आकाश पहले एक थे- पर दोनों को जोड़ने वाली धमनी इंसान ने काट दी । तब से दोनों अलग हैं और पृथ्वी का घाव नहीं भरता । ये हिमालय के बन्दर हैं, यहाँ की गर्मी में इनका रहना मुश्किल है । लेकिन ज्ञान के लिए वह कष्ट जरूरी है। आदमी के ज्ञान के लिए जानवरों का सुख क्या चीज़ है?

उद्धरण - 828

क्योंकि मेरा जो भोग है, उसमें माँ क्यों फँसें? उन्होंने काफी भोग लिया है। अब उन्हें अलग रहना चाहिए, शादी करके उन्होंने मुझे सौंप दिया था, अब जो होता है, उसका दायित्व क्यों लें? और मैं क्यों उन्हें लेने दूँ’

उद्धरण - 827

बालक दया भाव से भरकर उन बेचारे बच्चों की बात सोचता है जिनके माता पिता ‘गरीब लोग’ हैं और उनके लिए खिलौने नहीं खरीद सकते। और ना फल।

उद्धरण - 826

पर मन्दिर को दूर से देखते ही उसे विश्वास हो गया कि अपने देशवासी समय के बारे में सिर्फ़ दो सही शब्द जानते हैं और वे हैं अनादि और अनन्त। इसके सिवाय वे लगभग पचहत्तर वर्ष पुराने मन्दिर को आसानी से गुप्तकाल या मौर्यकाल में धकेल सकते हैं।

उद्धरण - 825

पांडे जी अपने पुरखों के लिए आपकी इतनी तड़प देख कर मुझे बहुत ख़शी हुई है। आज जब पुरखों को भुला देने में, हर समस्या के लिए उन्हें गुनहगार साबित करने में अपनी शान मानी जा रही है तब आप इतनी दूर से इस देश में आये हैं अपने बाबा के गांव की खोज में- ये बड़ी बात है।

उद्धरण - 824

कि अतीत के प्रति कोई बहुत बड़ी ग्रीवेंस होती तो वह भी कुछ बात होती- उसी की कडुवाहट एक सहारा हो जाती, एक उत्पीड़ित मसीहा की तरह मैं चल निकलता। बहुत से लोग इस उत्पीड़न के आक्रोश के सहारे ही जीते हैं- उस में से बड़े-बड़े जीवन-सिद्धान्त भी निकलते हैं और दूसरों का उत्पीड़न करने का जस्टिफिकेशन भी।

उद्धरण - 823

यह भला कौन कह सकता है कि किशोर बाबू की जिंदगी के ये पचास साल भारतवर्ष के ‘लोकतंत्र‘ के पचास सालों की तरह रहे हैं, जिनमें आजादी की लड़ाई के आदर्शों की खुरचन तक नहीं रही।

उद्धरण - 822

युद्ध में इनसान का गुण-दोष सब चरम रूप लेकर प्रकट होता है । मुश्किल यही है कि गुण प्रकट होते हैं तो मृत्यु के मुख में ले जाते हैं, दोष सुरक्षित लौटा लाते हैं । युद्ध के खिलाफ यह कम बड़ी दलील नहीं है- प्रत्येक युद्ध के बाद इनसान चारित्रिक दृष्टि से और गरीब होकर लौटता है ।

उद्धरण - 821

‘इसमें समझने की क्या बात है? ऐसा कौन है जो जीवन में सिक्योर होना नहीं चाहता? नहीं तो यह बीमा, प्राविडेण्ट फण्ड, पेंशन आदि का रिवाज ही कैसे होता? आजकल तो कोई नौकरी करता है, तो पहले पूछता है कि पेंशन का प्राविडेण्ट फण्ड है या नहीं। क्यों, मेरी बात ठीक नहीं है?’

उद्धरण - 820

जब वह सुनता, फूलॉ की माँ उसे पुकार कर कहती है, ‘फूलॉ, आ रोटी खा ले’ तब उसे जान पड़ता, वे अत्यन्त दुखी होकर खाने बैठे हैं, क्योंकि कोई उनके साथ खाने को तैयार नहीं होगा, उसे लगता, वे मानो छिपकर चोरी से खा रहे हैं, क्योंकि वे किसी के समाने बैठकर खाने के हकदार नहीं हैं

उद्धरण - 819

इस देश में जैसे भुखमरी से किसी की मौत नहीं होती, वैसे ही छूत की बीमारियों से भी कोई नहीं मरता। लोग यों ही मर जाते हैं और झूठ-मूठ बेचारी बीमारियों का नाम लगा देते हैं।

उद्धरण - 818

मनोविश्लेषक परीक्षण करते तो यही निष्कर्ष निकलता कि पांडे में संतान पाने की इच्छा मूलतः पिता बनने की इच्छा थी। वह किसी को दुलराना चाहता था। वह किसी को अपने आर्थिक साम्राज्य को सौंपना चाहता था और चाहता था कि बाबा के साथ उसका जैसा नाता था वैसा किसी का उसके संग हो।

उद्धरण - 817

सम्पूर्ण तटस्थ भाव से तो कुछ देखा नहीं जाता, हम अनजाने कथावस्तु पर अपना आरोप करते चलते हैं, या फिर अपने पर ही कथा की घटनाएँ घटित करते चलते हैं- और मन की यह भी एक शक्ति है कि जरा से भी साम्य के सहारे वह सहज ही सम्पूर्ण लयकारी सम्बन्ध जोड़ लेता है।

उद्धरण - 816

एक मुक्ति यह भी जानने में है कि कोई आदमी पूरी तरह एक आदमी नहीं होता। कहते हैं कि माँ और बाप की सात-सात पीढ़ियों की तरफ से आदमी में गुण चले आते हैं।

उद्धरण - 815

फौजी जीवन में आदमी विवेक छोड़कर अनुशासन के सहारे चलता है, और युद्ध का दबाव उसे अनुशासन से भी परे ले जाता है--उस स्थिति को मैं क्या नाम दूँ?

उद्धरण - 814

क्यों नहीं साहब से कहते, मेरी फाँसी देख लेने दें आपको? मुझे भी अकेला नहीं लगेगा- नहीं तो आखिरी समय सब जल्लादों का मुँह देखना पड़ेगा!

उद्धरण - 813

शेखर ने देखा, उसके संसार के अलावा एक और संसार है, जिसमें पक्षी रहते हैं, जिसमें स्वच्छन्दता है, जिसमें विश्वास है, जिसमें स्नेह है, जिसमें सोचने की या खेलने की अबाध् स्वतंत्रता है, जिसका एकमात्र नियम है, ‘वही होओ जो कि तुम हो’.......

उद्धरण - 812

जो प्रवृति बिना पुलिस की मदद के जंगल में खरगोश को खूँखार जानवरों से बचाती है, या शहर में पैदल चलनेवालों को ट्रक-ड्राइवरों के बावजूद ज़िन्दा रखती है, वही मेला जानेवालों की रक्षा बैलगाड़ियों की चपेट से कर रही थी।

उद्धरण - 811

उसके मन में बार बार यह प्रश्न कौंध रहा था कि अब कौन है मेरा ? न बाबा न बाबू न बेटा न बीवी न कोई नहीं मेरे पास तो फिर इस ब्रह्यांड में कौन है मेरा?

उद्धरण - 810

रोज सुबह होता है, सूरज निकलता है, हम आदी हो जाते हैं और मान लेते हैं कि न केवल सूरज कल निकलेगा बल्कि हम भी उसे कल देखेंगे। प्रकृति का स्थायित्व देख कर ही मानव अपने लिए स्थायित्व माँगता है, प्रकृति के रूपान्तर देख कर ही वह अपने रूपान्तरों की कल्पना करता है या उन के द्वारा अमरत्व की आशा.....

उद्धरण - 809

माँ कहती है कि हम अपने इतिहास को मिटा नहीं सकते। इसलिए उस पर हमें शर्म या ग्लानि महसूस नहीं करनी चाहिए। हमारे पुरखों ने जो ठीक समझा, उन्होंने किया। जो हम ठीक समझेंगे, हम करेंगे। इतिहास से मुक्त होकर ही हम ठीक से जी सकते हैं।

उद्धरण - 808

राजा में ईश्वर का अंश होता है, ऐसे अन्ध-विश्वास पालने वाली अहोम जाति के लिए यह मानना स्वाभाविक ही था कि राजकुल का अक्षत-शरीर व्यक्ति ही राजा हो सकता है, जिसके शरीर में कोई क्षत है, उसमें देवत्व का अंश कैसे रह सकता है? देवत्व-और क्षुण्ण? नहीं । ईश्वरत्व अक्षुण्ण ही होता है, और राज-शरीर अक्षत......

उद्धरण - 807

घर-गिरस्ती बनाओ, चार पैसे कमाओ, अलग निश्चिन्त होकर रहो। बहू अच्छे घर की होगी तो थोड़े में भी काम चला लेगी, बल्कि आधी गिरस्ती तो बहू के साथ आती है। और मैंने कुछ जोड़ा तो है नहीं, जो कुछ होता रहा है, तुम लोगों पर खर्च कर दिया है, पर फिर भी जो कुछ बन पड़ेगा, कर ही दूंगा।

उद्धरण - 806

इस तरह का नैतिक अविश्वास उसने अब तक जाना ही नहीं, पाप उसने बहुत जगह देखा है, किया भी है, लेकिन पाप ही मानव की हरेक प्रेरणा का मूल है, ऐसा भयानक सन्देह, ऐसा असन्दिग्ध् अविश्वास-वह अपने हृदय में नहीं जमा सका है।

उद्धरण - 805

नज़दीक के गाँवों में जो प्रेम-सम्बन्ध आत्मा के स्तर पर क़ायम होते हैं उनकी व्याख्या इस जंगल में शरीर के स्तर पर होती है। शहर से भी यहाँ कभी पिकनिक करनेवालों के जोड़े घूमने के लिए आते हैं और एक-दूसरे को अपना क्रियात्मक ज्ञान दिखाकर और कभी-कभी लगे-हाथ मन्दिर में दर्शन करके, सिकुड़ता हुआ तन और फूलता हुआ मन लेकर वापस चले जाते हैं।

उद्धरण - 804

बाबा के चेहरे पर ऐसी ज्योति जली जो उनके जीवन में पहली और अंतिम बार देखी गयी थी। बाबा बुदबुदाये-“गोसाईंगंज।“ बाबा के चेहरे की ज्योति क्षणिक साबित हुई। वह बुलबुले की तरह निर्मित होकर विलीन हो गयी थी। इसी के बाद उनकी आंखें जैसे अंधकार का कोटर बन गयीं और अपने मुलुक की शिनाख़्त कराने वाला दूसरा कोई लफ़्ज उनकी ज़बान से न निकला।

उद्धरण - 803

हमीं द्वीप हैं, मानवता के सागर में व्यक्तित्व के छोटे-छोटे द्वीप, और प्रत्येक क्षण एक द्वीप हैं- खास कर व्यक्ति और व्यक्ति के सम्पर्क का, कांटेक्ट का प्रत्येक क्षण- अपरिचय के महासागर में एक छोटा किन्तु कितना मूल्यवान द्वीप!

उद्धरण - 802

अठारहवीं शताब्दी के मध्य तक कलकत्ता फोर्ट विलियम अढ़ाई सौ एकड़ के फैलाव के अंदर यूरोपियनों, आरमेनियनों और पुर्तगाली क्रिश्चियनों के रहने का घिरा हुआ स्थान बन गया था, जिसे ‘गोरे शहर‘ के रूप में जाना जाता था। इसके बाहर नदी के मुहाने से करीब साढ़े तीन मील उत्तर तक ‘नेटिव‘ या ‘काला शहर‘ बसा था और इन दोनों भागों को घेरती हुई ‘मराठा खाई‘ थी जो मराठों के आक्रमण से कलकत्ते को बचाने के लिए बनाई गई थी।

उद्धरण - 801

कभी जी में आता है, कहीं डाका डालूँ- ये जो पड़ोस में मोटे लाला लोग रहते हैं, इनको मार डालूँ और इनकी हवेलियाँ लूट लूँ- या उस सरकारी डाक्टर को चुटिया पकड़कर घसीट लाउँ, जिसने आने की बात पर अकड़कर कहा था कि सरकारी डाक्टर कोई रास्ते की धूल नहीं है, जो हर कोई उठा ले जाए।

उद्धरण - 800

लड़कों के चाहने से थोड़े ही ब्याह होते हैं। यह तो सामाजिक कर्तव्य है। लड़का, कन्या, माता-पिता, बिरादरी, सभी उसमें होते हैं।

उद्धरण - 799

कहना आसान है! माँ-बाप की इच्छा के खिलाफ मैं कैसे जाऊँ! उन्होंने मुझे पाला-पोषा, बड़ा किया, पढ़ाया, क्या उनके प्रति मेरा कोई ऋण नहीं है? मैं इस बुढ़ापे में उन्हें चोट नहीं पहुँचा सकता। तुम इसे कायरता समझो, मैं नहीं समझता। तुम-सा हृदयहीन मैं न हूँ, न होना चाहता हूँ। लेकिन बीस वर्ष तक मेहनत करके उन्होंने तुम्हें इस लायक बनाया कि तुम अपने पैरों पर खडे़ हो सको, स्वाधीन हो सको, क्या उसके प्रति तुम्हारा ऋण नहीं है? मानवता के प्रति तुम्हारा ऋण नहीं है? कल्पना करो कि बीस वर्ष बाद माता-पिता यह पायें कि हमने अब तक एक नर नहीं, एक भेंड़ की सेवा की है।

उद्धरण - 798

भंग पीनेवालों में भंग पीसना एक कला है, कविता है, कार्रवाई है, करतब है, रस्म है। वैसे टके की पत्ती को चबाकर ऊपर से पानी पी लिया जाए तो अच्छा-खासा नशा आ जाएगा, पर यह नशेबाजी सस्ती है।

उद्धरण - 797

वह एक विचित्र, पेचीदा और बेमतलब का असत्यवाचन था। ऐसा झूठ जिसे पांड़े सत्य समझ कर बोलता था। ऐसा असत्य जिसके सत्य में पांडे जीता था।

उद्धरण - 796

यों पहलू तो हर किसी के चरित्र में होते हैं, पर चरित्र को इस तरह डिब्बों में बाँटना तो बड़ा खतरनाक है- व्यक्ति को एक ओर सम्पूर्ण होना चाहिए- यह विभाजन तो त्रास की भूमिका है।

उद्धरण - 795

गांधीजी ने हरिपुरा कांग्रेस का अध्यक्ष सुभाष बाबू को इसलिए बनाया था कि सुभाष बाबू की माँ ने गांधीजी को चिट्ठी लिखी थी - यदि सुभाष इस बार कांग्रेस का राष्ट्रपति नहीं बना, तो वह टूटकर बिखर जाएगा। सरदार पटेल ने हरिपुरा कांग्रेस में कई लोगों को कहा था - बंगाल के रसगुल्ले को राष्ट्रपति बना ही दिया महात्मा ने।

उद्धरण - 794

जेल में प्रभात क्या है? मशक्कत करने का एक और दिन।

उद्धरण - 793

जिस समाज को उसे बदलना है, उसी की वह एक स्वतंत्र इकाई है......यह विचार कोई असाधारण विचार नहीं था, पर इसमें शेखर का समूचा आग्रह समाज पर नहीं स्वतंत्र इकाई पर था, इसलिए उसे यह नया मालूम हुआ। स्वतंत्र होना, इकाई होना, अपने आप को एक खण्ड, एक टुकड़ा, अस्तित्व का एक अल्पांश न देखकर समूचा देखना- चाहे एक अकेला कण, किन्तु सम्पूर्ण जिसका एक स्पष्ट वास्तविक रूप है, एक छोटे से अस्तित्व का पृथक तेजपुंज।

उद्धरण - 792

शिक्षा देना संसार अपना सबसे बड़ा कर्तव्य समझता है, किन्तु शिक्षा अपने मन की, शिष्य के मन की नहीं। क्योंकि संसार का ‘आदर्श व्यक्ति’ व्यक्ति नहीं है, एक ‘टाइप’ है, और संसार चाहता है कि सर्वप्रथम अवसर पर ही प्रत्येक व्यक्ति को ठोक-पीटकर, उसका व्यक्तित्व कुचलकर, उसे उस टाइप में सम्मिलित कर लिया जाय।

उद्धरण - 791

गयादीन गाँव के महाजन ज़रूर थे, पर वैसे महाजन न थे जिनके किसी ओर निकलने पर पन्थ बन जाता है। वे उस जत्थे के महाजन थे जो अनजानी राह पर पहले किराये के जन भेजते हैं और जब देख लेते हैं कि उस पर पगडण्डी बन गई है और उसके धँसने का खतरा नहीं है, तब वे महाजन की तरह छड़ी टेक-टेककर धीरे-से निकल जाते हैं।

उद्धरण - 790

संसार में सच की परख उसके उद्देश्य के आधार पर नहीं की जाती है। सत्य स्वंय में कसौटी है। किंतु झूठ का मूल्याकंन उसके प्रयोग के पीछे निहित मंतव्य के आधार पर होता है। झूठ का इरादा यदि भला, करुणामय या परहित है तो सत्य जैसा दर्जा हासिल कर लेता है।

उद्धरण - 789

सन्तान को पढ़ा-लिखा कर फिर अपनी इच्छा पर चलाना चाहने का मतलब है स्वयं अपनी दी हुई शिक्षा-दीक्षा को अमान्य करना, अपने को अमान्य करना, क्योंकि बीस बरस में माँ-बाप सन्तान को स्वतंत्र विचार करना भी न सिखा सके तो उन्होंने क्या सिखाया?

उद्धरण - 788

दरअसल उसे तरह-तरह के काम करते या बेकार समय काटते लोगों को देखते हुए घूमने में ही ऐसा आनंद आने लगा है जो उसे और कुछ भी करके नहीं आता।

उद्धरण - 787

लोग कहेंगे कि सारी उम्र तो बेचारे को लड़वाते रहे और बूढ़ा हो गया तो थोड़े से चारे के लोभ में गोली मरवा दी। इन दोनों बातों पर ध्यान रखकर राजा साहब ने धर्म का विचार करके यह तजवीज नामंजूर कर दी।

उद्धरण - 786

पश्चिम का जीवन और दर्शन हमारे बिल्कुल विपरीत हैं। वह बहिर्मुखी और समाजवादी है। उसका मानदण्ड भिन्न है, उनकी समझ में हमारा दृष्टिकोण आध्यात्मिक कलाबाजी और कायरता है। हम उन्हें निकृष्ट यथार्थवादी कह सकते हैं, वह हमें थोथे अध्यात्मवादी कह सकते हैं।

उद्धरण - 785

उसके बाद, कई बार ऐसे मिथ्या डर का नाश करने पर उसे दण्ड मिला, क्योंकि डर के बिना समाज का अस्तित्व नहीं ठहर सकता।

उद्धरण - 784

बाज़ार में बिकनेवाली नब्बे फ़ीसदी मिठाइयों की तरह धूप खाने में नहीं, पर देखने में अच्छी लग रही थी। वह सब तरफ़ थी। पर लगता था सिर्फ़ सामने नीम के पेड़ पर ही फैली है।

उद्धरण - 783

उन्हें बीच बीच में संदेह होने लगता था कि वे लोग किसी ओट से उनकी सारी गातिविधियां देख रहे हैं और धिक्कार रहे हैं। जब वह भांवरें ले रहे थे तो चौथे फेरे के बाद उन्हें हठात् अपनी पहली पत्नी की बोली सुनायी पड़ी थी और सातवें फेरे के वक़्त उन्हें सामने एक पेड़ के नीचे अपने बच्चे आपस में हाथ पकड़े हुए दिखे। इससे भी आधिक ग़ज़ब शादी के बाद हुआ।

उद्धरण - 782

श्रवणकुमार का जो आदर्श है, वही- जरा-सी चूक पर! -हमारी सारी पीढ़ी की पराजय और क्लीवता का, आदर्श-परायणता का, आत्म-बलिदान का प्रतीक नहीं, जड़-पूजा का, आत्म-प्रवंचना का, स्वाधीन जीवन की अपात्रता का प्रतीक है।

उद्धरण - 781

अब लगता है जीवन तो वहीं था। उसके बाद तो सिर्फ जीवन की लाश ढोई है अब तक। बेहोशी में सारा जीवन कट गया। ऐसे लगता है महज एक धुंधलापन हो उन बीच के सालों में। जब से बाइपास सर्जरी हुई है, तबसे फिर न जाने कैसे उन्हीं पुराने दिनों में लौट आया हूँ।

उद्धरण - 780

भोजन उतना पाओ कि जीते रह सको, जियो ऐसे कि भोजन पाने में समर्थ हो सको; चन्दा माँगो कि पढ़-लिख सको, पहन सको; पहनो ऐसा कि चन्दा माँगने में सहायक हो....व्यक्ति में समाज का, समाज में व्यक्ति का, धर्म में दोनों का और धर्म का दोनों में विश्वास बनाये रखने के लिए, कीड़े बनकर आओ और कीड़े बनकर रहो...

उद्धरण - 779

हमारा भारतीय जीवन और दर्शन अन्तर्मुखी और व्यक्तिवादी है- जैसे, हम मुक्ति का साधन यही मानते हैं कि जहाँ तक हो सके, अपने को समाज से अलग खींच लें और ‘आत्मानं विद्ध।’ इस व्यक्तिवाद का परिणाम है कि हम पाप पुण्य भी व्यक्ति गत ही समझते हैं।

उद्धरण - 778

क्यों है गरीबी? क्यों है धन? क्यों ऐसा है कि आदमी, मनोरंजन की इच्छा रहने पर, सिनेमा-सर्कस नहीं जा सकता, और क्यों एक दूसरा आदमी, उसका जाना सम्भव बनाने की सामर्थ्य रखते हुए उसे जाने से रोक देता है?

उद्धरण - 777

वेदान्त हमारी परम्परा है और चूँकि गुटबन्दी का अर्थ वेदान्त से खींचा जा सकता है, इसलिए गुटबन्दी भी हमारी परम्परा है, और दोंनो हमारी सांस्कृतिक परम्पराएँ है।

उद्धरण - 776

लगता है कि हौली, हम्माम, हरम इस देश की सारी चीज़ों का ज्ञान इकट्ठा कर रखा है इसने। बहुगुणा और सूर्यकांत ने एक साथ सोचा कि पांड़े कहेगा- ‘मैं असलियत में भारतीय हूं’। पर पांडे ने कहा- “मैं असलियत में हिंदू हूं”। उसने आगे जोड़ा-“मेरे रक्त में बह रहा हिंदू ख़ून मुझे बार बार भारत बुलाता है”।

उद्धरण - 775

पर क्या माता-पिता की इच्छा पर अपने को उत्सर्ग कर देना भी एक रास्ता नहीं है? सारी परम्परा तो इसी का समर्थन करती है कि यही रास्ता हैः और ऐसे आत्म-बलिदान में सुख भी होता है यदि वह कल्याण की भावना से किया जाय, खीझ कर, आत्म-दहन की भावना से नहीं।

उद्धरण - 774

कैसे इन्हें समझाएं कि तुम लोगों ने चालू मापदंडों को निर्णायक मानकर जो संसार बनाया है, उसमें कितना नुकसान है। कितनी चीजों को देख पाने, महसूस कर पाने से तुम वंचित रह जा रहे हो।

उद्धरण - 773

आप दिनभर कॉलेज में लेक्चर झाड़ते हैं, सो क्या आपका धर्म है? आपको भी दूर कहीं पर दीखता है- पेंशन, एक अपना घर, बगिया में धनिया-पुदीना की अपनी खेती, वग़ैरह-वग़ैरह इसी आसरे तो--

उद्धरण - 772

समाज का मैं अंग हूँ, उसके प्रति मेरी जवाबदेही है, पर उसकी मैं उपेक्षा कर सकती हूँ, क्योंकि वह मेरे प्रति कर्तव्यशील नहीं है और फिर उसके आदर्श बदलते रहते हैं और रहेंगे। पर माँ- माँ तो सनातन है, सदा माँ है, उसके प्रति भी तो मेरा कर्तव्य है...... माँ विधवा है, फिर उसके अपने संस्कार हैं।

उद्धरण - 771

उसके विश्वासी हृदय ने कुमार को अपना भाई मान लिया था- वह अकल्पनीय भाई जो उसे घर में नहीं मिला था, और उसका स्थान बहिनें किसी प्रकार भी नहीं भर सकती थीं।

उद्धरण - 770

यथार्थ की गन्दगी में लिपटा हुआ मन कुछ वैसा ही निर्मल और पवित्र हो जाता था जैसे भारतीय संविधान में मौलिक अधिकारों का अध्याय पढ़कर।

उद्धरण - 769

ऐसा भी नहीं था कि वर्णाश्रम व्यवस्था में ऊंचे पायदान पर पहुंचने की कोई आकांक्षा थी उनके मन में क्योंकि वर्णाश्रम में यह कभी संभव ही नहीं था और न किसी के भीतर ऐसी हसरत पैदा होने की गुंजाइश थी यह भी सही नहीं होगा कि बाबा के अंदर झूठ बोलने की लत थी क्योंकि उनके जैसे सामाजिक स्तर के इन्सान सार्वजनिक रुप से झूठ बोलने की हिम्मत दिखाने की औक़ात ही नहीं रखते थे।

उद्धरण - 768

कभी-कभी इस में स्वयं उसे काफी परिश्रम करना पड़ता, पर वह मानता था कि अध्यापन का श्रेष्ठ सम्बन्ध वही होता है जिस में अध्यापक भी कुछ सीखता है, और इस परिश्रम में कोताही नहीं करता था।

उद्धरण - 767

क्या कर रहे हो तुम, किशोर! हजारों साल की इस गहरी नींद से अब तो उठो। हिंदुस्तान की महाजाति के अब जागने का समय है दोस्त- भूत-प्रेत हनुमान-पीर-फकीर आदि सब बातें अब छोड़ दो। इन्होंने हमें बहुत धोखा दिया है। अब हमें सबसे मुक्त होना है।

उद्धरण - 766

ऐसे ही होते हैं डॉक्टर, सरकारी अस्पताल है न, क्या परवाह है। मैं तो रोज ही ऐसी बातें सुनती हूँ! अब कोई मर-मुर जाए तो ख़्याल ही नहीं होता। पहले तो रात-रात भर नींद नहीं आया करती थी।

उद्धरण - 765

जहाँ नगर की सड़ाँध रहती है, वहाँ वह रहती थी। अधेड़ अवस्था की वेश्याएँ, बेकार मजदूर, पेशेवर भिखमंगे, कानून की आँख और चंगुल से बचकर छिपे-उधड़े काम करने वाले उचक्के लोगों के रहने की वह जगह थी।

उद्धरण - 764

व्यक्ति अपने को रखे या बलि दे, अच्छे काम में बलि दे या बुरे में, क्या इसका एकमात्र निर्णायक वह व्यक्ति स्वयं है और समाज को कुछ भी कहने का अधिकार नहीं है?

उद्धरण - 763

उस दिन से जब कोई आया करता था, तब उसका प्रदर्शन किया करते थे। मित्रों के सामने बुलाकर उससे पूछते अगर कोई तुम्हारे एक गाल पर थप्पड़ लगाये तो क्या करोगे?’ और उसका उत्तर सुनकर सब लोग हँसते, तब उसे जाने की अनुमति मिल जाती।

उद्धरण - 762

जो खुद कम खाता है, दूसरों को ज़्यादा खिलाता है; खुद कम बोलता है, दूसरों को ज़्यादा बोलने देता है; वही खुद कम बेवकूफ़ बनता है, दूसरे को ज़्यादा बेवकूफ़ बनाता है।

उद्धरण - 761

वह दुकान वाले से बोला-“इन्हें भरपेट खिला दो। उन सातों के लिए यह वर्तमान इतना अविश्वसनीय, सुखद, अलौकिक लग रहा था कि वे जड़ हो गये थे। शायद वे इसे सपना समझ रहे थे कि जैसे ही पूड़ी का कौर मुंह में डालेंगे, नींद खुल जायेगी। किंतु वह सपना नहीं यथार्थ था जो अराकारी के कारोबार से जुड़ा था।

उद्धरण - 760

खर्चा भेज देता था, कभी-कबाह चिट्ठी लिख देता था बस इस से अधिक उलझन नहीं थी न वह चाहता था। बच्चे बड़े होंगे तब पढ़ाई-वढ़ाई का प्रश्न उठेगा, अभी तो कोई चिन्ता नहीं, और पहले दो-चार बरस तो यों ही देखभाल लेगी- फिर बड़ी तो लड़की है, उसकी पढ़ाई की कौन इतनी चिन्ता है, लड़के की शुरू से फिक्र होती है.......

उद्धरण - 759

किशोर के अंदर रात को जो दुनिया चलती है, वह उसके दिन की दुनिया से बिलकुल अलग है। रात को वह दिमाग से नहीं सोच सकता। उसके सारे डर रात को असलियत ले लेते हैं। और वह पूरी शक्ति से उनसे लड़ते हुए भी उन्हें जीत नहीं पाता।

उद्धरण - 758

भारत का समाज कितना क्षुद्रहृदय है? किस्से-कहानियों में, बातों में तो कहते हैं, प्रेम बड़ा भारी आदर्श है, इसके आगे सब कुछ तुच्छ है। पर जब वास्तव में कोई बात सामने आती है, तब कितनी जल्दी पंचायत बिठाकर बिरादरी से बाहर करने की सूझती है, कितनी कठोरता से नैतिक स्वातन्त्र्य का दमन किया जाता है!

उद्धरण - 757

मनुष्य हो तो भीतर तक मनुष्य होगा। कलई वाला सदाचार यहाँ खुलकर उधड़ रहता है। यहाँ खरा कांच नहीं टिक सकता है, क्योंकि उसे जरूरत नहीं है कि वह कहे मैं पीतल नहीं हूँ।

उद्धरण - 756

क्यों नहीं कहा था कि समाज उसकी विविक्त इकाईयों का समूह है, और इकाई की अवहेलना समाज की अवहेलना है? क्यों नहीं कहा था कि अन्याय को सहना उसका भागी बनना है?

उद्धरण - 755

लोग प्रायः भूल ही जाते हैं कि उनके जीवन क्या रहे। तभी समाज अपने लिए यह सम्भव पाता है कि विधान करे, योग्य माता-पिता वे हैं, जो बच्चों को वयः प्राप्त लोगों की तरह रहना सिखायें।’ इस एक भावना ने यौवन का जितना अपघात किया है, उतना शायद ही किसी और कानून या प्रथा या विधान ने किया हो।

उद्धरण - 754

देसी विश्वविद्यालयों के लड़के अग्रेंज़ी फिल्म देखने जाते हैं। अग्रेंजी बातचीत समझ में नहीं आती, फिर भी बेचारे मुस्कराकर दिखाते रहते हैं वे सब समझ रहे हैं और फ़िल्म बड़ा मज़ेदार हैं।

उद्धरण - 753

उस गठरी में एक छोटी गठरी और तीन पोटलियां थीं। एक पोटली में सतुआ, दूसरी में गुड़ बंधा था, तीसरी में कुछ मुट्ठी चबेना था। छोटी गठरी में एक जोड़ी कपड़ा, लोटा, मूंज की लम्बी डोरी, थरिया, नून की कुछ डलियां, नीम की दातौन का एक मोटा बंडल था।

उद्धरण - 752

स्वाधीनता केवल सामाजिक गुण नहीं है। वह एक दृष्टिकोण है, व्यक्ति के मानस की एक प्रवृत्ति है। हम कहते हैं कि समाज हमे स्वाधीनता नहीं देता, पर समाज दे कैसे? हमीं तो अपने दृष्टिकोण से समाज बनाते हैं। मैं अपने-आपको बद्ध नहीं मानती हूँ, और स्वाधीनता के लिए अपने मन को ट्रेन करती हूँ। सफलता की बात नहीं जानती, उतनी शक्ति मेरे भीतर होगी तो क्यों नहीं होऊंगी सफल? और मैं सोचती हूँ कि सब लोग बलपूर्वक अपने को स्वाधीनता के लिए ट्रेन करें तो शायद हमारा समाज भी स्वाधीन हो सके।

उद्धरण - 751

उसमें लिखा था कि जब से कलकत्ता बना, तभी से यहां वेश्याओं की भरमार थी। डेढ़ सौ साल पहले वेश्याओं की बड़ी-बड़ी कोठियां हुआ करती थीं जिनमें पचास-पचास कमरे तक हुआ करते थे। कलकत्ता हमेशा बाहर से आकर व्यापार करने वालों का शहर रहा है। इसलिए यूरोपियन वेश्याओं से लेकर बड़ी-बड़ी नामी मुस्लिम वेश्याएं और बनारस की वेश्याएं यहां हुईं जिनके पास भारी धन- जायदाद हुआ करती थी। पूरे-के-पूरे इलाके वेश्याओं के इलाके कहलाते थे।

उद्धरण - 750

जब विवाह हुआ था तब दोनों जानते थे कि दोनों का पहले अन्यत्र लगाव रहा है जो मिटा नहीं है, लेकिन जिसका कोई रास्ता भी नहीं है। एक विवाहित व्यक्ति था, और पति-पत्नी दोनों ही सुधा के भी और हेमन्त के भी घने मित्र थे....वह परिवार न टूटे, यह भी सबके ध्यान में था, और विवाह हुआ तब जैसे यह भी एक बात पीछे कहीं पर थी कि सभ्य समाज में अगर ऐसी उलझनें पैदा होती हैं, तो सभ्य व्यक्ति उनका सामना भी सभ्य तरीकों से कर सकता है; प्यार जहाँ है वहाँ हो, और विवाह.....विवाह जो सामाजिक बन्धन है, व्यक्ति के जीवन में यह बाधक ही हो, ऐसा क्यों?

उद्धरण - 749

यहाँ सदाचार का कुछ मूल्य नहीं है, अपेक्षा ही नहीं है बल्कि ऋण मूल्य है। अगर कहीं भीतर, बहुत भीतर मज्जा तक में, छिपा विकास का कीटाणु है तो यहाँ वह ऊपर रहेगा। यहाँ छल असम्भव है, जो छल कि शिष्ट समाज में जरूरी ही है। यहाँ तहजीब की माँग नहीं है, सभ्यता की आशा नहीं है।

उद्धरण - 748

‘लड़की का चरित्र अच्छा नहीं है’......‘माँ ने ही बिगाड़ा है’.....और जो लड़की चरित्रहीन घोषित हो चुकी, उसकी चरित्रहीनता के प्रमाण खोजते कितनी देर लगती है? और उसके बाद? जिसे ‘समाज के लिए खतरनाक’ कह दिया जाता है।

उद्धरण - 747

माँ चाहती थी कि लड़के फुर्तीले, चालाक और हिट-फिट हों और पिता को इसमें एक ओछापना दीखता था.... माँ को रूचता था कि लड़के इधर-उधर मिलें, हरेक की बात जानें, पता रखें कि फलाने को कितनी तनख्वाह मिलती है, फलाने के घर में क्या पका, फलाने की भौजाई का फुफेरा भाई क्या करता है,

उद्धरण - 746

जिस तरह कोई भी जज अपने सामने के किसी भी मुक़दमें का फ़ैसला दे सकता है, कोई भी वकील किसी भी मुक़दमे की वकालत कर सकता है, वैसे ही पं‐ राधेलाल किसी भी मामले के चश्मदीद गवाह बन सकते थे।

उद्धरण - 745

घिसटती हुई चाल, सूखी हुई ज़बान बुझी हुई नेत्रज्योति सर्वव्याप्त और सर्वसुलभ दृश्य था। भगेलू कुम्हार इन्हें देख कर सोचते अगर गांव नहीं छोड़ा तो इन्हीं की गति को पायेंगे। और उस एक रात उन्होंने फ़ैसला किया जिसे अपनी पत्नी को बताया और कमाने के लिए गांव छोड़ दिया।

उद्धरण - 744

भुवन को रेखा ने देख लिया है, भुवन जायगा तो वह पहाड़ चलने को राजी हो जायगी, पर चन्द्र को भुवन और रेखा के साथ नहीं जाना है, भुवन को चन्द्र और रेखा के साथ जाना है, क्योंकि एक ओट के रूप में उस की उपयोगिता है। भुवन को बुलाया तो जायगा, पर उसे ठीक जगह रखने की भी व्यवस्था करनी होगी।

उद्धरण - 743

लेकिन फिर मां के चेहरे पर आए असुविधा भरे भाव को देखकर उसने भी जान लिया कि अब मां इतनी दूर आ चुकी है कि उसकी खुद की मर्जी से उसका परिचय तक खत्म हो गया है- दूर कभी बचपन में बने और बिछड़ गए किसी की तरह।

उद्धरण - 742

मैं गुस्सा करूँ तो वह दुगुना गुस्सा करेंगे। रूठा वहाँ जाता है जहाँ कोई मनाने वाला हो--जैसे माँ के साथ....माँ के साथ मैं भी बहुत रूठा करती थी।

उद्धरण - 741

दर-दर भटकी हूँ और मैंने सीखा है कि दुर्जन लोगों की सद्भावना के सिवा मेरी कुछ और पूँजी नहीं हो सकती। किसी और बात के लिए जीने की अब साध भी कोई नहीं रह गयी है।

उद्धरण - 740

संस्कार ही ऐसा है- परम्परा यही है।...... पर ब्याहना कर्तव्य है तो क्या अच्छी तरह ब्याहना कर्तव्य नहीं है? क्या यह ‘अच्छी तरह’ ब्याहना है?

उद्धरण - 739

शेखर की माँ को दृढ़ विश्वास था कि उनकी सन्तान संसार की सब सन्तान से गयी-बीती है। जब भी कोई बात लड़के करते जिसकी आलोचना हो सकती हो, तभी वे यह कहने को तैयार रहतीं- लोगों के लड़के होते हैं, ऐसा करते हैं।

उद्धरण - 738

यह हमारी प्राचीन परम्परा है, वैसे तो हमारी हर बात प्राचीन परम्परा है, कि लोग बाहर जाते हैं और ज़रा-ज़रा-सी बात पर शादी कर बैठते हैं। अर्जुन के साथ चित्रांगदा आदि को लेकर यही हुआ था। यही भारतवर्ष के प्रवर्त्तक भरत के पिता दुष्यन्त के साथ हुआ था, यही ट्रिनिडाड और टोबैगो, बरमा और बैंकाक जानेवालों के साथ होता था, यही अमरीका और यूरोप जानेवालों के साथ हो रहा है और यही पण्डित राधेलाल के साथ हुआ।

उद्धरण - 737

स्थिति यह थी : रात में सारे घर अंधकार में डूबे रहते। गांव में रात को रोशनी का स्त्रोत केवल श्मशान थे या चांद। लेकिन इतने मुर्दे जले और उसके बाद इतने लोग मरे कि उन्हें जलाने के लिए लड़कियों की बेपनाह कमी हो गयी थी। स्थिति इतनी ख़राब हो गयी कि अनेक ग़रीब गुरबा के शव वैसे ही फेंक दिये जाने लगे थे। जो जलाये जाते थे उन्हें इतनी कम लड़कियां मयस्सर होतीं कि शरीर के कई अंग अनजले रह जाते थे।

उद्धरण - 736

स्त्रियोपयोगी’....लेकिन क्या स्त्री के लिए बस यही बातें उपयोगी हैं- ‘हाउ टु विन ए मैन’ -‘हाउ टु होल्ड ए मैन’ -‘फीड द बूट’ -‘द वे टु ए मैन्स हर्ट’ -‘थ्रू हिज बेली’- आदमी को फाँसो कैसे, वश में कैसे रखो, रिझाओ कैसे- मानो उच्चाटन-वशीकरण के तंत्र-मंत्र के युग से हम अभी कुछ आगे नहीं गये।

उद्धरण - 735

क्या पुत्र व्यक्ति का अपना ही हिस्सा होता है जिसके मरने पर मृत्यु की वैसी ही पीड़ा का अनुभव पिता को होता है ? केदार के मरने के बाद उसके प्रकाशित लेखों को रामविलास ने पढ़ना चाहा।

उद्धरण - 734

थकते तो मर्द हैं, स्त्री कभी नहीं थकती है। काम और विश्राम- यह मर्द की ईजाद है। स्त्रियाँ विश्राम नहीं करतीं, क्योंकि वे शायद काम नहीं करतीं। वे कुछ करती ही नहीं.... वे शायद सिर्फ होती ही हैं। बालिका से किशोरी, कुमारी से पत्नी, बेटी से माँ, एक निस्संग आत्मा से परिगृहीत कुनबा--वे निरन्तर कुछ न कुछ होती ही चलती हैं।

उद्धरण - 733

मैं आज इसी पर आश्चर्य किया करता हूँ कि ‘लोग क्या समझेंगे‘, इसका बोझ अपने ऊपर लेकर हम क्यों अपनी चाल को सीधा नहीं रखते हैं, क्यों उसे तिरछा-आड़ा बनाने की कोशिश करते हैं।

उद्धरण - 732

मामा, चाचा, यह, वह- सब कहेंगे कि नहीं मिलता था तो रोती थीं, अब मिलता है तो दिमाग आसमान पर चढ़ा जा रहा है, ऐसा है तो अपना काम आप देखो, हमें कोई वास्ता नहीं।

उद्धरण - 731

जिस प्रकार क्रोध में वे छोटे को छोटा नहीं समझते, उसी प्रकार क्रोध के उतरने पर भी....कितनी स्वच्छ, एहसान के भाव से मुक्त, कितनी विशाल सर्वव्यापी होती है उनकी उदारता! इसीलिए शेखर पिटकर भी उन्हें पूजता है, जैसे वह माँ को कभी नहीं पूज सकता, माँ जो पीटती नहीं, पर जो ‘क्षमा’ देती है अनुग्रह की चक्की में पीसकर.....

उद्धरण - 730

सब वर्गों की हँसी और ठहाके अलग-अलग होते हैं। कॉफ़ी-हाउस में बैठे हुए साहित्यकारों का ठहाका कई जगहों से निकलता है, वह किसी के पेट की गहराई से निकलता है, किसी के गले, किसी के मुँह से और उनमें से एकाध ऐसे भी रह जाते हैं जो सिर्फ़ सोचते हैं कि ठहाका लगाया क्यों गया है।

उद्धरण - 729

बैल, गाय, भैंसें, बकरियां, भेड़ें, कुत्ते-सभी-पहले कमज़ोर पड़ते, शुरुआत में वे चलने में अशक्त होते, उनके चिल्लाने चिग्घाड़ने में मंदता आती। फिर वे बेतरह सुस्त पड़ते और मर जाते थे। यह एक वृहदाकार अकाल था जो दूर दूर तक फैला हुआ था। उसकी जकड़न इतनी घनघोर थी कि चारों ओर से जो इन्सान दिखायी देते थे उनके शरीर से बदबू आती रहती थी। तक़रीबन सभी के बदन पर फोड़े, फुंसियों, ज़ख़्म, खून, मवाद का हमला था।

उद्धरण - 728

एक के बाद एक कई नौकरियाँ उसे छोड़नी पड़ीं, और उस के साथ-साथ यह भी बात बन चली कि वह कहीं टिकती नहीं, दो-चार महीने बाद काम छोड़ देती है, जिस से आगे नौकरी मिलने में क्रमशः कठिनाई बढ़ती गयी।

उद्धरण - 727

उसके पास प्रत्येक अंग-प्रत्यंग पर पहने जाने वाले बारहों गहने- नुपूर, किंकिणी, चूड़ी,अंगूठी, कंकण, विजायण, हार, कंठश्री, बेसर, बिरिया, टीका, सीसफूल- हर तरह की नई पुरानी चाल के थे।

उद्धरण - 726

ऐसी बातों में राजकुमारियों की राय नहीं पूछी जाती। साधारण कन्याएँ राय देती होंगी, पर हमारा जीवन राज्य के कल्याण के पीछे चलता है।

उद्धरण - 725

मैं सोचता, यह दुनिया में क्या-क्या हमने खड़ा कर लिया है जो दो के मनों के स्नेह को ऐसे फाड़ देता है। मन क्या फटने के लिए है ! क्या वे आपस में रहने के लिए नहीं है।

उद्धरण - 724

सामाजिक से मेरा मतलब किसी एक समाज का नहीं है। मेरा मतलब उस सारे संगठन से है, जिसका एक अंग हम- मानव मात्र हैं। इस दृष्टि से जहाँ हत्या अहिंसा हो सकती है, वहाँ राह चलते, गेहूँ की एक बाल तोड़कर फेंक देना हिंसा होगी, क्योंकि वह कर्म उस विश्व समाज का कोई हित नहीं करता, उल्टे थोड़े से हित की सम्भावना को नष्ट कर देता है।

उद्धरण - 723

जिस ईश्वर के होने -न होने को हम समझ सकते हैं, जिसको निर्गुण, निराकार, अपरिमेय सब कुछ कहकर भी जिसके बारे में हमारा मस्तिष्क इतनी क्षमता रखता है कि उसके होने को अपनी मुठ्ठी में कर सके, किसी अर्थ से कह सके कि वह है, उस ईश्वर के होने-न होने से क्या?

उद्धरण - 722

बवासीर के चार आदम-क़द अक्षर चिल्लाकर कह रहे थे कि यहाँ पेचिश का युग समाप्त हो रहा है, मुलायम तबीयत, दफ़्तर की कुर्सी, शिष्टतापूर्ण रहन-सहन, चौबीस घण्टे चलनेवाले खान-पान और हल्के परिश्रम का युग धीरे-धीरे संक्रमण कर रहा है और आधुनिकता के प्रतीक- जैसी बवासीर सर्वव्यापी नामर्दी का मुकाबला करने के लिए मैदान में आ रही है।

उद्धरण - 721

हमको कहां मारेंगे महाराज। हम सबके भीतर वही भगवान बसता है। हम भगवान के अंश हैं। मारेंगे मुझे, चोटें उसको पहुंचेंगी।

उद्धरण - 720

भुवन अकेला है, घर-गिरस्ती की चिन्ताएँ उस ने जानी नहीं, दुख की दूर से रोमांटिक कल्पना की है, इसी लिए बातें बना सकता है। अगर सचमुच दुख उस ने जाना होता- दुख कैसे तोड़कर, चूर-चूर कर के रख देता है, दृष्टि देना तो क्या, आँखों को अन्ध कर के, पपोटे निकाल कर उन में कींचड़ भर देता है, यह देखा होता- तो उस की जबान ऐंठ जाती.....

उद्धरण - 719

तुम केदार को बस इतना समझाओ कि वह राजनीतिक मामलों में न पड़कर समाज-सेवा करे। बल्कि उसे एक पुस्तकालय खोलने के लिए पैसे दे दो। नदी की धारा को उसके रास्ते से हटा नहीं सकते, पर उसे मोड़ना बहुत मुश्किल काम नहीं है।

उद्धरण - 718

मैं तुम्हारी मदद नहीं करूँगी, कर भी नहीं सकती । लेकिन तुम्हारे काम में दखल भी न दूँगी । चाहे जैसे जीवन व्यतीत करना पड़े, तुम्हें उलाहना नहीं दूँगी । तुम इतना भी विश्वास कर लो कि तुम्हारी जो बातें जान जाउँगी, वे किसी से कहूँगी नहीं।

उद्धरण - 717

कम क्या, बिलकुल न मिलने-जुलने से, हँसी-मजाक खेल-कूद में शामिल न होने से, किसी तरह की कोई कमी जीवन में होती है। ऐसा बिलकुल नहीं लगता था।

उद्धरण - 716

नासूर होता है, तो उसका इलाज यही है कि नश्तर लगा दिया जाए। उससे दर्द होता है तो क्या वह हिंसा है? वह हिंसा इसलिए नहीं है कि रोगी के भले के लिए है, चिकित्सक का स्वार्थ उसमें नहीं है। और लाइलाज रोग का रोगी अगर दर्द से तड़प रहा हो तो उसे मारक मुक्ति देने में भी हिंसा नहीं है, यद्यपि उसकी जान ले ली गई होगी। यहाँ फिर हिंसा एक सामाजिक कर्तव्य के रूप में आती है।

उद्धरण - 715

एक दिन उसे घर से आज्ञा मिली कि वह यदि पड़ोस वाले घर में चला भी जाए, तो वहाँ कुछ खाए-पीए नहीं, कुछ भी ग्रहण न करे, क्योंकि वे छोटी जाति के हैं...... ‘‘तो फिर उनके साथ खेलते क्यों हैं, बोलते क्यों हैं?’ तो उत्तर नहीं मिला।

उद्धरण - 714

पैसे की बचत का सवाल आम़दनी और ख़र्च से जुड़ा हुआ है, इस छोटी-सी बात को छोड़कर बाक़ी सभी बातों पर इन विज्ञापनों में विचार कर लिया गया था और लोगों ने इनको इस भाव से स्वीकार कर लिया था कि ये बेचारे दीवार पर चुपचाप चिपके हुए हैं, न दाना माँगते हैं, न चारा, न कुछ लेते हैं न देते हैं। चलो, इन तस्वीरों को छेड़ो नहीं।

उद्धरण - 713

चढ़ावा उन्होंने नहीं लिया था लेकिन अपनी बस्ती से उन्हें सम्मान और भरोसा काफ़ी मिला था। इससे उनमें उदात्तता, साहस का लगातार विस्तार हो रहा था। यही उनकी मौत का सबब बना।

उद्धरण - 712

गर्हस्थ एक लम्बी यात्रा है- बल्कि पथ-यात्रा नहीं, सागर-यात्रा, जिस में मोड़-चौराहे पर नहीं, क्षण-क्षण पर संकल्प-पूर्वक जोखम का वरण करना होता है और कोई लीकें आँकी हुई नहीं मिलतीं, नक्शे और कम्पास और अन्ततोगत्वा अपनी बुद्धि और अपने साहस के सहारे चलना होता है।

उद्धरण - 711

क्या इतिहास कभी मरता नहीं? क्या वह बार-बार जीवित होकर अपनी रुपरेखा खुद बना देता है ?....... हैमिल्टन साहब की तरह या सौ साल पहले हुए डिरोजियो नाम के यूरेशियन की तरह इनमें से कितनों को हिंदुस्तान से कोई लगाव होगा ?

उद्धरण - 710

स्त्री के बिना कुछ भी अच्छा नहीं है, कुछ भी मधुर नहीं है, कुछ भी सुन्दर नहीं है; स्त्री--जो केवल स्त्री ही नहीं, संसार की कुल सुन्दर और मधुर वस्तुओं की प्रतिनिधि है....

उद्धरण - 709

सहायता मुझे इसलिए चाहिए कि मेरा मन पक्का होता रहे कि कोई मुझे कुचले, तो भी मैं कुचली न जाऊँ और इतनी जीवित रहूँ कि उसके पाप के बोझ को भी ले लूँ और सबके लिए क्षमा की प्रार्थना करूँ। प्रतिष्ठा मुझे क्यों चाहिए! मुझे तो जो मिलता है, उसी के भीतर सान्त्वना पाने की शक्ति चाहिए।

उद्धरण - 708

वे अब कैदी हैं। तीन महीने में एक मुलाकात कर सकते हैं। आप दरखास्त दे सकते हैं, पर आप मिलेंगे तो तीन महीने तक वे दूसरी मुलाकात नहीं कर सकेंगे। शायद इसके लिए वे आपके शुक्रमंद नहीं होंगे।

उद्धरण - 707

कहानी या नाटक की नायिका का यह पतिव्रत क्या है? यह एक गुलामी है, चाहे सहर्ष स्वयं स्वीकार की हुई गुलामी जिसके द्वारा वह अपने को अपने पति के, यानी दर्शक के, पुरुष जाति के, और इस प्रकार अन्ततः दर्शक के अधीन करती है! क्योंकि अपने पुरुषत्व के कारण दर्शक ही प्रतिनिधि् रुप में वह पति है।

उद्धरण - 706

लेक्चर का मज़ा तो तब है जब सुननेवाले भी समझें कि यह बकवास कर रहा है और बोलनेवाला भी समझे कि मैं बकवास कर रहा हूँ।

उद्धरण - 705

इसलिए भी अंग्रेज़ों से ख़ौफ़ खा रहे थे कि वह जाति से कुम्हार थे लेकिन उन्होंने डिपो में रजिस्ट्रेशन के समय अपने को पांडे बता दिया था। धीमे से लगभग फुसफुसाहट सरीखा कहा था- भगेलू पांडे।

उद्धरण - 704

लेकिन उखड़ापन तो भावना की बात है, रेखा जी! मानने से होता है। व्यक्ति की जड़ें घरों में नहीं होतीं- समाज-जीवन में होती हैं- नहीं? और यायावरों का भी अपना समाज होता है।

उद्धरण - 703

जो नहीं मिलता, उसके लिए तड़पता रहता है और जो मिला हुआ है, उसे छोड़ नहीं पाता, कहीं यह सब छोड़ जाने के बाद अफसोस ही हाथ न लगे- इसी भय से जहां-का तहां टिका रहता है।

उद्धरण - 702

हेमन्त देख रहा था; और केवल देखना, वह भी स्त्री को शराब पीते, स्वयं ग्लानि-जनक है, इसलिए साथ पी रहा था ।

उद्धरण - 701

जो समाज में हैं, समाज की प्रतिष्ठा कायम रखने का जिम्मा भी उन पर है उनका कर्तव्य है कि जो उसके उच्छिष्ट हैं, या उच्छिष्ट बनना पसन्द करते हैं, उन्ही को जीवन के साथ नये प्रयोग करने की छूट हो सकती है।

उद्धरण - 700

अधिकार! ऐ है! यह जेल है जेल, बाबू साहब! यहाँ का अधिकार है चक्की पीसना, समझे? वह देखो! दरोगा ने कोठरी के भीतरवाले चबूतरे की ओर इशारा किया। घबराओ मत! सब देखोगे।

उद्धरण - 699

जो आदमी वेश्याओं के पास नहीं जाता, वह शायद ऑब्जेक्टिव दृष्टि से देख कर कह सकता है कि वेश्याएँ समाज शुद्धि का अप्रत्यक्ष साधन हैं। लेकिन जो आदमी अपनी सब्जेक्टिव वासना का गुलाम कहा जाता है उसे क्या हक है कि वह समाज को ऐसे ऑब्जेक्टिव दृष्टि से देखे?

उद्धरण - 698

परोपकार एक व्यक्तिवादी धर्म है और उसके बारे में हर व्यक्ति की अपनी-अपनी धारणा होती है। कोई चींटियों को आटा खिलाता है, कोई अविवाहित प्रौढ़ाओ का मानसिक स्वास्थ्य ठीक रखने के लिए अपने मत्थे पर ‘प्रेम करने के लिए हमेशा तैयार‘ की तख्ती लगाकर घूमता है, कोई किसी को सीधे रिश्वत न लेनी पड़े, इसलिए रिश्वत देनेवालों से खुद सम्पर्क स्थापित करके दोनों पक्षों के बीच दिन-रात दौड़-धूप करता है।

उद्धरण - 697

विद्रोह ख़त्म करने के बाद अंग्रेज़ों ने पैतालिस लोगों को मार कर पेड़ों पर लटका दिया था। जिन्हें देख कर गांवों के लोगों में दहशत इस क़दर फैल गयी थी कि वे अपरम्पार दुख के बावजूद न बोल पा रहे थे न चीख़ पा रहे थे। उनकी ज़बान से शब्द तक नहीं निकल रहे थे। वे इधर से उधर पागलों की तरह चल रहे थे और हताश होकर बैठ जा रहे थे।

उद्धरण - 696

....साथ के लिए आती हूँ- कुछ लोगों से मिलने, बात करने- और यहाँ इसलिए कि यहाँ से सहज भाव से मिलते हैं। और मानव और मानव का सहज भाव से साक्षात्- वही हमारा मानव जीवन से और मानवता के जीवन से एकमात्र सम्पर्क हो सकता है।

उद्धरण - 695

तुम लोगों के सोचने का तरीका कितना अलग है। हमलोग सचमुच बड़ी दौड़भाग में लगे हैं। जल्दी जल्दी यह पूरा करके वह शुरू करना चाहते हैं। इसी तरह दौड़ते-भागते अंत में कहां पहुंचेंगे- कई बार सोचता हूँ

उद्धरण - 694

उतना दिल आप में होता तो जो बातें आप सुनाना चाहते हैं उनसे शर्म के मारे आपकी ज़बान बन्द हो गई होती- सिर नीचा हो गया होता! औरत की बेइज्जती औरत की बेइज्जती है, वह हिन्दू या मुसलमान की नहीं, वह इंसान की माँ की बेइज्जती है ।

उद्धरण - 693

मैं समाज को तोड़ना-फोड़ना नहीं चाहती हूँ। समाज टूटा कि फिर हम किसके भीतर बनेंगे? या कि किसके भीतर बिगड़ेंगे? इसलिए मैं इतना ही कर सकती हूँ कि समाज से अलग होकर उसकी मंगलाकांक्षा में, खुद ही टूटती रहूँ।

उद्धरण - 692

कामकाज ही तो संसार की व्यवस्था को स्थिर, एकरूप रखने वाली एकमात्र वस्तु है- और मौसी विद्यावती तथा शशि दिन भर किसी न किसी काम में जुटी रहती थीं......कभी जब पास-पड़ोस की औरतें हमदर्दी दिखाने आ बैठतीं, तब भी वे कुछ न कुछ काम लिए बैठी रहतीं और निष्ठा पूर्वक उस छिछली, कभी-कभी मिथ्या, और प्रायः ही रूढ़िगत संवेदना के लिए आँचल पसारे रहतीं।

उद्धरण - 691

मुझे लगता है कि इस तरह के आमूल परिवर्तन करने में खतरा है। यह मैं नहीं कहता कि केवल सतह पर सुधार किया जाय, वह भी बेवकूफी है। परिवर्तन होना मूल में ही चाहिए लेकिन वहाँ जहाँ पर बुराई साफ लक्ष्य हो, केवल तर्क से सिद्ध करके दीखने वाली नहीं।

उद्धरण - 690

साहित्य और कला के सैकड़ों अर्ध-प्रौढ़ आलोचकों की तरह सिर हिलाकर, अपनी राय देने से कतराते हुए, वह बोला, ‘भैया रंगनाथ, पहले के लोगों का हाल न पूछो। यहीं ठाकुर दुरबीनसिंह थे। मैंने उनके दिन भी देखे हैं। पर आजकल के लौण्डों के भी हाल न पूछो!

उद्धरण - 689

सूरीनाम आकर उन्होंने भारत की अंग्रेज़ ह़कूमत के खि़लाफ़ काम किया है! सच है कि अगर उनको यात्रा के पहले मालूम हुआ होता कि वह दूर देश ले जाये जा रहे हैं तो वह न आते! वह फंस गये थे अथवा वह फांस लिये गये थे! आश्वासन दिया गया था कि वह कलकत्ता ले जाये जा रहे हैं जहां जूट मिल में उनको नौकरी मिलेगी! लेकिन तकदीर ने यहां वतन से इतनी दूर भेज दिया था!

उद्धरण - 688

हाँ, मैं तो आता हूँ कि थोड़ी देर के लिए जीवन के भरपूर प्रवाह में अपने ढाल सकूँ- मुझे तो हमेशा यह डर रहता है कि कहीं तटस्थता के नाम पर मैं उस से बिल्कुल दूर ही न जा पड़ूँ। यहाँ बैठकर अपने को मानवता का अंग मान सकता हूँ- उस के समूचे जीवन का स्पन्दन अनुभव कर सकता हूँ।

उद्धरण - 687

पिताजी की बात ठीक निकली। वे कहा करते थे कि दुख ही सुख की शक्ल ले सकता है, प्रेम ही नफरत की - ये सारे ‘विपरीत‘ समय के फेर से एक-दूसरे में बदल जाते हैं।

उद्धरण - 686

‘कायर, नपुंसक!- तुम नगा कैसे हुए? कुमार तो अमर है, कीड़ा चूलिक-फा उन्हें कैसे छुएगा? मगर क्या लोग कहेंगे, कुमार की रानी जयमती ने देह की यन्त्रणा से घबड़ाकर उसका पता बता दिया? हट जाओ, अपना कलंकी मुँह मेरे सामने से दूर करो!’

उद्धरण - 685

चला जाऊँ उसी अपनी दुनिया में जहाँ वस्तुओं का मान बँधा हुआ है और कोई झमेला नहीं है। जहाँ रास्ता बना बनाया है और खुद को खोजने की जरुरत नहीं है। जिज्ञासा जहाँ शान्त है और प्रश्न अवज्ञा का द्योतक है।

उद्धरण - 684

जो पुरूष और स्त्री उसे घेरे हुए हैं और उसकी दुनिया को बनाते हैं, वे सब अन्ततोगत्वा बुरे नहीं हैं, वे सदिच्छाओं के बलहीन पुञ्ज हैं- उनमें सत्कामना है, लेकिन कामना पर्याप्त नहीं है, वे इससे सन्तुष्ट हैं कि वे शिव की कामना करने जाएँ और अशिव उन्हें घेर लें, बाँध लें, तोड़ लें......क्या ऐसों से घृणा करने का साहस मानव कर सकता है?

उद्धरण - 683

संसार को अपना बनाने की चेष्टा छोड़कर अपने को संसार का बनाने की चेष्टा उसने कभी नहीं की।

उद्धरण - 682

कुछ दिनों में ही रंगनाथ को शिवपालगंज के बारे में ऐसा लगने लगा कि महाभारत की तरह, जो कहीं नहीं है वह यहाँ है और जो यहाँ नहीं है वह कहीं नहीं है। उसे जान पड़ा कि हम भारतवासी एक हैं हर जगह हमारी बुद्धि एक-सी है।

उद्धरण - 681

बाबा बताते है कि वह आयोध्या अपने गांव से पैदल गये थे ! चल कर अगली सुबह पहुंच गये थे ! और सरयू में स्नान किया था उस रोज रामनवमी थी ! मैंने पता किया है बिहार से इतने कम समय में पैदल आयोध्या नहीं पहुंचा जा सकता था !

उद्धरण - 680

रेखा जैसी आधुनिका के लिए भक्त की उपमा शायद ठीक न हो पर उस तुलना के द्वारा रेखा का पार्थक्य और उभर आता था, और यह बात बार-बार भुवन के सामने आती थी कि रेखा में एक दूरी है, एक अलगाव है, कि वह जिस समाज से घिरी है और जिस का केन्द्र है उस से अछूती भी है.......

उद्धरण - 679

मैं भी कल सारे समय यही सोचता रहा कि अगर आज जान बच गई, तो कल ही अपने देश लौट जाऊंगा। अपनी बूढ़ी मां के बारे में मैं सारे वक्त चिंता करता रहा। लेकिन हर आदमी को अपना काम पूरा करके ही लौटना होता है। न कहीं आना आसान है और न कहीं से जाना। तुम इतनी जल्दी हिम्मत कैसे हार सकते हो? मैं तुम्हें इस तरह जाने नहीं दूंगा।

उद्धरण - 678

एक छोटे क्षण-भर के लिए मैं स्तब्ध हो गया, फिर एकाएक मेरे मन ने, मेरे समूचे अस्तित्व ने, विद्रोह के स्वर में कहा- मेरे मन के भीतर ही, बाहर एक शब्द भी नहीं निकला- ‘माँ, युवती माँ, यह तुम्हारे हृदय को क्या हो गया है जो तुम अपने एकमात्र बच्चे के गिरने पर ऐसी बात कह सकती हो- और यह अभी, जब तुम्हारा सारा जीवन तुम्हारे आगे है!

उद्धरण - 677

जब सबको छोड़कर मुझे साथ ले चलने को उतावला था, तब भी मैं जानती थी कि थोड़े दिन बाद इसे लौटकर अपने परिवार के बीच आ जाना होगा। जानती थी कि इसी अवश अनुरक्ति में से एक दिन प्रबल विरक्ति का भाव फूटेगा। जानती थी, इसलिए मैं उसे साथ ले आयी।

उद्धरण - 676

कभी उसे लगता कि ये टुकड़ियाँ सिद्धान्तों के आसरे बनी हैं, क्योंकि किसी एक में वह प्लेटो को आदर्श रूप में पूजते हुए पाता तो दूसरे में शोपेनहॉर को, किसी में स्टोइक मत पर बहस होती हुई पाता, तो किसी में हीडोनिज़्म की चर्चा, कभी उसे लगता कि यह दलबन्दी अपने -अपने व्यसन-विशेष का समर्थन करने के लिए है....

उद्धरण - 675

क्रान्तिकारी अन्ततोगत्वा एक प्रकार के नियतिवादी होते हैं। लेकिन यह नियतिवाद उन्हें अक्षम और निकम्मा बनाने वाला कोरा भाग्यवाद नहीं होता, वह उन्हें अधिक निर्मम होकर कार्य करने की प्रेरणा देता है।

उद्धरण - 674

बात कुल इतनी नहीं है, सच तो यह है कि दुख मनुष्य को पहले फींचता है, फिर फींचकर निचोड़ता है, फिर निचोड़कर उसके चेहरे को घुग्घू-जैसा बनाकर उस पर दो-चार काली-सफ़ेद लकीरें खींच देता है। फिर उसे सड़क पर लम्बे-लम्बे डगों से टहलने के लिए छोड़ देता है।

उद्धरण - 673

मेरे विद्रोह-मेरे अवकाश पर चले जाने की पृष्ठभूमि में मेरा नैतिक बल, मेरा क्रोध, मेरी आत्मा की पुकार नहीं थी वरन् अपनी ताक़त का झूठा अनुमान था, नयी नौकरी ढूंढ़ लेने, पा जाने का अशुद्ध आकलन था। आज मैं असफल और नाउम्मीद हूं।

उद्धरण - 672

चिचिड़ापन वाजिब था, क्योंकि इंटर क्लास ही सही, रात को सोते सब हैं, और तड़के तीन बजे दरवाजा खोल कर खड़े हो जाना दूसरे मुसाफिरों को न सुहाये तो अचम्भा नहीं होना चाहिए। रेल का सपफर शायद इस तरह के आत्म-प्रकाशन को सहज बनाता है- चलती गाड़ी में हम अजनबी को भी बहुत सी ऐसी निजी बातें कह देते हैं जो अपने ठिकाने पर घनिष्ठ मित्रों से भी न कहें। समाज में आदमी अपने सब छद्य, कवच, अस्त्र-शस्त्र जो धारण किये रहता है और सब ओर से चौकस रहता है, रेल में वह इन्हें उतार कर सहज स्वाभाविक मानव प्राणी हो जाता है।

उद्धरण - 671

तुम भी अपने पिता की तरह बार-बार अपनी पगड़ी को हाथ लगाते हो और दोनों कान छूकर देवी को हाथ जोड़ते हो।” रामविलास ने तभी जाना कि उसके पिता बहुत छोटी छोटी आदतों में उसके अंदर जिंदा हैं। एक बार बहूबाजार में फिरंगी काली के यहां भी हो आना”- हाथीपांववाले पंडित ने उसे कहा।

उद्धरण - 670

कभी जब कोई भाग्यशालिनी माँ अपनी बच्ची को एक रोटी का टुकड़ा ऐसे लाकर देती है, मानो स्वर्ग की सारी विभूति छीन लाई हो और उसे दे रही हो, तब दूसरे भूखे बच्चों की मुग्ध आँखों के आगे ही कोई कुत्ता आकर उस टुकड़े को छीन ले जाता है।

उद्धरण - 669

एक बार घर आकर मैं समझ गयी थी कि वैसे मैके जाना ठीक नहीं है। स्त्री जब तक ससुराल की है तभी तक मैके की है। ससुराल से टूटी, तब मैके से तो आप ही मैं टूट गयी थी।

उद्धरण - 668

वह आते ही कोशिश करने लगा कि उनके साथ एकात्म, एक प्राण हो सके। होस्टल के लड़कों से मिलकर उनके विचार जानने की, उनके आदर्श और उनकी कामनाएँ समझने की, उसने चेष्टा की। स्वीकृति पाना, स्वागत पाना, मान्य होना, कितना अच्छा था....... ... ... ... ... ... ...शीघ्र ही शेखर ने पाया कि उसे कालेज के अधिकांश लड़के जानते हैं, और वैसे नहीं जानते, जैसे मद्रास में जानते थे....उसे अपने आपसे सन्तोष-सा होने लगा।

उद्धरण - 667

मुझे विश्वास है कि विद्रोही बनते नहीं, उत्पन्न होते हैं। विद्रोह-बुद्धि परिस्थितियों से संघर्ष की सामर्थ्य, जीवन की क्रियाओं से, परिस्थितियों के घात-प्रतिघात से नहीं निर्मित होती। वह आत्मा का कृत्रिम परिवेष्टन नहीं है, उसका अभिन्नतम अंग है।

उद्धरण - 666

यह जनतन्त्र का सिद्धान्त है। हमारे नेतागण कितनी शालीनता से विरोधियों को झेल रहे हैं। विरोधीगण अपनी बात बकते रहते हैं और नेतागण चुपचाप अपनी चाल चलते रहते हैं। कोई किसी से प्रभावित नहीं होता। यह आदर्श विरोध है। आपको भी यही रूख अपनाना चाहिए।

उद्धरण - 665

चैनल के स्टेड हेड को किसी ने मेरी कैंसर वाली बात पहुंचा दी थी। स्टेड हेड ख़ासा उत्साहित हो गया। उसने अपने चैनल पर मुझे पेश करने की एक विशेष योजना भी बना ली। उसने तय किया था कि मेरी पहली रिपोर्ट प्रस्तुत करने के पहले दस दिनों तक मेरा विज्ञापन दिखाया जायेगा जिसमें कहा गया होगा-’मौत से घिरा पत्रकार लायेगा जिंदगी के समाचार‘। अब मैं मौत से घिरा नहीं हूं फिर कैसे जिंदगी की ख़बरें ला सकता

उद्धरण - 664

कितना बड़ा है जीवन, कितना विस्तृत, कितना गहरा, कितना प्रवहमान, और उस में व्यक्ति की ये छोटी-छोटी इकाइयाँ-प्रवाह से अलग जो कोई अस्तित्व नहीं रखतीं, कोई अर्थ नहीं रखतीं, फिर भी सम्पूर्ण हैं, स्वायत्त हैं, अद्वितीय हैं, और स्वतःप्रमाण हैं, क्योंकि अन्ततोगत्वा आत्मानुशासित हैं, अपने आगे उत्तरदायी हैं।

उद्धरण - 663

लोगों ने भूख के मारे कच्चा बाजरा या चना ही फांक लिया। अपने बच्चे तक बेंच डाले। कई जगह लाशों की कमर में अंटी में सिक्के बंधे हुए मिले। अनाज इतना महंगा हो गया था कि उसे खरीदने के लिए उन पैसों को खर्च करने के बजाय लोगों ने मौत को चुना।

उद्धरण - 662

उन्हें मनोरंजन की सामग्री कभी नहीं मिली थी, लेकिन उससे क्या उनकी चाह मर गई थी? अभी, क्षण-भर तक, वे स्वयं नाथ हैं, क्षण-भर बाद, जब अनाथ हो जायेंगे, तब पुकारेंगे कृष्ण को और माँगेंगे भीख--दुहाई देंगे हिन्दू धर्म की....

उद्धरण - 661

मैं स्त्री-धर्म ही मानती हूँ। उसका स्वतन्त्र धर्म मैं नहीं मानती हूँ। क्यों पतिव्रता को यह चाहिए कि पति उसे नहीं चाहता, तब भी वह अपना भार उस पर डाले रहे? मुझे देखना भी नहीं चाहते यह जानकर मैने उसकी आँखों के आगे से हट जाना स्वीकार कर लिया।

उद्धरण - 660

मैं तो इसी विश्वास में पली हूँ कि स्त्री का पति ही सब कुछ है। स्त्री भी पति की कुछ है, मैं जानती हूँ, पर जिस तरह अधिकार देना सीखा था, उसी तरह लेना नहीं सीखा, और अब बूढ़ी हो गई, कुछ नया नहीं सीख सकती।

उद्धरण - 659

क्रान्तिकारी की बनावट में एक विराट, व्यापक प्रेम की सामर्थ्य तो आवश्यक है ही, साथ ही उसमें एक और वस्तु नितान्त आवश्यक, अनिवार्य है- घृणा की क्षमता, एक कभी न मरने वाली, जला डालने वाली, घोर मारक, किन्तु इतना सब होते हुए भी एक तटस्थ सात्विक घृणा की क्षमता, यानि ऐसी घृणा जिसका अनुभव हम अपने सचेतन मस्तिष्क से करते हैं, ऐसी नहीं जो कि हमें भस्म कर डालती है और पागल करके अपना दास बना लेती है।

उद्धरण - 658

अखि़र में एक ऐसी बात बोले जिसे सब जानते हैं। उन्होंने कहा, ‘लोग आजकल बड़े बेईमान हो गए हैं।‘

उद्धरण - 657

उसके घर के लिए जाने वाली सीधी सड़क आने वाली थी। यही वह स्थल था जहां उसकी घबराहट चरम पर पहुंच जाती थी। हालांकि इधर कुछ साल से यही वह स्थल था जहां घर से मुलाक़ात की खुशी अपने सबसे अधिक उभार पर होती थी। किंतु उसके पहले की बात है, यहां आते ही वह डरने लगता : घर में कोई हादसा हुआ होगा और मुहल्ले वाले मातमपुर्सी के लिए घर के सामने भीड़ लगाये होंगे।

उद्धरण - 656

‘जब अमुक एक वर्ष का था’ या ‘जिस साल अमुक की लड़की की शादी हुई’... और आज मैं स्वयं हिसाब लगा रही हूँ, तुम से पहली भेंट से दस महीने बाद, तुलियन से आठ महीने बाद, और तुम्हें अन्तिम बार देखा तब से चार महीने....कैसे मानव अपने सारे जगत को अपने छोटे से जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं के आस-पास जमा लेता है, और विराट का समूचा सत्य उस निजी छोटे-से सत्य का सापेक्ष हो जाता है।

उद्धरण - 655

रामविलास ने उसी सुबह गंगा में डुबकी लगाते हुए यह प्रतिज्ञा कर ली थी कि वह इसी भूमि पर रहेगा। यहीं बसेगा। यहीं अपने प्राण त्याग करेगा। देश में हवेली बनवाएगा जरूर- वह पिताजी का सपना था - लेकिन वह कभी इस शहर को नहीं छोड़ेगा।

उद्धरण - 654

वह सोचने लगा, वह माँ के मरने पर अनाथ नहीं हुआ, बाप के मरने पर नहीं, समाज से निकलकर नहीं, पर अनाथालय में आकर अनाथ हो गया, क्योंकि वहाँ आकर स्वयं उसकी आत्मा मर गई ।

उद्धरण - 653

फिर जिनको साथ लेकर पति को छोड़ आयी हूँ, उनको मैं छोड़ दूँ! उन्होंने मेरे लिए क्या नहीं त्यागा? उनकी करुणा पर मैं बची हूँ। मैं मर सकती थी, लेकिन मैं नहीं मरी। मरने को अधर्म जानकर ही मैं मरने से बच गयी। जिसके सहारे मैं उस मृत्यु के अधर्म से बची, उन्हीं को छोड़ देने को मुझसे कहते हो।

उद्धरण - 652

रोज सुनने में आता है कि नेता नहीं है, नेता नहीं है......ऐसे नेताओं के बोझ से समाज कुचला ही जाएगा, उठेगा कैसे.....जो ऊपर से लादा जाएगा, वह भार ही होगा, भारवाहक कैसे होगा? भार उठाने की सामर्थ्य तो उसमें होगी, जो नीचे से उठेगा- बिघ्नों, बन्धनों, भारों, श्रृंखलाओं की उपेक्षा करता हुआ, चोटों से दृढ़ हुए पुट्ठे और संघर्ष से दृढ़ हुआ हृदय लेकर अभिमान भरा और मुक्त.......

उद्धरण - 651

आज हमारे नेता बार-बार कहते हैं, हमारा विद्रोह केवल मात्र आर्थिक है। हमारे घर में रोटी नहीं है, रोजी हमें मिलती नहीं, हम भूखे हैं, इसलिए हम विद्रोही हैं। मैं समझता हूँ कि यह कहना क्षूद्रता है, अपना घोरतम अपराध् है।

उद्धरण - 650

इस देश में लड़कियाँ ब्याहना भी चोरी करने का बहाना हो गया है। एक रिश्वत लेता है तो दूसरा कहता है कि क्या करे बेचारा! बड़ा खानदान है, लड़कियाँ ब्याहनी हैं। सारी बदमाशी का तोड़ लड़कियों के ब्याह पर होता है।

उद्धरण - 649

मन्नतें और मौत। शायद इस संसार का तम्बू इन्हीं दो छोरों पर तना हुआ है। मन्नतें रक्तबीज की तरह होती हैं। एक के पूरी होने पर अनेक जन्म ले लेती हैं और मृत्यु ही उनकी उर्वरता का समापन कर पाती है।

उद्धरण - 648

हो सकता है कि मेरा सोचना शुरू से ही गलत रहा हो- पर शुरू से वह यही रहा है। मेरे कर्म का- सामाजिक व्यवहार का नियमन समाज करे, ठीक है, मेरे अन्तरंग जीवन का- नहीं। वह मेरा है। मेरा यानी हर व्यक्ति का निजी।

उद्धरण - 647

कहा ही गया है कि आदमी की उन्नति में छह बातें बाधक हैं - आलस, पत्नी-प्रेम, बीमारी, जन्मभूमि से लगाव, संतोष और कायरता। तुममें तो ये छहों गुण भरे हुए हैं।

उद्धरण - 646

बच्चे कैसे इतने सुन्दर होते हैं, यही एक ताज्जुब की बात है । शायद पीड़ा से जो चीज पैदा होती है, वह सुन्दर ही होती है..............असमय पैदा होने से ही, देखिए, इनकी खाल कितनी मुलायम और सुन्दर है । तभी मैं कहता हूँ पीड़ा सौन्दर्य की माँ है

उद्धरण - 645

जिन्दगी है, चलती जाती है। कौन किसके लिए थमता है, यह तो चक्कर है। गिरता गिरे, उसे उठाने की सोचने में तुम लगे कि पिछडे़।

उद्धरण - 644

गुजारा? आप गुजारा करना चाहते हैं? तब यह सब वर्दियॉ क्यों, संगठन क्यों, ओहदे क्यों? आप क्यों सुनहरी बिल्ले वाली वर्दी कसकर और तलवार लगाकर बैठे हैं? परेड क्यों होती है, बिगुल क्यों बजता है? पंचायत करना इससे कहीं अच्छा रहता। मैं तो यह जानता हूँ कि अगर संगठन है तो अनुशासन है

उद्धरण - 643

एक स्वाधीन लोकतंत्र भारत का विराट स्वप्न, जिसके राष्ट्रपति गॉधी हैं, और सिद्धि के लिए साधन हैं अनवरत कताई और बुनाई, विदेशी माल और मनुष्य का परित्याग, और प्रत्येक अवसर पर दूसरा गाल आगे कर देना

उद्धरण - 642

इसने क़सम खायी है कि रिश्वत न दूँगा और क़ायदे से ही नक़ल लूँगा, उधर नक़ल बाबू ने कसम खाई है कि मैं रिश्वत न लूँगा और क़ायदे से ही नक़ल दूँगा। इसी की लड़ाई चल रही है।

उद्धरण - 641

बार बार सोचे जाने के कारण इन हादसों की चमक खो उठती तो वह नयी विपत्तियों की रचना करने लगता था और तब उसके मनोलोक में गौरी किसी दूसरी दुर्घटना का शिकार होने लगती थी।

उद्धरण - 640

मैं अपने विवाह को विवाह कभी नहीं मान सका हूँ- ऐसा विवाह सन्तान को जायज करने की रस्म से अधिक कुछ नहीं है, न हो सकता है। मैं अलग हूँ, अपने को अलग और मुक्त मानता हूँ, और मेरा परिवार भी मुझ से न कुछ चाहता है, न कुछ अपेक्षा रखता है सिवाय खर्चें के जो मैं भेजता हूँ और भेजता रहूँगा।

उद्धरण - 639

छपनिया (विक्रम संवत् उन्नसी सौ छप्पन याने अठारह सौ निन्यानबे ईस्वी) का अकाल। मां और पिताजी का एक एक कर उसे छोड़ जाना, किराने की दुकान का कारोबार अकाल के कारण ठप हो जाना और पत्नी का अपने बंबई प्रवासी भाइयों के पास देखी हुई अंग्रेजी घड़ी और अंग्रेजी टार्च-बत्ती के लिए ललचाना

उद्धरण - 638

हजूर, ये तोते जंगलों के रहने वाले हैं। आकाश के डकैत हैं; लेकिन इसीलिए इनका सुख-दुख, गाना-रोना सब आजादी के ही आसरे है। यहाँ इन्हें उसकी झलक भी नहीं मिलती। आप इनके रहने के लिए ऐसी जगह बनवाइए जहाँ सामने दीवार न हो, आगे खुला नजारा हो, ये सूर्योदय भी देख सकें और सूर्यास्त भी; उस आजादी से इनका नाता न टूटे जो इनका जीवन है ।

उद्धरण - 637

अपने से पूछता रह जाता था कि यह ठीक से होना, मौज से होना क्या चीज होती है! क्या बुआ प्रसन्न हैं? प्रसन्न हैं तो मैं इधर प्रसन्न क्यों नहीं हूँ ऐसा मन में उठता था और बैठ जाता था। कुछ काल बाद पता लगा कि उन्होंने एक मृत कन्या को जन्म दिया है।

उद्धरण - 636

जो वर्दी पहन कर अपने को उन सब कर्मो का अधिकारी समझते थे, जो उन्होंने गोरे सैनिकों या पुलिस वालों को करते देखा था और देखकर घृणा और विवश क्रोध् से भर गए थे- राह चलतों का धमकाना, किसी गरीब पर शक हो जाने पर उसे गाली देना और सताना, आदि........

उद्धरण - 635

अपने हिन्दी-ज्ञान को प्रमाणित करने के लिए, और गॉधी के प्रति अपनी श्रद्धा- जिसे व्यक्त करने का और कोई साधन उसे प्राप्त नहीं था- प्रकट करने के लिए उसने एक राष्ट्रीय नाटक लिखना आरम्भ किया।

उद्धरण - 634

पुनर्जन्म के सिद्धान्त की ईजाद दीवानी की अदालतों में हुई है, ताकि वादी और प्रतिवादी इस अफसोस को लेकर न मरें कि उनका मुकदमा अधूरा ही पड़ा रहा। इसके सहारे वे सोचते हुए चैन से मर सकते हैं कि मुक़दमे का फैसला सुनने के लिए अभी अगला जन्म तो पड़ा ही है।

उद्धरण - 633

मैं कहती दवा लाओ तुम हवा लेकर आ जाते। मैं कहती आम तुम जाम लेकर आते। अब गांवों में टीवी फैल गया है। मेरी एक रिश्तेदार बता रही थीं उनके गांव में कई बार घरों के टीवी से आवाज़ आयी, डाकू़ डाकू पकड़ो पकड़ो। जो टीवी नहीं देख रहे थे डाकुओं को पकड़ने के लिए दौड़ने लगे। और एक दिन सचमुच में डाकू आने पर उन्होंने समझा टीवी में डाकू आये हैं।

उद्धरण - 632

मैं मान कर चल रहा हूँ कि आप दोनों छुटकारा चाहते हैं, नहीं तो अगर वह न चाहती हों और धर्म-परिवर्तन करने को तैयार हों तो आप कुछ नहीं कर सकते- यानी ऐसे स्मूथली नहीं हो सकता- फिर तो आप को ऐसे आरोप उन पर लगाने पड़ेंगे जो सच होने पर भी कोई स्त्री आसानी से न मानेगी- और झूठ हों तब तो...और यह तो सवाल ही दूसरा है कि वह कितनी क्रूरता होगी

उद्धरण - 631

पिताजी की ख्वाहिश है कि भिवानी में वे एक बड़ी हवेली बनाएं। शायद इसीलिए वे कलकत्ते में दिन - रात काम करते हैं। एक मिनट आराम नहीं करते। वे खुद कलकत्ता गए और वहीं एक विशाल हवेली चिनवाने का पिताजी का सपना उनके हृदय से निकल कर रामविलास के हृदय में कई परतों के नीचे दबता चला गया।

उद्धरण - 630

मैंने सुना, मालती एक बिल्कुल अनैच्छिक, अनुभूतिहीन, नीरस, यन्त्रवत्- वह भी थके हुए यन्त्र के से स्वर में कह रही है, ‘‘चार बज गए’’ मानो इस अनैच्छिक समय गिनने-गिनने में ही उसका मशीन-तुल्य जीवन बीतता हो । जब आठवें दिन उसके पिता ने पूछा, ‘‘किताब समाप्त कर ली?’’ तो उत्तर दिया, ‘‘हाँ, कर ली,’’ पिता ने कहा, ‘‘लाओ, मैं प्रश्न पूछूंगा’’ तो चुप खड़ी रही । पिता ने फिर कहा, तो उद्धत स्वर में बोली, ‘‘किताब मैंने फाड़कर फेंक दी है, मैं नहीं पढ़ूँगी।’’........ वही उद्धत और चंचल मालती आज कितनी सीधी हो गई है, कितनी शान्त, और एक अखबार के टुकड़े को तरसती है...........

उद्धरण - 629

मुझे मालूम होता है कि मैं अपने को खो सका हूँ तभी सफल वकील और बड़ा जज बन सका हूँ, इतनी उम्र बिताकर बहुतों को मरते और उनसे बहुतों को जीते देखकर अगर मैं कुछ चाहता हूँ तो वह यह है कि भीतर का दर्द मेरा इष्ट हो। धन न चाहूँ, मन चाहूँ। धन मैल है। मन का दर्द अमृत है।

उद्धरण - 628

मैंने देखा है कि सब प्रचार अन्ततः घृणा का प्रचार है, क्योंकि घृणा में शक्ति है, प्यार में वह नहीं है। वैसे ही जैसे विष में शक्ति है। लड़ाई लड़ी जाती है, जिहाद होते हैं, तो घृणा के सहारे......और घृणा सचमुच विष है। वह दूसरे को भी मारती है, अपने को भी नहीं छोड़ती।

उद्धरण - 627

शेखर ने घर के सब कमरों में से विदेशी कपड़े बटोरे, और नीचे एक खुली जगह ढेर लगा दिया। फिर लैम्पें लाकर उनपर मिट्टी का तेल उड़ेला; तेल का पीपा नौकरों के पास रहता था, वहॉ जाने की हिम्मत नहीं हुई, और आग लगा दी।

उद्धरण - 626

झिलमिलाते हवाई अड्डों और लकलकाते होटलों की मार्फत जैसा ‘सिम्बालिक माडर्नाइज़ेशन‘ इस देश में हो रहा है, उसका असर इस मकान की वास्तुकला में भी उतर आया था और उससे साबित होता था कि दिल्ली से लेकर शिवपालगंज तक काम करनेवाली देसी बुद्धि सब जगह एक-सी है।

उद्धरण - 625

इसने मुख्यमंत्री को समझा रखा है कि इससे दो फ़ायदे होंगे। एक यह कि यह खाऊकमाऊ नज़रिये से बेमिसाल योजना होगी जिसमें जितना लूटना चाहे लूटा जा सकता है। दूसरे मुख्यमंत्री को आने वाले लोकसभा चुनाव में दो तिहाई सीटों पर क़ब्ज़ा चाहिए ताकि वह राष्ट्रीय राजनीति में अपने ख़्वाब पूरे कर सके। संपूर्णानंद ने उसे समझाया है कि देवस्थानों का जीर्णोद्धार, उत्थान, सौन्दर्यीकरण, नवनिर्माण का अभियान पार्टी की झोली को वोटों से भर देगा।

उद्धरण - 624

उस के लिए सब से आसान तरीका यह होगा कि धर्म-परिवर्तन कर के डाइवोर्स माँगे-तुम न धर्म-परिवर्तन करोगी न उस के पास जाओगी, बस। तुम डाइवोर्स माँगती तो वह न देता- और शादी के लिए माँगती तो और भी नहीं, तुम्हें वह एक गुलाम रख कर सताना ही चाहता- पर अपनी सुविधा के लिए वह सब करेगा।

उद्धरण - 623

ऊंटों के साथ घूमनेवाले बनजारों से भी गई-गुजरी जिंदगी हो गई है हमारी। इन लोगों का परिवार कम से कम साथ तो रहता है। हमारे नसीब में तो उतना भी नहीं। क्या होगा ऐसा धन कमा के? रुखी-सूखी खाकर क्या आदमी नहीं जी सकता? परदेश की पूरी रोटी तै घर की आध भली।

उद्धरण - 622

पति ढाई बजे खाना खाने आते हैं, इसलिए पत्नी तीन बजे तक भूखी बैठी रहेगी!

उद्धरण - 621

ज्ञानीजन कह गये हैं कि परम कल्याणमय ही इस सृष्टि में अपनी परम-लीला का विस्तार कर रहा है। मैं जान लेता हूँ कि ऐसा ही है। न मानूँ, तो जीऊँ कैसे? पर रह रहकर जी होता है कि पुकारकर कहूँ कि हे परम कल्याणमय, तेरी कल्याणी लीला को मैं नहीं जानता हूँ, फिर भी रोने-बिलखने की आवाज तो चारों ओर से मेरे कानों में भरी आ रही है। यह क्या है, ओ जगत्पिता! तेरी लीला के नीचे यह सब आर्तनाद क्या है?

उद्धरण - 620

आज के जीवन में पुरुष की ओर से देय कुछ भी नहीं है, सख्य तो दूर, करुणा भी देय नहीं रही, और नारी केवल पुरुष के उपभोग का साधन रह गई है, निरी सामग्री, जिसे वह जब चाहे, जैसे चाहे, जहाँ चाहे, अपनी तुष्टि के आग में होम कर दे। और इसकी कहीं अपील नहीं है, क्यांकि स्त्री कभी दुहाई दे तो उत्तर स्पष्ट है कि ‘और शादी की किसलिए जाती है?’

उद्धरण - 619

इसका अर्थ यही है कि प्रत्येक भारतीय नौजवान अपने माँ-बाप का गुलाम है। और चाहते हैं, शासक की गुलामी से निकलना, समाज की गुलामी से निकलना, अज्ञान की और प्रकृति की गुलामी से निकलना- स्वयं परमात्मा की गुलामी से निकलने की बात करते हैं वे!

उद्धरण - 618

वह कोई परिवर्तन झेलने को तैयार न था।

उद्धरण - 617

देशों की सीमाएं, भाषाएं, ध्वज, क़िले, क़ानून और सभ्यताएं मिट सकती हैं किंतु धर्म इन्सानों के ख़त्म हो जाने के बाद भी बचा रहता है। स्वयं अपने देश में देखिए, कितनी विदेशी सत्ताएं अपने-अपने धर्म लेकर यहाँ सत्ता पर क़ाबिज़ रहीं।

उद्धरण - 616

जैसा मैं देखता हूँ, हमारे देश में कम्यूनिस्ट दो प्रकार के हैं- एक तो जो वास्तव में मजदूर हैं, दूसरे मध्य या उच्च वर्ग के कुछ लोग जो अपनी परिस्थितियों के उत्तरदायित्व से भागते हैं- या भाग गये हैं।

उद्धरण - 615

बंगाल में गोपीनाथ साहा ने आज के सोलह साल पहले टैगर्ट को मारने की कोशिश में किसी और को भूल से मार डाला था- सिर्फ अठारह साल की उम्र में टैगर्ट को मारने के लिए उसने अपनी जान दे दी। इतना ही नहीं, सुभाष बाबू के बड़े भाई शरत बाबू को टैगर्ट को मारने की योजना बनाने के लिए आठ साल पहले गिरफ्तार किया गया था। कहते हैं कि आदमी कितना भी बदल जाए पर पूरी तरह नहीं बदलता। अब भी किशोर बाबू के दिमाग में स्कूल के इतिहास- मास्टर रघुनंदन मिश्र की बात बैठी हुई है कि बीते हुए कल को जाने बिना आज का कोई अर्थ पूरी तरह नहीं निकलता।

उद्धरण - 614

कुछ भी किसी के बस का नहीं है, योके। एक ही बात हमारे बस की है- इस बात को पहचान लेना। इससे आगे हम कुछ नहीं जानते।

उद्धरण - 613

शायद हमारे मन में पाप का झूठा डर होता है...डर ही से पाप बनते हैं । पर जाता भी तो नहीं वह! मैं सोचता हूँ.....मैं जान देकर तुम्हें अच्छा कर दूँ-’ इस बीच में स्वर फिर रुक गया, मानो किसी ने मुँह के आगे हाथ रख दिया हो-‘पर एक छोटी सी चोरी नहीं होती ।

उद्धरण - 612

और सच पूछिए तो छोटे-मोटे रोगों की परवाह करना उनकी परवरिश करना है। सौ दवाओं की एक दवा है बेफिकरी।

उद्धरण - 611

आप अगर डरतें हैं कि मैं पीछे पुस्तक पर अपना लेखकत्व का अधिकार जमाना चाहुंगा, तो यह डर निर्मूल है। प्रकाशन के बाद पुस्तक में कुछ रहेगा, जिस पर मैं अधिकार जमाना चाहुंगा या जिसका मैं उत्तरदायी भी हूँगा, ऐसा भरोसा मुझे नहीं है। मैंने तो पुस्तक कुँए में डाल दी- और मुण्डेर पर पड़े हुए साठ रूपये उठा लिए।

उद्धरण - 610

साहित्य में, समाज में, कला में, जीवन में, सब जगह वही मनमोहक आरम्भ, वही मनमोहक प्रवाह, और अन्त में वही गहरी खड्ड! प्राणों का पक्षी उड़ान भरता है, लगता है कि वह आकाश की छत को छू लेगा, लेकिन एकाएक वह टूटकर गिर जाता है, मानों बिजली की मार से नष्ट हो गया हो।

उद्धरण - 609

खन्ना मास्टर का असली नाम खन्ना था। वैसे ही, जैसे तिलक, पटेल, गाँधी, नेहरू आदि हमारे यहाँ जाति के नहीं, बल्कि व्यक्ति के नाम हैं।

उद्धरण - 608

उनको आधुनिकता और विज्ञान के कारण कौतुक नहीं होगा। उनको चाहिए प्राचीनता, रहस्य, चमत्कार, अध्यात्म। ये सब यदि किसी एक तत्व में एक साथ हैं तो सनातन प्राचीनतम हिंदू धर्म में।