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उद्धरण - 1180

आलोचना से टूट जाएगा, शाबासी इसे जड़ बना देगी जरूरत बस इतनी है कि जो भी संभावना इसके अन्दर है वह खिलती चली जाए।

उद्धरण - 1179

जैसे अवांछित जनसंख्या वृद्धि का समाधान महात्मा गांधी अखंड ब्रह्मचर्य में खोजने लगे थे। सारा विचार खुले तौर पर इतना हवाई है। लगता है आप पूरे समाज की सामान्य समझ का अपमान कर रहे हैं।

उद्धरण - 1178

मैंने सोचा कि अब अगर और कुछ बोलता हूँ तो यह विदग्धा न जाने उसमें कौन-सी शाखा-प्रशाखा निकालकर मुझे एक बार फिर निरूत्तर कर देगी। बुद्धिमान की नीति मौन होती है। मैं हँसकर चुप हो रहा।

उद्धरण - 1177

ज्ञानशंकर की दृष्टि में आत्म-संयम का महत्व बहुत कम था। उनका विचार था संयम और नियम मानव-चरित्र के स्वाभाविक विकास में बाधक हैं। वही पौधा सघन वृक्ष हो सकता है जो समीर और लू, वर्षा और पाले में समान रूप से खड़ा रहे। उसकी वृद्धि के लिए अग्निमय प्रचण्ड वायु उतनी ही आवश्यक है जितनी शीतल मन्द समीर, शुष्कता उतनी ही प्राण पोषक है जितनी आर्द्रता।

उद्धरण - 1176

आखिर धोखा दे गए न गाँव के लोग। तुम अब तो समझ गए होगे कि गाँव से सीधापन कब का उड़ गया। कई बार हम भी उनकी वेशभूषा देखकर उन्हें भोला समझ बैठते हैं। पता चलता है कि वे तो शातिर बदमाश को मात देते हैं।

उद्धरण - 1175

मुझे हमेशा लगता था कि नामवर ने किसी के बारे में नहीं सिर्फ अपने बारे में लिखा है और अपने बारे में का मतलब है जिसमें उसने अपने आप को सबसे अधिक पाया है। वे हमेशा महसूस करते थे कि साहित्य समूची मनुष्य-जाति का होता है और उस जाति में मुक्तिबोध और नागार्जुन ही नहीं रघुवीर सहाय और निर्मल वर्मा भी आते हैं।

उद्धरण - 1174

असल में एक राजा था हैराद। उसने अपने भाई को मारकर उसकी पत्नी से अपनी शादी कर ली। उसकी भतीजी थी सेलामी जो बहुत सुन्दर थी और बहुत अच्छा नाचती थीं। हैराद उस पर मुग्ध हो गया। लेकिन सेलामी एक पैगम्बर पर मुग्ध थी। पैगम्बर ने सेलामी के प्रणय को ठुकरा दिया। एक बार हैराद ने सेलामी से कहा कि यदि तुम नाचो तो मैं तुम्हें कुछ दे सकता हूँ। सेलामी नाची और पुरस्कार में उसने अपना अपमान करने वाले पैगम्बर का सिर माँगा! हैराद वचनबद्ध था। उसने पैगम्बर का सिर तो दे दिया लेकिन बाद में इस भय से कि कहीं राज्य पर कोई आपत्ति न आये उसने सेलामी को भी मरवा डाला।