उद्धरण - 399

तुम पुरूष हो शक्तिपुंज तुम्हारा कार्य शासन करना है व्यवस्था सन्तुलन सन्तोष और तृप्ति देना है। तुम प्रेम और सुख लेने और देने के अधिकारी हो। मैं तुमको सबकुछ देना और वही तुमसे प्राप्त करना चाहती हूँ। मैं दोहरी जिन्दगी जी रही हूँ अभिशप्त हूँ मेरी कोई परिभाषा नहीं है मैं निरन्तर तुम्हारी याद में जल रही हूँ मेरे पास आओ तुम्हीं मुझे शीतलता और मेरे जीवन को नई परिभाषा और नया अर्थ दे सकते हो।

Comments

Popular posts from this blog

उद्धरण - 797

उद्धरण - 549