उद्धरण - 1178

मैंने सोचा कि अब अगर और कुछ बोलता हूँ तो यह विदग्धा न जाने उसमें कौन-सी शाखा-प्रशाखा निकालकर मुझे एक बार फिर निरूत्तर कर देगी। बुद्धिमान की नीति मौन होती है। मैं हँसकर चुप हो रहा।

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