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Showing posts from May, 2020

उद्धरण - 585

पारस लोहे को भी कंचन कर देता है। सुगना हमारे भाग में न जाने कौन सा सराप है कि जो सोचें ठीक उसका उलटा होगा विपरीत घटेगा। हमारा दुर्भाग्य कोई पारस नहीं बदल सकता।

उद्धरण - 584

आँसू भरी आँखों के सामने डिब्बे की हर चीज़, बैठे हुए अजनबी लोगों के चेहरे पहले धुँधले हुए और फिर एक-दूसरे में मिल गए। पापा का चेहरा भी उन्हीं में मिल गया और फिर धीरे-धीरे सारे चेहरे एक-दूसरे में गड्डमड्ड हो गए।

उद्धरण - 583

तुम समाज-समाज चिल्लाओ वो आजा़द दुनिया का नारा लगाएँ। मुनाफे की दुकान अलग है विज्ञापन के ढंग अलग है लेकिन बात एक ही है। तुम दोनों ही गुटों के लोग बेचारे निरीह व्यक्ति पर सामूहिक आक्रमण करते हो। व्यक्ति को स्वतन्त्रता दिलाना चाहता हूँ।

उद्धरण - 582

यह मेरा नहीं। जो कुछ मैं अर्पण कर रहा हूँ यह मेरा नहीं। ठीक तो है जहाँ आदमी पैदा होता है वहीं किसी कोने में नाल गाड़ी जाती है। उसकी कि इस आँगुर-भर धरती में इस जीव की जड़े हैं। फूलेंगी-फलेंगी। भले ही दुनिया के छोर पर चला जाय फिर भी नहीं भूली जाती अपनी भूमि नाम और मिट्टी। ....... इंसानियत के नाते ही सोच लो जिस धरती से तुम पैसा खुदवा रहे हो उस पर हम पसीना बहा लें बस। बेघर होने से बच जाएँगे। अपनी जड़ों से जुड़े रहकर हरे-भरे बने रहेंगे इस गाँव के लोग

उद्धरण - 581

मैंने इतना समझाया कि देखो अभी मत लाओ। पहले उसके एक्ज़ाम्स होने दो। छुट्टियों में लाकर यहाँ रखना यदि हिल जाए उसका मन लग जाए तो यहाँ भर्ती करा देना। वरना बच्चे के साथ भी तो कितनी ज़्यादती है। पर इनको तो जैसे झख सवार हो गई। रात-रात भर नींद नहीं आती थी। ....... क्या हाल हो गया है बच्चे का? कितना सहमा-सहमा डरा-डरा रहता है। कैसे नहीं भेजूँ इसे हॉस्टल? यह सब सबसे कटकर रहेगा अपने बराबरी के बच्चों के बीच में ही रहेगा तभी नार्मल होगा। हो खर्चा जैसे भी हो-जो भी हो। ...... सारे समय बालकनी मैं बैठा रहा बिलकुल नहीं बोलता। मैं तो खेलने भी बैठी पर सच मुझे तो तरस आने लगा। और इस चीनू को देखो पाँच बजे से ही आँखे फाड़-फाड़कर चारों तरफ़ ऐसे देखता है। जैसे कुछ ढूँढ रहा है। बस तुम्हें ढूँढता है। यह तो अब तुम्हें बहुत मिस करने लगा है।

उद्धरण - 580

कामाचारी अर्थाचारी अथवा सदाचारी कोई भी हो इनका एकजुट होकर कोई भी सामूहिक आन्दोलन चलाना अनैतिकता है। हमारी इच्छाएँ और आकांक्षाएँ ऊपरी तौर पर बहुतों से मेल खाने के बावजूद हमारे अन्दर अपना स्वतन्त्र अस्तित्व रखती हैं। अस्ति की स्वीकारोक्ति ही यह है कि मैं हूँ और मैं हर हालत में दूसरे से भिन्न हूँ-अपने माता-पिता भाई-बन्द पत्नी-प्रेमिका मित्र-व्यवहारी इन सबसे मेरा अस्तित्व जुदा है। अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखने के लिए मुझे केवल अपनी ही चिंता करनी चाहिए।

उद्धरण - 579

ऐसा होता है कभी कि राजा सपना देखे और प्रजा के कारण सच न हो पाए। राजा का सपना जिद्दी होता है। कहते हैं न कि राजहठ पर किसी का वश नहीं।

उद्धरण - 578

पता नहीं कैसे क्या हुआ कि उसके भीतर दो आँखें और उग आईं और उसके बाद से ही सब कुछ गड़बड़ हो गया। बाहर की आँखों से वह एक चीज़ देखता है तो भीतर की आँखें दूसरी चीज़ देखने लगती हैं। कभी भीतर की चीजे़ बाहर की चीजों को दबोच लेती हैं तो कभी बाहर की भीतर की चीजों को।

उद्धरण - 577

और सारे समाज में रहकर आप लोगों की बखानी हुई सारी नैतिकता के लबादे ओढ़कर बेचारा व्यक्ति कितना अकेला, कितना शून्य, कितना निरर्थक है! या तो वह समाज को स्वीकारे अथवा समाज उसका अस्तित्व ही नकार देगा। ये क्या खूब समाजवाद है कि जिसमें समाज तो आजाद है पर उसका व्यक्ति गुलाम। और जब व्यक्ति ही गुलाम है निज अस्तित्वहीन है तब समाज ही क्योंकर स्वतन्त्र हुआ।

उद्धरण - 576

जब गुहार-पुकार भी नहीं सुनी जाती तो आदमी किसी भी तरह अपने बचाव में खड़ा हो जाता है। उचित-अनुचित सही गलत को ताक पर रखकर संघर्ष करने लगता है।

उद्धरण - 575

कहाँ? ये पत्तियाँ तो सूख रही हैं। माली की हँसी- ये तो सूखेगी ही। उस ज़मीन के खाद-पानी की पत्तियाँ हैं ये तो सूखकर झड़ जाएँगी। फिर नई पत्तियाँ फूटेंगी। जड़ पकड़ने के बाद कोई डर नहीं। और उसने खुद उन मरी-मुरझाई पत्तियों को झाड़ दिया था।

उद्धरण - 574

नैतिकता इस बात में नहीं कि आदमी कितना सच्चा त्यागी तपस्वी और प्रामाणिक है। प्रश्न यह है कि व्यक्ति को अपनी इच्छाओं आकांक्षाओं और आचार-व्यवहार को गति देने में मुक्ति कितनी मिलती है।

उद्धरण - 573

महापर्व ही था बिटिया किसी के लिए विकास का महापर्व तो किसी के लिए विनाश का महापर्व। पारीछा खुर्द जसौरा-खड़ेसर के विनाश का महापर्व! जहाँ के निवासियों को अपनी भूमि से उखाड़ा जा रहा था। बेदखल किया जा रहा था खदेड़ा जा रहा था।

उद्धरण - 572

मुझे कोई एतराज़ नहीं होगा। सच पूछो तो मैं ख़ुद अब यही चाहने लगी थी कि इसे तुम्हारे पास ही भेज दूँ। बहुत रख लिया। अब कम से कम मैं अपनी ज़िंदगी जिऊँ- एक परत पर उभरा और उससे भी भीतर की परत पर उभरा- अच्छा है तुम्हारे और मीरा के बीच में भी दरार पड़े हर दिन एक परेशानी हर दिन एक तूफ़ान

उद्धरण - 571

रूपयों के आगे लोगों की चिंतन-शक्ति को भ्रमित और कुण्ठा-केन्द्रित कर देना। उन्हें नपुंसक बौद्धिक और सैद्धान्तिक बकवास के लिए प्रेरित करके उनकी बची-खुची स्नायविक शक्तियों को थकाना और तोड़ना क्या अच्छी बात है?

उद्धरण - 570

स्त्री तो धरती के समान है हमेशा देने के लिए तैयार है इसलिए निजी सुख और महत्त्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए पुरूष उस पर सम्पूर्ण अधिकार चाहता है। उसे अपना अंहकार प्यारा है इसलिए उसे दूसरे का खयाल नहीं रहता। उसे अपना सुख चाहिए तब वह नहीं देखता कि कहाँ क्या टूटा क्या विभाजित हुआ।

उद्धरण - 569

हमें लगता है कि जो सबसे ज्यादा पापी होता है वही घोर धर्मभीरू भी होता है। गरीबों का खून चूसनेवाले बड़े बड़े दान दिया करते हैं। धर्मशाला बनवाते हैं। अस्पताल में दान देते हैं, मन्दिर की स्थापना करते हैं। छल-कपट से रूपया न कमाते तो इस तरह के विशाल दान के योग्य हो पाते?

उद्धरण - 568

बच्चों का गुस्सा, बच्चों का मान, बच्चों का अहं कितना छोटा और कितना निरीह होता है सबकुछ। फिर बंटी जो छाया की तरह चिपककर रहा है उसके साथ।

उद्धरण - 567

भैया तुम्हारी बात का निर्णय करना बड़ा कठिन है। इस समय जमाने का एक रंग नहीं है कहीं माँ-बाप नालायक हैं तो लड़के लायक हैं और कहीं-कहीं ये भी है कि लड़के और माता-पिता दोनों लायक हैं मगर आपस में मत मतान्तर है। अब आप ही बताइए पुत्ती गुरू के लड़के रमेश में आप कोई दोष निकाल सकते हैं?

उद्धरण - 566

इसका तो अर्थ यही हुआ कि कोई भी व्यक्ति स्वंय अपनी प्रतिभा और महानता को पहचान नहीं सकता जब तक कि कोई प्रभावशाली एवं शक्तिशाली व्यक्ति उसे नहीं बताता और उस पर अपना वरदहस्त नहीं रखता!

उद्धरण - 565

गाँव का जीता-जागता जीवन हमारे अपने हाथ में है। कच्ची मिट्टी की तरह मुलायम। इसे सँवारा जा सकता है। बार-बार गढ़ा जा सकता है। अनुपम रूप दिया जा सकता है। अपने अनुरूप दिया जा सकता है। अपने अनुरूप ढाला जा सकता है।

उद्धरण - 564

तुमसे कुछ नहीं होगा। मैं ही बंटी को अपने साथ लंबी ड्राइव पर ले जाऊँगा। बहुत प्यार से विश्वास में लेकर उससे पूछूँगा, उसकी मनःस्थिति जानने की कोशिश करूँगा क्यों वह यहाँ एडजस्ट नहीं कर पा रहा है क्या बताऊँ शकुन मुझे समय नहीं मिलता।

उद्धरण - 563

जीवन क्या है मास्टर साहब आपसे सत्त कहता हूँ ग्यानी महात्माओं की चरण रज लेके आ रहा हूँ झूठ नहीं बोलूँगा- मैं कहता हूँ हमसे-आपसे बढ़कर निष्काम कर्मी इन लाखों उपदेश देनेवाले ग्यानी महात्माओं में भी नहीं मिलेगा। हम ससरी बीबी-बच्चों के लिए दिन-रात हाय-हाय करते जीवन खपा देते हैं। साहेबों बड़े बाबुओं की जिस-तिस की ससरे चपरासियों तक की रौब-फटकार सुनके घर आओ तो घर सा घर नहीं लगता। फिर अपनी ज़िन्दगी ही क्या रह गई। जो कुछ रही इन बीबी-बच्चों की रही। हम जीते हैं। तो निष्काम जीते हैं।

उद्धरण - 562

हिन्दुस्तानी भाषाओं में पुरानापन, बड़बोलापन, कच्चापन, पाखंड और फालतू आदर्श बहुत हैं। आपसी झगड़े भी बहुत हैं। अंग्रेजी तो सभी मान लेंगे लेकिन हिन्दी या किसी और हिन्दुस्तानी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने पर झगड़़ने लगेंगे आपस में।

उद्धरण - 561

घबराते नहीं मन्दाकिनी! क्या नहीं हो पाएगा? सब कुछ होगा। जितना सम्भव होगा कोशिश करेंगे। तुम क्या सोच रही हो अस्तपाल चलने डॉक्टर आ जाने से मिट जाएँगे सारे दर्द? आदमी हो जाएगा निरोग? बिटिया रूग्ण तो आदमी की आत्मा भी है उसके निवारण की दवा कहाँ खोजोगी? रोगी हमारी व्यवस्था है उसे भी सँभालोगी? क्षयग्रस्त हमारा समाज है सुधारने का यत्न करोगी?

उद्धरण - 560

वह जानती थी कि ये कोने जब होते हैं तो कितने पैने होते हैं। कैसे इनसे सबकुछ कटता चलता है विश्वास सद्भावना अपनत्व! सारी की सारी ज़िंदगी बँट जाती है खंडो में, टुकड़ों में कि इसके बाद एक पूरी ज़िंदगी जीना नहीं वह अब और उस सबसे गुजरना भी नहीं चाहती। बड़ी से बड़ी कीमत भी चुकानी होगी तो चुका देगी।

उद्धरण - 559

मेरी भगती कच्ची नहीं है बाबूजी। माया-मोह साले को छोड़ते कितनी देर लगती है मुझे। इस्तरी-बच्चों में धरा क्या है? सब अपने-अपने स्वारथ के कारन हमें घेरते हैं। अरे हम घिर जायँ तो मूरख नहीं तो सन्त। इस्तरी-बच्चों से मुक्ती पाने का नाम ही मोच्छ है। देखौ आज हमारे लच्छू ने रेस्टोरां खोला हम गये। पर उसके ठाठ देखके हमारे मन में माया-मोह न उपजा। मिठाई खाई और संत-सम्मेलन में आ गये। यही तो मोच्छ है।

उद्धरण - 558

बीमारी से शरीर कलुषित और अपवित्र हो जाता है और गलत विचार से मन। बीमारी दूर होने से जैसे शरीर स्वच्छ और पवित्र हो जाता है उसी तरह सुन्दर विचार से मन और आत्मा। शरीर और मन के स्वास्थ्य और नए सुन्दर संकल्प से हर आदमी नया जन्म ग्रहण कर सकता है। यह नया संकल्प है अपने में पूरा विश्वास रखने का, खूबसूरत उम्मीदों को अपने अन्दर जीवित रखने का, दूसरों के सुख-दुख से अपने को जोड़ने का। यह आसान नहीं है मगर मुमकिन है। नाउम्मीदी की बीती बातों को जितनी बार याद करता है मनुष्य उतनी ही बार मरता है और मरता जाता है।

उद्धरण - 557

मानस-जनम बार बार नहीं मिलता। देवयोनि से बड़़ी है मनुष्य-योनि। प्रभामंडल के बीच सत्पुरूष बने रहना सरल है। सांसारिक पाप-पुण्य सत्-असत् ज्योति और अन्धकार से गुजरकर परमारथ करना कठिन तप है।

उद्धरण - 556

अहं और गुस्से से भरे-भरे शकुन की लाई हुई चीजों को बिना देखे, बिना छुए एक ओर सरका देने उमड़ते आँसूओं को भीतर ही भीतर रोककर सूखी आँखों से मोटर में बैठकर विदा हो जाने की व्यथा बंटी से कहीं ज़्यादा शकुन की अपनी व्यथा है और ऐसी व्यथा जिसे कोई भी बाँट नहीं सकता।

उद्धरण - 555

औरत के साथ अस्मत का जो हौआ बँधा है उसे माफ़ कीजियेगा मैं नहीं मानती। बॉयोलॉजिकल अर्जेज़ (कायिक आवश्यकताएँ) अपनी जगह पर और ज़िन्दगी का सवाल अपनी जगह पर। मैं एक के हाथ अस्मत बेचकर अपनी आजा़द ज़िन्दगी खराब नहीं करना चाहती हूँ।

उद्धरण - 554

शायद सुख की निकटता से ही दुख सार्थक होता है। खाली दुख या खाली सुख कितना उबाऊ यान्त्रिक और भयावह?

उद्धरण - 553

सौ बातों की एक बात अब पिरधानी भी ससुर व्यापार हो गई है जो ज्यादा-से-ज्यादा खरच सके सो बन जाओ पिरधान और फिर काट लो उसका चौगुना कि दस गुना पइसा। जे कहो बऊ कि बुद्वि-चतुरई के जमाने गए। अब तो कलदार कर रहा है राज। भरी जेब की महिमा है चारों तरफन।

उद्धरण - 552

शकुन को लग रहा है उसके मन में इस समय कुछ नहीं है । न गिल्ट न जस्टिफ़िकेशन। कुछ है तो सिर्फ दुख कि बंटी चला गया कि बंटी एक दिन भी वहाँ खुश नहीं रहेगा। न उस घर में न हॉस्टल में। बिना शकुन के वह कहीं खुश रह ही नहीं सकता। और इन दिनों तो शकुन के साथ भी।

उद्धरण - 551

अब वह सोचते कि उन पर नहीं बल्कि बलिया और भारत की असंख्य जनता की स्वातन्त्र्य भावना नैतिक एवं प्रतिरोध शक्ति पर प्रहार किया जा रहा है और देश के गरीब, सरल, सच्चे, अन्याय-त्रस्त लोगों के कष्टों के मुकाबले तो उनका कष्ट कुछ भी नहीं बल्कि उनको बचाने के लिए उनकी मुक्ति के लिए ही वह सबकुछ बरदाश्त कर रहे हैं।

उद्धरण - 550

किसी से कुछ नहीं पूछना है पार्टनर! मैंने फैसला कर लिया है कि मुझे क्या करना है। अपनी ज़रूरत से कहीं ज़्यादा पैसा कमाकर मैंने देख लिया। इस तरह तुम जितना कमाते हो, उससे कहीं बहुत ज़्यादा गँवा देते हो। अब मैं एक सार्थक जीवन जीकर देखना चाहता हूँ। उसी की कोशिश करूँगा।

उद्धरण - 549

तुम निजी इच्छाओं की पूर्ति और उससे प्राप्त क्षणिक सन्तोष तृप्ति को राष्ट्र, समाज और मनावता की सेवा से क्यों जोड़ते हो, एक में निजी प्रतिशोध का सुख है और दूसरे में मानव अस्तित्व की गरिमा का आनन्द। करोड़ों आम लोगों से जुड़ने की दिव्य अनुभूति! यह सही है कि तुम्हारे साथ बड़ा घृणित व्यवहार किया गया है लेकिन यह समझ लो कि यह सुलूक इसलिए नहीं हुआ कि तुम ऊँचे कुल में पैदा हुए हो, तुम ब्राह्मण हो उसका स्पष्ट कारण यह है कि तुम अपने देश की आजादी, देश के लोगों का कल्याण चाहते हो!

उद्धरण - 548

कि मिठू हमारे सगे भाई ने हमें बेईमान सिद्व कर दिया। छली कपटी और ढोंगी बनाकर छोड़ा। गाँव में ही नहीं असपेर भर में। एरच से कालपी तक। श्यामली से झांसी तक। नहीं-नहीं मिठू दसों दिशाओं में आकाश से पाताल तक रूखे पेड़ों और नदी सागर तक पहाड़-पर्वत तक हमें तो लगता है कि धरती के हर कोने में पिट रही है हमारी बेईमानी की डुगडुगी कि पंचमसिंह आदमी इंसान नहीं डकैत है ठग है चोर-भड़िया है।

उद्धरण - 547

और इसके साथ ही बहुत सारा शोर तरह-तरह का। और एकाएक ही सारे शोर के ऊपर उभरता है- बंटी मत जा बेटे मैं तेरे बिना नहीं रह सकूँगी। दौड़ती-दौड़ती ममी चली आ रही हैं बदहवास लाल आँखें। पर ममी जैसे उस तक पहुँच नहीं पा रही हैं सिर्फ़ उनकी आवाज़ उसके इर्द-गिर्द घूम रही है।

उद्धरण - 546

प्रेम के माने है विवाह और विवाह के माने है कि अब चाहत और प्रेम का एक ऐसा धरातल इन्सान को मिल गया जहाँ से जीवन की दूसरी समस्याओं को समझने और सुलझाने के लिए दिल दिमाग की शक्तियाँ एकजुट होकर आगे बढ़ने के लिए स्वतन्त्र होती है।

उद्धरण - 545

मेरी दशा उस अभिनेता की सी थी, आधे शो के दौरान जिसके सारे दर्शक हॉल छोड़कर चले गये हों। इसके बावजूद परफॉर्म किया जा सकता है। लेकिन क्यों? किसके लिए?

उद्धरण - 544

यदि अहिंसा के तरीके से आजादी मिल भी जाती है तो ये मानव जाति के अपराधी क्षमा प्राप्त करके जीवित रहेंगे और समय बदलने पर स्वंय चोला बदलकर ईमानदार देशभक्तों और वफादारों से अधिक देशभक्त और वफादार बनकर देश और समाज को नए ढंग से दूषित और विकृत करेंगे!

उद्धरण - 543

भले भूखे प्यासे सही पर अपने घोंसले में बसने का आत्मविश्वास बड़ा मजबूत होता है। पाँवों के नीचे की धरती का आधार सच और ठोस लगता है।...... बऊ हमने एक किताब में पढ़ा जब तक मनुष्य आत्मरत रहता है अपने दुखों से नहीं उबर पाता। समष्टिगत प्रेम मानव को दुखों के गर्त से बाहर खींचता है।

उद्धरण - 542

ठीक है बेटे तू वहीं चला जा । तेरे पापा तुझे लेने आ रहे हैं। अब मैं भी नहीं रोकूँगी। जब तू ही खुश नहीं तो आख़िर अपने पापा से कम ज़िद्दी तो तू भी नहीं।.......बाँहों में भिंचे-भिंचे सीने से चिपके-चिपके बंटी के मन में बहुत दिनों का जमा हुआ कुछ पिघलने लगा। अनायास ही आँखों में आँसू आ गए। उन्हें भीतर ही भीतर पीता हुआ वह गोद से नीचे उतर आया।.......पापा ने कसकर उसे सीने से चिपका लिया रो मत बेटे बंटी रो मत और उनकी अपनी आवाज़ भी भीग गई।........जाने कहाँ से देखती हुई ममी की आँखें बिलकुल सूख गईं। बिना आँसू की भीगी-भीगी आँखे। सफ़ेद चेहरा। अब पता लगेगा ममी को।

उद्धरण - 541

मगर उम्र और अरमान शक्तिशाली गुण्डे की तरह बरबस अपनी ओर घसीट ले जाया करते थे। दिन के सूनेपन में खुदा और रातों की सूनी सेज मे सनम का ध्यान चुम्बक के दो सिरों की तरह अपनी-अपनी जगहों पर अटल मौजूद रहते थे। खुदा तो सनम को न पछाड़ पाया मगर सनम खुदा को अक्सर पछाड़-पछाड़ देता है।........यानी कि रूह कहती है कि मैं सात सौ सत्तर काया पलट के इस बदन में आई हूँ। मैं सब्जे यानी घास की तरह से सैकड़ों बार उगी हूँ मिटी हूँ।

उद्धरण - 540

मेरा सिर्फ आइडिया होता था, दिमाग होता था, योजना होती थी, स्वप्न होता था, परिकल्पना होती थी, पूर्वानुमान होता था, आकलन होता था, हंच होता था, बाकी सब कदरोलकर का होता था। सारा ले आउट, सारा सम्पर्क, सारा कैलेण्डरप्लान, सारी दौड़ भाग, कंसल्ट्रंस या पैटीजॉबर्स के चुनाव से लगाकर फीसवसूली तक।

उद्धरण - 539

थाने में मोचनी थी इसका अर्थ यह हुआ कि पहले भी ऐसा कुकृत्य किया जा चुका है यदि नहीं किया गया तो आगे ऐसा इरादा होगा जो अब चरितार्थ होने जा रहा था। साम्राज्यवादी शासन के दौरान भीषण दमन एवं उत्पीड़न के अनेक अकल्पनीय वीभत्स मौलिक तरीके ईजाद किए गए जिनका पता क्रान्तिकारियों का इतिहास पढ़ने से होता है। इसलिए कैसे उनका रस्सा खोलकर जमीन पर पटका गया कैसे चार व्यक्तियों ने उनका एक-एक हाथ एक-एक पैर दबाए रखा और पाँचवें ने कैसे मोचनी से मूँछ का एक-एक बाल उखाड़ा-फिर उसके बाद कैसे गरीब राहगीरों को बुलाकर उनका पेशाब एक हँडिया में एकत्रित करके ढरके की मदद से उसे जबरदस्ती पिलाया गया इसका विस्तार से वर्णन करना जरूरी नहीं है।

उद्धरण - 538

तुम अपने हिस्से की लड़ाई दूसरों से लड़वा रही थी उसी की कीमत चुकानी पड़ी है। आपदाएँ ढकेल देने से खतम नहीं हो जातीं कुछ देर को ओझल होती हैं बस और फिर दूनी भयानकता से।

उद्धरण - 537

जब तक डॉक्टर साहब घर में रहते हैं ममी कहीं भी रहें कुछ भी करें उनकी आँखे बंटी के आगे-पीछे ही घूमती रहती हैं उसे ही देखती रहती हैं। वह पढ़ता है तब भी वह खाता है तब भी सोता है तब भी-सर्तक चौकन्नी और घूरती हुई आँखे।

उद्धरण - 536

एक बार जब मैं आजमगढ़ में था तो कुछ लोग मुझसे मस्जिद बनवाने के लिए चन्दा माँगने आए। मैंने कह दिया कि जनाब नमाज़ घर में पढ़िए। ये मस्जिदें मन्दिर और गिरजे वगैरह पब्लिक प्लेसेज (जन स्थलों) आज के जमाने में नहीं बनवाने चाहिए। पुराने जमाने की बात और थी। आज के जमाने में तो इस जगहों मे खुदा के बजाय शैतान रहता है।

उद्धरण - 535

कितना बड़ा पत्थर छाती पर रखकर किया मैंने- स्निग्धा क्या, कोई नहीं समझेगा। मर्द रोते नहीं, खासकर औरतों के सामने, तो क्या यह मान लिया जाता है कि उन्हें कोई दुख व्यापता ही नहीं? क्या उनके कलेजे पत्थर के बने होते हैं? वे तुम्हारा हौसला टूटने से बचाये रखने के लिए ख़ामोश रहते हैं, इधर-उधर की मसरूफियात में दिल को भुलाए रखने की कोशिश करते हैं। बहादुरी से ज़िन्दगी के प्रवाह मे पाँव जमाये खड़े रहते है, परिवार को, आश्रितों को भी खड़ा रखने की कोशिश करते हैं और एक दिन उन्हें मैसिव हार्ट अटैक होता है या दिमाग की नस फट जाती है या और कुछ हो जाता है, और मर जाते हैं।

उद्धरण - 534

अहिंसा का यह तो मतलब नहीं कि हम विरोधी के छल-कपट को न समझें। उनके झूठ पर एतबार कर लें और सन्तुष्ट होकर बैठ जाएँ ....... उम्मीद का छिछोरापन मशहूर है उस घास की तरह जिसे भले ही काट दिया जाए लेकिन जल्दी ही वह फिर उसी तरह उग आती है।

उद्धरण - 533

बेटा चोरी का दुख डकैती से अधिक होता है। छल और बल का फरक रहता है दोनों में। सीना और पीठ का अन्तर। माँगा होता कि छीना होता गोविन्दसिंह ने तो इतेक टीस न होती। लड़ने-बचने का मौका भी मिलता।

उद्धरण - 532

ऐसा ही होता है बहूजी ऐसा ही होता है अपने बोए-सींचे पौधों से ऐसा ही मोह होता है बिलकुल संतान-जैसा। जहाँ एक बार लगाओं वहाँ से उखाड़ा नहीं जाता। और फिर थरथराते गले से बोला तुम एक बार आकर देख जाना बंटी भैया। तुम्हारे बगीचे को तो मैं जान से भी ज़्यादा रखता हूँ।

उद्धरण - 531

स्वभाव से मुसलमान ’बुली’ (भभकियाँ देनेवाला) और हिन्दु कावर्ड (कायर) हैं। मैं मानता हूँ मुसलमानों ने अपने आक्रमणकारी ऐतिहासिक दौर में हिन्दुओं को बड़ी बुरी तरह से कुचला है। निरीह प्रजा का खूब मान-मर्दन भी उन्होनें किया था। हिन्दुओं में एक निष्ठामूलक समाज चारों वर्णो से ऐसा भी निकला जिसने अत्याचार का सामना करने के बाद भी अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक आन बनाए रक्खी।......देवी और हनुमान के सम्बन्ध में किसी कारण मुसलमानों में यह धारणा बँध गयी कि वे बड़ी जागृत शक्तियाँ हैं। चेचक के लिए खासतौर पर हिन्दुओं की शीतलामाता मुसलमानों की पूज्या हुईं। आँख दुखने पर मुसलमान लोग बोतलों में कालीजी का नीर भी ले जाते थे।

उद्धरण - 530

बदकिस्मती से तुम्हारे साथ भी उसका जैसा कम्युनिकेशन और शेयरिंग होनी चाहिए, वो भी नहीं। दूसरा कोई बच्चा भी नहीं। दूसरा कोई बच्चा हो तो माँ उसकी तरफ देखकर ही तसल्ली कर ले। अनफॅारचुनेटली इस केस में तो ये भी है कि स्निग्धा का कोई भाई-बहन भी नहीं। वही होते, चार रोज़ साथ रहते, उनके बच्चों के बीच कुछ जी बहलता, तो बात बिल्कुल दूसरी होती।

उद्धरण - 529

समाज के अछूत दबाए हुए गरीब लोगों के पैरों के नीचे तो कोई जमीन ही नहीं है जिस पर खड़े होकर शरीर मन और दिमाग को सहारा मिल सके। यह सिर्फ आर्थिक समस्या नहीं है। सदियों से कुछ नहीं हुआ है। मैं देश की आजादी का विरोधी नहीं हूँ मैं आजादी चाहता हूँ। लेकिन कांग्रेस यदि आजादी ले लेती तो क्या यह समाज बदल जाएगा।

उद्धरण - 528

लो जानेंगे नहीं? हम चले गए तो क्या अनपहचान हो गए? अपनी मट्टी की माया अलग होती है बेटा! मुख न दिखे तो भी क्या गन्ध-चिन्हार से सूँघ लेता है आदमी। बोली-बानी से तुरत चीन्ह लेता है…… उपेक्षित पड़े घर को उन्होंने ऐसा देखा जैसे बहुत दिनों से बिछुड़ा बालक गन्दा और मैला हुआ सहमा-सिकुड़ा सा खड़ा है। सुस्त और नाराज। अपनी माता से रूठा हुआ……. हम तो छाती से लगाकर रखते थे कि अपनी बाखर को। अरे इसी के मोह से मुक्त नहीं हो पाएं कितनी रातों जगे हैं। इस आँगन के विछोह में। लगता था पलकों में पराए आसमान की तरइयाँ करकराती है पिराती हैं आँखें।

उद्धरण - 527

मक्खन लगाते-लगाते चाय के घूँटे लेती ममी के भी मिनट-मिनट में कपड़े उतर जाते हैं। एक बड़ा भारी सा रहस्य था जो उसे एकाएक ही पता लग गया है जैसे। पहले बड़ा डर लगा था फिर अजीब-सी घिन छूटी और अब गुस्से और घिन के साथ-साथ इच्छा हो रही है कि बार-बार उसी दृश्य को देखे।

उद्धरण - 526

ये सब हिन्दू मुसलमान ईसाईपन की जाति-महत्ता की बातों में विश्वास करनेवाले लोग ऐसे मालूम होते हैं जैसे जवानी में बचपन के कपड़े घसीट-घसीटकर पहने खड़े हों।….. काश कि एक दयानन्द मुसलमानों में भी पैदा हो जाता और तमाम मुल्ला-मौलवियों को जूते मार मारकर मिल्लते-मोमिनीन से निकाल बाहर करता।…… एक अकेला निहत्था मुसलमान लगभग आध घण्टे तक हिन्दुओं को उन्हीं के महल्ले में खड़ा होकर कहनी सुनाता रहा तब सब चुप रहे और अब उसके जाने के बाद मुसलमानों की निन्दा इस जोर-शोर से कह रहे हैं कि जैसे अपनी शेखियाँ बघार रहे हों!

उद्धरण - 525

1990 से 1999 तक भारत में सिर्फ अट्टाइस अरब डॅालर की विदेशी पूँजी आयी थी जिसका वार्षिक औसत मात्र तीन अरब डॅालर, बल्कि उससे भी कम बैठता था, जबकि इसकी तुलना में चीन में हर साल चालीस अरब डॅालर की विदेशी पूँजी जा रही थी। जबकि चीन ने विदेशी कम्पनियों को छूटें और रियायतें भी हमारी तुलना में तो कम ही दी थीं ।

उद्धरण - 524

हर तरह के काम-धाम से मतलब है मेरा। कोई भी उद्यम एक अच्छा सामाजिक बौद्धिक और नैतिक कार्य है जिससे ऊर्जा प्रकट होती है और जीवन को सार्थकता मिलती है। उद्यम में लगा व्यक्ति एक अच्छा संघटनकर्ता होता है। वह आवेश से दूर रहता है इसलिए बारीक-से-बारीक बात को देख सकता है और जटिल-से-जटिल बात को सरल और व्यावहारिक बना सकता है।

उद्धरण - 523

बेटा बोने उगाने की तिसना ही तो किसान का पसीना नहीं सूखने देती। और जे तिसना ही न रहे तो किसनगत जैसा तप कैसे हो? फिर धरती पर पिरानी की जात सम्भव नहीं।

उद्धरण - 522

कभी अकेले में डर लगे तो जोर-जोर से बोलकर ही कैसी राहत मिलती है। अपनी आवाज़ ही कैसा सहारा देती है।.....बत्ती बंद करते ही कमरे का सारा अँधेरा बंटी के मन में भर गया भर ही नहीं गया जैसे जम गया है। मन में आकर अँधेरा जम जाए तो कैसा लगता है कोई जान सकता है?

उद्धरण - 521

मेरे ख्याल में सड़क न यहाँ बनेगी न वहाँ- शायद कहीं और बन जायेगी। तुम क्या समझते हो राजनीति आज सड़कें बनाने में विश्वास रखती है? इस समय तो राजनीति बनी सड़कें नष्ट करने और काल्पनिक सड़कों की योजनाएँ पेश करने में भरोसा रखकर चल रही है। आज राहें धुँधली होती जा रही हैं।

उद्धरण - 520

उस रात पहली बार- बरसों बाद पहली बार- मुझे एक नागरिक के रूप में अपनी असहायता का और अपनी कमायी तमाम दौलत की निरर्थकता का तीख़ा बोध हुआ।.......पापा कभी नहीं समझ पाएँगे कि हमारी दुनिया एक विशाल दैत्याकार धमन भट्ठी बन चुकी है और हम तीनों अपने जैसे हजा़रों-लाखों की तरह उसमें ईंधन की तरह झोंक दिये गये हैं। बेटू छोटा था, भस्म हो गया। हमारे पूरी तरह भस्म होने में अभी कुछ और समय लगेगा।

उद्धरण - 519

न कहीं जुलूस न कहीं आन्दोलन एक बाजार पर बिना किसी चेतावनी के तड़ातड़ गोलियाँ। कोई चावल के ढेर पर मरा है कोई ढेरों के बीच के रास्ते में। कोई सड़क के बीच में पड़ा है कोई नाली के किनारे। बाजार तो बन्द है दुकानदार भाग गए हैं समान जहाँ-के-तहाँ पड़े हैं। समस्या है लाशों की उनके रिश्तेदारों को बुलाकर अत्येष्टि कराने की। घायलों का उपचार जरूरी है।

उद्धरण - 518

बिटिया जहाँ पारीछा बिजली-टेसन बन गया है पहले वहाँ क्या था? गाँव जंगल और नद्दी। अब देखो कि गाँव-गाँव लट्टू झिलकते हैं। तेरौ कौल बऊ रात के समय भी दिन जैसा परकास! सूरज नारायन की धूप की सी रोसनी।

उद्धरण - 517

नहीं हमें पाप में मत डालो बहूजी कसम दिलाकर हम कुछ नहीं लेंगे। भगवान के दरबार में जा रहे हैं। रूपया-पइसा का होगा क्या? देना ही है तो एक वचन दे दो कि हमारे बंटी भय्या को जैसा आपने बिसरा दिया है आजकल वैसा और मत करना। बाप के रहते यह बिना बाप का हो रहा अब माँ के रहते यह बिना माँ का न हो जाए। और फूफी ने साड़ी में मुँह छिपा लिया।

उद्धरण - 516

हिन्दुस्तान इहलोक से अधिक परलोक में रहता है यथार्थ सत्य को अस्वीकार कर कल्पित सत्य को भजता है और सच पूछो तो वह ईश्वर को भी नहीं भजता। आस्तिक भारत से कई लाख गुना अधिक यह नास्तिक रूप ही ईश्वर का सच्चा पुजारी है।

उद्धरण - 515

मेरा ध्यान पैसा कमाने और वस्तुएँ जुटाने में लगा रहा। मैं उपलब्धियों की मीनार पर खड़ा संभावनाओं के उस पहाड़ पर निगाहें जमाये रहा जो था तो न जाने कितनी दूर, लेकिन सामने नज़र आ रहा था और जिस पर मुझे फतेह हासिल करनी थी।

उद्धरण - 514

यहाँ या मैके में अनेक स्त्रियाँ मिलने आती हैं ऊपर से मैं प्रेम और उत्साह से बोलती हूँ अन्दर से जलन-कुढ़न से बेचैन रहती हूँ। उनकी छोटी-छोटी खुशी उनकी हँसी उनकी तन्दुरुस्ती उनकी सरलता उनकी सुन्दरता कुछ भी तो मुझे सहन नहीं होती। बनावटी आत्मीयता से आरम्भ करके जल्दी ही मैं गम्भीर हो जाती हूँ और कोई-न-कोई बहाना करके वहाँ से उठकर चली जाती हूँ।

उद्धरण - 513

ज्यादा याद नहीं करते किसी को। उसका मन बेचैन हो जाता है पराई देहती पर इस तरह नहीं जाते। दरोगिन आदर-मान देने से तो रहीं। मकरन्द को दुख दोगी तुम?...... मान रखना सीखो मन्दा। हमारे पास मान ही तो एक पूँजी है। वही हमारा बल है बिटिया।

उद्धरण - 512

जवानी यों ही अंधी होती है बहूजी फिर बुढा़पे में उठी हुई जवानी। महासत्यानाशी। साहब ने जो किया तो आपकी मट्टी-पलीद हुई और अब आप जो कर रहीं हैं इस बच्चे की मट्टी-पलीद होगी। चेहरा देखा है बच्चे का? कैसा निकल आया है जैसे रात-दिन घुलता रहता हो भीतर ही भीतर।

उद्धरण - 511

एक बड़े सूर्यग्रहण के मौके पर सुप्रसिद्ध दार्शनिक आलडुअस हक्सले काशी में मौजूद थे। उसने देखा कि लाखों लोग गंगाजी में खड़े-खड़े नहा धो रहे थे जप कर रहे थे। खासी सर्दी का दिन था वह। हक्सले ने लोगों से पूछा लोगों ने उन्हें बतलाया कि भगवान् सूर्यनारायण को छूने के लिए म्लेच्छ राहु-केतु दौड़ रहे हैं और भगवान् को इन म्लेच्छों से मोक्ष दिलाने के लिए ये हिन्दू भक्त तपस्या कर रहे हैं। हक्सले ने इस प्रसंग को अपनी किताब में लिखते हुए यह प्रश्न उठाया कि जो लाखों लोग आसमानी सूर्य भगवान् की मुक्ति के लिए इतनी कठोर तपस्या कर सकते हैं वे स्वयम् अपने-आपको ब्रिटिश दासता से मुक्त क्यों नहीं करा पाते?

उद्धरण - 510

पर यह सच है कि अब हमारे घर में सबकुछ था। बस पति नहीं था। पति की कमाई थी, पति की कमाई से आयी हुई वस्तुएँ थीं और पति का प्रतिरूप बच्चा था। लेकिन प्रतिरूप या विलोम? पूरक या प्रतिद्धंद्धी ? उत्तर या प्रश्न ? परिणाम या पहेली ?

उद्धरण - 509

उसे आज प्रथम बार महसूस हुआ कि उम्र में छोटा होने पर भी वीरेश बड़ा हो गया है और वह भी स्वाभिमान समानता तथा जीवन में कुछ सार्थक करने की बढ़ती हुई इच्छा के साथ। और अब समय गया जब बड़े भाई के नाते वह आश्वस्त और आत्मतुष्ट तानाशाह की लापरवाही के साथ वीरेश को कोई आदेश दे देता या डाँट-फटकार देता था। वह सोचकर दुखी हो गया कि कितना निर्मम है अपने से छोटे निर्बल और आज्ञाकारी से सद्भावना-रहित अलोकतान्त्रिक व्यवहार करना।

उद्धरण - 508

कुछ भी नहीं बस ऐसे ही रोने को मन हो रहा है। होता है न कुसुमा भाभी कभी-कभी ऐसे ही रो लेने का मन हो आता है।.....बिन्नू हमें न भरमाओं। मन्दा सब जानते हैं हम। दुख जब लबालब भर जाता है तो छलकता है बिटिया ऐसे ही नहीं आता रोना। यादों की आँच से भीतर भरी टीसें हो जाती है पानी-पानी।

उद्धरण - 507

सारा रास्ता अकेले-अकेले चलकर सारी परेशानियों से अकेले-अकेले लड़कर भी ऐसा आत्मविश्वास और ऐसी शक्ति तो उसने अपने भीतर कभी महसूस ही नहीं की जो आज अपने को पूरी तरह डॉक्टर के हवाले करके वह महसूस कर रही है।

उद्धरण - 506

कोमल होता है, स्त्री माँ होती है और मैं समझती हूँ ईश्वर भी ऐसा ही होता है। मैं-मैं ईश्वर के बारे में कुच्छ नई जानती कुच्छ बी नई जानती। वो मुझे कहीं प्यारा लगता है बस।

उद्धरण - 505

कदरोलकर कहता था इस देश के लिए साम्प्रदायिकता से बीस गुना ज़्यादा बड़ा कैन्सर है नौकरशाही, लेकिन उसके खि़लाफ़ कोई नहीं बोलता। बोलना छोड़ो, सोचता तक नहीं।

उद्धरण - 504

मुझे ऐसा लगता है थोड़े-से बचकाने काम करके तुम अपने को देश का बड़ा नेता समझ रहे हो! लेकिन यहाँ आकर मैंने तुम्हारी असलियत देख ली है। घर में लोग जब इतना कष्ट भुगत रहे थे सुरेश दिन-रात उधार-सामान लाने के लिए दुकानों के चक्कर लगा रहा था तुम अपने घमंड में चूर निष्क्रिय बने रहे। देश के लिए काम तो ठीक है मगर क्या घर-परिवार के कष्टों से उदासीन हुआ जा सकता है।

उद्धरण - 503

वे भगवान को नहीं डराती। सोचती हैं कि जग जीत लिया। अब तुमसे क्या कहें कक्को हमें मिली थी सो कहती थी जे मोंडी तनक उमर में बीस घटिया नाँखी है गाँव-गाँव रही बसी है भला बची होगी अच्छत कुँआरी। हमें तो बता गए हैं। गिरगवाँ के कैलास मास्टर कि सती सावितरी नहीं है वा सोनपुरा की मोंडी़। दरोगिन अपने लरका को अलग कर लो वा से। सो बैन हम तो ले जाकें रहेंगे अपने मकरन्द को।

उद्धरण - 502

तुम जानती हो अजय बहुत इगोइस्ट भी है और बहुत पजे़सिव भी। अपने-आपको पूरी तरह समाप्त करके ही तुम उसे पा सको तो पा सको अपने को बचाए रखकर तो उसे खोना ही पड़ेगा।

उद्धरण - 501

जो प्रेमी नहीं वे अपने स्वार्थ को छोड़कर और कुछ नहीं जानते। वे अपने ही अर्थ-साधन में लीन रहते हैं परन्तु जो प्रेमी हैं वे परहित साधन में अपनी हड्डियाँ तक अर्पित करने को तत्पर रहते हैं।

उद्धरण - 500

माँ बनने को औरत की सबसे बड़ी ख्वाहिश बताना और मातृत्व को खामखां गौरवमंडित करना एक बहुत बड़ा छल है जो सदियों से स्त्रियों के साथ किया जा रहा है। सच बात तो यह है कि गर्भधारण और मातृत्व स्त्री के पैरों की बेड़ी और उसके व्यक्तित्व का लगभग विसर्जन है- दुर्भाग्य से जिसका न कोई विकल्प है न उचित क़दर ।

उद्धरण - 499

एक मामूली आदमी नहीं जानता कि वह कभी कोई क्रान्तिकारी कार्य कर सकता है। वह अपने काम धन्धे ईर्ष्या-द्वेष सुख-दुख छोटी-छोटी चालाकियों में लिप्त रहकर फूँक-फूँककर आत्मरक्षात्मक कदम आगे बढ़ाता है तब आश्चर्य होता है कि कैसे यही लोग किसी संकटकालीन ऐतिहासिक मौके पर उठ खड़े होते हैं आगे मिलजुलकर जोर-जुल्म अन्याय गुलामी का विरोध करने के लिए घरों से बाहर निकल आते हैं।

उद्धरण - 498

ना! ऐसा गजब न करना मन्दा। विदा की घड़ी ही याद रह जाती है। अपना कोई जहाँ तक दीखे वहाँ तक निहारते हैं बिटिया! अब के बिछुड़े जल्दी ही मिलावें मोरे ठाकुर जू। हमसे पूछ मन्दा अपने बालक का दुख कितेक भारी होता है।

उद्धरण - 497

बंटी को दरार ही बनना है तो मीरा और अजय के बीच में बने। अजय भी तो जाने कि बच्चे को लेकर किस तरह की यातना से गुज़रना होता है कि पुरानी स्लेट इतनी जल्दी और इतनी आसानी से साफ़ नहीं होती

उद्धरण - 496

ये प्रेम का नाता बड़ा अजब है। अपनी भौतिक मर्यादाओं भावनाओं तक ऊँचा उठना तो मेरी समझ में आता है। मगर जहाँ ये समस्त भावनाएँ एकमेव प्रेमभाव के रूप मे ही प्रकट हों, विकसित हों, जूझें और अपनी जूझ में हर बार छलाँग मारकर नयी दहाइयों तक अदम्य अबाध रूप से बिजली सी कौंधती हुई दौड़कर बढ़ती हों वहाँ उनकी शक्ति क्या कहूँ कुछ अजब अलौकिक हो जाती है।

उद्धरण - 495

मुंबई को कोई भी पहन सकता है। उसका कोई नाप नहीं है। वह सबको आ जाता है। सिर्फ उसके अनुरूप अपने शरीर और आत्मा को थोड़ा फैलाना-सिकोड़ना पड़ता है। मैं ऐसा करने में कामयाब हो गया था।

उद्धरण - 494

तुमने कहा था कि मुझे गहना साड़ी कुछ भी नहीं चाहिए। और यह भी कि मैं ही तुम्हारा गहना और साड़ी हूँ। मुझे ऐसी बातों से सख्त चिढ़ है। वे औरतें मुझे पसन्द हैं जो हबककर खाती हैं। बढ़िया से बढ़िया पहनती हैं। किसी का अन्याय बरदाशत नहीं करती हैं। अपने हक के लिए लड़ती हैं। मैं वह मर्द नहीं हूँ जो औरत जलील करते हैं। मैं तुम्हारे पास हूँ तो अपने हक के लिए लड़ती हैं। मैं वह मर्द नहीं हूँ तो तुम्हें मुझसे खूब साड़ी-गहना लेना चाहिए।

उद्धरण - 493

बऊ तुम्हारे पास कितने औजार है? स्वंय को ही चीरने को तर्क-वितर्क दया क्षमा की धारदार आरी लिये फिरती हो और समय असमय चलाने लगती हो अपनी ही छाती पर। बेहिचक अपने ही खंड-खंड करती रहती हो बऊ

उद्धरण - 492

बंटी उसके और अजय के बीच सेतु नहीं बन सका तो वह उसे अपने और डॉक्टर के बीच में बाधा भी नहीं बनने देगी।

उद्धरण - 491

लेकिन न जाने क्यों ऐसे मौकों पर बरबस याद आनेवाला ईश्वर मुझे एक बड़ा भारी भ्रमजाल लगता है। धारोंधार डुबता हुआ हर तरह से असहाय मनुष्य चाहे वह आजीवन अनीश्वरवादी ही क्यों न रहा हो कहते हैं कि जान बचाने की लालच में ईश्वर को अवश्य याद करता है। परन्तु आस्तिकों की इसी बात को हम अपने ढंग से क्यों न कहें कि असहाय डूबते मनुष्य की जूझती जीवनेच्छा उस नये चेतनास्तर को पाने के लिए प्रेरित होती है जिसके ज्ञान-प्रकाश में वह अपनी जान बचाने की सूझ भरी राह पा ले।

उद्धरण - 490

धीरे-धीरे स्निग्धा भी समझ गयी कि पति गपशप करने की या दिल की बात बताने-पूछने की या साथ हँसने-रोने की, घूमने-फिरने की, सोने-सपने देखने की, सोचने-योजना बनाने की या अपना सबकुछ बाँटने की चीज़ नहीं होती। ऐसे उसके शहर के पति होते होंगे। यह महानगर का पति है।

उद्धरण - 489

अच्छा मर्द वह है जो औरत के अंकुश को पहचानकर अपने को सुधारता है गलत रास्ते पर आगे बढ़ने से अपने को रोकता है। भले ही आगे चलकर वह मर्द उस औरत को मन में पसन्द करता रहे अगर वह औरत से बदसलूकी नहीं करता तो वह चाहता रहे इसमें किसी का नुकसान थोड़े ही है।

उद्धरण - 488

विश्वास न करने से बदल तो नहीं जाएग कुछ। असल बात तो असल ही रहेगी। झुठलाने से क्या होगा। परदा डालने से अपनी आँखें ही तो छिपाई जा सकती हैं जो घटित हो रहा है उसे तिरोहित कैसे किया जा सकता है।

उद्धरण - 487

आज मैनेजर को आपत्ति हुई तो तुमने नौकरी छोड़ दी। कल शहर को आपत्ति होगी तो तुम शहर छोड़ने को कहोगी। और ज़रूर होगी। छोटी जगह है ऐसी बातें लोग आसानी से पचा नहीं पाते हैं। पर इस तरह कमजोर होने से कहीं काम चलता है चल सकता है? और पूछो तो आपत्ति बाहर नहीं होती है कहीं मन के भीतर ही होती है। तभी तो हमें ये छोटी-छोटी बातें परेशान कर देती हैं। वरना इन आपत्तियों पर एक मिनट भी जाया करना मैं उचित नहीं समझता। इन लोगों को क्या हक है तुम्हारे व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप करने का?

उद्धरण - 486

युसुफ का माशूक खुदा नहीं हो सकता लेकिन मेरा हिदायत ईश्वर का मजनू है। काल-प्रभाव से अब उसके जैसी आस्थावाले छीजते चले जा रहे हैं। अगली दुनिया में शायद इस रंग के लोग न होंगे।

उद्धरण - 485

न्यायाधीश विस्थापन की यातना को नज़रअन्दाज़ कर राक्षसी बाँधो के निर्माण के पक्ष में फैसले सुना रहे थे और देश का सबसे बढ़िया युवा दिमाग़ सिलिकॉन वैली में अपनी जवानी का क़ीमा बना रहा था।

उद्धरण - 484

क्योंकि उसके पास इसका कोई जवाब नहीं था और तब उसके दिमाग में पहली बार यह सवाल उठा कि एक औरत क्या अपना शरीर किसी ताकतवर मर्द को सौंपकर ही अपने को बचा सकती है? लेकिन कब तक? औरत क्या सिर्फ शरीर है वह अपने बूते पर अपने शरीर और मन की रक्षा नहीं कर सकती?

उद्धरण - 483

जा विकरम की बहू को यह बात कौन याद दिवाए कि तुम्हारे बाप जू हमारी हैसियत के मुकाबले क्या थे? कोरे फाटकदार। हती कोई बराबरी? फिर भी विकरम के दादा जू ने बचन दिया था सो मोहरें-अशरफियन की थैली लिये लोग लौटा दिए। और ऐसे ही सिकिल-सूरत में विकरम के मुकाबले पासंग नही हैं मकरन्द की मताई।

उद्धरण - 482

प्रमीला के साथ का जीवन- वह जैसा भी था अच्छा या बुरा मेरा इतना निजी है कि मैं उसे किसी के साथ शेयर नहीं कर सकता। तुम ग़लत मत समझना और बुरा भी मत मानना। वह एक अध्याय था जो उसी के साथ समाप्त हो गया और अब मैं उसे किसी के साथ खोलना नहीं चाहता। चाहूँ तो भी खोल नहीं सकता। शायद अब तो अपने सामने भी नहीं।

उद्धरण - 481

तुम फाहशा किसको कहोगे खत्रा? हमारे हिन्दुस्तान को छोड़कर अब हर सभ्य देश में कवाँरे युवक-युवतियों का मुक्त प्रेम समाज द्वारा स्वीकार किया जाने लगा है बहुत सी लड़कियों के जीवन में एक से अधिक प्रेमी आ जाते हैं। लेकिन यहाँ उन्हें कोई फाहशा नहीं कहता जब तक कि वे अति की सीमा को पार न कर जायँ। यहाँ बहुत से ऐसे जोड़े रहते हैं जिनकी आपस में किसी प्रकार की शादी नहीं हुई। कोई भी ऐसे लोगों के बदचलन नहीं कहता।

उद्धरण - 480

फिर जैसे भैंस के साथ भुनगें, खुजियल कुत्ते के साथ मक्खियाँ और व्हेल के साथ छोटी-छोटी परजीवी मछलियाँ आ जाती हैं उसी तरह पेप्सी आ गयी, कोला आ गया, बर्गर आ गया, केंटुकी चिकन आ गया, आलू की चिप्स आ गयी, मक्का का दलिया आ गया, गाय का बाटा आ गया, भैंस की सानी आ गयी - एक बार तो ख़बर आयी कि गोबर भी आयात किया जा रहा है।

उद्धरण - 479

आप लोगों का दुख हम जानते हैं। इसलिए यह लड़ाई हो रही है कि जब देश आजाद हो जाएगा तो गरीबी दूर होगी, लोगों का दवा इलाज होगा, गरीब ऊँचा उठेंगे, घी- दूध की नदियाँ बहेंगी इसलिए तो गांधीजी और लाखों लोग जेल जाते हैं। लाठी-डंडा सहते हैं, अपने सीने पर गोली रोकते हैं और अपनी जान कुर्बान कर देते हैं।

उद्धरण - 478

समझाया है दादा! भरोसा भी दिया है। सोचता हूँ कि अब जाने भी दो। कल को कोई बात हो गई तो आपके सिर कलंक कका जू का कोप अलग। घर की एकता ही टूट गई तो क्या रह जाएगा हमारा परिवार?

उद्धरण - 477

मनुष्य जब अपने भीतर ही भीतर बहुत गिल्टी महसूस करता है तो तर्क से वह अपने को जस्टिफ़ाई करता रहता है। अपने हर ग़लत काम को जस्टिफ़ाई करता रहता है। न करे तो इतना अपराध-बोध ढोकर वह जी नहीं सकता। जहाँ जस्टिफ़िकेशन है वहाँ गिल्ट है।

उद्धरण - 476

लच्छू भी गरीब के सताये रूप्पन महाजन और उसके कारिन्दों के मारे हुए शोषित समाज ही का एक अंग है। और इस लाल सितारे में इस क्रान्ति के तीर्थ मास्को में उसे एक तरह से अपनी जीत की आस्थायुक्त भावना मिल रही है। बड़ा पढ़ाकू न होते हुए भी उसने ताल्सतोय तुर्गनेव दोस्तायव्स्की चेखोव गोर्की और शोलोखोव की थोड़ी-बहुत किताबें सारसलेक में पढ़ी है।

उद्धरण - 475

लेकिन मुवक्किल की मुर्खता खाकर ही वकील ज़िन्दा रहता है, जनता की कमसमझी और तंगनज़री जीमकर ही नेता की भूख तृप्त होती है, मरीज की नादानी ही चिकित्सक का संतुलित आहार होता है और नौकरशाही के काफ्काई प्रपंच ही मेरा भी पुष्टिकर खाद्य था।

उद्धरण - 474

स्त्री अपनी सीमाओं में सिद्ध कूटनीतिज्ञ होती है। एकदम व्यावहारिक कभी कभी तुच्छता की हद तक। अफसोस की बात है कि उसको दबाकर रखा गया। यदि ऐसा न होता तो वह राजनीति और कूटनीति की उच्च खिलाड़ी होती ........ इस बार का आन्दोलन बहुत बड़ा और कड़ा होगा। यह केवल कांग्रेसजनों तक सीमित नहीं होगा बल्कि वह अपने दायरे में सभी भारतीयों को खींच लेगा।

उद्धरण - 473

पर हम तुम्हारे अहसान के बदले में हल्के-ही-हल्के मान रहे हैं खुद को। हर हाल में हल्के। ........ उपकार का भार तो धन-माया के वजन से भारी होता है हमारे विचार में। रही विकरम की बहू की बात सो अब फैसला उसके हाथ में है। बेटीवाला विवेक-बुद्धि और व्यवहार पर रहता है।

उद्धरण - 472

तुम बंटी पर इतना निर्भर करती हो उसे अपनी ज़िंदगी का केंद्र बनाकर जीना चाहती हो यही गलत है। केवल तुम्हारे लिए ही नहीं बंटी के लिए भी लेट हिम ग्रो लाइक ए बॉय लाइक ए मैन। सारे समय अपने में दुबकाए रखोगी तो क्या बनेगा उसका।..... तुम उस पर शायद इतना ज़्यादा हावी रही हो कि वह पूरी तरह लड़का बन ही नहीं पाया। तुमने उसे ऊधम करने ही नहीं दिया- हाँ औरतोंवाली ज़िद और रोना ज़रूर सिखा दिया।

उद्धरण - 471

पहले ने लच्छू से हिन्दी में कहाः हमारे मित्र पूछते हैं कि जो-जो शब्द आपने अंग्रेजी में प्रयुक्त किए हैं वे शब्द क्या आपकी मातृभाषा में नहीं हैं?...... मातृभाषा के जाननेवाले हमारे देश में अनेकानेक हैं किन्तु पुरानी दासता के संस्कारों के कारण हमारी बोलचाल की भाषा का रूप बिगड़ गया है।

उद्धरण - 470

और काफी सोचने के बाद मैंने तय किया कि मुझे अभी बच्चा पैदा नहीं करना है, नौकरी करनी है, पढ़ना भी है और अपने पैरों पर खड़े होना है। कल यदि पापा या रोहित मेरी जिन्दगी में न भी रहे, तो भी रहूँगी, और दूसरों की दया की मोहताज नहीं। खुदमुख्तार। अपने आत्मसम्मान के साथ।

उद्धरण - 469

अपने उद्गम स्थान पर पतली धार वाली टेढ़ी-मेढ़ी उछलती-कूदती छिपती-उमगती सरिता ने एक लीक पकड़ ली जो गहरी और चौड़ी होती गई दो तटों की बाँहों की सुरक्षा के बीच आबद्ध होकर भी गतिमान।

उद्धरण - 468

लो कितनी भी जातना दे ली कुगत कर ली फिर भी प्रैम बयान बदलकर मानी। अरे जनी की जात के बिरोबर कोई मूरख भी नहीं होता और जो अकल पा जात तो आदमी को भंगी बनाकर रख दे। ..... प्यार-पिरीत में मारी जाती है बैयर। कहते हैं न कि जनी प्यार के पीछे और आदमी पैसे के पीछे पागिल हो जाता है।

उद्धरण - 467

पर आज चार लोगों के सामने मेरे मुँह पर जूता मारकर तूने बता दिया कि तू क्या बना है और तुझे क्या बना सकी हूँ।

उद्धरण - 466

गाँवों में नगरों जैसी ही सुविधाएँ हैं- रेडियो टेलीविजन स्कूल अस्पताल हमारे देश के गाँव कब ऐसी उन्नति कर पाएँगें? हमारे पल्टू मतई फज्जू अकबर कब अपने घरों में ये तमाम नयी सुविधाएँ पा सकेंगे।

उद्धरण - 465

मल्टीस्टोरी कॉम्प्लेक्स बन जाते। पूंजी चलती-दौड़ती-उफ़नती-भागती दिखाई देती। कितना घोर अपव्यय! ज़मीन का, समय का, जीवन शक्ति का, संभावनाओं का। ...... कितना फालतू समय है इस देश के पास! कितनी संभावित सक्रियता, कितनी प्रसुप्त ऊर्जा, कितनी श्रमशक्ति, कितना जीवन ऐसे ही नष्ट हो रहा है, ऐेसे ही नष्ट हो जाएगा। अस्सी नब्बे प्रतिशत मानसिक शक्ति-शारीरिक शक्ति अनिवेशित ही रह जाएगी और देह चिता पर चढ़ा दी जाएगी।

उद्धरण - 464

रूस की मजदूर सरकार को बचाने के लिए हिटलर मुसोलिनी तोजो के खिलाफ लड़ना रूस के साथी अंग्रेज सरकार का साथ देना है। फिर आगे तो जापानियों का साथ देने के लिए सुभाष बाबू की निन्दा होने लगी।....... दुनिया के हर देश की अपनी परिस्थितियाँ हैं समस्याएँ है दूसरे देशों का आँख मूँदकर अनुकरण करने से हम अपनी परिस्थितियों पर विजय नहीं प्राप्त कर सकते। साम्यवाद कोई ऐसा साँचा नहीं है कि उसमें आसानी से दूसरे देश की जनता को कस दिया जाए।

उद्धरण - 463

लोग तोलते रहे उसका शोक जायज है या नाजायज वैध है या अवैध उचित है या अनुचित सत्य है या झूठ। मन्दाकिनी का हाथ थामकर जो रोई तो रोती ही गई। भूखी-प्यासी बेसुध हुई पड़ी रही दाऊ जू वाले कोठा में।

उद्धरण - 462

तड़ाक। बंटी के गाल पर एक चाँटा पड़ा तो सारा कमरा जैसे घूम गया। बंटी ऊपर से नीचे तक काँप गया। चोट ज़्यादा नहीं थी पर ममी के हाथ का चाँटा और वह भी सबके बीच में जोत और अमि के सामने। वह रोया नहीं पर उसकी आँखों से जैसे चिनगारियाँ निकलने लगीं। .........गुस्सा दुख अपमान भूख और डर ने मिलकर बंटी को भीतर से बिलकुल थका दिया। थक ही नहीं गया जैसे भीतर से कहीं बिलकुल सुन्न हो गया। अब तो न गुस्सा आ रहा है न रोना।

उद्धरण - 461

और दूसरी बात हमने अपने लड़के से यह कही कि दूसरों की जानता नहीं पर अगर तू अपना उद्देश्य सिद्ध किए बिना इस घर में लौटा। तो तुझे जूते मारकर मैं घर से निकाल दूँगा। सत्य और आन पर घुटने टेक देनेवाले को मनुष्य नहीं मानता।

उद्धरण - 460

एक नवविवाहित पत्नी के लिए पति का प्रेम सहानुभूति और आश्वासन सबसे बड़ी ताकत और सहारा होता है लेकिन जब पति ही अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अहंकार में असंवेदनशील कठोर और क्रोधी हो जाता है तो वह पत्नी के लिए बानर राज बालि साबित होता है जो उसकी आधी शक्ति हर लेता है और वह अपने स्वाभिमान की रक्षा करने लायक भी नहीं रह जाती।

उद्धरण - 459

कनिया भाभी का ठीक कहना है कि स्त्री का प्रेम सृष्टि की इच्छा और नियति से जुड़ा है इसलिए उसकी स्थिति मर्द के प्यार की तरह आधी-अधूरी नहीं होती है। वह अपनी असलियत को छिपा नहीं सकती चाहे सकारात्मक हो या नकारात्मक।

उद्धरण - 458

मन्दा जीवन हिसाब माँग रहा है हमसे। एक-एक छिन का हिसाब। बुरे और अच्छे करमों का लेखा-जोखा। बिटिया कुसुमा के रिनी जाएँगे हम सो दादा के टेर दो हमारे पास। हम एक ही अरज करना चाहते हैं कि हमारा हिस्सा कुसुमा के नाम लिखवा दें

उद्धरण - 457

उसे तो बहुत पहले से मालूम था कि ममी के पास अपने को बदलने का जादू है। पर कैसा है और कहाँ है यह आज तक नहीं जान पाया। ममी के पीछे इधर-उधर काफ़ी ताक-झाँक और छान-बीन भी की।

उद्धरण - 456

और उसकी मानसिक प्रतिक्रिया यह हुई कि वह शहीद की भाँति घर त्यागकर माता का मोह त्यागकर उपस्थित समाज की दृष्टि में बोलती अपील की करूणा को अनदेखी करके तेजी से गली के मुहाने की ओर बढ़ गया। रमेश की माता की करूण पुकारें गली में खड़े हुए बब्बू भैया की आवाज़ें उस गली की दीवालों से टकराकर गुँजती हुई रमेश के मन में उसके संकल्प को दृढ़ता प्रदान करने लगीं।

उद्धरण - 455

जिसे मैं सड़क समझता था, वह गली थी। जिन्हें मैं अट्टालिकाएँ समझता था, छोटे-छोटे मकान थे। जिसे मैं कोलाहल समझता था, वह अव्यवस्था थी। जिसे मैं स्वच्छता और खुलापन समझता था वह उदासीनता और वीरानी थी।

उद्धरण - 454

हर औरत का प्यार सृष्टि से जुड़ा है कोई भी स्त्री उसे नकार नहीं सकती उसके लिए वह पूरी सच्चाई है उसे छिपा नहीं सकती उसे झुठला नहीं सकती। स्त्री के लिए सबसे बुरा समय वह होता है जब उससे जबरदस्ती प्यार प्राप्त करने की कोशिश की जाती है जब उसके प्यार का गलत अर्थ लगाया जाता है उसका गलत नतीजा प्राप्त करने की कोशिश की जाती है।

उद्धरण - 453

साँची कहो। खुशी की बात है यह तो चलो बहन कर ली तुम्हारी भी कदर। नहीं तो बाहर फेंकी जूती को कौन पहनता है फिर से।

उद्धरण - 452

तुम्हें मेरी बिलकुल परवाह नहीं रह गई है। मत करो मेरा कोई भी काम। बस डॉक्टर साहब के पास बैठकर चाय पियो। तुम्हारा क्या है सज़ा तो मुझे मिलेगी। मैं अब स्कूल ही नहीं जाऊँगा कभी नहीं जाऊँगा कभी भी ..... पहले ममी का चेहरा ममी की आँखें देखकर ही ममी के मन की बात जान लेता था ममी की खु़शी ममी की उदासी ममी की नाराज़गी सब उसे पता था। पर अब?

उद्धरण - 451

सब साली भारतीय संस्कृति है। हम लोगों को सोलह दूनी आठ पढ़ाने के लिए भारतीय संस्कृति और अपने लिए हराम की तनख्वाह और ऐश। मैं तो सच कहता हूँ रमेश कि ऐसे प्रोफे़सरों कि लिए अमरीका की ’कू क्लक्स क्लान’ जैसी संस्था खोलनी चाहिए। किसी लौंडियाबाज़ की खोपड़ी तोड़कर यूनिवर्सिटी के लॉन में उसकी लाश फेंक दी जाय किसी को पेड़ से उल्टा टाँग दिया जाय किसी के नाक-कान काटे जायँ- तब ये लोग काबू मे आएँगे। साले हम पर ’इंडिसिप्लिन’ का चार्ज लगाते हैं और आप ही मोस्ट इण्डिसिप्लिन्ड स्वार्थी और कमीने हैं।

उद्धरण - 450

भैया का मतलब भाई नहीं दूधवाला या यूपीवाला होता।

उद्धरण - 449

मैं अब बड़ी होकर कह सकती हूँ कि स्त्री में बचपन से ही प्यार कूट कूट भरा होता है। सात फेरे के बाद उसका प्यार साकार होकर उमड़ पड़ता है उसके जीवन को सराबोर कर देता है। उसे कोई मिटा नहीं सकता। पत्नी के प्यार को गुलामी नहीं कहा जा सकता। वह एकाकी प्यार भी नहीं है। वह किसी भीख में नहीं मिलता।

उद्धरण - 448

मन्दा मौत को ढकेलकर जीवन की चाह जोड़ रहे हैं दाऊ जू। जाने हमारी पिरीत में बल है कि उनके विसवास में हौसला जमराज अभी तक तो दूर खड़ा है बिन्नू वे बीमार और हम अधमरे बदहवास उसी कोंठा में उसी खटिया पर हरस-खुसी सुख-सुरग आनन्द-मंगल लेकर जी रहे हैं।

उद्धरण - 447

और तब पहली बार बंटी ने महसूस किया कि समझदार बनना कितना मुश्किल है। ममी की नज़रों में समझकर होकर रहने का मतलब है कुछ भी मत कहो, कुछ भी मत करो। दूध उसे पसंद नहीं फिर भी बिना चूँ किए पी लेता है। जो खाने को दो खा लेता है। जो कुछ करने को कहा जाता है कर लेता है।

उद्धरण - 446

हमारी नई पीढी में इस समय दो तरह के लोग है। एक सक्रिय महत्त्वाकांक्षी है और दूसरे हताकांक्षी। महत्त्वाकांक्षियों की सक्रियता आजकल (या शायद सदा) खुशामद तिकड़म दाँवपेंच और स्वार्थ भरी बदमाशियों की दिशा में रही है। उनकी आकांक्षा का महत्व केवल उसी तक सीमित है- और इसलिए वह वर्ग अकेली लड़त लेता है। और दूसरा हताकांक्षी वर्ग कोल्हू का बैल है। उसे जो चाहे अपने काम में जोत ले जहाँ चाहे जोत ले। उसके अरमान शुरू ही से कभी उमंग नहीं पाते।

उद्धरण - 445

मैं परंपरापोषित परिस्थितिपुत्र यही मानता था कि आदमी कमाकर लाता है और औरत उड़ाती है आदमी खटता है और औरत खिलाती है, आदमी जुटाता है औरत बनाती है, आदमी पाता है औरत पालती है, आदमी चलाता है औरत चलती है, इसी तरह की होती है दुनिया।

उद्धरण - 444

उसे लगता उसके पिताजी जिस परिस्थिति में डाल दिए जाते हैं उसी से प्यार भी करने लगते हैं। क्या परिस्थिति के गुलाम उसमें किंचित् भी व्यतिक्रम या बदलाव उन्हें पसन्द नहीं। ऐसा क्यों हैं? क्या यह छद्म पलायन नहीं हैं?

उद्धरण - 443

वह सिसकती हुई माँ के आँचल में सिमट गई। अपनेपन की गर्माहट समेटती रही। लगा कि कभी कोई क्लेश मन में हुआ ही नहीं। कुछ घटा ही नहीं अभी अभी जन्म हुआ है उसका। नई अक्षत है वह। पवित्र। गंगा के जल की तरह निर्मल।

उद्धरण - 442

मन को मारना भी तपस्या करना हो सकता है क्या? मन तो आजकल वह भी कितना मारता है अपना तो क्या वह भी तपस्या कर रहा है? एक अजीब-सी पुलक उसके मन में जागी। एक अजीब-सा आत्मविश्वास। कौन ख़ुश होगा उसकी तपस्या से?

उद्धरण - 441

उमेश महत्त्वाकांक्षी है मगर कमजोर भी है। जी हुजूरी उसकी नीति नहीं उसका चरित्र है। मैं जानता हूँ मन से उसने यह अवश्य चाहा होगा कि ऐसे शुभ अवसर पर हम सब उसके साथ हों। मगर ससुर साहब ने उत्सव की कोई योजना निश्चित कर दी होगी

उद्धरण - 440

बम्बई ने मुझे सपने देखना सिखा दिया। उसने मुझे अपने अब तक के जीवन को नीची नज़र से देखना अपनी लगभग हर जानी-पहचानी चीज़ को घटिया समझना और जो कभी नहीं सोचा था उसे सोचना, उसके सपने देखना और उसे पाने की कोशिश में सिर खपाते रहना सिखा दिया।

उद्धरण - 439

हाँ ए बिटिया चालीस से आगे के दूल्हा को ‘खुरनाठ’ कहते हैं। इस उमिर में शरीर और मुँह फैल जाता है। चेहरे पर एक-दो गहरी लकीरें दिखाई देने लगती हैं जैसे कच्ची सड़क पर बैलगाड़ी की लीक। अधपके मूँछों के बाल झाडू की सींकों की तरह फरकने लगते हैं। वह बुढ़ौती को छिपाने के लिए इतर-फुलेल खिजाब लगाता है। उसके गले में बलगम भर जाता है और वह हमेशा खुर-खुर किए रहता है।

उद्धरण - 438

तुम इतनी टूटी हुई तुम्हारी यह दीनता बऊ पर वार करती होगी? हो सकता है बऊ को लगता हो ऐसा। महसूस करती हों वे कचोट लेकिन वे क्यों नहीं समझती कि ऐसा भी तो हो सकता है कि बोल तुम्हारें हो शब्द किसी और के!......देह तुम्हारी रहती हो अकड़ किसी दूसरे की! चाल तुम्हारी अवश्य होगी दर्प-घमंड उधार का होता होगा अम्मा।

उद्धरण - 437

फिर भी जब ममी इधर-उधर होती हैं तो वह चुपचाप अलमारी खोलकर उस किताब को निकालकर देखता है जिसके पीछे के कवर पर पापा अपना पता लिख गए थे।

उद्धरण - 436

यही जिन्दगी का लुत्फ़ है। कल हमारा ज़माना था आज उनका है कल किसी और का होगा- यही जिन्दगी का लुत्फ़ है। अगर सारा आलम एक रंग में रंग जाय तो फिर मजा़ ही क्या रहा। हम भाई सोशलिज़म-वोशलिज़म क़तई नहीं मानते।

उद्धरण - 435

शुरू-शुरू में एक कन्साइनमेंट सीधा अमेरिका से आया था और उसमें से आधे कम्प्यूटर बड़े-बड़े आधिकारियों-नीति निर्माताओं और मंत्रियों को उपहार स्वरूप दे दिये गये थे और शेष देश के बड़े शहरों में इलेक्ट्रॅानिक सामान के वातानुकूलित शोरूमों में प्रदर्शन के लिए रख दिये गये थे।

उद्धरण - 434

शादी-ब्याह की सबसे अच्छी उमिर होती है सोलह से बीस बरिस तक। इस उमिर के दुल्हा को ’बर’ कहते हैं। बर को देखकर सबका जी जुड़ा जाता है। दुल्हन का दिल भी उल्लास से भर जाता है।.....बीस-पच्चीस बरिस के दूल्हा में वह बात नहीं फिर भी कोई हरज नहीं। इस उमिर के दूल्हा को बर नहीं बरूल्ली कहते हैं। अब पच्चीस से आगे बढ़ो ए बच्चा। पच्चीस से तीस बरिस तक के दूल्हे का चेहरा रूढ़ होने लगता है। मूँछ के बाल कड़े हो जाते हैं। बोली भी रूखी और कड़कीली हो जाती है। इस उमिर के दूल्हा को बरनाठ कहते हैं। इसके आगे तीस से चालीस बरिस का दूल्हा होता है। इसे जरनाठ कहते हैं। इस उमिर में देह बोली-किसी में भी नरमाई नहीं रहती। चमड़ी एकदम मोटी हो जाती है। इस उमिर का दूल्हा बड़ा चालाक हो जाता है हमेशा अपने मतलब की बात सोचता है। रात-बिरात घुमक्कड़ी करने लगता है। कई चक्करों में रहता है ए बिटिया। बीवी से हराठी-मुराठी की तरह ब्यौहार करता है। हमेशा जली-कटी सुनाता है।

उद्धरण - 433

अम्मा। बऊ जाकर क्या क्या कहती थीं? लोगों से क्या क्या सुनती हूँ पर मैं कैसे मानूँ अम्मा कि तुम सम्पन्न घराने की छत्रछाया में हो। रानी महारानियों की तरह रहती हो। अपने-आप चुना था तुमने यह जीवन। स्वंय चली गई थीं सब कुछ त्यागकर।

उद्धरण - 432

ममी का रोना बंटी को एकाएक बड़ा बना गया। बड़ा और समझदार। ममी की पापा से लड़ाई हो गई है पक्कीवाली! दोस्ती तो अब हो ही नहीं सकती। ममी ने खु़द उसे बताया। बिलकुल ऐसे जैसे बड़ों को बताया जाता है। साथ ही यह भी कि अब ममी के लिए जो भी है बंटी ही है।

उद्धरण - 431

हिन्दुस्तानी शौहर की कुछ भी कह लो अपनी धरमपत्नी का ओहदा जितना रूहानी तौर पर क़बूल होता है उतना और किसी का भी नहीं।

उद्धरण - 430

दसअसल मेरे ख़याल से शारीरिक तौर पर इतना डैमेज नहीं हुआ है लेकिन उन्हें इस बात का गहरा सदमा लगा है कि उनका शरीर भी किसी भी और आदमी के शरीर की तरह फ्रेजाइल है और एक दिन नष्ट हो जानेवाला है। इस नयी रिवीलीशन से कॉम्प्रोमाइस करने में उन्हें कुछ टाइम लगेगा।

उद्धरण - 429

सम्भवतः बनारस की सबसे बड़ी पहचान तो गुरुपन है जो यहाँ निवास करनेवाले सभी व्यक्तियों में किसी-न किसी रूप में पाया जाता है चाहे वे इसके प्रति सजग हों या नहीं चाहे वे इस जिले और शहर अथवा पूरबी और पश्चिमी जिलों के विभिन्न गाँवो-शहरों के ही क्यों न रहनेवाले हों।

उद्धरण - 428

इतेक नहीं समझते कि हिफाजत की कितेक बड़ी कीमत होत है? चाहे राजा से परजा को मिले चाहे पुरिख से जनी को बात एक ही है। ताबेदारी एक ही सी करनी परती है। और जई ताबेदारी के चलते फजीहत और बिटम्ना भी। क्या जानें किस मोल बिकी हो प्रेम? क्या-क्या सह-झेल रही हो? और कौन कगार से भेजनी परी हो जे पिराथना?

उद्धरण - 427

तो ममी को यह डर है कि पापा उसे अपने साथ ले जाएँगे। इसीलिए शायद सवेरे से ही नाराज़ थी। पर पापा उसे क्यों ले जाएँगे भला? वह तो शुरू से ही ममी के पास रहा है। कैसी लड़ाई है यह ममी-पापा की?

उद्धरण - 426

करूणा की अथाह गहराई में रमेश का दिल डूबा हुआ है। वह जी रहा है देख-सुन रहा है उसकी अनुभूतियाँ भी जाग रही है; लेकिन उसके भाव गूँगे हो रहे है उसकी चेतना पीड़ा-कुंठित और भय से जड़ीभूत है।

उद्धरण - 425

दुनिया बहुत ज़ालिम है। वह मुफ़लिस पर हँसती है। उसे पटकती है। और जब वह कराहता है- रोता है- दया की गुहार करता है, तो और हँसती है। इन्सान का सबसे बड़ा गुनाह है कमजोर रहना, गरीब रहना, मुफ़लिस रहना। यह जिन्दगी का अपमान है। अपनी ज़ात का अपमान है। अपने इन्सान होने पर लानत है।

उद्धरण - 424

सचमुच बनारस के पास बहुत कुछ ऐसा है जो दूसरे शहरों के पास नहीं है-राँड़, साँड़, सीढ़ी, संन्यासी के अलावा उसके पास टेढ़ी-मेढ़ी लकीरों की तरह पतली गलियाँ और गहरे कुंड है।

उद्धरण - 423

नहीं नहीं ऐसा नहीं होगा। घिरकर या घेरकर कोई सुकर्म भी नहीं करना चाहिए। सत्यपुरूषों की नीति के विरूद्ध पड़ती है यह बात।

उद्धरण - 422

पर अगर ऐसा होता नहीं है तो कहानी में कैसे आ जाता है? कहानी तो आदमी ही बनाता है जिस चीज़ को आदमी ने कभी देखा ही नहीं वह बात उसके दिमाग़ में आती ही कैसे है फिर? ज़रूर कभी ऐसा रहा होगा।

उद्धरण - 421

न जाने कितने हिरनों और चीतलों को शिकारी लोग मारकर खा गये। शेर अपने कठघरे से बहकर बाहर चला आया और चिड़ियाघर के सब रखवालों की चिन्ता का कारण बन गया। उसे मारने की तदबीरें होने लगीं और अन्त मे जनसुरक्षा के नाम पर बाढ़ग्रस्त सिंह मार डाला गया।

उद्धरण - 420

धीमे स्वर में और रूक-रूककर बीच-बीच में लम्बी साँसे लेते हुए वह अपने ही जीवन का मानो पुनरावलोकन कर रहे थे- एक भोक्ता या भागीदार या साक्षी की तरह नहीं, एक दर्शक, समीक्षक या आलोचक की तरह, और ऐसा शायद वह पहली बार कर रहे थे।

उद्धरण - 419

आप दुखी ना होइए मेरे मन में कोई घमंड नहीं है। कि लड़ाई में आपकी हार हुई। यह हार मेरी भी हो सकती थी। इस दुनिया में कोई भी हमेशा नहीं जीतता है। यदि आपको इस समय अपने किसी कार्य से तकलीफ हो रही है पश्चाताप हो रहा है तो सचमुच यह आपकी जीत है।

उद्धरण - 418

यह सोचने की वेला नहीं है। असल बात तो यह है कि अब ताकित ही नहीं बची अपने आपसे जूझने की। यह तो उसी दिन सोचना था जब आसा अभिलाखा लिये इस चन्दन वन में पाँव धरा था। काहे भूल गई कि भुजंगों का वास भी होगा इन सेँदली रूखों में।

उद्धरण - 417

सवेरे मन में जो एक अपराध-बोध था, भय था वह धीरे-धीरे गुस्से में बदलने लगा। अच्छा है कोई कुछ मत बताओ। मेरा क्या जाता है। मैं भी अपनी कोई बात नहीं बताऊँगा। इम्तिहान होगा तो यह भी नहीं बताऊँगा कि कैसा करके आया हूँ। तब पता लगेगा।

उद्धरण - 416

सात्विकता, इन्सानियत, शुभ काम की भावना ने नशे की तरह चढ़कर सारे वातावरण ही को मयखाना बना दिया।....ऐसे महान् जन-संकट के समय बहुतों के दिलों में कर्त्तव्य और इन्सानियत की दिव्य ज्योति जगमगा उठी थी। इस ज्योति के टार्च समान गोल दायरे के इर्द-गिर्द संकीर्ण स्वार्थों का अँधेरा उस समय भी ज्यों का त्यों मौजूद रहा।

उद्धरण - 415

अब मैं रोहित की पत्नी नहीं, अपने पापा की बेटी थी। अब मेरी टाँगें नहीं थरथरा रही थीं। अब मेरी आंखों में आँसू नहीं थे। पापा के मज़बूत गद्दीदार हाथ के स्पर्श ने मुझमें जैसे थोड़ी सी शक्ति का संचार कर दिया हो।

उद्धरण - 414

पुरूष का भाग्य कोई नहीं जानता धैर्य और हिम्मत से रहने और बुद्धि का इस्तेमाल करने से कब चमक जाए यह कोई नहीं जानता।

उद्धरण - 413

इतनी बेजाँ बात पर अड़कर क्या सिद्ध करना चाहते हैं गोविन्दसिंह? यही कि खोखली होती है आत्मा? पोला-ही-पोला है करूणा और हमदर्दी का रिस्ता।

उद्धरण - 412

पागल कहीं का! इतना बड़ा होकर रोता है ममी के लिए। तो अँसुवाई आँखों से ही बंटी हँस दिया। भीतर ही भीतर बड़ी शरम महसूस हुई अपने ऊपर। सचमुच उसे इतनी जल्दी रोना नहीं चाहिए। बच्चे रोया करते हैं बात-बात पर तो वह तो अब बड़ा हो गया है। अब कभी नहीं रोएगा इस तरह।

उद्धरण - 411

चेतना जिसकी स्वस्थ सबल और दृढ़ होगी कल्पना उतनी ही सुन्दर और बेदाग भी होगी। मैं अपने जीवन भर के कार्य ही को ईश्वर मान सकता हूँ। भावनात्मक रूप से और अधिक गतिमान और सत्यशील होते हुए मैं मनुष्य में भगवान के अस्तित्व को स्वीकार कर सकता हूँ।

उद्धरण - 410

उनकी माँग रहती थी कि शनिवार को बच्चों को डबल होमवर्क दिया जाय- शनिवार के लिए भी और रविवार के लिए भी। या तो वे बच्चों से तंग थे, उनकी जिज्ञासाओं से कतराते थे, उनकी गतिविधियों से परेशानी महसूस करते थे और उनको इल्लत समझकर स्कूल भेजते थे कि चलो, जितनी देर बच्चा स्कूल में रहेगा, कम से कम उतनी देर घर में शान्ति रहेगी।

उद्धरण - 409

बाबा पूछते हैं कि शीतल जल की जो बूँद कंठ की प्यास बुझाती है उसमें कौन-सी आकांक्षा है? ठंड़ी छाया और मीठे फल देनेवाला वृक्ष किस आकांक्षा से यह करता है? यह उसका स्वभाव है कि वह दूसरों को सुख देता है और बदले में कुछ नहीं माँगता।

उद्धरण - 408

कहते हैं न जल की एक लहर भी गद्दारी कर जाए तो पूरा जखीरा डूब जाता है।

उद्धरण - 407

बिरादरी के बंधन घुटन भी पैदा करते हैं और आवश्यक भी मालूम पड़ते हैं। जनसाधारण में हर व्यक्ति आमतौर पर यही शिकायत करता है कि दुनिया हमसे जलती है। ये अपना प्रदेश है यह पराया है ये अपना धर्म है वो पराया है- इस प्रकार औसत व्यक्ति अपने ही सुख-दुख हानि-लाभ स्वार्थ की दृष्टि से अपना सत्य पाता है और अपने सत्य को प्रतिष्ठित करने के लिए मार-काट मचाता है।

उद्धरण - 406

जैनेन्द्र अज्ञेय इलाचन्द्र ने व्यक्ति का मनोमंथन और यशपाल भगवतीचरण ने सामजिक-राजनैतिक दृष्टि से विचार-मंथन किया। अश्क नागार्जुन अदि इनके साथ हैं और समय इन सबके साथ आगे बढ़ा है।

उद्धरण - 405

पहली लड़ाई से ही जैसे हर अगली लड़ाई में चीखने- चिल्लाने और हाथ-पैर चलाने का हमें लाइसेंस मिल गया था। जरा़ जऱा सी बात पर हम आपस में उलझ पड़ते, एक दूसरे की तकलीफों के बारे में सोचने की बजाय सिर्फ अपनी इच्छाओं-सुविधाओं के बारे में सोचने लगते, एक दूसरे को जली-कटी सुनाने लगते और हाथपाई करने लगते।

उद्धरण - 404

सांसारिक आकांक्षाओं की बात मैं नहीं कहता बल्कि उनसे दूर आध्यात्मिक आकांक्षाओं की बात कह रहा हूँ। बिना आकांक्षा के हम मृत हो जाते हैं। ईश्वर और मोक्ष को प्राप्त करना भी एक आकांक्षा है। नरक के बजाए स्वर्ग में जाने का प्रयास भी आकांक्षा है। जब तक मनुष्य है आकांक्षा उसमें किसी-न-किसी रूप में विद्यमान रहती है परन्तु आध्यात्मिक आकांक्षा सर्वश्रेष्ठ है।

उद्धरण - 403

हमारा यही दोष है कि इन लोगों की तरह लाभ-हानि का हिसाब नहीं धँसता हमारे मगज में। यही खोट है कि गणित नहीं आने दिया जीवन में। उन सबको यही दुख है कि इनकी अभिलाखा से अलग है हमारे लाभ की इबारत।

उद्धरण - 402

अजय बंटी को बहुत प्यार करता है पर अब से वह बंटी को मिलने भी नहीं देगी। बंटी से न मिल पाने की वजह से अजय को जो यातना होगी उसकी कल्पना मात्र से उसे एक क्रूर-सा संतोष मिलने लगा।

उद्धरण - 401

वह कहता है कि व्यभिचार की वृत्ति मोक्षदायिनी है क्योंकि दोनों पक्षों में किसी की कोई ज़िम्मेदारी उसमें नहीं रहती। व्यभिचार एक ऐसा जंगल है जिसके ओर-छोर पर कहीं भी भूत या भविष्य का लगाव नहीं होता। वह केवल वर्तमान में होता है। पुरूष केवल अपने देह-सुख के स्वार्थवश ही होता है और स्त्री अपने सुख-स्वार्थ के वश में। दोनों अपने-आपमें स्वतन्त्र होते हैं।

उद्धरण - 400

कभी अच्छा मत पहनो कभी अच्छा मत खाओ। खाओ भी तो स्वाद न लो। व्यंजनों का स्वादिष्ट लगना पाप है। किसी अच्छी चीज़ का अच्छा लगना गुनाह है, कुफ्र है। किसी भी अच्छी चीज़ में, मसलन संगीत में, चित्रकला में, अभिनय में, नृत्य में, स्थापत्य में, यहाँ तक कि सुन्दर प्राकृतिक दृश्य में, किसी भी चीज़ में अगर तुम्हें मजा आता है तो यह मनुष्यता के प्रति एक घोर अपराध है। क्योंकि ये चीज़े सबको सुलभ नहीं।

उद्धरण - 399

तुम पुरूष हो शक्तिपुंज तुम्हारा कार्य शासन करना है व्यवस्था सन्तुलन सन्तोष और तृप्ति देना है। तुम प्रेम और सुख लेने और देने के अधिकारी हो। मैं तुमको सबकुछ देना और वही तुमसे प्राप्त करना चाहती हूँ। मैं दोहरी जिन्दगी जी रही हूँ अभिशप्त हूँ मेरी कोई परिभाषा नहीं है मैं निरन्तर तुम्हारी याद में जल रही हूँ मेरे पास आओ तुम्हीं मुझे शीतलता और मेरे जीवन को नई परिभाषा और नया अर्थ दे सकते हो।

उद्धरण - 398

बिन्नू अपने मन में तनिक भी भय मत लाना। झिझक-हिचक में मत रहना। जो हुआ उसे भूल जाना। डर मत मानना कभी। जिन्दगानी में इतनी बड़ी जिन्दगी में अच्छा बुरा घट जाता है बिटिया उसके कारन मन में गाँठ लगाने से क्या फायदा? जो तुमने किया ही नहीं उसके लिए अपने को दोसी क्यों मानना?

उद्धरण - 397

हिंदुस्तानी लोग बच्चों से प्रेम नहीं करते उन्हें बच्चों से मोह होता है अंधा मोह। सच कहता हूँ .... एक आम हिंदुस्तानी बच्चे को सही ढंग से परवरिश करना जानता ही नहीं। प्यार और देखभाल के नाम पर माँ-बाप ही अपने को इतना थोपे रहते हैं बच्चे पर कि कभी वह पूरी तरह पनप ही नहीं पाता।

उद्धरण - 396

शुरू में लगता है कि व्यभिचार से अहम् को एक विद्रोह भरी खुशी मिलती है पर झीनी झीनी समझ फिर यह बतलाने लगती है कि इसका अहम् से सीधा या गहरा सम्बन्ध नहीं होता। यह केवल उसका एक ऊपरी विकार मात्र है एक मानसिक उत्पात है।

उद्धरण - 395

गरीबी को ग्लोरिफाई क्यों किया जाय विपन्नता, असमर्थता या साधनहीनता को आदर्श का दर्ज़ा क्यों दिया जाए उसे एन्जॉय करना कौन सी मानसिकता है हर गरीब-विपन्न को ईमानदार और हर अमीर-सम्पन्न को बेईमान और मक्कार समझना कहाँ की समझदारी है।

उद्धरण - 394

प्रेम सिर्फ शारीरिक भूख नहीं है वह ममता भी है वात्सल्य भी है। एक आध्यात्मिक बुलन्दी है और अपने प्रिय से अभिन्न रहने की तमन्ना और उसके लिए कुर्बानी का संकल्प।

उद्धरण - 393

बिन्नू सौ बातों की एक बात है नाते-सम्बन्ध का नाम बताएँ गढ़ें सो बेकार है। साँचा नाता तो प्यास और पानी का है।....खोट तो हमारे मतारी-बाप का था। वे गरीब काहे को थे? गरीब थे तो अपनी बिटिया के लिए सुख के सपने काहे देखे? सपने देखे ही थे तो मान-परतिष्ठावाले घर के लिए उतना दहेज काहे नहीं जुटा पाए? काहे नहीं कर पाए घर-वर की इच्छा पूरन?

उद्धरण - 392

जो कुछ हो गया उसे भूल जाओ। बीती बातों को कातते रहना बूढ़ों का स्वभाव होता है।

उद्धरण - 391

औरत में तो मान-अभिमान नखरा होता ही है हमने खुद झेला है उठाया भी है रीझे भी है मगर पुरूष के मान की भव्यता ही कुछ और होती है।

उद्धरण - 390

मुझे सभ्य बनाया जा रहा था। पालतू बनाया जा रहा था। चार जनों के बीच पेश करने लायक बनाया जा रहा था। मुझे भद्र समाज के अनुकूल ढालने के कोशिश की जा रही थी। मुझे गगनचुम्बी सफलता की दिशा में प्रक्षेपित किया जा रहा था।

उद्धरण - 389

तुम जबरदस्ती करोगे कर लो मैं तुम्हारे सामने हूँ। यह तो शरीर मिट्टी का है पर समझ लेना आत्मा नहीं मिलेगी। बिना आत्मा के शरीर को जितना चाहे ले लो। मेरी आत्मा तो चनरा में बसती है। उसके बिना मुझे तो यह शरीर भी नहीं चाहिए। इसी से बार-बार कहती हूँ ममता बड़ी बुरी चीज होती है। उसकी ममता मुझसे छूटती नहीं न छूट सकती है बाबू साहब।

उद्धरण - 388

बिन्नू यह जल निरमल है या मैला? पवित्तर है या पाप का? इमरत है कि बिस? नहीं जानते हम। तुम्हारी रामायन में लिखा भी होगा तो लिखनेवाला यह नहीं जानता कि आदमी जब प्यासा होता है प्यास से मर रहा होता है तो कहाँ देखता है कहाँ सोचता है कहाँ करता है कोई भेद? कोई अन्तर ।

उद्धरण - 387

पर मैं तुम्हें तकलीफ़ देने के लिए बंटी को अलग नहीं करना चाहता बिना बंटी को अलग किए भी तुम सोच सको। तो अच्छा है। पर इतना जरूर कहूँगा कि तुम केवल बंटी की माँ ही नहीं हो इसलिए केवल बंटी की माँ की तरह ही मत जियो शकुन की तरह भी जियो।

उद्धरण - 386

नारी के आक्रामक पौरुष ने उसके संकोच जड़े पौरुष को झटका दिया। जीवन में पहली बार उसे किसी नारी का एकांत साथ मिला था। पिछले कई वर्षों से मन में हिलोंरे लेती हुई प्रेम-कामना जो स्वयं आक्रामक होना चाहती थी जो किसी प्रेमिका के लाज-संकोच से लड़कर उसे जीतना चाहती थी अब तक एक बार भी अपना दाँव न पाकर इस समय स्वंय ही एक फाहशा औरत के हत्थे चढ़ी जा रही है। उसे अच्छा नहीं लग रहा मगर अच्छा भी लग रहा है।

उद्धरण - 385

स्निग्धा के अधैर्य से मैं परिचित न रहा होऊँ ऐसी बात नहीं थी। उसे हर चीज़ फटाफट चाहिए होती थी। इधर इच्छा हुई उधर चीज़ हाजिर। उसे इसी का अभ्यास था इसी का प्रशिक्षण। उसके लिए यही सहज दुनिया थी। जबकि वास्तविक दुनिया न ऐसी थी न हो सकती थी। ....यह सब नहीं होना था। क्योंकि स्निग्धा अपने पापा का घर हमेशा के लिए छोड़ आयी थी। क्योंकि उसमें धैर्य नामक चीज़ थी ही नहीं।

उद्धरण - 384

क्या अर्थ है इसका? कागज पर बनाया चित्र सजीव मनुष्य लगता है और सजीव सक्रिय मामूली गरीब युवती किसी कलाकार के चित्र की तरह! सौन्दर्य कहाँ है? उस युवती में या चित्र में? अथवा कलाकार में चाहे वह मनुष्य हो या ईश्वर ? या वह स्वंय उनके अन्दर है। यदि ऐसी ही बात है तो इतना ताप क्यो ? कब से यह आग है उनके अन्दर ? क्या कामनाओं की वह सुप्त आग ही सौन्दर्य है जो किसी खास अवसर पर जलने लगती है।

उद्धरण - 383

बिन्नू तुम्हारी रामायन में हमारे मन की बातें लिखी है? तुम ही बताओं हमारे मन में सब कुछ उलटा काहे होता जा रहा है? अँधियारा ज्यों-ज्यों बढ़ता है भीतर जुन्हैया छिटकती जाती है। बिन्नू इँधेरे पाख में पूरनमासी का चाँद दिखाई देता है हमें। तुम कहती हो कि बियाबान डाँग में स्यार-बिलावों के सिवा कुछ नहीं। और हमें हमें तो देवताओं का बास लगता है इस गढ़ी में जंगल में और चारऊ तरफ।

उद्धरण - 382

ज़रा आज से आठ-नौ साल बाद की बात सोचो जब बंटी की अपनी जि़दगी होगी अपने स्वतत्र संबंध होंगे अपनी इच्छाएँ और अपनी महत्वाकांक्षाएँ होंगी तब तुम्हारा कितना अस्तित्व होगा उसकी ज़िदगी में?

उद्धरण - 381

वह अपने-आपको उस कुएँ के मेढक की तरह सहमा-सहमा-सा महसूस करने लगा; जो किस्मत के डोल में पानी के साथ साथ ऊपर खिंच आया हो और एक नयी भव्य और अपरम्पार दुनिया में फेंक दिया गया हो।

उद्धरण - 380

क्या यह सिखाना था यह किस तरह का सिखाना था। क्या यही सब सीखने की तमन्ना लेकर मैं इस घर में आयी थी? क्या कोई भी लड़की शादी के बाद माँ-बाप का घर छोड़कर यही सब सीखने ससुराल आती है? इस तरह क़दम-क़दम ज़लील होना, पल पल दोषी ठहराया जाना, घड़ी-घड़ी छोटी-छोटी चीजों के लिए तरसना और एक अदृश्य पर निंरतर हिंसा रक्तपात झेलना?

उद्धरण - 379

जब मनुष्य लुढ़कता है तो लुढ़कता ही जाता है। बीच में रूकना मुश्किल हो जाता है।

उद्धरण - 378

बखरी में अम्म रहती थीं तो ऐसा ही लगता था जैसे बसा हुआ घोंसला है। चिड़िया उड़ जाय घोंसला टूट जाय तो गिरकर मर नहीं जाएगा चिड़िया का बच्चा।

उद्धरण - 377

बंटी को हॉस्टल भेजने की बात तो आपने कह दी पर कभी यह भी सोचा है कि उसे हॉस्टल भेजकर मैं कितनी अकेली हो जाऊँगी।....मुझे डर है शकुन कहीं तुम अपना अकेलापन ख़त्म करने के चक्कर में बंटी का भविष्य ही न ख़त्म कर दो। तुम्हारा यह अतिरिक्त स्नेह उसे बौना ही न छोड़ दें।

उद्धरण - 376

प्रेम के ऐसे रूप को मैं एकांत ही की चीज़ मानती हूँ बिलकुल पूजा ऐसी ही चीज़ को मानती हूँ और उसका दिखावा मुझे बेहद-बेहद बुरा लगता है- उतना ही बुरा जितना कि नये हिन्दुस्तान के अपने इन पिछड़े क्षेत्रों के अन्दर मुझे लड़के-लड़कियों की दोस्ती छिपाना या फौरन ही पाप-चेतना के साथ जोड़ देना बुरा लगता है।

उद्धरण - 375

मेरी ही नहीं अपनी जरूरतों के प्रति भी उसका रवैया एकदम अड़ियल बूढ़ों जैसा था। लेटरीन के लिए अलग चप्पल होनी चाहिए उसे समझ नहीं आता क्यों....घर की जो हालत थी ऐसी कि मैं किसी फ्रेण्ड को अपने घर भी नहीं बुला सकती थी।....नींबू-मिर्च-धनिया-टमाटर-अदरक आदि खरीदना तो उसे बिलकुल फिजूलखर्ची लगता। एक बार प्याज़ महँगी हो गयी तो उसने प्याज़ खरीदना ही छोड़ दिया। क्या हुआ जैन लोग भी तो नहीं खाते।....धीरे-धीरे मैं डरने लगी। घर में कोई चीज़ खत्म हो जाती तो यह बताते मैं डरती कि अमुक चीज़ ख़त्म हो गयी है। क्या।

उद्धरण - 374

पिछले एक वर्ष से मैं शाम को रामचरितमानस का पाठ करने के बाद प्रभु से अपील करता हूँ कि वे हमारे प्रियजनों को रोग शौक हैरानी परेशानी से दूर रखें। मैं हर आदमी का नाम लेकर उनके लिए अपील करता हूँ।

उद्धरण - 373

चीफ तुम फिकिर जिन करों। लड़ने दो उस कंजरी को। और ऐन लड़ा लेवे अपने यारों को। जब तक इस काया में पिरान बाकी हैं लड़ेगे हम भी। पूरी जिन्दगानी हमने लड़ाई लड़ी है। हँसी-खेल नहीं है जिमींदारिन बने रहना। वैसा ही रौब-रूतबा रखना आनबान से रहे है।

उद्धरण - 372

सच पूछा जाए तो अजय के साथ न रह पाने का दंश नहीं है यह, वरन् अजय को हरा न पाने की चुभन है यह जो उसे उठते-बैठते सालती रहती है।

उद्धरण - 371

हवन से वायुमण्डल शुद्ध होता है वेदों में संसार का सारा ज्ञान समाया हुआ है। जर्मनी वाले हमारे वेद उठा ले गये और उन्हीं की बदौलत ये गैस के हण्डे, रेल के इंजन, ये सरसराती हुई जाने वाली हवागाड़ी या मोटरकार सब कुछ वेदों से ही आविष्कृत हुआ है।

उद्धरण - 370

तब मैंने एक चीज़ डिस्कवर की। रोहित कंजूस है। बेहद कंजूस मक्खीचूस....होता क्या है इनमें सेलखड़ी और सुगंध। कोई तीसरी चीज़ होती हो तो बताओ। यह था उसका तर्क। ज़ाहिर है ऐसे में उसे पर्फ्यूम और डियोड्रेण्ट तो बिलकुल ही बेकार की चीजे़ं लगती....उसके मन में ऐसे ही तिरस्कारपूर्ण विचार होंगे जो उसने कभी व्यक्त नहीं किये लेकिन अपने तिरस्कारपूर्ण मौन से यह जरूर जता दिया कि या तो मुझे इन चीजों को प्रयोग छोड़ना पड़ेगा या इनकी व्यवस्था अपने बूते पर करनी पड़ेगी। उसकी कमाई से यह सब नहीं आएगा।

उद्धरण - 369

ये दोनों ही उन लोगों में से थे जो विवाह के बाद पत्नी को घर में राशन के बोरे की तरह पटककर निश्चिन्त हो जाते हैं और अपने कोटे से अधिक बच्चे पैदा करते हुए बाहर ऐश करते और गुलछर्रे उड़ाते हैं।

उद्धरण - 368

पगलू हमने तो अब जाना है कि औरत धरती जैसी होती है। सारे भार को फलों की तरह समेटती हुई इमरतदान देती है आदमी को।

उद्धरण - 367

दस वर्ष का यह विवाहित जीवन-एक अँधेरी सुरंग में चलते चले जाने की अनुभूति से भिन्न न था। आज जैसे एकाएक वह उसके अंतिम छोर पर आ गई है। पर आ पहुँचने का संतोष भी तो नहीं है ढकेल दिए जाने की विवश कचोट-भर है। पर कैसा है यह छोर? न प्रकाश न वह खुलापन न मुक्ति का एहसास। लगता है जैसे इस सुरंग ने उसे एक दूसरी सुरंग के मुहाने पर छोड़ दिया है- फिर एक और यात्रा वैसा ही अंधकार वैसा ही अकेलापन।

उद्धरण - 366

घर से निकलने पर चाहे पैरों में जूते-चट्टी न हों पर टोपी जरूर होनी चाहिए। हम बच्चों को समझाया जाता था कि नंगे सिर पर शैतान सवार हो जाता है। शैतान क्या होता है यह हम नहीं जानते थे पर यह धारणा किसी तरह हमारे मन में घर कर गई थी कि जो हिन्दुओं का ब्रह्मराक्षस है वही मुसलमानों का शैतान है।

उद्धरण - 365

संभव है वही सिखा दे। सीखने में मदद तो कर ही सकता है। लेकिन क्या उसने सिखाया क्या उसने सीखने में मेरी मदद की....संडासी की जरूरत ही मानों नहीं थी। काग़ज़ के दो टुकड़ों से गरम बरतन आँच पर से उतार लिया जाता। बेडरूम में एक भी खूँटी नहीं थी। .....ओडोनिल हार्पिक आदि के अविष्कार की खबर अभी यहाँ तक नहीं पहुँची थी। धुले कपड़े सुखाने के लिए छत पर एक जंग लगा तार झूल रहा था। उसमें क्लिप नहीं थे।....सच बात तो यह है कि उसने मुझे सिखाया नहीं, धीरे धीरे अनुकूलित करने की कोशिश की। यदि उसे मूँग की छिलके वाली दाल और लौकी की सब्जी ही खानी है तो मेरे अलग से छोले-भटूरे बनाकर खाने का तो सवाल ही नहीं उठता।

उद्धरण - 364

मेरी बकसिया जो दादा के पलंग के नीचे रखी है न तुम्हें याद होगा तुमने उसमें सीपियाँ रख दी थीं जिन्हें तुम अपने गाँव की नदी से लाई थीं। वे रखी हैं। छूता हूँ तो लगता है वे तुम्हारी उँगलियों की पोरे हैं। नहीं वे तो सीपियाँ है। है न?

उद्धरण - 363

यह कण्व का आश्रम तो नहीं था और न ही शकुन्तला की विदाई का अवसर किन्तु घरवालों को लगा कि छकौड़ी-बो की बकरी दुकानदार लाला की गाय शीशम वृक्ष की गिलहरी और नम्रता की छत पर बैठा कौआ सभी उसी को देखकर अपनी उदासी प्रकट कर रहे हैं।

उद्धरण - 362

सामनेवाले को पराजित करने के लिए जैसा सायाम और सन्नद्ध जीवन उसे जीना पड़ा उसने उसे खुद ही पराजित कर दिया। सामनेवाला व्यक्ति तो पता नहीं कब परिदृश्य से हट भी गया और वह आज तक उसी मुद्रा में उसी स्थिति में खड़ी है- साँस रोके दम साधे घुटी-घुटी और कृत्रिम!

उद्धरण - 361

बाप-बेटे आपस में कितना ही गुण रूप साम्य क्यों न रखते हों लेकिन उनमें एक मौलिक दृष्टि-भेद होता ही है। इसे बेटे की बाप के प्रति अवज्ञा नहीं माना जा सकता- और आरोपण तो वह किसी भी तरह है ही नहीं।

उद्धरण - 360

टाइम्स ऑफ इण्डिया का शेयर बाज़ार वाला पन्ना उनके लिए संसार के सभी रिश्तों से ज्यादा दिलचस्प है। बेटी की जिन्दगी से भी ज़्यादा। बेटी तो गायत्री की हत्यारी है। उसी के साथ मर जाती तो झंझट ही खत्म हो जाता।

उद्धरण - 359

कक्को ने समझाया कि कौन मानता है तुम्हारी सिच्छा-दीच्छा। अपने नैमधरम अपने मगज तक राखो। बहुत बन लिये बड़े अब छोटे-बड़े की मान-मरजाद कहाँ राखते हैं लोग? जे तो एक दिन होना ही था तुम कहाँ लों रोकते?

उद्धरण - 358

जितना ज्ञानी उतना ही ढोंगी स्वार्थी और संकीर्ण। हर जगह है यह चीज

उद्धरण - 357

भीतर ही भीतर चलनेवाली एक अजीब ही लड़ाई थी वह भी जिसमें दम साधकर दोनों ने हर दिन प्रतीक्षा की थी कि कब सामनेवाले की साँस उखड़ जाती है और वह घुटने टेक देता है जिससे कि फिर वह बड़ी उदारता और क्षमाशीलता के साथ उसके सारे गुनाह माफ करके उसे स्वीकार कर ले उसके संपूर्ण व्यक्तित्व को निरे एक शून्य में बदलकर।

उद्धरण - 356

सेठों रिश्वतखोरों की बात छोड़ दो वरना किसका अच्छा दिन जा रहा है आज के जमाने में? घर-घर मटियारे चूल्हे हैं अपनी अपनी धोतियो में सभी नंगे है।

उद्धरण - 355

पार्टी के दिन समझ में आ गया कि यह किस क़दर असंभव है। पापा ने अपने निर्णय आप लिये थे और मुझे भी यही सिखाया था कि तुम्हें अपने निर्णय स्वंय लेने चहिए। ….समाजशास्त्र में एम ए करने का निर्णय भी मेरा ही था और रोहित से शादी करने मेरा ही था। यह सही था कि मुझे मेरे निर्णय लेने की स्वतंत्रता दी गयी थी। लेकिन इस बात की कोई शर्त नहीं थी कि मेरे द्वारा लिये गये हर निर्णय को पसन्द भी किया ही जाएगा। न यह कि परिणामों के प्रति खबरदार भी किया जाएगा।

उद्धरण - 354

परदेसी की प्रीत रैन का सपना, दिया कलेजा काट हुआ नहीं अपना।

उद्धरण - 353

क्या स्त्री इतनी हीन अछूत और गई गुजरी होती है कि उसकी वजह से पुरूष महानता से गिर कर अपराधी हो जाता है, क्या स्त्री की कोई भावना नहीं होती कोई विचार नहीं होते। उसके पास आत्म-सम्मान और विवेक नहीं होता? क्या वह किसी के आचरण के औचित्य को नहीं समझ सकती?

उद्धरण - 352

समझौते का प्रयत्न भी दोनों में एक अंडरस्टैंडिंग पैदा करने की इच्छा से नहीं होता था वरन् एक-दूसरे को पराजित करके अपने अनुकूल बना लेने की आकांक्षा से।

उद्धरण - 351

दुनिया के किसी भी पिछड़े-से-पिछडे देश के नेताओं में शायद ही इतने विचारशून्य राजनीतिक गुटबाज़ मिलें। इस संकीर्ण स्वार्थ भरी दम्भ भरी गुटबाजियों में पड़कर पढ़ा लिखा और चतुर-भोला सामान्य सभ्य सुप्रतिष्ठित जन समझ से नासमझी की ओर आँखें मीचे बढ़ा जा रहा है।

उद्धरण - 350

क्यों और किसने यह रिवाज़ बनाया कि लड़की को एक अनजान मकान के अजनबी कमरे में, अजनबी पलंग या खटिया पर, एक अजनबी व्यक्ति के साथ सोना पड़ेगा क्यों नहीं ऐसा हो सकता कि लड़की अपने चिर-परिचित परिवेश में ही रहे और उससे शादी करने वाला ही वहाँ आकर रहने लगे क्यों यह एक संभावना नहीं है। क्यों यह एक सम्मानप्रद संभावना नहीं है

उद्धरण - 349

अब तो लोगों के कान और जीभ एक ही समझो। दोनों इन्दिरियों ने अपना धरम खो दिया है।

उद्धरण - 348

कुछ बातें देखी जाती हैं कुछ सुनी जाती हैं कुछ दीवारें कहती हैं कुछ बिना सिर-पैर के हवा में उड़ती रहती हैं और कुछ के हम स्वंय भी गवाह होते हैं

उद्धरण - 347

उसने कई बार अपने और अजय के संबंधों के रेशे-रेशे उधेड़े हैं- सारी स्थिति में बहुत लिप्त होकर भी और सारी स्थिति से बहुत तटस्थ होकर भी पर निष्कर्ष हमेशा एक ही निकला है कि दोनों ने एक-दूसरे को कभी प्यार किया ही नहीं।

उद्धरण - 346

मैं यथार्थ की गति स्थूल से सूक्ष्म मानकर चलता हूँ- मेरी बिम्बध्वनियों या ध्वनिबिम्बों को अभिन्न अटूट तार अब तो अपनी बहिर्चेतना द्वारा बिना किसी प्रकार का श्रम कराये हुए ही मेरे पूर्वश्रम के अर्जित फलस्वरूप संस्कार बनकर बिम्बावलियों की स्वतः गति के साथ घुल-मिलकर एक हो गया है।

उद्धरण - 345

यह जो भी होगा, सिर्फ अपनी मेहनत से। फिर भी विनम्र था। कुंठित नहीं था, निष्क्रिय नहीं था, विध्वंसक या सनकी नहीं था चुपचाप प्रयासरत था। यह सचमुच आदमी था। वे लड़के थे।

उद्धरण - 344

तुमको भेज तो दिया रात के बखत पर दादा बड़े घबड़ाए मन्दा कैसे-कैसे बिलबिलाए। कक्को ने बताया हमें रात-भर विलाप किया है दादा ने-सारा गाँव क्या असपेर-भर यही कहेगा कि सामर्थहीन और अविवेकी पंचमसिंह। रच्छा नहीं कर पाए मोंडी की। बचा नहीं पाए सोनपुरा की मातौन को। मुख दिखलाने जोग नहीं रहे हम।

उद्धरण - 343

मृत्यु जिसका संकल्प एवं मुक्ति हो ऐसे ही व्यक्ति के स्थिति नीलेश की हो गई जो संसार की हर चीज़ से उदासीन होकर एक अँधेरी निश्चिन्तता में प्रवेश करते हुए सामने जो कुछ भी उपलब्ध होता है उसी में बाकी दिन अपना ध्यान रमाता है।

उद्धरण - 342

उस दिन अजय के पास से लौटने पर वह बड़ी देर तक बंटी को दुलारती-पुजकारती रही थी मानों बंटी वहाँ से अकेला नहीं लौटा हो अपने साथ अजय को भी ले आया हो।

उद्धरण - 341

क्या किया जाय हमारे जीवन में परिस्थितियों के संयोग ही कुछ ऐसे बैठे हैं कि एक बेटे की यशोगाथा के साथ-साथ दूसरे बेटे की कलंकगाथा अमृत और विष के समान प्राणों में घुलती है।

उद्धरण - 340

यह आदमी संघर्ष कर रहा था। धारा के विरुद्ध तैर रहा था। अपने पैरों पर मजबूती से खड़ा था। बाप के आगे किसी चीज़ के लिए हाथ नहीं फैला रहा था।

उद्धरण - 339

ठीक कह रही हो बऊ बड़े दुख के आगे छोटा दुख सुख समान ही लगता है।

उद्धरण - 338

सच्चा प्यार चरित्रहीन नहीं है परन्तु उसका नित्य फैशन और स्वाद बदलने की आदत अवश्य घृणित है। स्त्री हो या पुरूष चरित्र को नष्ट करना अपनी मानवीय पहचान को नष्ट करना है।

उद्धरण - 337

यदि उसने ठीक से खाना नहीं खाया या कि वह किसी बात पर ज़िद करके रो दिया या कि उसने कोई ऐसी बात पूछ ली जो इस उम्र के बच्चे को नहीं पूछनी चाहिए तो वह उत्तेजित होने की स्थिति तक परेशान हो जाया करती है।

उद्धरण - 336

पितृसत्ताक समाज में भी माँ का पद एक जगह पिता से बड़ा है। पिता की गया एक बार करने ही से पितृ़ऋण से मुक्ति मिल जाती है पर माँ की गया सात बार में पूरी नहीं होती।

उद्धरण - 335

यह सब मेरे तब तक देखे हुए जीवन से इतना अलग था कि जिसे मैं ठीक से सोच ही नहीं पाती थी। अब तक जितने भी, लड़के मेरे दोस्त रह चुके थे या थे उनसे रोहित इतना अलग था कि यह विस्मयकारी भी था और आकर्षक भी। संभवत हमारी दुनिया से उसकी इतनी ज्यादा भिन्नता या विपरीतता ने ही मुझे उसके प्रति आकर्षित किया होगा।

उद्धरण - 334

जो लड़की-लड़का दोनों का खेल हो। वैसे मैं लड़कों के खेल खेल सकती हूँ। खेल नहीं लड़कोवाले काम कर सकती हूँ।

उद्धरण - 333

दुनिया में क्या कोई ऐसा है जो कह सके कि वह दोष-मुक्त है गलतियाँ तो सभी करते हैं। इसकी वजह से अपने को छोटा महसूस करने की जरूरत नहीं है। गलतियों को समझकर उनको छोड़ना और उनसे सीखकर आगे बढ़ना ही मनुष्य की वास्तविक शक्ति है।

उद्धरण - 332

क्या बताएँ कुछ भी समझ में नहीं आता। लगता है जब एक बार धुरी गड़बड़ा जाती है तो फिर ज़िंदगी लड़खड़ा ही जाती हैं फिर कुछ नहीं होता कुछ भी नहीं।

उद्धरण - 331

यह अन्तर्जातीय प्रेम विवाह पहले रूढ़ियों के प्रति बग़ावत करके मनुष्य को संकीर्णता से व्यापकता के दायरे में ले जाता है लेकिन विवाह के बाद यही संकीर्ण जातिगत चेतना पति-पत्नी के बीच कभी-कभी बेतुकी और चुभन भरी स्थितियाँ ला देती है।

उद्धरण - 330

और हैरानी इस बात की थी कि जितना मैं उससे मिलने की इच्छा को टालती जाती थी, उतनी ही उससे मिलने की तड़प बढती जाती थी।

उद्धरण - 329

एक ही घर की दो जनी! एक ही ड्योढ़ी की सास बहू। ऐसा दुसमनाई! ऐसी गहरी खुन्दक! और ऐसी बेरहम दूरी! लो अब कहाँ जावें। कितै करें निरवाह? कौन गुफा में दुका देवें मन्दा कों? कौन सुरंग से निकर जायँ कहूँ दूर देस।

उद्धरण - 328

अधैर्य बड़ी खराब चीज है इससे सही काम भी बिगड़ जाता है। इसका परिणाम कुविचार और दुर्व्यवहार है धैर्य सन्तुलन है शक्ति है आशा है विश्वास है। वह दूरदृष्टि और बुद्धिमानी है उससे आप पहले से ही भविष्य देख सकते हैं और उसके मुकाबले के लिए सही नियोजन सही तैयारी कर सकते हैं। धैर्य से ही सही समय पर सही दृष्टिकोण से सही काम होता है।

उद्धरण - 327

अनायास ही ममी की उँगलियाँ उसके बालों को सहलाने लगीं काँपती-थिरकती उँगलियाँ। उन उँगलियों के पोरों में से झर-झरकर जाने कैसा स्नेह बंटी की नसों में दौड़ने लगा कि मन में थोड़ी देर पहले जो भय समाया था वह अपने आप ही धीरे-धीरे बह गया। स्पर्श से ही वह जान गया कि अब तक ममी के चेहरे की वह सख़्ती भी ज़रूर पिघल गई होगी।

उद्धरण - 326

मैंने कहा लड़की वालों की तरफ से जो काम करने आते हैं वो किसी के बाप के नौकर नहीं होते। ये इंसानियत का कर्त्तव्य है और हम इंसानों की सेवा करने के लिए हरदम मुस्तैद हैं। आज सेवा की हमारी पारी है तो कल आपकी भी पारी आ सकती है।

उद्धरण - 325

साथ रहने लगी एक दिन कॉलेज में इसको देखा। मैली जीन्स, कोल्हापुरी चप्पलें, खादी का कुरता और बगल में झोला, दाढ़ी बढ़ी हुई और लपकते क़दम। हरदम यही। रोज़ यही। कभी कुरते की जगह टीशर्ट आ जाती, पर दूसरे दिन कुरता। सर्दियों में स्वेटर मफलर या कोट। मैं देख रही थी। मैं लगातर चार साल देखती रही।

उद्धरण - 324

शकील हमारे गाँव में भी सब आदमी माता के मन्दिर के पास लैन बनाकर बैठे होंगे। सब बिटियाँ भुँजरियाँ बाँट रही होगी। कका भइया दादा सब पाँव छू रहे होंगे उनके। ससुरालों से आ गई होंगी सब बिटियाँ

उद्धरण - 323

तुम स्त्री हो अपने होने की गारिमा से भरी। तुम स्वंय मूर्तिमान गरिमा हो। पाप-पुण्य की संकुचित परिभाषा से परे तुम संवेदना प्यार और शक्ति का स्त्रोत हो। मैं पुरूष हूँ लम्बे और शक्तिशाली शरीर के बावजूद स्वंय में दुर्बल और चंचल हूँ। निर्मम क्रूर हूँ। मेरे अन्दर न कोई प्रकाश है और न ही मेरा कोई प्रयोजन। मैं अधूरा हूँ और भटक रहा हूँ। मेरा कोई उद्देश्य नहीं और न ही लक्ष्य। यह सब प्राप्त करने मैं तुम्हारे पास आया हूँ जो तुम्हारे पास ही है मेरे पास नहीं।

उद्धरण - 322

अँधेरा यानी कि सोओ। रात-भर अँधेरा रहता है और रात-भर वह सोता भी है। अब दिन में भी अँधेरा कर दोगे तो कोई रात थोड़े ही हो जाएगी।

उद्धरण - 321

जीवन भर देश-प्रेम मानवता सत्य न्याय और ईमानदारी को ही भला समझता और समझाता रहा पर अब ये सब बातें निस्सार लगती हैं। इनसे न तो वह संसार ही बदला जिसे बदलने की भावना से मेरे मन में सदा उथल-पुथल मचाकर नये से नये विचार और कल्पनाएँ स्वतः स्फूर्त होती रहीं न मुझे सुख ही मिला।

उद्धरण - 320

मैं कैसे बताऊँ तुम्हारी आँखें, तुम्हारी बातें मेरी आत्मा की गहराइयों को छू लेती हैं। हाँ मुझे तुम्हारा शरीर बेहद प्रिय है लेकिन सिर्फ शरीर ही नहीं बल्कि तुम्हारी सच्चाई, तुम्हारी निश्छलता, तुम्हारी आत्मा। पूरी-की-पूरी तुम जैसी हो जिसको मैं जितना जानता हूँ उसी का बार-बार अनुभव करने के लिए मैं आता हूँ

उद्धरण - 319

बचपन भी कैसी अनमोल नियामत है? बड़े-से-बड़े हादसों से बेअसर निकल जाता है। बीते हुए को भूल-बिसराकर किलकने लगता है फिर से।

उद्धरण - 318

पापा लोग ऐसे ही होते हैं। उन्हें बच्चों का ख़याल कभी रहता ही नहीं। यह तो माँ ही होती है जो....

उद्धरण - 317

बुद्धि उस गलियारे में जाकर भटक गई जहाँ पैसा भगवान् और सत्ता जगदम्बा है।

उद्धरण - 316

पापा मुझसे खुश नहीं थें। पता नहीं किस वजह से पापा भूआ से भी खुश नहीं थे। पापा अपनी नौकरी से भी खुश नहीं थे। पापा अपने पत्नीविहीन घर और जीवन से भी खुश नहीं थे। पापा नौजवान और महत्वाकांक्षी थे। शायद हम लोग उनकी नौजवानी और महत्वाकांक्षी के रास्ते में व्यवधान सिद्ध हो रहे थे।

उद्धरण - 315

रुपए के लिए ही अपने शरीर को बेचनेवाली एक वेश्या-पुत्री की रुपयों के लिए ही किसी की विश्वासिनी बनने की यह भावना स्वयं उसकी समझ के परे थी फिर भी उसकी तुलना उस बन्द अँधेरी घुटी-घटी कोठरी से की जा सकती है जिसके फॉफर से अचानक झिर-झिर हवा और रोशनी की कोई लकीर आ जाए।

उद्धरण - 314

वोट देने की बात तो भइया ऐसी ही हुई जैसे कड़वी ककड़ी को पेट में रखे रहें। कंठ में लौटा-लौटाकर जुगाली करते रहें और जोड़ते रहें विष। पचाते रहें चुनाव तक। और चुनाव के दिन मोहर ठोक के कागज घोंपि आए मतपेटिका में। कर दिया पीठ पर वार। काढ़ लिया बदला।

उद्धरण - 313

क्या इतने बड़े-बड़े लोग भी लड़ते हैं? ऐसी लड़ाई जिसमें कभी दोस्ती ही न हो। क्या मम्मी को पापा की याद नहीं आती होगी?

उद्धरण - 312

अरविन्दजी कानून चाक पर चढ़ी-मिट्ठी है पैसे वाला उसे जैसा रूप देना चाहेगा दे लेगा और आप कुछ न कर पायेंगे।