ज्ञानशंकर की दृष्टि में आत्म-संयम का महत्व बहुत कम था। उनका विचार था संयम और नियम मानव-चरित्र के स्वाभाविक विकास में बाधक हैं। वही पौधा सघन वृक्ष हो सकता है जो समीर और लू, वर्षा और पाले में समान रूप से खड़ा रहे। उसकी वृद्धि के लिए अग्निमय प्रचण्ड वायु उतनी ही आवश्यक है जितनी शीतल मन्द समीर, शुष्कता उतनी ही प्राण पोषक है जितनी आर्द्रता।