पारस लोहे को भी कंचन कर देता है। सुगना हमारे भाग में न जाने कौन सा सराप है कि जो सोचें ठीक उसका उलटा होगा विपरीत घटेगा। हमारा दुर्भाग्य कोई पारस नहीं बदल सकता।
आँसू भरी आँखों के सामने डिब्बे की हर चीज़, बैठे हुए अजनबी लोगों के चेहरे पहले धुँधले हुए और फिर एक-दूसरे में मिल गए। पापा का चेहरा भी उन्हीं में मिल गया और फिर धीरे-धीरे सारे चेहरे एक-दूसरे में गड्डमड्ड हो गए।
तुम समाज-समाज चिल्लाओ वो आजा़द दुनिया का नारा लगाएँ। मुनाफे की दुकान अलग है विज्ञापन के ढंग अलग है लेकिन बात एक ही है। तुम दोनों ही गुटों के लोग बेचारे निरीह व्यक्ति पर सामूहिक आक्रमण करते हो। व्यक्ति को स्वतन्त्रता दिलाना चाहता हूँ।
यह मेरा नहीं। जो कुछ मैं अर्पण कर रहा हूँ यह मेरा नहीं। ठीक तो है जहाँ आदमी पैदा होता है वहीं किसी कोने में नाल गाड़ी जाती है। उसकी कि इस आँगुर-भर धरती में इस जीव की जड़े हैं। फूलेंगी-फलेंगी। भले ही दुनिया के छोर पर चला जाय फिर भी नहीं भूली जाती अपनी भूमि नाम और मिट्टी। ....... इंसानियत के नाते ही सोच लो जिस धरती से तुम पैसा खुदवा रहे हो उस पर हम पसीना बहा लें बस। बेघर होने से बच जाएँगे। अपनी जड़ों से जुड़े रहकर हरे-भरे बने रहेंगे इस गाँव के लोग
मैंने इतना समझाया कि देखो अभी मत लाओ। पहले उसके एक्ज़ाम्स होने दो। छुट्टियों में लाकर यहाँ रखना यदि हिल जाए उसका मन लग जाए तो यहाँ भर्ती करा देना। वरना बच्चे के साथ भी तो कितनी ज़्यादती है। पर इनको तो जैसे झख सवार हो गई। रात-रात भर नींद नहीं आती थी। ....... क्या हाल हो गया है बच्चे का? कितना सहमा-सहमा डरा-डरा रहता है। कैसे नहीं भेजूँ इसे हॉस्टल? यह सब सबसे कटकर रहेगा अपने बराबरी के बच्चों के बीच में ही रहेगा तभी नार्मल होगा। हो खर्चा जैसे भी हो-जो भी हो। ...... सारे समय बालकनी मैं बैठा रहा बिलकुल नहीं बोलता। मैं तो खेलने भी बैठी पर सच मुझे तो तरस आने लगा। और इस चीनू को देखो पाँच बजे से ही आँखे फाड़-फाड़कर चारों तरफ़ ऐसे देखता है। जैसे कुछ ढूँढ रहा है। बस तुम्हें ढूँढता है। यह तो अब तुम्हें बहुत मिस करने लगा है।
कामाचारी अर्थाचारी अथवा सदाचारी कोई भी हो इनका एकजुट होकर कोई भी सामूहिक आन्दोलन चलाना अनैतिकता है। हमारी इच्छाएँ और आकांक्षाएँ ऊपरी तौर पर बहुतों से मेल खाने के बावजूद हमारे अन्दर अपना स्वतन्त्र अस्तित्व रखती हैं। अस्ति की स्वीकारोक्ति ही यह है कि मैं हूँ और मैं हर हालत में दूसरे से भिन्न हूँ-अपने माता-पिता भाई-बन्द पत्नी-प्रेमिका मित्र-व्यवहारी इन सबसे मेरा अस्तित्व जुदा है। अपने अस्तित्व को सुरक्षित रखने के लिए मुझे केवल अपनी ही चिंता करनी चाहिए।
पता नहीं कैसे क्या हुआ कि उसके भीतर दो आँखें और उग आईं और उसके बाद से ही सब कुछ गड़बड़ हो गया। बाहर की आँखों से वह एक चीज़ देखता है तो भीतर की आँखें दूसरी चीज़ देखने लगती हैं। कभी भीतर की चीजे़ बाहर की चीजों को दबोच लेती हैं तो कभी बाहर की भीतर की चीजों को।
और सारे समाज में रहकर आप लोगों की बखानी हुई सारी नैतिकता के लबादे ओढ़कर बेचारा व्यक्ति कितना अकेला, कितना शून्य, कितना निरर्थक है! या तो वह समाज को स्वीकारे अथवा समाज उसका अस्तित्व ही नकार देगा। ये क्या खूब समाजवाद है कि जिसमें समाज तो आजाद है पर उसका व्यक्ति गुलाम। और जब व्यक्ति ही गुलाम है निज अस्तित्वहीन है तब समाज ही क्योंकर स्वतन्त्र हुआ।
कहाँ? ये पत्तियाँ तो सूख रही हैं। माली की हँसी- ये तो सूखेगी ही। उस ज़मीन के खाद-पानी की पत्तियाँ हैं ये तो सूखकर झड़ जाएँगी। फिर नई पत्तियाँ फूटेंगी। जड़ पकड़ने के बाद कोई डर नहीं। और उसने खुद उन मरी-मुरझाई पत्तियों को झाड़ दिया था।
नैतिकता इस बात में नहीं कि आदमी कितना सच्चा त्यागी तपस्वी और प्रामाणिक है। प्रश्न यह है कि व्यक्ति को अपनी इच्छाओं आकांक्षाओं और आचार-व्यवहार को गति देने में मुक्ति कितनी मिलती है।
महापर्व ही था बिटिया किसी के लिए विकास का महापर्व तो किसी के लिए विनाश का महापर्व। पारीछा खुर्द जसौरा-खड़ेसर के विनाश का महापर्व! जहाँ के निवासियों को अपनी भूमि से उखाड़ा जा रहा था। बेदखल किया जा रहा था खदेड़ा जा रहा था।
मुझे कोई एतराज़ नहीं होगा। सच पूछो तो मैं ख़ुद अब यही चाहने लगी थी कि इसे तुम्हारे पास ही भेज दूँ। बहुत रख लिया। अब कम से कम मैं अपनी ज़िंदगी जिऊँ- एक परत पर उभरा और उससे भी भीतर की परत पर उभरा- अच्छा है तुम्हारे और मीरा के बीच में भी दरार पड़े हर दिन एक परेशानी हर दिन एक तूफ़ान
रूपयों के आगे लोगों की चिंतन-शक्ति को भ्रमित और कुण्ठा-केन्द्रित कर देना। उन्हें नपुंसक बौद्धिक और सैद्धान्तिक बकवास के लिए प्रेरित करके उनकी बची-खुची स्नायविक शक्तियों को थकाना और तोड़ना क्या अच्छी बात है?
स्त्री तो धरती के समान है हमेशा देने के लिए तैयार है इसलिए निजी सुख और महत्त्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए पुरूष उस पर सम्पूर्ण अधिकार चाहता है। उसे अपना अंहकार प्यारा है इसलिए उसे दूसरे का खयाल नहीं रहता। उसे अपना सुख चाहिए तब वह नहीं देखता कि कहाँ क्या टूटा क्या विभाजित हुआ।
हमें लगता है कि जो सबसे ज्यादा पापी होता है वही घोर धर्मभीरू भी होता है। गरीबों का खून चूसनेवाले बड़े बड़े दान दिया करते हैं। धर्मशाला बनवाते हैं। अस्पताल में दान देते हैं, मन्दिर की स्थापना करते हैं। छल-कपट से रूपया न कमाते तो इस तरह के विशाल दान के योग्य हो पाते?
भैया तुम्हारी बात का निर्णय करना बड़ा कठिन है। इस समय जमाने का एक रंग नहीं है कहीं माँ-बाप नालायक हैं तो लड़के लायक हैं और कहीं-कहीं ये भी है कि लड़के और माता-पिता दोनों लायक हैं मगर आपस में मत मतान्तर है। अब आप ही बताइए पुत्ती गुरू के लड़के रमेश में आप कोई दोष निकाल सकते हैं?
इसका तो अर्थ यही हुआ कि कोई भी व्यक्ति स्वंय अपनी प्रतिभा और महानता को पहचान नहीं सकता जब तक कि कोई प्रभावशाली एवं शक्तिशाली व्यक्ति उसे नहीं बताता और उस पर अपना वरदहस्त नहीं रखता!
गाँव का जीता-जागता जीवन हमारे अपने हाथ में है। कच्ची मिट्टी की तरह मुलायम। इसे सँवारा जा सकता है। बार-बार गढ़ा जा सकता है। अनुपम रूप दिया जा सकता है। अपने अनुरूप दिया जा सकता है। अपने अनुरूप ढाला जा सकता है।
तुमसे कुछ नहीं होगा। मैं ही बंटी को अपने साथ लंबी ड्राइव पर ले जाऊँगा। बहुत प्यार से विश्वास में लेकर उससे पूछूँगा, उसकी मनःस्थिति जानने की कोशिश करूँगा क्यों वह यहाँ एडजस्ट नहीं कर पा रहा है क्या बताऊँ शकुन मुझे समय नहीं मिलता।
जीवन क्या है मास्टर साहब आपसे सत्त कहता हूँ ग्यानी महात्माओं की चरण रज लेके आ रहा हूँ झूठ नहीं बोलूँगा- मैं कहता हूँ हमसे-आपसे बढ़कर निष्काम कर्मी इन लाखों उपदेश देनेवाले ग्यानी महात्माओं में भी नहीं मिलेगा। हम ससरी बीबी-बच्चों के लिए दिन-रात हाय-हाय करते जीवन खपा देते हैं। साहेबों बड़े बाबुओं की जिस-तिस की ससरे चपरासियों तक की रौब-फटकार सुनके घर आओ तो घर सा घर नहीं लगता। फिर अपनी ज़िन्दगी ही क्या रह गई। जो कुछ रही इन बीबी-बच्चों की रही। हम जीते हैं। तो निष्काम जीते हैं।
हिन्दुस्तानी भाषाओं में पुरानापन, बड़बोलापन, कच्चापन, पाखंड और फालतू आदर्श बहुत हैं। आपसी झगड़े भी बहुत हैं। अंग्रेजी तो सभी मान लेंगे लेकिन हिन्दी या किसी और हिन्दुस्तानी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने पर झगड़़ने लगेंगे आपस में।
घबराते नहीं मन्दाकिनी! क्या नहीं हो पाएगा? सब कुछ होगा। जितना सम्भव होगा कोशिश करेंगे। तुम क्या सोच रही हो अस्तपाल चलने डॉक्टर आ जाने से मिट जाएँगे सारे दर्द? आदमी हो जाएगा निरोग? बिटिया रूग्ण तो आदमी की आत्मा भी है उसके निवारण की दवा कहाँ खोजोगी? रोगी हमारी व्यवस्था है उसे भी सँभालोगी? क्षयग्रस्त हमारा समाज है सुधारने का यत्न करोगी?
वह जानती थी कि ये कोने जब होते हैं तो कितने पैने होते हैं। कैसे इनसे सबकुछ कटता चलता है विश्वास सद्भावना अपनत्व! सारी की सारी ज़िंदगी बँट जाती है खंडो में, टुकड़ों में कि इसके बाद एक पूरी ज़िंदगी जीना नहीं वह अब और उस सबसे गुजरना भी नहीं चाहती। बड़ी से बड़ी कीमत भी चुकानी होगी तो चुका देगी।
मेरी भगती कच्ची नहीं है बाबूजी। माया-मोह साले को छोड़ते कितनी देर लगती है मुझे। इस्तरी-बच्चों में धरा क्या है? सब अपने-अपने स्वारथ के कारन हमें घेरते हैं। अरे हम घिर जायँ तो मूरख नहीं तो सन्त। इस्तरी-बच्चों से मुक्ती पाने का नाम ही मोच्छ है। देखौ आज हमारे लच्छू ने रेस्टोरां खोला हम गये। पर उसके ठाठ देखके हमारे मन में माया-मोह न उपजा। मिठाई खाई और संत-सम्मेलन में आ गये। यही तो मोच्छ है।
बीमारी से शरीर कलुषित और अपवित्र हो जाता है और गलत विचार से मन। बीमारी दूर होने से जैसे शरीर स्वच्छ और पवित्र हो जाता है उसी तरह सुन्दर विचार से मन और आत्मा। शरीर और मन के स्वास्थ्य और नए सुन्दर संकल्प से हर आदमी नया जन्म ग्रहण कर सकता है। यह नया संकल्प है अपने में पूरा विश्वास रखने का, खूबसूरत उम्मीदों को अपने अन्दर जीवित रखने का, दूसरों के सुख-दुख से अपने को जोड़ने का। यह आसान नहीं है मगर मुमकिन है। नाउम्मीदी की बीती बातों को जितनी बार याद करता है मनुष्य उतनी ही बार मरता है और मरता जाता है।
मानस-जनम बार बार नहीं मिलता। देवयोनि से बड़़ी है मनुष्य-योनि। प्रभामंडल के बीच सत्पुरूष बने रहना सरल है। सांसारिक पाप-पुण्य सत्-असत् ज्योति और अन्धकार से गुजरकर परमारथ करना कठिन तप है।
अहं और गुस्से से भरे-भरे शकुन की लाई हुई चीजों को बिना देखे, बिना छुए एक ओर सरका देने उमड़ते आँसूओं को भीतर ही भीतर रोककर सूखी आँखों से मोटर में बैठकर विदा हो जाने की व्यथा बंटी से कहीं ज़्यादा शकुन की अपनी व्यथा है और ऐसी व्यथा जिसे कोई भी बाँट नहीं सकता।
औरत के साथ अस्मत का जो हौआ बँधा है उसे माफ़ कीजियेगा मैं नहीं मानती। बॉयोलॉजिकल अर्जेज़ (कायिक आवश्यकताएँ) अपनी जगह पर और ज़िन्दगी का सवाल अपनी जगह पर। मैं एक के हाथ अस्मत बेचकर अपनी आजा़द ज़िन्दगी खराब नहीं करना चाहती हूँ।
सौ बातों की एक बात अब पिरधानी भी ससुर व्यापार हो गई है जो ज्यादा-से-ज्यादा खरच सके सो बन जाओ पिरधान और फिर काट लो उसका चौगुना कि दस गुना पइसा। जे कहो बऊ कि बुद्वि-चतुरई के जमाने गए। अब तो कलदार कर रहा है राज। भरी जेब की महिमा है चारों तरफन।
शकुन को लग रहा है उसके मन में इस समय कुछ नहीं है । न गिल्ट न जस्टिफ़िकेशन। कुछ है तो सिर्फ दुख कि बंटी चला गया कि बंटी एक दिन भी वहाँ खुश नहीं रहेगा। न उस घर में न हॉस्टल में। बिना शकुन के वह कहीं खुश रह ही नहीं सकता। और इन दिनों तो शकुन के साथ भी।
अब वह सोचते कि उन पर नहीं बल्कि बलिया और भारत की असंख्य जनता की स्वातन्त्र्य भावना नैतिक एवं प्रतिरोध शक्ति पर प्रहार किया जा रहा है और देश के गरीब, सरल, सच्चे, अन्याय-त्रस्त लोगों के कष्टों के मुकाबले तो उनका कष्ट कुछ भी नहीं बल्कि उनको बचाने के लिए उनकी मुक्ति के लिए ही वह सबकुछ बरदाश्त कर रहे हैं।
किसी से कुछ नहीं पूछना है पार्टनर! मैंने फैसला कर लिया है कि मुझे क्या करना है। अपनी ज़रूरत से कहीं ज़्यादा पैसा कमाकर मैंने देख लिया। इस तरह तुम जितना कमाते हो, उससे कहीं बहुत ज़्यादा गँवा देते हो। अब मैं एक सार्थक जीवन जीकर देखना चाहता हूँ। उसी की कोशिश करूँगा।
तुम निजी इच्छाओं की पूर्ति और उससे प्राप्त क्षणिक सन्तोष तृप्ति को राष्ट्र, समाज और मनावता की सेवा से क्यों जोड़ते हो, एक में निजी प्रतिशोध का सुख है और दूसरे में मानव अस्तित्व की गरिमा का आनन्द। करोड़ों आम लोगों से जुड़ने की दिव्य अनुभूति! यह सही है कि तुम्हारे साथ बड़ा घृणित व्यवहार किया गया है लेकिन यह समझ लो कि यह सुलूक इसलिए नहीं हुआ कि तुम ऊँचे कुल में पैदा हुए हो, तुम ब्राह्मण हो उसका स्पष्ट कारण यह है कि तुम अपने देश की आजादी, देश के लोगों का कल्याण चाहते हो!
कि मिठू हमारे सगे भाई ने हमें बेईमान सिद्व कर दिया। छली कपटी और ढोंगी बनाकर छोड़ा। गाँव में ही नहीं असपेर भर में। एरच से कालपी तक। श्यामली से झांसी तक। नहीं-नहीं मिठू दसों दिशाओं में आकाश से पाताल तक रूखे पेड़ों और नदी सागर तक पहाड़-पर्वत तक हमें तो लगता है कि धरती के हर कोने में पिट रही है हमारी बेईमानी की डुगडुगी कि पंचमसिंह आदमी इंसान नहीं डकैत है ठग है चोर-भड़िया है।
और इसके साथ ही बहुत सारा शोर तरह-तरह का। और एकाएक ही सारे शोर के ऊपर उभरता है- बंटी मत जा बेटे मैं तेरे बिना नहीं रह सकूँगी। दौड़ती-दौड़ती ममी चली आ रही हैं बदहवास लाल आँखें। पर ममी जैसे उस तक पहुँच नहीं पा रही हैं सिर्फ़ उनकी आवाज़ उसके इर्द-गिर्द घूम रही है।
प्रेम के माने है विवाह और विवाह के माने है कि अब चाहत और प्रेम का एक ऐसा धरातल इन्सान को मिल गया जहाँ से जीवन की दूसरी समस्याओं को समझने और सुलझाने के लिए दिल दिमाग की शक्तियाँ एकजुट होकर आगे बढ़ने के लिए स्वतन्त्र होती है।
यदि अहिंसा के तरीके से आजादी मिल भी जाती है तो ये मानव जाति के अपराधी क्षमा प्राप्त करके जीवित रहेंगे और समय बदलने पर स्वंय चोला बदलकर ईमानदार देशभक्तों और वफादारों से अधिक देशभक्त और वफादार बनकर देश और समाज को नए ढंग से दूषित और विकृत करेंगे!
भले भूखे प्यासे सही पर अपने घोंसले में बसने का आत्मविश्वास बड़ा मजबूत होता है। पाँवों के नीचे की धरती का आधार सच और ठोस लगता है।...... बऊ हमने एक किताब में पढ़ा जब तक मनुष्य आत्मरत रहता है अपने दुखों से नहीं उबर पाता। समष्टिगत प्रेम मानव को दुखों के गर्त से बाहर खींचता है।
ठीक है बेटे तू वहीं चला जा । तेरे पापा तुझे लेने आ रहे हैं। अब मैं भी नहीं रोकूँगी। जब तू ही खुश नहीं तो आख़िर अपने पापा से कम ज़िद्दी तो तू भी नहीं।.......बाँहों में भिंचे-भिंचे सीने से चिपके-चिपके बंटी के मन में बहुत दिनों का जमा हुआ कुछ पिघलने लगा। अनायास ही आँखों में आँसू आ गए। उन्हें भीतर ही भीतर पीता हुआ वह गोद से नीचे उतर आया।.......पापा ने कसकर उसे सीने से चिपका लिया रो मत बेटे बंटी रो मत और उनकी अपनी आवाज़ भी भीग गई।........जाने कहाँ से देखती हुई ममी की आँखें बिलकुल सूख गईं। बिना आँसू की भीगी-भीगी आँखे। सफ़ेद चेहरा। अब पता लगेगा ममी को।
मगर उम्र और अरमान शक्तिशाली गुण्डे की तरह बरबस अपनी ओर घसीट ले जाया करते थे। दिन के सूनेपन में खुदा और रातों की सूनी सेज मे सनम का ध्यान चुम्बक के दो सिरों की तरह अपनी-अपनी जगहों पर अटल मौजूद रहते थे। खुदा तो सनम को न पछाड़ पाया मगर सनम खुदा को अक्सर पछाड़-पछाड़ देता है।........यानी कि रूह कहती है कि मैं सात सौ सत्तर काया पलट के इस बदन में आई हूँ। मैं सब्जे यानी घास की तरह से सैकड़ों बार उगी हूँ मिटी हूँ।
मेरा सिर्फ आइडिया होता था, दिमाग होता था, योजना होती थी, स्वप्न होता था, परिकल्पना होती थी, पूर्वानुमान होता था, आकलन होता था, हंच होता था, बाकी सब कदरोलकर का होता था। सारा ले आउट, सारा सम्पर्क, सारा कैलेण्डरप्लान, सारी दौड़ भाग, कंसल्ट्रंस या पैटीजॉबर्स के चुनाव से लगाकर फीसवसूली तक।
थाने में मोचनी थी इसका अर्थ यह हुआ कि पहले भी ऐसा कुकृत्य किया जा चुका है यदि नहीं किया गया तो आगे ऐसा इरादा होगा जो अब चरितार्थ होने जा रहा था। साम्राज्यवादी शासन के दौरान भीषण दमन एवं उत्पीड़न के अनेक अकल्पनीय वीभत्स मौलिक तरीके ईजाद किए गए जिनका पता क्रान्तिकारियों का इतिहास पढ़ने से होता है। इसलिए कैसे उनका रस्सा खोलकर जमीन पर पटका गया कैसे चार व्यक्तियों ने उनका एक-एक हाथ एक-एक पैर दबाए रखा और पाँचवें ने कैसे मोचनी से मूँछ का एक-एक बाल उखाड़ा-फिर उसके बाद कैसे गरीब राहगीरों को बुलाकर उनका पेशाब एक हँडिया में एकत्रित करके ढरके की मदद से उसे जबरदस्ती पिलाया गया इसका विस्तार से वर्णन करना जरूरी नहीं है।
तुम अपने हिस्से की लड़ाई दूसरों से लड़वा रही थी उसी की कीमत चुकानी पड़ी है। आपदाएँ ढकेल देने से खतम नहीं हो जातीं कुछ देर को ओझल होती हैं बस और फिर दूनी भयानकता से।
जब तक डॉक्टर साहब घर में रहते हैं ममी कहीं भी रहें कुछ भी करें उनकी आँखे बंटी के आगे-पीछे ही घूमती रहती हैं उसे ही देखती रहती हैं। वह पढ़ता है तब भी वह खाता है तब भी सोता है तब भी-सर्तक चौकन्नी और घूरती हुई आँखे।
एक बार जब मैं आजमगढ़ में था तो कुछ लोग मुझसे मस्जिद बनवाने के लिए चन्दा माँगने आए। मैंने कह दिया कि जनाब नमाज़ घर में पढ़िए। ये मस्जिदें मन्दिर और गिरजे वगैरह पब्लिक प्लेसेज (जन स्थलों) आज के जमाने में नहीं बनवाने चाहिए। पुराने जमाने की बात और थी। आज के जमाने में तो इस जगहों मे खुदा के बजाय शैतान रहता है।
कितना बड़ा पत्थर छाती पर रखकर किया मैंने- स्निग्धा क्या, कोई नहीं समझेगा। मर्द रोते नहीं, खासकर औरतों के सामने, तो क्या यह मान लिया जाता है कि उन्हें कोई दुख व्यापता ही नहीं? क्या उनके कलेजे पत्थर के बने होते हैं? वे तुम्हारा हौसला टूटने से बचाये रखने के लिए ख़ामोश रहते हैं, इधर-उधर की मसरूफियात में दिल को भुलाए रखने की कोशिश करते हैं। बहादुरी से ज़िन्दगी के प्रवाह मे पाँव जमाये खड़े रहते है, परिवार को, आश्रितों को भी खड़ा रखने की कोशिश करते हैं और एक दिन उन्हें मैसिव हार्ट अटैक होता है या दिमाग की नस फट जाती है या और कुछ हो जाता है, और मर जाते हैं।
अहिंसा का यह तो मतलब नहीं कि हम विरोधी के छल-कपट को न समझें। उनके झूठ पर एतबार कर लें और सन्तुष्ट होकर बैठ जाएँ ....... उम्मीद का छिछोरापन मशहूर है उस घास की तरह जिसे भले ही काट दिया जाए लेकिन जल्दी ही वह फिर उसी तरह उग आती है।
बेटा चोरी का दुख डकैती से अधिक होता है। छल और बल का फरक रहता है दोनों में। सीना और पीठ का अन्तर। माँगा होता कि छीना होता गोविन्दसिंह ने तो इतेक टीस न होती। लड़ने-बचने का मौका भी मिलता।
ऐसा ही होता है बहूजी ऐसा ही होता है अपने बोए-सींचे पौधों से ऐसा ही मोह होता है बिलकुल संतान-जैसा। जहाँ एक बार लगाओं वहाँ से उखाड़ा नहीं जाता। और फिर थरथराते गले से बोला तुम एक बार आकर देख जाना बंटी भैया। तुम्हारे बगीचे को तो मैं जान से भी ज़्यादा रखता हूँ।
स्वभाव से मुसलमान ’बुली’ (भभकियाँ देनेवाला) और हिन्दु कावर्ड (कायर) हैं। मैं मानता हूँ मुसलमानों ने अपने आक्रमणकारी ऐतिहासिक दौर में हिन्दुओं को बड़ी बुरी तरह से कुचला है। निरीह प्रजा का खूब मान-मर्दन भी उन्होनें किया था। हिन्दुओं में एक निष्ठामूलक समाज चारों वर्णो से ऐसा भी निकला जिसने अत्याचार का सामना करने के बाद भी अपनी धार्मिक-सांस्कृतिक आन बनाए रक्खी।......देवी और हनुमान के सम्बन्ध में किसी कारण मुसलमानों में यह धारणा बँध गयी कि वे बड़ी जागृत शक्तियाँ हैं। चेचक के लिए खासतौर पर हिन्दुओं की शीतलामाता मुसलमानों की पूज्या हुईं। आँख दुखने पर मुसलमान लोग बोतलों में कालीजी का नीर भी ले जाते थे।
बदकिस्मती से तुम्हारे साथ भी उसका जैसा कम्युनिकेशन और शेयरिंग होनी चाहिए, वो भी नहीं। दूसरा कोई बच्चा भी नहीं। दूसरा कोई बच्चा हो तो माँ उसकी तरफ देखकर ही तसल्ली कर ले। अनफॅारचुनेटली इस केस में तो ये भी है कि स्निग्धा का कोई भाई-बहन भी नहीं। वही होते, चार रोज़ साथ रहते, उनके बच्चों के बीच कुछ जी बहलता, तो बात बिल्कुल दूसरी होती।
समाज के अछूत दबाए हुए गरीब लोगों के पैरों के नीचे तो कोई जमीन ही नहीं है जिस पर खड़े होकर शरीर मन और दिमाग को सहारा मिल सके। यह सिर्फ आर्थिक समस्या नहीं है। सदियों से कुछ नहीं हुआ है। मैं देश की आजादी का विरोधी नहीं हूँ मैं आजादी चाहता हूँ। लेकिन कांग्रेस यदि आजादी ले लेती तो क्या यह समाज बदल जाएगा।
लो जानेंगे नहीं? हम चले गए तो क्या अनपहचान हो गए? अपनी मट्टी की माया अलग होती है बेटा! मुख न दिखे तो भी क्या गन्ध-चिन्हार से सूँघ लेता है आदमी। बोली-बानी से तुरत चीन्ह लेता है…… उपेक्षित पड़े घर को उन्होंने ऐसा देखा जैसे बहुत दिनों से बिछुड़ा बालक गन्दा और मैला हुआ सहमा-सिकुड़ा सा खड़ा है। सुस्त और नाराज। अपनी माता से रूठा हुआ……. हम तो छाती से लगाकर रखते थे कि अपनी बाखर को। अरे इसी के मोह से मुक्त नहीं हो पाएं कितनी रातों जगे हैं। इस आँगन के विछोह में। लगता था पलकों में पराए आसमान की तरइयाँ करकराती है पिराती हैं आँखें।
मक्खन लगाते-लगाते चाय के घूँटे लेती ममी के भी मिनट-मिनट में कपड़े उतर जाते हैं। एक बड़ा भारी सा रहस्य था जो उसे एकाएक ही पता लग गया है जैसे। पहले बड़ा डर लगा था फिर अजीब-सी घिन छूटी और अब गुस्से और घिन के साथ-साथ इच्छा हो रही है कि बार-बार उसी दृश्य को देखे।
ये सब हिन्दू मुसलमान ईसाईपन की जाति-महत्ता की बातों में विश्वास करनेवाले लोग ऐसे मालूम होते हैं जैसे जवानी में बचपन के कपड़े घसीट-घसीटकर पहने खड़े हों।….. काश कि एक दयानन्द मुसलमानों में भी पैदा हो जाता और तमाम मुल्ला-मौलवियों को जूते मार मारकर मिल्लते-मोमिनीन से निकाल बाहर करता।…… एक अकेला निहत्था मुसलमान लगभग आध घण्टे तक हिन्दुओं को उन्हीं के महल्ले में खड़ा होकर कहनी सुनाता रहा तब सब चुप रहे और अब उसके जाने के बाद मुसलमानों की निन्दा इस जोर-शोर से कह रहे हैं कि जैसे अपनी शेखियाँ बघार रहे हों!
1990 से 1999 तक भारत में सिर्फ अट्टाइस अरब डॅालर की विदेशी पूँजी आयी थी जिसका वार्षिक औसत मात्र तीन अरब डॅालर, बल्कि उससे भी कम बैठता था, जबकि इसकी तुलना में चीन में हर साल चालीस अरब डॅालर की विदेशी पूँजी जा रही थी। जबकि चीन ने विदेशी कम्पनियों को छूटें और रियायतें भी हमारी तुलना में तो कम ही दी थीं ।
हर तरह के काम-धाम से मतलब है मेरा। कोई भी उद्यम एक अच्छा सामाजिक बौद्धिक और नैतिक कार्य है जिससे ऊर्जा प्रकट होती है और जीवन को सार्थकता मिलती है। उद्यम में लगा व्यक्ति एक अच्छा संघटनकर्ता होता है। वह आवेश से दूर रहता है इसलिए बारीक-से-बारीक बात को देख सकता है और जटिल-से-जटिल बात को सरल और व्यावहारिक बना सकता है।
कभी अकेले में डर लगे तो जोर-जोर से बोलकर ही कैसी राहत मिलती है। अपनी आवाज़ ही कैसा सहारा देती है।.....बत्ती बंद करते ही कमरे का सारा अँधेरा बंटी के मन में भर गया भर ही नहीं गया जैसे जम गया है। मन में आकर अँधेरा जम जाए तो कैसा लगता है कोई जान सकता है?
मेरे ख्याल में सड़क न यहाँ बनेगी न वहाँ- शायद कहीं और बन जायेगी। तुम क्या समझते हो राजनीति आज सड़कें बनाने में विश्वास रखती है? इस समय तो राजनीति बनी सड़कें नष्ट करने और काल्पनिक सड़कों की योजनाएँ पेश करने में भरोसा रखकर चल रही है। आज राहें धुँधली होती जा रही हैं।
उस रात पहली बार- बरसों बाद पहली बार- मुझे एक नागरिक के रूप में अपनी असहायता का और अपनी कमायी तमाम दौलत की निरर्थकता का तीख़ा बोध हुआ।.......पापा कभी नहीं समझ पाएँगे कि हमारी दुनिया एक विशाल दैत्याकार धमन भट्ठी बन चुकी है और हम तीनों अपने जैसे हजा़रों-लाखों की तरह उसमें ईंधन की तरह झोंक दिये गये हैं। बेटू छोटा था, भस्म हो गया। हमारे पूरी तरह भस्म होने में अभी कुछ और समय लगेगा।
न कहीं जुलूस न कहीं आन्दोलन एक बाजार पर बिना किसी चेतावनी के तड़ातड़ गोलियाँ। कोई चावल के ढेर पर मरा है कोई ढेरों के बीच के रास्ते में। कोई सड़क के बीच में पड़ा है कोई नाली के किनारे। बाजार तो बन्द है दुकानदार भाग गए हैं समान जहाँ-के-तहाँ पड़े हैं। समस्या है लाशों की उनके रिश्तेदारों को बुलाकर अत्येष्टि कराने की। घायलों का उपचार जरूरी है।
बिटिया जहाँ पारीछा बिजली-टेसन बन गया है पहले वहाँ क्या था? गाँव जंगल और नद्दी। अब देखो कि गाँव-गाँव लट्टू झिलकते हैं। तेरौ कौल बऊ रात के समय भी दिन जैसा परकास! सूरज नारायन की धूप की सी रोसनी।
नहीं हमें पाप में मत डालो बहूजी कसम दिलाकर हम कुछ नहीं लेंगे। भगवान के दरबार में जा रहे हैं। रूपया-पइसा का होगा क्या? देना ही है तो एक वचन दे दो कि हमारे बंटी भय्या को जैसा आपने बिसरा दिया है आजकल वैसा और मत करना। बाप के रहते यह बिना बाप का हो रहा अब माँ के रहते यह बिना माँ का न हो जाए। और फूफी ने साड़ी में मुँह छिपा लिया।
हिन्दुस्तान इहलोक से अधिक परलोक में रहता है यथार्थ सत्य को अस्वीकार कर कल्पित सत्य को भजता है और सच पूछो तो वह ईश्वर को भी नहीं भजता। आस्तिक भारत से कई लाख गुना अधिक यह नास्तिक रूप ही ईश्वर का सच्चा पुजारी है।
मेरा ध्यान पैसा कमाने और वस्तुएँ जुटाने में लगा रहा। मैं उपलब्धियों की मीनार पर खड़ा संभावनाओं के उस पहाड़ पर निगाहें जमाये रहा जो था तो न जाने कितनी दूर, लेकिन सामने नज़र आ रहा था और जिस पर मुझे फतेह हासिल करनी थी।
यहाँ या मैके में अनेक स्त्रियाँ मिलने आती हैं ऊपर से मैं प्रेम और उत्साह से बोलती हूँ अन्दर से जलन-कुढ़न से बेचैन रहती हूँ। उनकी छोटी-छोटी खुशी उनकी हँसी उनकी तन्दुरुस्ती उनकी सरलता उनकी सुन्दरता कुछ भी तो मुझे सहन नहीं होती। बनावटी आत्मीयता से आरम्भ करके जल्दी ही मैं गम्भीर हो जाती हूँ और कोई-न-कोई बहाना करके वहाँ से उठकर चली जाती हूँ।
ज्यादा याद नहीं करते किसी को। उसका मन बेचैन हो जाता है पराई देहती पर इस तरह नहीं जाते। दरोगिन आदर-मान देने से तो रहीं। मकरन्द को दुख दोगी तुम?...... मान रखना सीखो मन्दा। हमारे पास मान ही तो एक पूँजी है। वही हमारा बल है बिटिया।
जवानी यों ही अंधी होती है बहूजी फिर बुढा़पे में उठी हुई जवानी। महासत्यानाशी। साहब ने जो किया तो आपकी मट्टी-पलीद हुई और अब आप जो कर रहीं हैं इस बच्चे की मट्टी-पलीद होगी। चेहरा देखा है बच्चे का? कैसा निकल आया है जैसे रात-दिन घुलता रहता हो भीतर ही भीतर।
एक बड़े सूर्यग्रहण के मौके पर सुप्रसिद्ध दार्शनिक आलडुअस हक्सले काशी में मौजूद थे। उसने देखा कि लाखों लोग गंगाजी में खड़े-खड़े नहा धो रहे थे जप कर रहे थे। खासी सर्दी का दिन था वह। हक्सले ने लोगों से पूछा लोगों ने उन्हें बतलाया कि भगवान् सूर्यनारायण को छूने के लिए म्लेच्छ राहु-केतु दौड़ रहे हैं और भगवान् को इन म्लेच्छों से मोक्ष दिलाने के लिए ये हिन्दू भक्त तपस्या कर रहे हैं। हक्सले ने इस प्रसंग को अपनी किताब में लिखते हुए यह प्रश्न उठाया कि जो लाखों लोग आसमानी सूर्य भगवान् की मुक्ति के लिए इतनी कठोर तपस्या कर सकते हैं वे स्वयम् अपने-आपको ब्रिटिश दासता से मुक्त क्यों नहीं करा पाते?
पर यह सच है कि अब हमारे घर में सबकुछ था। बस पति नहीं था। पति की कमाई थी, पति की कमाई से आयी हुई वस्तुएँ थीं और पति का प्रतिरूप बच्चा था। लेकिन प्रतिरूप या विलोम? पूरक या प्रतिद्धंद्धी ? उत्तर या प्रश्न ? परिणाम या पहेली ?
उसे आज प्रथम बार महसूस हुआ कि उम्र में छोटा होने पर भी वीरेश बड़ा हो गया है और वह भी स्वाभिमान समानता तथा जीवन में कुछ सार्थक करने की बढ़ती हुई इच्छा के साथ। और अब समय गया जब बड़े भाई के नाते वह आश्वस्त और आत्मतुष्ट तानाशाह की लापरवाही के साथ वीरेश को कोई आदेश दे देता या डाँट-फटकार देता था। वह सोचकर दुखी हो गया कि कितना निर्मम है अपने से छोटे निर्बल और आज्ञाकारी से सद्भावना-रहित अलोकतान्त्रिक व्यवहार करना।
कुछ भी नहीं बस ऐसे ही रोने को मन हो रहा है। होता है न कुसुमा भाभी कभी-कभी ऐसे ही रो लेने का मन हो आता है।.....बिन्नू हमें न भरमाओं। मन्दा सब जानते हैं हम। दुख जब लबालब भर जाता है तो छलकता है बिटिया ऐसे ही नहीं आता रोना। यादों की आँच से भीतर भरी टीसें हो जाती है पानी-पानी।
सारा रास्ता अकेले-अकेले चलकर सारी परेशानियों से अकेले-अकेले लड़कर भी ऐसा आत्मविश्वास और ऐसी शक्ति तो उसने अपने भीतर कभी महसूस ही नहीं की जो आज अपने को पूरी तरह डॉक्टर के हवाले करके वह महसूस कर रही है।
कोमल होता है, स्त्री माँ होती है और मैं समझती हूँ ईश्वर भी ऐसा ही होता है। मैं-मैं ईश्वर के बारे में कुच्छ नई जानती कुच्छ बी नई जानती। वो मुझे कहीं प्यारा लगता है बस।
मुझे ऐसा लगता है थोड़े-से बचकाने काम करके तुम अपने को देश का बड़ा नेता समझ रहे हो! लेकिन यहाँ आकर मैंने तुम्हारी असलियत देख ली है। घर में लोग जब इतना कष्ट भुगत रहे थे सुरेश दिन-रात उधार-सामान लाने के लिए दुकानों के चक्कर लगा रहा था तुम अपने घमंड में चूर निष्क्रिय बने रहे। देश के लिए काम तो ठीक है मगर क्या घर-परिवार के कष्टों से उदासीन हुआ जा सकता है।
वे भगवान को नहीं डराती। सोचती हैं कि जग जीत लिया। अब तुमसे क्या कहें कक्को हमें मिली थी सो कहती थी जे मोंडी तनक उमर में बीस घटिया नाँखी है गाँव-गाँव रही बसी है भला बची होगी अच्छत कुँआरी। हमें तो बता गए हैं। गिरगवाँ के कैलास मास्टर कि सती सावितरी नहीं है वा सोनपुरा की मोंडी़। दरोगिन अपने लरका को अलग कर लो वा से। सो बैन हम तो ले जाकें रहेंगे अपने मकरन्द को।
तुम जानती हो अजय बहुत इगोइस्ट भी है और बहुत पजे़सिव भी। अपने-आपको पूरी तरह समाप्त करके ही तुम उसे पा सको तो पा सको अपने को बचाए रखकर तो उसे खोना ही पड़ेगा।
जो प्रेमी नहीं वे अपने स्वार्थ को छोड़कर और कुछ नहीं जानते। वे अपने ही अर्थ-साधन में लीन रहते हैं परन्तु जो प्रेमी हैं वे परहित साधन में अपनी हड्डियाँ तक अर्पित करने को तत्पर रहते हैं।
माँ बनने को औरत की सबसे बड़ी ख्वाहिश बताना और मातृत्व को खामखां गौरवमंडित करना एक बहुत बड़ा छल है जो सदियों से स्त्रियों के साथ किया जा रहा है। सच बात तो यह है कि गर्भधारण और मातृत्व स्त्री के पैरों की बेड़ी और उसके व्यक्तित्व का लगभग विसर्जन है- दुर्भाग्य से जिसका न कोई विकल्प है न उचित क़दर ।
एक मामूली आदमी नहीं जानता कि वह कभी कोई क्रान्तिकारी कार्य कर सकता है। वह अपने काम धन्धे ईर्ष्या-द्वेष सुख-दुख छोटी-छोटी चालाकियों में लिप्त रहकर फूँक-फूँककर आत्मरक्षात्मक कदम आगे बढ़ाता है तब आश्चर्य होता है कि कैसे यही लोग किसी संकटकालीन ऐतिहासिक मौके पर उठ खड़े होते हैं आगे मिलजुलकर जोर-जुल्म अन्याय गुलामी का विरोध करने के लिए घरों से बाहर निकल आते हैं।
ना! ऐसा गजब न करना मन्दा। विदा की घड़ी ही याद रह जाती है। अपना कोई जहाँ तक दीखे वहाँ तक निहारते हैं बिटिया! अब के बिछुड़े जल्दी ही मिलावें मोरे ठाकुर जू। हमसे पूछ मन्दा अपने बालक का दुख कितेक भारी होता है।
बंटी को दरार ही बनना है तो मीरा और अजय के बीच में बने। अजय भी तो जाने कि बच्चे को लेकर किस तरह की यातना से गुज़रना होता है कि पुरानी स्लेट इतनी जल्दी और इतनी आसानी से साफ़ नहीं होती
ये प्रेम का नाता बड़ा अजब है। अपनी भौतिक मर्यादाओं भावनाओं तक ऊँचा उठना तो मेरी समझ में आता है। मगर जहाँ ये समस्त भावनाएँ एकमेव प्रेमभाव के रूप मे ही प्रकट हों, विकसित हों, जूझें और अपनी जूझ में हर बार छलाँग मारकर नयी दहाइयों तक अदम्य अबाध रूप से बिजली सी कौंधती हुई दौड़कर बढ़ती हों वहाँ उनकी शक्ति क्या कहूँ कुछ अजब अलौकिक हो जाती है।
मुंबई को कोई भी पहन सकता है। उसका कोई नाप नहीं है। वह सबको आ जाता है। सिर्फ उसके अनुरूप अपने शरीर और आत्मा को थोड़ा फैलाना-सिकोड़ना पड़ता है। मैं ऐसा करने में कामयाब हो गया था।
तुमने कहा था कि मुझे गहना साड़ी कुछ भी नहीं चाहिए। और यह भी कि मैं ही तुम्हारा गहना और साड़ी हूँ। मुझे ऐसी बातों से सख्त चिढ़ है। वे औरतें मुझे पसन्द हैं जो हबककर खाती हैं। बढ़िया से बढ़िया पहनती हैं। किसी का अन्याय बरदाशत नहीं करती हैं। अपने हक के लिए लड़ती हैं। मैं वह मर्द नहीं हूँ जो औरत जलील करते हैं। मैं तुम्हारे पास हूँ तो अपने हक के लिए लड़ती हैं। मैं वह मर्द नहीं हूँ तो तुम्हें मुझसे खूब साड़ी-गहना लेना चाहिए।
बऊ तुम्हारे पास कितने औजार है? स्वंय को ही चीरने को तर्क-वितर्क दया क्षमा की धारदार आरी लिये फिरती हो और समय असमय चलाने लगती हो अपनी ही छाती पर। बेहिचक अपने ही खंड-खंड करती रहती हो बऊ
लेकिन न जाने क्यों ऐसे मौकों पर बरबस याद आनेवाला ईश्वर मुझे एक बड़ा भारी भ्रमजाल लगता है। धारोंधार डुबता हुआ हर तरह से असहाय मनुष्य चाहे वह आजीवन अनीश्वरवादी ही क्यों न रहा हो कहते हैं कि जान बचाने की लालच में ईश्वर को अवश्य याद करता है। परन्तु आस्तिकों की इसी बात को हम अपने ढंग से क्यों न कहें कि असहाय डूबते मनुष्य की जूझती जीवनेच्छा उस नये चेतनास्तर को पाने के लिए प्रेरित होती है जिसके ज्ञान-प्रकाश में वह अपनी जान बचाने की सूझ भरी राह पा ले।
धीरे-धीरे स्निग्धा भी समझ गयी कि पति गपशप करने की या दिल की बात बताने-पूछने की या साथ हँसने-रोने की, घूमने-फिरने की, सोने-सपने देखने की, सोचने-योजना बनाने की या अपना सबकुछ बाँटने की चीज़ नहीं होती। ऐसे उसके शहर के पति होते होंगे। यह महानगर का पति है।
अच्छा मर्द वह है जो औरत के अंकुश को पहचानकर अपने को सुधारता है गलत रास्ते पर आगे बढ़ने से अपने को रोकता है। भले ही आगे चलकर वह मर्द उस औरत को मन में पसन्द करता रहे अगर वह औरत से बदसलूकी नहीं करता तो वह चाहता रहे इसमें किसी का नुकसान थोड़े ही है।
विश्वास न करने से बदल तो नहीं जाएग कुछ। असल बात तो असल ही रहेगी। झुठलाने से क्या होगा। परदा डालने से अपनी आँखें ही तो छिपाई जा सकती हैं जो घटित हो रहा है उसे तिरोहित कैसे किया जा सकता है।
आज मैनेजर को आपत्ति हुई तो तुमने नौकरी छोड़ दी। कल शहर को आपत्ति होगी तो तुम शहर छोड़ने को कहोगी। और ज़रूर होगी। छोटी जगह है ऐसी बातें लोग आसानी से पचा नहीं पाते हैं। पर इस तरह कमजोर होने से कहीं काम चलता है चल सकता है? और पूछो तो आपत्ति बाहर नहीं होती है कहीं मन के भीतर ही होती है। तभी तो हमें ये छोटी-छोटी बातें परेशान कर देती हैं। वरना इन आपत्तियों पर एक मिनट भी जाया करना मैं उचित नहीं समझता। इन लोगों को क्या हक है तुम्हारे व्यक्तिगत जीवन में हस्तक्षेप करने का?
युसुफ का माशूक खुदा नहीं हो सकता लेकिन मेरा हिदायत ईश्वर का मजनू है। काल-प्रभाव से अब उसके जैसी आस्थावाले छीजते चले जा रहे हैं। अगली दुनिया में शायद इस रंग के लोग न होंगे।
न्यायाधीश विस्थापन की यातना को नज़रअन्दाज़ कर राक्षसी बाँधो के निर्माण के पक्ष में फैसले सुना रहे थे और देश का सबसे बढ़िया युवा दिमाग़ सिलिकॉन वैली में अपनी जवानी का क़ीमा बना रहा था।
क्योंकि उसके पास इसका कोई जवाब नहीं था और तब उसके दिमाग में पहली बार यह सवाल उठा कि एक औरत क्या अपना शरीर किसी ताकतवर मर्द को सौंपकर ही अपने को बचा सकती है? लेकिन कब तक? औरत क्या सिर्फ शरीर है वह अपने बूते पर अपने शरीर और मन की रक्षा नहीं कर सकती?
जा विकरम की बहू को यह बात कौन याद दिवाए कि तुम्हारे बाप जू हमारी हैसियत के मुकाबले क्या थे? कोरे फाटकदार। हती कोई बराबरी? फिर भी विकरम के दादा जू ने बचन दिया था सो मोहरें-अशरफियन की थैली लिये लोग लौटा दिए। और ऐसे ही सिकिल-सूरत में विकरम के मुकाबले पासंग नही हैं मकरन्द की मताई।
प्रमीला के साथ का जीवन- वह जैसा भी था अच्छा या बुरा मेरा इतना निजी है कि मैं उसे किसी के साथ शेयर नहीं कर सकता। तुम ग़लत मत समझना और बुरा भी मत मानना। वह एक अध्याय था जो उसी के साथ समाप्त हो गया और अब मैं उसे किसी के साथ खोलना नहीं चाहता। चाहूँ तो भी खोल नहीं सकता। शायद अब तो अपने सामने भी नहीं।
तुम फाहशा किसको कहोगे खत्रा? हमारे हिन्दुस्तान को छोड़कर अब हर सभ्य देश में कवाँरे युवक-युवतियों का मुक्त प्रेम समाज द्वारा स्वीकार किया जाने लगा है बहुत सी लड़कियों के जीवन में एक से अधिक प्रेमी आ जाते हैं। लेकिन यहाँ उन्हें कोई फाहशा नहीं कहता जब तक कि वे अति की सीमा को पार न कर जायँ। यहाँ बहुत से ऐसे जोड़े रहते हैं जिनकी आपस में किसी प्रकार की शादी नहीं हुई। कोई भी ऐसे लोगों के बदचलन नहीं कहता।
फिर जैसे भैंस के साथ भुनगें, खुजियल कुत्ते के साथ मक्खियाँ और व्हेल के साथ छोटी-छोटी परजीवी मछलियाँ आ जाती हैं उसी तरह पेप्सी आ गयी, कोला आ गया, बर्गर आ गया, केंटुकी चिकन आ गया, आलू की चिप्स आ गयी, मक्का का दलिया आ गया, गाय का बाटा आ गया, भैंस की सानी आ गयी - एक बार तो ख़बर आयी कि गोबर भी आयात किया जा रहा है।
आप लोगों का दुख हम जानते हैं। इसलिए यह लड़ाई हो रही है कि जब देश आजाद हो जाएगा तो गरीबी दूर होगी, लोगों का दवा इलाज होगा, गरीब ऊँचा उठेंगे, घी- दूध की नदियाँ बहेंगी इसलिए तो गांधीजी और लाखों लोग जेल जाते हैं। लाठी-डंडा सहते हैं, अपने सीने पर गोली रोकते हैं और अपनी जान कुर्बान कर देते हैं।
समझाया है दादा! भरोसा भी दिया है। सोचता हूँ कि अब जाने भी दो। कल को कोई बात हो गई तो आपके सिर कलंक कका जू का कोप अलग। घर की एकता ही टूट गई तो क्या रह जाएगा हमारा परिवार?
मनुष्य जब अपने भीतर ही भीतर बहुत गिल्टी महसूस करता है तो तर्क से वह अपने को जस्टिफ़ाई करता रहता है। अपने हर ग़लत काम को जस्टिफ़ाई करता रहता है। न करे तो इतना अपराध-बोध ढोकर वह जी नहीं सकता। जहाँ जस्टिफ़िकेशन है वहाँ गिल्ट है।
लच्छू भी गरीब के सताये रूप्पन महाजन और उसके कारिन्दों के मारे हुए शोषित समाज ही का एक अंग है। और इस लाल सितारे में इस क्रान्ति के तीर्थ मास्को में उसे एक तरह से अपनी जीत की आस्थायुक्त भावना मिल रही है। बड़ा पढ़ाकू न होते हुए भी उसने ताल्सतोय तुर्गनेव दोस्तायव्स्की चेखोव गोर्की और शोलोखोव की थोड़ी-बहुत किताबें सारसलेक में पढ़ी है।
लेकिन मुवक्किल की मुर्खता खाकर ही वकील ज़िन्दा रहता है, जनता की कमसमझी और तंगनज़री जीमकर ही नेता की भूख तृप्त होती है, मरीज की नादानी ही चिकित्सक का संतुलित आहार होता है और नौकरशाही के काफ्काई प्रपंच ही मेरा भी पुष्टिकर खाद्य था।
स्त्री अपनी सीमाओं में सिद्ध कूटनीतिज्ञ होती है। एकदम व्यावहारिक कभी कभी तुच्छता की हद तक। अफसोस की बात है कि उसको दबाकर रखा गया। यदि ऐसा न होता तो वह राजनीति और कूटनीति की उच्च खिलाड़ी होती ........ इस बार का आन्दोलन बहुत बड़ा और कड़ा होगा। यह केवल कांग्रेसजनों तक सीमित नहीं होगा बल्कि वह अपने दायरे में सभी भारतीयों को खींच लेगा।
पर हम तुम्हारे अहसान के बदले में हल्के-ही-हल्के मान रहे हैं खुद को। हर हाल में हल्के। ........ उपकार का भार तो धन-माया के वजन से भारी होता है हमारे विचार में। रही विकरम की बहू की बात सो अब फैसला उसके हाथ में है। बेटीवाला विवेक-बुद्धि और व्यवहार पर रहता है।
तुम बंटी पर इतना निर्भर करती हो उसे अपनी ज़िंदगी का केंद्र बनाकर जीना चाहती हो यही गलत है। केवल तुम्हारे लिए ही नहीं बंटी के लिए भी लेट हिम ग्रो लाइक ए बॉय लाइक ए मैन। सारे समय अपने में दुबकाए रखोगी तो क्या बनेगा उसका।..... तुम उस पर शायद इतना ज़्यादा हावी रही हो कि वह पूरी तरह लड़का बन ही नहीं पाया। तुमने उसे ऊधम करने ही नहीं दिया- हाँ औरतोंवाली ज़िद और रोना ज़रूर सिखा दिया।
पहले ने लच्छू से हिन्दी में कहाः हमारे मित्र पूछते हैं कि जो-जो शब्द आपने अंग्रेजी में प्रयुक्त किए हैं वे शब्द क्या आपकी मातृभाषा में नहीं हैं?...... मातृभाषा के जाननेवाले हमारे देश में अनेकानेक हैं किन्तु पुरानी दासता के संस्कारों के कारण हमारी बोलचाल की भाषा का रूप बिगड़ गया है।
और काफी सोचने के बाद मैंने तय किया कि मुझे अभी बच्चा पैदा नहीं करना है, नौकरी करनी है, पढ़ना भी है और अपने पैरों पर खड़े होना है। कल यदि पापा या रोहित मेरी जिन्दगी में न भी रहे, तो भी रहूँगी, और दूसरों की दया की मोहताज नहीं। खुदमुख्तार। अपने आत्मसम्मान के साथ।
अपने उद्गम स्थान पर पतली धार वाली टेढ़ी-मेढ़ी उछलती-कूदती छिपती-उमगती सरिता ने एक लीक पकड़ ली जो गहरी और चौड़ी होती गई दो तटों की बाँहों की सुरक्षा के बीच आबद्ध होकर भी गतिमान।
लो कितनी भी जातना दे ली कुगत कर ली फिर भी प्रैम बयान बदलकर मानी। अरे जनी की जात के बिरोबर कोई मूरख भी नहीं होता और जो अकल पा जात तो आदमी को भंगी बनाकर रख दे। ..... प्यार-पिरीत में मारी जाती है बैयर। कहते हैं न कि जनी प्यार के पीछे और आदमी पैसे के पीछे पागिल हो जाता है।
गाँवों में नगरों जैसी ही सुविधाएँ हैं- रेडियो टेलीविजन स्कूल अस्पताल हमारे देश के गाँव कब ऐसी उन्नति कर पाएँगें? हमारे पल्टू मतई फज्जू अकबर कब अपने घरों में ये तमाम नयी सुविधाएँ पा सकेंगे।
मल्टीस्टोरी कॉम्प्लेक्स बन जाते। पूंजी चलती-दौड़ती-उफ़नती-भागती दिखाई देती। कितना घोर अपव्यय! ज़मीन का, समय का, जीवन शक्ति का, संभावनाओं का। ...... कितना फालतू समय है इस देश के पास! कितनी संभावित सक्रियता, कितनी प्रसुप्त ऊर्जा, कितनी श्रमशक्ति, कितना जीवन ऐसे ही नष्ट हो रहा है, ऐेसे ही नष्ट हो जाएगा। अस्सी नब्बे प्रतिशत मानसिक शक्ति-शारीरिक शक्ति अनिवेशित ही रह जाएगी और देह चिता पर चढ़ा दी जाएगी।
रूस की मजदूर सरकार को बचाने के लिए हिटलर मुसोलिनी तोजो के खिलाफ लड़ना रूस के साथी अंग्रेज सरकार का साथ देना है। फिर आगे तो जापानियों का साथ देने के लिए सुभाष बाबू की निन्दा होने लगी।....... दुनिया के हर देश की अपनी परिस्थितियाँ हैं समस्याएँ है दूसरे देशों का आँख मूँदकर अनुकरण करने से हम अपनी परिस्थितियों पर विजय नहीं प्राप्त कर सकते। साम्यवाद कोई ऐसा साँचा नहीं है कि उसमें आसानी से दूसरे देश की जनता को कस दिया जाए।
लोग तोलते रहे उसका शोक जायज है या नाजायज वैध है या अवैध उचित है या अनुचित सत्य है या झूठ। मन्दाकिनी का हाथ थामकर जो रोई तो रोती ही गई। भूखी-प्यासी बेसुध हुई पड़ी रही दाऊ जू वाले कोठा में।
तड़ाक। बंटी के गाल पर एक चाँटा पड़ा तो सारा कमरा जैसे घूम गया। बंटी ऊपर से नीचे तक काँप गया। चोट ज़्यादा नहीं थी पर ममी के हाथ का चाँटा और वह भी सबके बीच में जोत और अमि के सामने। वह रोया नहीं पर उसकी आँखों से जैसे चिनगारियाँ निकलने लगीं। .........गुस्सा दुख अपमान भूख और डर ने मिलकर बंटी को भीतर से बिलकुल थका दिया। थक ही नहीं गया जैसे भीतर से कहीं बिलकुल सुन्न हो गया। अब तो न गुस्सा आ रहा है न रोना।
और दूसरी बात हमने अपने लड़के से यह कही कि दूसरों की जानता नहीं पर अगर तू अपना उद्देश्य सिद्ध किए बिना इस घर में लौटा। तो तुझे जूते मारकर मैं घर से निकाल दूँगा। सत्य और आन पर घुटने टेक देनेवाले को मनुष्य नहीं मानता।
एक नवविवाहित पत्नी के लिए पति का प्रेम सहानुभूति और आश्वासन सबसे बड़ी ताकत और सहारा होता है लेकिन जब पति ही अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अहंकार में असंवेदनशील कठोर और क्रोधी हो जाता है तो वह पत्नी के लिए बानर राज बालि साबित होता है जो उसकी आधी शक्ति हर लेता है और वह अपने स्वाभिमान की रक्षा करने लायक भी नहीं रह जाती।
कनिया भाभी का ठीक कहना है कि स्त्री का प्रेम सृष्टि की इच्छा और नियति से जुड़ा है इसलिए उसकी स्थिति मर्द के प्यार की तरह आधी-अधूरी नहीं होती है। वह अपनी असलियत को छिपा नहीं सकती चाहे सकारात्मक हो या नकारात्मक।
मन्दा जीवन हिसाब माँग रहा है हमसे। एक-एक छिन का हिसाब। बुरे और अच्छे करमों का लेखा-जोखा। बिटिया कुसुमा के रिनी जाएँगे हम सो दादा के टेर दो हमारे पास। हम एक ही अरज करना चाहते हैं कि हमारा हिस्सा कुसुमा के नाम लिखवा दें
उसे तो बहुत पहले से मालूम था कि ममी के पास अपने को बदलने का जादू है। पर कैसा है और कहाँ है यह आज तक नहीं जान पाया। ममी के पीछे इधर-उधर काफ़ी ताक-झाँक और छान-बीन भी की।
और उसकी मानसिक प्रतिक्रिया यह हुई कि वह शहीद की भाँति घर त्यागकर माता का मोह त्यागकर उपस्थित समाज की दृष्टि में बोलती अपील की करूणा को अनदेखी करके तेजी से गली के मुहाने की ओर बढ़ गया। रमेश की माता की करूण पुकारें गली में खड़े हुए बब्बू भैया की आवाज़ें उस गली की दीवालों से टकराकर गुँजती हुई रमेश के मन में उसके संकल्प को दृढ़ता प्रदान करने लगीं।
जिसे मैं सड़क समझता था, वह गली थी। जिन्हें मैं अट्टालिकाएँ समझता था, छोटे-छोटे मकान थे। जिसे मैं कोलाहल समझता था, वह अव्यवस्था थी। जिसे मैं स्वच्छता और खुलापन समझता था वह उदासीनता और वीरानी थी।
हर औरत का प्यार सृष्टि से जुड़ा है कोई भी स्त्री उसे नकार नहीं सकती उसके लिए वह पूरी सच्चाई है उसे छिपा नहीं सकती उसे झुठला नहीं सकती। स्त्री के लिए सबसे बुरा समय वह होता है जब उससे जबरदस्ती प्यार प्राप्त करने की कोशिश की जाती है जब उसके प्यार का गलत अर्थ लगाया जाता है उसका गलत नतीजा प्राप्त करने की कोशिश की जाती है।
तुम्हें मेरी बिलकुल परवाह नहीं रह गई है। मत करो मेरा कोई भी काम। बस डॉक्टर साहब के पास बैठकर चाय पियो। तुम्हारा क्या है सज़ा तो मुझे मिलेगी। मैं अब स्कूल ही नहीं जाऊँगा कभी नहीं जाऊँगा कभी भी ..... पहले ममी का चेहरा ममी की आँखें देखकर ही ममी के मन की बात जान लेता था ममी की खु़शी ममी की उदासी ममी की नाराज़गी सब उसे पता था। पर अब?
सब साली भारतीय संस्कृति है। हम लोगों को सोलह दूनी आठ पढ़ाने के लिए भारतीय संस्कृति और अपने लिए हराम की तनख्वाह और ऐश। मैं तो सच कहता हूँ रमेश कि ऐसे प्रोफे़सरों कि लिए अमरीका की ’कू क्लक्स क्लान’ जैसी संस्था खोलनी चाहिए। किसी लौंडियाबाज़ की खोपड़ी तोड़कर यूनिवर्सिटी के लॉन में उसकी लाश फेंक दी जाय किसी को पेड़ से उल्टा टाँग दिया जाय किसी के नाक-कान काटे जायँ- तब ये लोग काबू मे आएँगे। साले हम पर ’इंडिसिप्लिन’ का चार्ज लगाते हैं और आप ही मोस्ट इण्डिसिप्लिन्ड स्वार्थी और कमीने हैं।
मैं अब बड़ी होकर कह सकती हूँ कि स्त्री में बचपन से ही प्यार कूट कूट भरा होता है। सात फेरे के बाद उसका प्यार साकार होकर उमड़ पड़ता है उसके जीवन को सराबोर कर देता है। उसे कोई मिटा नहीं सकता। पत्नी के प्यार को गुलामी नहीं कहा जा सकता। वह एकाकी प्यार भी नहीं है। वह किसी भीख में नहीं मिलता।
मन्दा मौत को ढकेलकर जीवन की चाह जोड़ रहे हैं दाऊ जू। जाने हमारी पिरीत में बल है कि उनके विसवास में हौसला जमराज अभी तक तो दूर खड़ा है बिन्नू वे बीमार और हम अधमरे बदहवास उसी कोंठा में उसी खटिया पर हरस-खुसी सुख-सुरग आनन्द-मंगल लेकर जी रहे हैं।
और तब पहली बार बंटी ने महसूस किया कि समझदार बनना कितना मुश्किल है। ममी की नज़रों में समझकर होकर रहने का मतलब है कुछ भी मत कहो, कुछ भी मत करो। दूध उसे पसंद नहीं फिर भी बिना चूँ किए पी लेता है। जो खाने को दो खा लेता है। जो कुछ करने को कहा जाता है कर लेता है।
हमारी नई पीढी में इस समय दो तरह के लोग है। एक सक्रिय महत्त्वाकांक्षी है और दूसरे हताकांक्षी। महत्त्वाकांक्षियों की सक्रियता आजकल (या शायद सदा) खुशामद तिकड़म दाँवपेंच और स्वार्थ भरी बदमाशियों की दिशा में रही है। उनकी आकांक्षा का महत्व केवल उसी तक सीमित है- और इसलिए वह वर्ग अकेली लड़त लेता है। और दूसरा हताकांक्षी वर्ग कोल्हू का बैल है। उसे जो चाहे अपने काम में जोत ले जहाँ चाहे जोत ले। उसके अरमान शुरू ही से कभी उमंग नहीं पाते।
मैं परंपरापोषित परिस्थितिपुत्र यही मानता था कि आदमी कमाकर लाता है और औरत उड़ाती है आदमी खटता है और औरत खिलाती है, आदमी जुटाता है औरत बनाती है, आदमी पाता है औरत पालती है, आदमी चलाता है औरत चलती है, इसी तरह की होती है दुनिया।
उसे लगता उसके पिताजी जिस परिस्थिति में डाल दिए जाते हैं उसी से प्यार भी करने लगते हैं। क्या परिस्थिति के गुलाम उसमें किंचित् भी व्यतिक्रम या बदलाव उन्हें पसन्द नहीं। ऐसा क्यों हैं? क्या यह छद्म पलायन नहीं हैं?
वह सिसकती हुई माँ के आँचल में सिमट गई। अपनेपन की गर्माहट समेटती रही। लगा कि कभी कोई क्लेश मन में हुआ ही नहीं। कुछ घटा ही नहीं अभी अभी जन्म हुआ है उसका। नई अक्षत है वह। पवित्र। गंगा के जल की तरह निर्मल।
मन को मारना भी तपस्या करना हो सकता है क्या? मन तो आजकल वह भी कितना मारता है अपना तो क्या वह भी तपस्या कर रहा है? एक अजीब-सी पुलक उसके मन में जागी। एक अजीब-सा आत्मविश्वास। कौन ख़ुश होगा उसकी तपस्या से?
उमेश महत्त्वाकांक्षी है मगर कमजोर भी है। जी हुजूरी उसकी नीति नहीं उसका चरित्र है। मैं जानता हूँ मन से उसने यह अवश्य चाहा होगा कि ऐसे शुभ अवसर पर हम सब उसके साथ हों। मगर ससुर साहब ने उत्सव की कोई योजना निश्चित कर दी होगी
बम्बई ने मुझे सपने देखना सिखा दिया। उसने मुझे अपने अब तक के जीवन को नीची नज़र से देखना अपनी लगभग हर जानी-पहचानी चीज़ को घटिया समझना और जो कभी नहीं सोचा था उसे सोचना, उसके सपने देखना और उसे पाने की कोशिश में सिर खपाते रहना सिखा दिया।
हाँ ए बिटिया चालीस से आगे के दूल्हा को ‘खुरनाठ’ कहते हैं। इस उमिर में शरीर और मुँह फैल जाता है। चेहरे पर एक-दो गहरी लकीरें दिखाई देने लगती हैं जैसे कच्ची सड़क पर बैलगाड़ी की लीक। अधपके मूँछों के बाल झाडू की सींकों की तरह फरकने लगते हैं। वह बुढ़ौती को छिपाने के लिए इतर-फुलेल खिजाब लगाता है। उसके गले में बलगम भर जाता है और वह हमेशा खुर-खुर किए रहता है।
तुम इतनी टूटी हुई तुम्हारी यह दीनता बऊ पर वार करती होगी? हो सकता है बऊ को लगता हो ऐसा। महसूस करती हों वे कचोट लेकिन वे क्यों नहीं समझती कि ऐसा भी तो हो सकता है कि बोल तुम्हारें हो शब्द किसी और के!......देह तुम्हारी रहती हो अकड़ किसी दूसरे की! चाल तुम्हारी अवश्य होगी दर्प-घमंड उधार का होता होगा अम्मा।
यही जिन्दगी का लुत्फ़ है। कल हमारा ज़माना था आज उनका है कल किसी और का होगा- यही जिन्दगी का लुत्फ़ है। अगर सारा आलम एक रंग में रंग जाय तो फिर मजा़ ही क्या रहा। हम भाई सोशलिज़म-वोशलिज़म क़तई नहीं मानते।
शुरू-शुरू में एक कन्साइनमेंट सीधा अमेरिका से आया था और उसमें से आधे कम्प्यूटर बड़े-बड़े आधिकारियों-नीति निर्माताओं और मंत्रियों को उपहार स्वरूप दे दिये गये थे और शेष देश के बड़े शहरों में इलेक्ट्रॅानिक सामान के वातानुकूलित शोरूमों में प्रदर्शन के लिए रख दिये गये थे।
शादी-ब्याह की सबसे अच्छी उमिर होती है सोलह से बीस बरिस तक। इस उमिर के दुल्हा को ’बर’ कहते हैं। बर को देखकर सबका जी जुड़ा जाता है। दुल्हन का दिल भी उल्लास से भर जाता है।.....बीस-पच्चीस बरिस के दूल्हा में वह बात नहीं फिर भी कोई हरज नहीं। इस उमिर के दूल्हा को बर नहीं बरूल्ली कहते हैं। अब पच्चीस से आगे बढ़ो ए बच्चा। पच्चीस से तीस बरिस तक के दूल्हे का चेहरा रूढ़ होने लगता है। मूँछ के बाल कड़े हो जाते हैं। बोली भी रूखी और कड़कीली हो जाती है। इस उमिर के दूल्हा को बरनाठ कहते हैं। इसके आगे तीस से चालीस बरिस का दूल्हा होता है। इसे जरनाठ कहते हैं। इस उमिर में देह बोली-किसी में भी नरमाई नहीं रहती। चमड़ी एकदम मोटी हो जाती है। इस उमिर का दूल्हा बड़ा चालाक हो जाता है हमेशा अपने मतलब की बात सोचता है। रात-बिरात घुमक्कड़ी करने लगता है। कई चक्करों में रहता है ए बिटिया। बीवी से हराठी-मुराठी की तरह ब्यौहार करता है। हमेशा जली-कटी सुनाता है।
अम्मा। बऊ जाकर क्या क्या कहती थीं? लोगों से क्या क्या सुनती हूँ पर मैं कैसे मानूँ अम्मा कि तुम सम्पन्न घराने की छत्रछाया में हो। रानी महारानियों की तरह रहती हो। अपने-आप चुना था तुमने यह जीवन। स्वंय चली गई थीं सब कुछ त्यागकर।
ममी का रोना बंटी को एकाएक बड़ा बना गया। बड़ा और समझदार। ममी की पापा से लड़ाई हो गई है पक्कीवाली! दोस्ती तो अब हो ही नहीं सकती। ममी ने खु़द उसे बताया। बिलकुल ऐसे जैसे बड़ों को बताया जाता है। साथ ही यह भी कि अब ममी के लिए जो भी है बंटी ही है।
दसअसल मेरे ख़याल से शारीरिक तौर पर इतना डैमेज नहीं हुआ है लेकिन उन्हें इस बात का गहरा सदमा लगा है कि उनका शरीर भी किसी भी और आदमी के शरीर की तरह फ्रेजाइल है और एक दिन नष्ट हो जानेवाला है। इस नयी रिवीलीशन से कॉम्प्रोमाइस करने में उन्हें कुछ टाइम लगेगा।
सम्भवतः बनारस की सबसे बड़ी पहचान तो गुरुपन है जो यहाँ निवास करनेवाले सभी व्यक्तियों में किसी-न किसी रूप में पाया जाता है चाहे वे इसके प्रति सजग हों या नहीं चाहे वे इस जिले और शहर अथवा पूरबी और पश्चिमी जिलों के विभिन्न गाँवो-शहरों के ही क्यों न रहनेवाले हों।
इतेक नहीं समझते कि हिफाजत की कितेक बड़ी कीमत होत है? चाहे राजा से परजा को मिले चाहे पुरिख से जनी को बात एक ही है। ताबेदारी एक ही सी करनी परती है। और जई ताबेदारी के चलते फजीहत और बिटम्ना भी। क्या जानें किस मोल बिकी हो प्रेम? क्या-क्या सह-झेल रही हो? और कौन कगार से भेजनी परी हो जे पिराथना?
तो ममी को यह डर है कि पापा उसे अपने साथ ले जाएँगे। इसीलिए शायद सवेरे से ही नाराज़ थी। पर पापा उसे क्यों ले जाएँगे भला? वह तो शुरू से ही ममी के पास रहा है। कैसी लड़ाई है यह ममी-पापा की?
करूणा की अथाह गहराई में रमेश का दिल डूबा हुआ है। वह जी रहा है देख-सुन रहा है उसकी अनुभूतियाँ भी जाग रही है; लेकिन उसके भाव गूँगे हो रहे है उसकी चेतना पीड़ा-कुंठित और भय से जड़ीभूत है।
दुनिया बहुत ज़ालिम है। वह मुफ़लिस पर हँसती है। उसे पटकती है। और जब वह कराहता है- रोता है- दया की गुहार करता है, तो और हँसती है। इन्सान का सबसे बड़ा गुनाह है कमजोर रहना, गरीब रहना, मुफ़लिस रहना। यह जिन्दगी का अपमान है। अपनी ज़ात का अपमान है। अपने इन्सान होने पर लानत है।
सचमुच बनारस के पास बहुत कुछ ऐसा है जो दूसरे शहरों के पास नहीं है-राँड़, साँड़, सीढ़ी, संन्यासी के अलावा उसके पास टेढ़ी-मेढ़ी लकीरों की तरह पतली गलियाँ और गहरे कुंड है।
पर अगर ऐसा होता नहीं है तो कहानी में कैसे आ जाता है? कहानी तो आदमी ही बनाता है जिस चीज़ को आदमी ने कभी देखा ही नहीं वह बात उसके दिमाग़ में आती ही कैसे है फिर? ज़रूर कभी ऐसा रहा होगा।
न जाने कितने हिरनों और चीतलों को शिकारी लोग मारकर खा गये। शेर अपने कठघरे से बहकर बाहर चला आया और चिड़ियाघर के सब रखवालों की चिन्ता का कारण बन गया। उसे मारने की तदबीरें होने लगीं और अन्त मे जनसुरक्षा के नाम पर बाढ़ग्रस्त सिंह मार डाला गया।
धीमे स्वर में और रूक-रूककर बीच-बीच में लम्बी साँसे लेते हुए वह अपने ही जीवन का मानो पुनरावलोकन कर रहे थे- एक भोक्ता या भागीदार या साक्षी की तरह नहीं, एक दर्शक, समीक्षक या आलोचक की तरह, और ऐसा शायद वह पहली बार कर रहे थे।
आप दुखी ना होइए मेरे मन में कोई घमंड नहीं है। कि लड़ाई में आपकी हार हुई। यह हार मेरी भी हो सकती थी। इस दुनिया में कोई भी हमेशा नहीं जीतता है। यदि आपको इस समय अपने किसी कार्य से तकलीफ हो रही है पश्चाताप हो रहा है तो सचमुच यह आपकी जीत है।
यह सोचने की वेला नहीं है। असल बात तो यह है कि अब ताकित ही नहीं बची अपने आपसे जूझने की। यह तो उसी दिन सोचना था जब आसा अभिलाखा लिये इस चन्दन वन में पाँव धरा था। काहे भूल गई कि भुजंगों का वास भी होगा इन सेँदली रूखों में।
सवेरे मन में जो एक अपराध-बोध था, भय था वह धीरे-धीरे गुस्से में बदलने लगा। अच्छा है कोई कुछ मत बताओ। मेरा क्या जाता है। मैं भी अपनी कोई बात नहीं बताऊँगा। इम्तिहान होगा तो यह भी नहीं बताऊँगा कि कैसा करके आया हूँ। तब पता लगेगा।
सात्विकता, इन्सानियत, शुभ काम की भावना ने नशे की तरह चढ़कर सारे वातावरण ही को मयखाना बना दिया।....ऐसे महान् जन-संकट के समय बहुतों के दिलों में कर्त्तव्य और इन्सानियत की दिव्य ज्योति जगमगा उठी थी। इस ज्योति के टार्च समान गोल दायरे के इर्द-गिर्द संकीर्ण स्वार्थों का अँधेरा उस समय भी ज्यों का त्यों मौजूद रहा।
अब मैं रोहित की पत्नी नहीं, अपने पापा की बेटी थी। अब मेरी टाँगें नहीं थरथरा रही थीं। अब मेरी आंखों में आँसू नहीं थे। पापा के मज़बूत गद्दीदार हाथ के स्पर्श ने मुझमें जैसे थोड़ी सी शक्ति का संचार कर दिया हो।
पागल कहीं का! इतना बड़ा होकर रोता है ममी के लिए। तो अँसुवाई आँखों से ही बंटी हँस दिया। भीतर ही भीतर बड़ी शरम महसूस हुई अपने ऊपर। सचमुच उसे इतनी जल्दी रोना नहीं चाहिए। बच्चे रोया करते हैं बात-बात पर तो वह तो अब बड़ा हो गया है। अब कभी नहीं रोएगा इस तरह।
चेतना जिसकी स्वस्थ सबल और दृढ़ होगी कल्पना उतनी ही सुन्दर और बेदाग भी होगी। मैं अपने जीवन भर के कार्य ही को ईश्वर मान सकता हूँ। भावनात्मक रूप से और अधिक गतिमान और सत्यशील होते हुए मैं मनुष्य में भगवान के अस्तित्व को स्वीकार कर सकता हूँ।
उनकी माँग रहती थी कि शनिवार को बच्चों को डबल होमवर्क दिया जाय- शनिवार के लिए भी और रविवार के लिए भी। या तो वे बच्चों से तंग थे, उनकी जिज्ञासाओं से कतराते थे, उनकी गतिविधियों से परेशानी महसूस करते थे और उनको इल्लत समझकर स्कूल भेजते थे कि चलो, जितनी देर बच्चा स्कूल में रहेगा, कम से कम उतनी देर घर में शान्ति रहेगी।
बाबा पूछते हैं कि शीतल जल की जो बूँद कंठ की प्यास बुझाती है उसमें कौन-सी आकांक्षा है? ठंड़ी छाया और मीठे फल देनेवाला वृक्ष किस आकांक्षा से यह करता है? यह उसका स्वभाव है कि वह दूसरों को सुख देता है और बदले में कुछ नहीं माँगता।
बिरादरी के बंधन घुटन भी पैदा करते हैं और आवश्यक भी मालूम पड़ते हैं। जनसाधारण में हर व्यक्ति आमतौर पर यही शिकायत करता है कि दुनिया हमसे जलती है। ये अपना प्रदेश है यह पराया है ये अपना धर्म है वो पराया है- इस प्रकार औसत व्यक्ति अपने ही सुख-दुख हानि-लाभ स्वार्थ की दृष्टि से अपना सत्य पाता है और अपने सत्य को प्रतिष्ठित करने के लिए मार-काट मचाता है।
जैनेन्द्र अज्ञेय इलाचन्द्र ने व्यक्ति का मनोमंथन और यशपाल भगवतीचरण ने सामजिक-राजनैतिक दृष्टि से विचार-मंथन किया। अश्क नागार्जुन अदि इनके साथ हैं और समय इन सबके साथ आगे बढ़ा है।
पहली लड़ाई से ही जैसे हर अगली लड़ाई में चीखने- चिल्लाने और हाथ-पैर चलाने का हमें लाइसेंस मिल गया था। जरा़ जऱा सी बात पर हम आपस में उलझ पड़ते, एक दूसरे की तकलीफों के बारे में सोचने की बजाय सिर्फ अपनी इच्छाओं-सुविधाओं के बारे में सोचने लगते, एक दूसरे को जली-कटी सुनाने लगते और हाथपाई करने लगते।
सांसारिक आकांक्षाओं की बात मैं नहीं कहता बल्कि उनसे दूर आध्यात्मिक आकांक्षाओं की बात कह रहा हूँ। बिना आकांक्षा के हम मृत हो जाते हैं। ईश्वर और मोक्ष को प्राप्त करना भी एक आकांक्षा है। नरक के बजाए स्वर्ग में जाने का प्रयास भी आकांक्षा है। जब तक मनुष्य है आकांक्षा उसमें किसी-न-किसी रूप में विद्यमान रहती है परन्तु आध्यात्मिक आकांक्षा सर्वश्रेष्ठ है।
हमारा यही दोष है कि इन लोगों की तरह लाभ-हानि का हिसाब नहीं धँसता हमारे मगज में। यही खोट है कि गणित नहीं आने दिया जीवन में। उन सबको यही दुख है कि इनकी अभिलाखा से अलग है हमारे लाभ की इबारत।
अजय बंटी को बहुत प्यार करता है पर अब से वह बंटी को मिलने भी नहीं देगी। बंटी से न मिल पाने की वजह से अजय को जो यातना होगी उसकी कल्पना मात्र से उसे एक क्रूर-सा संतोष मिलने लगा।
वह कहता है कि व्यभिचार की वृत्ति मोक्षदायिनी है क्योंकि दोनों पक्षों में किसी की कोई ज़िम्मेदारी उसमें नहीं रहती। व्यभिचार एक ऐसा जंगल है जिसके ओर-छोर पर कहीं भी भूत या भविष्य का लगाव नहीं होता। वह केवल वर्तमान में होता है। पुरूष केवल अपने देह-सुख के स्वार्थवश ही होता है और स्त्री अपने सुख-स्वार्थ के वश में। दोनों अपने-आपमें स्वतन्त्र होते हैं।
कभी अच्छा मत पहनो कभी अच्छा मत खाओ। खाओ भी तो स्वाद न लो। व्यंजनों का स्वादिष्ट लगना पाप है। किसी अच्छी चीज़ का अच्छा लगना गुनाह है, कुफ्र है। किसी भी अच्छी चीज़ में, मसलन संगीत में, चित्रकला में, अभिनय में, नृत्य में, स्थापत्य में, यहाँ तक कि सुन्दर प्राकृतिक दृश्य में, किसी भी चीज़ में अगर तुम्हें मजा आता है तो यह मनुष्यता के प्रति एक घोर अपराध है। क्योंकि ये चीज़े सबको सुलभ नहीं।
तुम पुरूष हो शक्तिपुंज तुम्हारा कार्य शासन करना है व्यवस्था सन्तुलन सन्तोष और तृप्ति देना है। तुम प्रेम और सुख लेने और देने के अधिकारी हो। मैं तुमको सबकुछ देना और वही तुमसे प्राप्त करना चाहती हूँ। मैं दोहरी जिन्दगी जी रही हूँ अभिशप्त हूँ मेरी कोई परिभाषा नहीं है मैं निरन्तर तुम्हारी याद में जल रही हूँ मेरे पास आओ तुम्हीं मुझे शीतलता और मेरे जीवन को नई परिभाषा और नया अर्थ दे सकते हो।
बिन्नू अपने मन में तनिक भी भय मत लाना। झिझक-हिचक में मत रहना। जो हुआ उसे भूल जाना। डर मत मानना कभी। जिन्दगानी में इतनी बड़ी जिन्दगी में अच्छा बुरा घट जाता है बिटिया उसके कारन मन में गाँठ लगाने से क्या फायदा? जो तुमने किया ही नहीं उसके लिए अपने को दोसी क्यों मानना?
हिंदुस्तानी लोग बच्चों से प्रेम नहीं करते उन्हें बच्चों से मोह होता है अंधा मोह। सच कहता हूँ .... एक आम हिंदुस्तानी बच्चे को सही ढंग से परवरिश करना जानता ही नहीं। प्यार और देखभाल के नाम पर माँ-बाप ही अपने को इतना थोपे रहते हैं बच्चे पर कि कभी वह पूरी तरह पनप ही नहीं पाता।
शुरू में लगता है कि व्यभिचार से अहम् को एक विद्रोह भरी खुशी मिलती है पर झीनी झीनी समझ फिर यह बतलाने लगती है कि इसका अहम् से सीधा या गहरा सम्बन्ध नहीं होता। यह केवल उसका एक ऊपरी विकार मात्र है एक मानसिक उत्पात है।
गरीबी को ग्लोरिफाई क्यों किया जाय विपन्नता, असमर्थता या साधनहीनता को आदर्श का दर्ज़ा क्यों दिया जाए उसे एन्जॉय करना कौन सी मानसिकता है हर गरीब-विपन्न को ईमानदार और हर अमीर-सम्पन्न को बेईमान और मक्कार समझना कहाँ की समझदारी है।
प्रेम सिर्फ शारीरिक भूख नहीं है वह ममता भी है वात्सल्य भी है। एक आध्यात्मिक बुलन्दी है और अपने प्रिय से अभिन्न रहने की तमन्ना और उसके लिए कुर्बानी का संकल्प।
बिन्नू सौ बातों की एक बात है नाते-सम्बन्ध का नाम बताएँ गढ़ें सो बेकार है। साँचा नाता तो प्यास और पानी का है।....खोट तो हमारे मतारी-बाप का था। वे गरीब काहे को थे? गरीब थे तो अपनी बिटिया के लिए सुख के सपने काहे देखे? सपने देखे ही थे तो मान-परतिष्ठावाले घर के लिए उतना दहेज काहे नहीं जुटा पाए? काहे नहीं कर पाए घर-वर की इच्छा पूरन?
मुझे सभ्य बनाया जा रहा था। पालतू बनाया जा रहा था। चार जनों के बीच पेश करने लायक बनाया जा रहा था। मुझे भद्र समाज के अनुकूल ढालने के कोशिश की जा रही थी। मुझे गगनचुम्बी सफलता की दिशा में प्रक्षेपित किया जा रहा था।
तुम जबरदस्ती करोगे कर लो मैं तुम्हारे सामने हूँ। यह तो शरीर मिट्टी का है पर समझ लेना आत्मा नहीं मिलेगी। बिना आत्मा के शरीर को जितना चाहे ले लो। मेरी आत्मा तो चनरा में बसती है। उसके बिना मुझे तो यह शरीर भी नहीं चाहिए। इसी से बार-बार कहती हूँ ममता बड़ी बुरी चीज होती है। उसकी ममता मुझसे छूटती नहीं न छूट सकती है बाबू साहब।
बिन्नू यह जल निरमल है या मैला? पवित्तर है या पाप का? इमरत है कि बिस? नहीं जानते हम। तुम्हारी रामायन में लिखा भी होगा तो लिखनेवाला यह नहीं जानता कि आदमी जब प्यासा होता है प्यास से मर रहा होता है तो कहाँ देखता है कहाँ सोचता है कहाँ करता है कोई भेद? कोई अन्तर ।
पर मैं तुम्हें तकलीफ़ देने के लिए बंटी को अलग नहीं करना चाहता बिना बंटी को अलग किए भी तुम सोच सको। तो अच्छा है। पर इतना जरूर कहूँगा कि तुम केवल बंटी की माँ ही नहीं हो इसलिए केवल बंटी की माँ की तरह ही मत जियो शकुन की तरह भी जियो।
नारी के आक्रामक पौरुष ने उसके संकोच जड़े पौरुष को झटका दिया। जीवन में पहली बार उसे किसी नारी का एकांत साथ मिला था। पिछले कई वर्षों से मन में हिलोंरे लेती हुई प्रेम-कामना जो स्वयं आक्रामक होना चाहती थी जो किसी प्रेमिका के लाज-संकोच से लड़कर उसे जीतना चाहती थी अब तक एक बार भी अपना दाँव न पाकर इस समय स्वंय ही एक फाहशा औरत के हत्थे चढ़ी जा रही है। उसे अच्छा नहीं लग रहा मगर अच्छा भी लग रहा है।
स्निग्धा के अधैर्य से मैं परिचित न रहा होऊँ ऐसी बात नहीं थी। उसे हर चीज़ फटाफट चाहिए होती थी। इधर इच्छा हुई उधर चीज़ हाजिर। उसे इसी का अभ्यास था इसी का प्रशिक्षण। उसके लिए यही सहज दुनिया थी। जबकि वास्तविक दुनिया न ऐसी थी न हो सकती थी। ....यह सब नहीं होना था। क्योंकि स्निग्धा अपने पापा का घर हमेशा के लिए छोड़ आयी थी। क्योंकि उसमें धैर्य नामक चीज़ थी ही नहीं।
क्या अर्थ है इसका? कागज पर बनाया चित्र सजीव मनुष्य लगता है और सजीव सक्रिय मामूली गरीब युवती किसी कलाकार के चित्र की तरह! सौन्दर्य कहाँ है? उस युवती में या चित्र में? अथवा कलाकार में चाहे वह मनुष्य हो या ईश्वर ? या वह स्वंय उनके अन्दर है। यदि ऐसी ही बात है तो इतना ताप क्यो ? कब से यह आग है उनके अन्दर ? क्या कामनाओं की वह सुप्त आग ही सौन्दर्य है जो किसी खास अवसर पर जलने लगती है।
बिन्नू तुम्हारी रामायन में हमारे मन की बातें लिखी है? तुम ही बताओं हमारे मन में सब कुछ उलटा काहे होता जा रहा है? अँधियारा ज्यों-ज्यों बढ़ता है भीतर जुन्हैया छिटकती जाती है। बिन्नू इँधेरे पाख में पूरनमासी का चाँद दिखाई देता है हमें। तुम कहती हो कि बियाबान डाँग में स्यार-बिलावों के सिवा कुछ नहीं। और हमें हमें तो देवताओं का बास लगता है इस गढ़ी में जंगल में और चारऊ तरफ।
ज़रा आज से आठ-नौ साल बाद की बात सोचो जब बंटी की अपनी जि़दगी होगी अपने स्वतत्र संबंध होंगे अपनी इच्छाएँ और अपनी महत्वाकांक्षाएँ होंगी तब तुम्हारा कितना अस्तित्व होगा उसकी ज़िदगी में?
वह अपने-आपको उस कुएँ के मेढक की तरह सहमा-सहमा-सा महसूस करने लगा; जो किस्मत के डोल में पानी के साथ साथ ऊपर खिंच आया हो और एक नयी भव्य और अपरम्पार दुनिया में फेंक दिया गया हो।
क्या यह सिखाना था यह किस तरह का सिखाना था। क्या यही सब सीखने की तमन्ना लेकर मैं इस घर में आयी थी? क्या कोई भी लड़की शादी के बाद माँ-बाप का घर छोड़कर यही सब सीखने ससुराल आती है? इस तरह क़दम-क़दम ज़लील होना, पल पल दोषी ठहराया जाना, घड़ी-घड़ी छोटी-छोटी चीजों के लिए तरसना और एक अदृश्य पर निंरतर हिंसा रक्तपात झेलना?
बंटी को हॉस्टल भेजने की बात तो आपने कह दी पर कभी यह भी सोचा है कि उसे हॉस्टल भेजकर मैं कितनी अकेली हो जाऊँगी।....मुझे डर है शकुन कहीं तुम अपना अकेलापन ख़त्म करने के चक्कर में बंटी का भविष्य ही न ख़त्म कर दो। तुम्हारा यह अतिरिक्त स्नेह उसे बौना ही न छोड़ दें।
प्रेम के ऐसे रूप को मैं एकांत ही की चीज़ मानती हूँ बिलकुल पूजा ऐसी ही चीज़ को मानती हूँ और उसका दिखावा मुझे बेहद-बेहद बुरा लगता है- उतना ही बुरा जितना कि नये हिन्दुस्तान के अपने इन पिछड़े क्षेत्रों के अन्दर मुझे लड़के-लड़कियों की दोस्ती छिपाना या फौरन ही पाप-चेतना के साथ जोड़ देना बुरा लगता है।
मेरी ही नहीं अपनी जरूरतों के प्रति भी उसका रवैया एकदम अड़ियल बूढ़ों जैसा था। लेटरीन के लिए अलग चप्पल होनी चाहिए उसे समझ नहीं आता क्यों....घर की जो हालत थी ऐसी कि मैं किसी फ्रेण्ड को अपने घर भी नहीं बुला सकती थी।....नींबू-मिर्च-धनिया-टमाटर-अदरक आदि खरीदना तो उसे बिलकुल फिजूलखर्ची लगता। एक बार प्याज़ महँगी हो गयी तो उसने प्याज़ खरीदना ही छोड़ दिया। क्या हुआ जैन लोग भी तो नहीं खाते।....धीरे-धीरे मैं डरने लगी। घर में कोई चीज़ खत्म हो जाती तो यह बताते मैं डरती कि अमुक चीज़ ख़त्म हो गयी है। क्या।
पिछले एक वर्ष से मैं शाम को रामचरितमानस का पाठ करने के बाद प्रभु से अपील करता हूँ कि वे हमारे प्रियजनों को रोग शौक हैरानी परेशानी से दूर रखें। मैं हर आदमी का नाम लेकर उनके लिए अपील करता हूँ।
चीफ तुम फिकिर जिन करों। लड़ने दो उस कंजरी को। और ऐन लड़ा लेवे अपने यारों को। जब तक इस काया में पिरान बाकी हैं लड़ेगे हम भी। पूरी जिन्दगानी हमने लड़ाई लड़ी है। हँसी-खेल नहीं है जिमींदारिन बने रहना। वैसा ही रौब-रूतबा रखना आनबान से रहे है।
हवन से वायुमण्डल शुद्ध होता है वेदों में संसार का सारा ज्ञान समाया हुआ है। जर्मनी वाले हमारे वेद उठा ले गये और उन्हीं की बदौलत ये गैस के हण्डे, रेल के इंजन, ये सरसराती हुई जाने वाली हवागाड़ी या मोटरकार सब कुछ वेदों से ही आविष्कृत हुआ है।
तब मैंने एक चीज़ डिस्कवर की। रोहित कंजूस है। बेहद कंजूस मक्खीचूस....होता क्या है इनमें सेलखड़ी और सुगंध। कोई तीसरी चीज़ होती हो तो बताओ। यह था उसका तर्क। ज़ाहिर है ऐसे में उसे पर्फ्यूम और डियोड्रेण्ट तो बिलकुल ही बेकार की चीजे़ं लगती....उसके मन में ऐसे ही तिरस्कारपूर्ण विचार होंगे जो उसने कभी व्यक्त नहीं किये लेकिन अपने तिरस्कारपूर्ण मौन से यह जरूर जता दिया कि या तो मुझे इन चीजों को प्रयोग छोड़ना पड़ेगा या इनकी व्यवस्था अपने बूते पर करनी पड़ेगी। उसकी कमाई से यह सब नहीं आएगा।
ये दोनों ही उन लोगों में से थे जो विवाह के बाद पत्नी को घर में राशन के बोरे की तरह पटककर निश्चिन्त हो जाते हैं और अपने कोटे से अधिक बच्चे पैदा करते हुए बाहर ऐश करते और गुलछर्रे उड़ाते हैं।
दस वर्ष का यह विवाहित जीवन-एक अँधेरी सुरंग में चलते चले जाने की अनुभूति से भिन्न न था। आज जैसे एकाएक वह उसके अंतिम छोर पर आ गई है। पर आ पहुँचने का संतोष भी तो नहीं है ढकेल दिए जाने की विवश कचोट-भर है। पर कैसा है यह छोर? न प्रकाश न वह खुलापन न मुक्ति का एहसास। लगता है जैसे इस सुरंग ने उसे एक दूसरी सुरंग के मुहाने पर छोड़ दिया है- फिर एक और यात्रा वैसा ही अंधकार वैसा ही अकेलापन।
घर से निकलने पर चाहे पैरों में जूते-चट्टी न हों पर टोपी जरूर होनी चाहिए। हम बच्चों को समझाया जाता था कि नंगे सिर पर शैतान सवार हो जाता है। शैतान क्या होता है यह हम नहीं जानते थे पर यह धारणा किसी तरह हमारे मन में घर कर गई थी कि जो हिन्दुओं का ब्रह्मराक्षस है वही मुसलमानों का शैतान है।
संभव है वही सिखा दे। सीखने में मदद तो कर ही सकता है। लेकिन क्या उसने सिखाया क्या उसने सीखने में मेरी मदद की....संडासी की जरूरत ही मानों नहीं थी। काग़ज़ के दो टुकड़ों से गरम बरतन आँच पर से उतार लिया जाता। बेडरूम में एक भी खूँटी नहीं थी। .....ओडोनिल हार्पिक आदि के अविष्कार की खबर अभी यहाँ तक नहीं पहुँची थी। धुले कपड़े सुखाने के लिए छत पर एक जंग लगा तार झूल रहा था। उसमें क्लिप नहीं थे।....सच बात तो यह है कि उसने मुझे सिखाया नहीं, धीरे धीरे अनुकूलित करने की कोशिश की। यदि उसे मूँग की छिलके वाली दाल और लौकी की सब्जी ही खानी है तो मेरे अलग से छोले-भटूरे बनाकर खाने का तो सवाल ही नहीं उठता।
मेरी बकसिया जो दादा के पलंग के नीचे रखी है न तुम्हें याद होगा तुमने उसमें सीपियाँ रख दी थीं जिन्हें तुम अपने गाँव की नदी से लाई थीं। वे रखी हैं। छूता हूँ तो लगता है वे तुम्हारी उँगलियों की पोरे हैं। नहीं वे तो सीपियाँ है। है न?
यह कण्व का आश्रम तो नहीं था और न ही शकुन्तला की विदाई का अवसर किन्तु घरवालों को लगा कि छकौड़ी-बो की बकरी दुकानदार लाला की गाय शीशम वृक्ष की गिलहरी और नम्रता की छत पर बैठा कौआ सभी उसी को देखकर अपनी उदासी प्रकट कर रहे हैं।
सामनेवाले को पराजित करने के लिए जैसा सायाम और सन्नद्ध जीवन उसे जीना पड़ा उसने उसे खुद ही पराजित कर दिया। सामनेवाला व्यक्ति तो पता नहीं कब परिदृश्य से हट भी गया और वह आज तक उसी मुद्रा में उसी स्थिति में खड़ी है- साँस रोके दम साधे घुटी-घुटी और कृत्रिम!
बाप-बेटे आपस में कितना ही गुण रूप साम्य क्यों न रखते हों लेकिन उनमें एक मौलिक दृष्टि-भेद होता ही है। इसे बेटे की बाप के प्रति अवज्ञा नहीं माना जा सकता- और आरोपण तो वह किसी भी तरह है ही नहीं।
टाइम्स ऑफ इण्डिया का शेयर बाज़ार वाला पन्ना उनके लिए संसार के सभी रिश्तों से ज्यादा दिलचस्प है। बेटी की जिन्दगी से भी ज़्यादा। बेटी तो गायत्री की हत्यारी है। उसी के साथ मर जाती तो झंझट ही खत्म हो जाता।
कक्को ने समझाया कि कौन मानता है तुम्हारी सिच्छा-दीच्छा। अपने नैमधरम अपने मगज तक राखो। बहुत बन लिये बड़े अब छोटे-बड़े की मान-मरजाद कहाँ राखते हैं लोग? जे तो एक दिन होना ही था तुम कहाँ लों रोकते?
भीतर ही भीतर चलनेवाली एक अजीब ही लड़ाई थी वह भी जिसमें दम साधकर दोनों ने हर दिन प्रतीक्षा की थी कि कब सामनेवाले की साँस उखड़ जाती है और वह घुटने टेक देता है जिससे कि फिर वह बड़ी उदारता और क्षमाशीलता के साथ उसके सारे गुनाह माफ करके उसे स्वीकार कर ले उसके संपूर्ण व्यक्तित्व को निरे एक शून्य में बदलकर।
पार्टी के दिन समझ में आ गया कि यह किस क़दर असंभव है। पापा ने अपने निर्णय आप लिये थे और मुझे भी यही सिखाया था कि तुम्हें अपने निर्णय स्वंय लेने चहिए। ….समाजशास्त्र में एम ए करने का निर्णय भी मेरा ही था और रोहित से शादी करने मेरा ही था। यह सही था कि मुझे मेरे निर्णय लेने की स्वतंत्रता दी गयी थी। लेकिन इस बात की कोई शर्त नहीं थी कि मेरे द्वारा लिये गये हर निर्णय को पसन्द भी किया ही जाएगा। न यह कि परिणामों के प्रति खबरदार भी किया जाएगा।
क्या स्त्री इतनी हीन अछूत और गई गुजरी होती है कि उसकी वजह से पुरूष महानता से गिर कर अपराधी हो जाता है, क्या स्त्री की कोई भावना नहीं होती कोई विचार नहीं होते। उसके पास आत्म-सम्मान और विवेक नहीं होता? क्या वह किसी के आचरण के औचित्य को नहीं समझ सकती?
दुनिया के किसी भी पिछड़े-से-पिछडे देश के नेताओं में शायद ही इतने विचारशून्य राजनीतिक गुटबाज़ मिलें। इस संकीर्ण स्वार्थ भरी दम्भ भरी गुटबाजियों में पड़कर पढ़ा लिखा और चतुर-भोला सामान्य सभ्य सुप्रतिष्ठित जन समझ से नासमझी की ओर आँखें मीचे बढ़ा जा रहा है।
क्यों और किसने यह रिवाज़ बनाया कि लड़की को एक अनजान मकान के अजनबी कमरे में, अजनबी पलंग या खटिया पर, एक अजनबी व्यक्ति के साथ सोना पड़ेगा क्यों नहीं ऐसा हो सकता कि लड़की अपने चिर-परिचित परिवेश में ही रहे और उससे शादी करने वाला ही वहाँ आकर रहने लगे क्यों यह एक संभावना नहीं है। क्यों यह एक सम्मानप्रद संभावना नहीं है
उसने कई बार अपने और अजय के संबंधों के रेशे-रेशे उधेड़े हैं- सारी स्थिति में बहुत लिप्त होकर भी और सारी स्थिति से बहुत तटस्थ होकर भी पर निष्कर्ष हमेशा एक ही निकला है कि दोनों ने एक-दूसरे को कभी प्यार किया ही नहीं।
मैं यथार्थ की गति स्थूल से सूक्ष्म मानकर चलता हूँ- मेरी बिम्बध्वनियों या ध्वनिबिम्बों को अभिन्न अटूट तार अब तो अपनी बहिर्चेतना द्वारा बिना किसी प्रकार का श्रम कराये हुए ही मेरे पूर्वश्रम के अर्जित फलस्वरूप संस्कार बनकर बिम्बावलियों की स्वतः गति के साथ घुल-मिलकर एक हो गया है।
यह जो भी होगा, सिर्फ अपनी मेहनत से। फिर भी विनम्र था। कुंठित नहीं था, निष्क्रिय नहीं था, विध्वंसक या सनकी नहीं था चुपचाप प्रयासरत था। यह सचमुच आदमी था। वे लड़के थे।
तुमको भेज तो दिया रात के बखत पर दादा बड़े घबड़ाए मन्दा कैसे-कैसे बिलबिलाए। कक्को ने बताया हमें रात-भर विलाप किया है दादा ने-सारा गाँव क्या असपेर-भर यही कहेगा कि सामर्थहीन और अविवेकी पंचमसिंह। रच्छा नहीं कर पाए मोंडी की। बचा नहीं पाए सोनपुरा की मातौन को। मुख दिखलाने जोग नहीं रहे हम।
मृत्यु जिसका संकल्प एवं मुक्ति हो ऐसे ही व्यक्ति के स्थिति नीलेश की हो गई जो संसार की हर चीज़ से उदासीन होकर एक अँधेरी निश्चिन्तता में प्रवेश करते हुए सामने जो कुछ भी उपलब्ध होता है उसी में बाकी दिन अपना ध्यान रमाता है।
क्या किया जाय हमारे जीवन में परिस्थितियों के संयोग ही कुछ ऐसे बैठे हैं कि एक बेटे की यशोगाथा के साथ-साथ दूसरे बेटे की कलंकगाथा अमृत और विष के समान प्राणों में घुलती है।
सच्चा प्यार चरित्रहीन नहीं है परन्तु उसका नित्य फैशन और स्वाद बदलने की आदत अवश्य घृणित है। स्त्री हो या पुरूष चरित्र को नष्ट करना अपनी मानवीय पहचान को नष्ट करना है।
यदि उसने ठीक से खाना नहीं खाया या कि वह किसी बात पर ज़िद करके रो दिया या कि उसने कोई ऐसी बात पूछ ली जो इस उम्र के बच्चे को नहीं पूछनी चाहिए तो वह उत्तेजित होने की स्थिति तक परेशान हो जाया करती है।
पितृसत्ताक समाज में भी माँ का पद एक जगह पिता से बड़ा है। पिता की गया एक बार करने ही से पितृ़ऋण से मुक्ति मिल जाती है पर माँ की गया सात बार में पूरी नहीं होती।
यह सब मेरे तब तक देखे हुए जीवन से इतना अलग था कि जिसे मैं ठीक से सोच ही नहीं पाती थी। अब तक जितने भी, लड़के मेरे दोस्त रह चुके थे या थे उनसे रोहित इतना अलग था कि यह विस्मयकारी भी था और आकर्षक भी। संभवत हमारी दुनिया से उसकी इतनी ज्यादा भिन्नता या विपरीतता ने ही मुझे उसके प्रति आकर्षित किया होगा।
दुनिया में क्या कोई ऐसा है जो कह सके कि वह दोष-मुक्त है गलतियाँ तो सभी करते हैं। इसकी वजह से अपने को छोटा महसूस करने की जरूरत नहीं है। गलतियों को समझकर उनको छोड़ना और उनसे सीखकर आगे बढ़ना ही मनुष्य की वास्तविक शक्ति है।
यह अन्तर्जातीय प्रेम विवाह पहले रूढ़ियों के प्रति बग़ावत करके मनुष्य को संकीर्णता से व्यापकता के दायरे में ले जाता है लेकिन विवाह के बाद यही संकीर्ण जातिगत चेतना पति-पत्नी के बीच कभी-कभी बेतुकी और चुभन भरी स्थितियाँ ला देती है।
एक ही घर की दो जनी! एक ही ड्योढ़ी की सास बहू। ऐसा दुसमनाई! ऐसी गहरी खुन्दक! और ऐसी बेरहम दूरी! लो अब कहाँ जावें। कितै करें निरवाह? कौन गुफा में दुका देवें मन्दा कों? कौन सुरंग से निकर जायँ कहूँ दूर देस।
अधैर्य बड़ी खराब चीज है इससे सही काम भी बिगड़ जाता है। इसका परिणाम कुविचार और दुर्व्यवहार है धैर्य सन्तुलन है शक्ति है आशा है विश्वास है। वह दूरदृष्टि और बुद्धिमानी है उससे आप पहले से ही भविष्य देख सकते हैं और उसके मुकाबले के लिए सही नियोजन सही तैयारी कर सकते हैं। धैर्य से ही सही समय पर सही दृष्टिकोण से सही काम होता है।
अनायास ही ममी की उँगलियाँ उसके बालों को सहलाने लगीं काँपती-थिरकती उँगलियाँ। उन उँगलियों के पोरों में से झर-झरकर जाने कैसा स्नेह बंटी की नसों में दौड़ने लगा कि मन में थोड़ी देर पहले जो भय समाया था वह अपने आप ही धीरे-धीरे बह गया। स्पर्श से ही वह जान गया कि अब तक ममी के चेहरे की वह सख़्ती भी ज़रूर पिघल गई होगी।
मैंने कहा लड़की वालों की तरफ से जो काम करने आते हैं वो किसी के बाप के नौकर नहीं होते। ये इंसानियत का कर्त्तव्य है और हम इंसानों की सेवा करने के लिए हरदम मुस्तैद हैं। आज सेवा की हमारी पारी है तो कल आपकी भी पारी आ सकती है।
साथ रहने लगी एक दिन कॉलेज में इसको देखा। मैली जीन्स, कोल्हापुरी चप्पलें, खादी का कुरता और बगल में झोला, दाढ़ी बढ़ी हुई और लपकते क़दम। हरदम यही। रोज़ यही। कभी कुरते की जगह टीशर्ट आ जाती, पर दूसरे दिन कुरता। सर्दियों में स्वेटर मफलर या कोट। मैं देख रही थी। मैं लगातर चार साल देखती रही।
शकील हमारे गाँव में भी सब आदमी माता के मन्दिर के पास लैन बनाकर बैठे होंगे। सब बिटियाँ भुँजरियाँ बाँट रही होगी। कका भइया दादा सब पाँव छू रहे होंगे उनके। ससुरालों से आ गई होंगी सब बिटियाँ
तुम स्त्री हो अपने होने की गारिमा से भरी। तुम स्वंय मूर्तिमान गरिमा हो। पाप-पुण्य की संकुचित परिभाषा से परे तुम संवेदना प्यार और शक्ति का स्त्रोत हो। मैं पुरूष हूँ लम्बे और शक्तिशाली शरीर के बावजूद स्वंय में दुर्बल और चंचल हूँ। निर्मम क्रूर हूँ। मेरे अन्दर न कोई प्रकाश है और न ही मेरा कोई प्रयोजन। मैं अधूरा हूँ और भटक रहा हूँ। मेरा कोई उद्देश्य नहीं और न ही लक्ष्य। यह सब प्राप्त करने मैं तुम्हारे पास आया हूँ जो तुम्हारे पास ही है मेरे पास नहीं।
जीवन भर देश-प्रेम मानवता सत्य न्याय और ईमानदारी को ही भला समझता और समझाता रहा पर अब ये सब बातें निस्सार लगती हैं। इनसे न तो वह संसार ही बदला जिसे बदलने की भावना से मेरे मन में सदा उथल-पुथल मचाकर नये से नये विचार और कल्पनाएँ स्वतः स्फूर्त होती रहीं न मुझे सुख ही मिला।
मैं कैसे बताऊँ तुम्हारी आँखें, तुम्हारी बातें मेरी आत्मा की गहराइयों को छू लेती हैं। हाँ मुझे तुम्हारा शरीर बेहद प्रिय है लेकिन सिर्फ शरीर ही नहीं बल्कि तुम्हारी सच्चाई, तुम्हारी निश्छलता, तुम्हारी आत्मा। पूरी-की-पूरी तुम जैसी हो जिसको मैं जितना जानता हूँ उसी का बार-बार अनुभव करने के लिए मैं आता हूँ
पापा मुझसे खुश नहीं थें। पता नहीं किस वजह से पापा भूआ से भी खुश नहीं थे। पापा अपनी नौकरी से भी खुश नहीं थे। पापा अपने पत्नीविहीन घर और जीवन से भी खुश नहीं थे। पापा नौजवान और महत्वाकांक्षी थे। शायद हम लोग उनकी नौजवानी और महत्वाकांक्षी के रास्ते में व्यवधान सिद्ध हो रहे थे।
रुपए के लिए ही अपने शरीर को बेचनेवाली एक वेश्या-पुत्री की रुपयों के लिए ही किसी की विश्वासिनी बनने की यह भावना स्वयं उसकी समझ के परे थी फिर भी उसकी तुलना उस बन्द अँधेरी घुटी-घटी कोठरी से की जा सकती है जिसके फॉफर से अचानक झिर-झिर हवा और रोशनी की कोई लकीर आ जाए।
वोट देने की बात तो भइया ऐसी ही हुई जैसे कड़वी ककड़ी को पेट में रखे रहें। कंठ में लौटा-लौटाकर जुगाली करते रहें और जोड़ते रहें विष। पचाते रहें चुनाव तक। और चुनाव के दिन मोहर ठोक के कागज घोंपि आए मतपेटिका में। कर दिया पीठ पर वार। काढ़ लिया बदला।