उद्धरण - 895

दरअसल औरत, जाति और धर्म- इन तीनों के नाम पर बुज़दिल, नरमदिल, नेकदिल भी ख़ौफ़नाक बन जाता है। एक डरपोक इन्सान अपनी स्त्री के सामने बाघ बना रहता है। इसी तरह धर्म के नाम पर होने वाले दंगों में देखो, जो लोग रोज़मर्रा की ज़िदगी में घायल परिन्दों देख कर दुखी हो जाते हैं चींटियों को आटा खिलाते हैं, बंदरों को चना- वे भी दंगों में इन्सान के ख़ून की होली खेलने की बात करने लगते हैं तो ये है वो ख़ुदा का बंदा, परमेश्वर का सपूत जो दूसरे मज़बह के लोगों की लाशों को धरती का बिछौना बनाना चाहता है। और जो जाति है न शोर कम मचाती है ख़ून भी कम बहाती है पर भीतरी हिंसा करती है। ये मामूली से मामूली बात में मौजूद रहती है और बड़ी से बड़ी बात में भी। वाक़ई इसकी हिंसा दिखे भले न पर होती हर जगह है। जन्म से मौत तक यह चिपकी रहती है।

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