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Showing posts from March, 2020

उद्धरण - 302

लिखा कि सेठ हरपालदास को उस ज़मीन की जरूरत है इसलिए आपको अपना समझकर ही उन्होंनें आपकी ज़मीन ले ली है। वे आपको उसका मुआवज़ा देने को भी राजी है। आप तो समाजवादी है; आपको ज़मीन की आवश्यकता नहीं और उन्हें है इसलिए उन्हें ले लेने दीजिए। आप तो महान् आत्मा हैं इतनी उदारता दिखला दीजिए।

उद्धरण - 301

क्या सोचकर आखिर क्या सोचकर मैंने इस आदमी से शादी कर ली क्या मैं यह सोच रही थी कि शादी दो-चार रोज़ का खेल है कभी भी मन भरने या ऊबने पर इसे बन्द किया जा सकता है या छोड़ा जा सकता है और वापस वही हुआ जा सकता है जो हम पहले थे? क्या मैं यही सोच रही थी कि एक बार आज़माकर देख लेने में कोई हर्ज़ नहीं है क्योंकि जो दरवाज़ा मै छोड़कर आऊँगी वह हमेशा के खुला रहेगा और मैं कभी पीछे मुड़कर चार कदम चलूँगी और उस दरवाजे़ से अपनी चिर-परिचित पुरानी दुनिया में प्रवेश कर लूँगी और किसी को पता भी नहीं चलेगा कि मैं इस बीच क्या कर आयी हूँ क्या यही सोचकर मैने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी दे मारी थी या फिर आखिर क्या सोचकर

उद्धरण - 300

उसकी सीख़ में एक खास बात यह थी कि वेश्या-पुत्री को एक सूदखोर बनिए की तरह निर्दयी यानी मीठी छुरी बनना चहिए जो आदर्शवादी होते हैं भुखमरी के कगार पर पहुँचा खुद रफूचक्कर हो जाते हैं।

उद्धरण - 299

दादा के हाथ में छाता मोदी के हाथ में छड़ी और चीफ साब के कन्धे पर खादी का झोला रहता है। लोग दूर से ही पहचान जाते है। लो वे आ रहे है छाता डंडा झोला!

उद्धरण - 298

पापा साथ नहीं रहते तो क्या हुआ वे तो शुरू से ही साथ नहीं रहते। वह तो हमेशा से ही ममी के पास रहता है। उसकी ममी कोई ऐसी-वैसी हैं? कॉलेज की प्रिंसिपल हैं आते-जाते लोग कैसे सलाम ठोंकते हैं। करेगा कोई ऐसे सलाम इनकी अम्मा को?

उद्धरण - 297

तन के ठेले पर लदा हुआ यह जीवन का भारी बोझ खींचते मेरे प्राणों का भूखा अशक्त भैंसा अब बेदम होकर जेठ की चिलचिलाती धूप में तपती हुई सड़क पर गिर पड़ा; नियति की चाबुकों से उत्तेजित होकर भी उसमें उठने की ताब नहीं रही।

उद्धरण - 296

मै थोड़ा इतराया भी कि स्निग्धा का बदलाव उसमें ही छिपे सद्गुणों का प्रगट होना भर है जिन्हें मैने अपनी छठी इन्द्रिय से पहले दिन ही ताड़ लिया था। मैने स्निग्धा को बहुत सारा कुछ सिखाया। और इस बात के लिए उसने मुझे कभी माफ नहीं किया।

उद्धरण - 295

शुरू से आखिर तक उसमें काम भावना का हौवा खड़ा किया गया था। जब पशु-पक्षी घास-पात खाकर पीड़ित रहते है तो अन्न मिर्च-मसाला; पूड़ी; हलवा आदि पकवान; मांस मछली जैसे तामसिक उत्तेजक खाद्य पदार्थ खानेवाले मनुष्य की क्या दशा होगी?

उद्धरण - 294

हम तो जे ही सोच रहे है कि तनक उमर में उस हादसे को बताएँगे तो न जाने क्या से क्या सोच बैठे। कैसा असर ले अपने मन पर कच्ची मिट्टी है टेढे़-मेढ़े साँचों से बचाकर रखना चाहिए लरका-बिटिया को।

उद्धरण - 293

जान तो वह आज तक नहीं पाया पर उसे हमेशा लगता है कि ड्रेसिंग टेबुल की इन रंग-बिरंगी शीशियों में छोटी-बड़ी डिबियों में ज़रूर कोई जादू है कि ममी इन सबको लगाने के बाद एकदम बदल जाती हैं।

उद्धरण - 292

इक्कीस वर्ष की आयु से लेकर अब तक कभी इच्छामत विश्राम ही नही कर पाया या बीमार होकर ही बिस्तर पर लेटा और या फिर इसी प्रकार दिमाग़ ठप पड़ जाने पर ही निकम्मा बनने को मजबूर हुआ।

उद्धरण - 291

उसने मान लिया कि लकड़ी के खोके पर गद्दी या चादर बिछाकर भी उसे सोफा या सैटी माना जा सकता है कि सब्जी के छिलकों में विटामिन होते हैं इसलिए फेंकने की बजाय एक वक़्त उनकी भी सब्जी बनायी जा सकती है

उद्धरण - 290

गांधीजी ने ठीक ही कहा है ब्रिटिश हुकूमत भारत के कन्धे पर एक लाश के समान है। सदियों से हम यह लाश ढो रहे है। हमारी कमर टूट गई है। जब तक यह लाश नहीं हटाई जाती हम स्वतन्त्र और स्वाभिमानी मनुष्य की तरह नहीं खड़े हो सकते। हमारी कौम अपंग बनी रहेगी।

उद्धरण - 289

जे डुकरो अपने घर की व्यथा इस गाँव में ले आई कही होता है ऐसा कि किसी के हक के लिए कोई दूसरा अपना मूँड़ चिराए!

उद्धरण - 288

इस पूरी स्थिति की सबसे बड़ी विडंबना ही यह है कि इन संबंधों के लिए सबसे कम ज़िम्मेदार और सब से बेगुनाह बंटी ही इस टै्रजडी के त्रास को सबसे अधिक भोगता है।

उद्धरण - 287

पिछड़े हुए समाज की पिछड़ी हुई भाषा का एक साहित्यिक डिमॉक्रेसी के इन कर्णधारों के लिए केवल शतरंज का एक मोहरा भर है जिसे चलकर वे विरोधी पक्ष की ओर से पड़ती हुई शह बचा लेते हैं।

उद्धरण - 286

दूसरे दिन से स्निग्धा मेरी पत्नी हो गयी । लेकिन यह एक बदली हुई स्निग्धा थी।

उद्धरण - 285

गुलामी भयंकर अभिशाप है। चिरई-चुरंग से लेकर मनुष्य तक कोई भी गुलामी पसन्द नहीं करता। गरीब-से-गरीब मजदूर भी नमक के साथ सूखी रोटी खा लेगा लेकिन किसी का गुलाम बनकर चिकना-चिकना भोजन पसन्द नहीं करेगा।

उद्धरण - 284

राजकाज की भाखा समझना तुम्हारे हमारे बस की नही है मातौन। काहे से कि जब तक हम एक बात समझ पाएँ तब तक तो हमारे नेता लोग चार पहेलियाँ और धर देते हैं हमारे सामने। वह भी ऐसे जैसे कुनैन को शक्कर में लपेट दिया हो। सरकार और विपक्षी दलों का गोरखधन्धा मछेरे का जाल-सा फैला है। कहाँ-कहाँ तक बचे आदमी।

उद्धरण - 283

जिंदगी को चलाने और निर्धारित करनेवाली कोई भी स्थिति कभी इकहरी नहीं होती उसके पीछे एक साथ अनेक और कभी कभी बड़ी विरोधी प्रेरणाएँ निरंतर सक्रिय रहती है।

उद्धरण - 282

पर छोटी-बड़ी अड़तीस किताबें हैं-पहले भावों की उछालों में लिखी थीं फिर नाम की महत्वाकांक्षा में बाद में अपने परिवार के भरण-पोषण की समस्या हल करने के लिए। मुझे फुरसत ही कहाँ मिली जो अपने से उबरकर दूसरों के लिए सोचता।

उद्धरण - 281

कहावत है कि सितारों को पास से मत देखो वे पत्थर नज़र आएँगे। हम जब भी और जिससे भी मोहब्बत करते हैं उसे एक छोटा-मोटा सितारा बना लेते हैं। और जब उसे नज़दीक से देखना पड़ता हैं ठगे जाने की अनुभूति होती है।

उद्धरण - 280

जिस कौम को गुस्सा नहीं आता वह गुलामी; जुल्म; शोषण के खिलाफ क्या लड़ेगी?

उद्धरण - 279

बऊ आदमी बड़ा बेबस जीव है। वह आदमी के हाथों ही मारा जाता है। स्यार जिनावर तक अपनी जाति का शिकार नहीं करते मगर आदमी केवल आदमी को ही खाना चाहता है। उसी को मिटाने पर तुला रहता है। बुद्धिमान होकर भी बुद्धिहीन साबित होता है।

उद्धरण - 278

शकुन चक्की पीस-पीसकर बेटे का जीवन बनाने में अपने-आपको स्वाहा कर देनेवाली माँ नहीं थी; बल्कि स्वतंत्र व्यक्तित्व आकांक्षाएँ और आजीविका के साधनों से दृप्त माँ थी।

उद्धरण - 277

मन में हीनता का तीव्र बोध लेकर बैठा हुआ मैं अपने माहात्म्य सुन रहा था। अन्दर और बाहर की आवाजों से दबकर मैं घुट गया।

उद्धरण - 276

बात यह है कि राजनीतिक रुप से यदि यह क्षेत्र किसी के अधीन हुआ भी है तो उसने कभी अपनी अस्मिता नहीं खोई है। यह किसी कौम के लिए बड़ी खूबी है। अपनी संस्कृति को भूल जाना उसकी उपेक्षा करना दूसरों का अन्धानुकरण करना या पिछलग्गू बनना पराधीनता का ही लक्षण है।

उद्धरण - 275

बचपन की स्मृतियाँ बहुत त्रस्त करने वाली हैं। वह तपती रेत पर निरंतर चलती नंगे पैरों की दौड़ जैसा ही है।

उद्धरण - 274

दादा के कहते ही बऊ का कलेजा गड्डमड् होने लगा ज्यों किसी निजता-भरे हाथ ने उनकी लड़खड़ाहट को सम्बल प्रदान किया हो। कृतज्ञता के संवेगों को अपने भीतर सँभालना कठिन हो गया। आत्मीयता सँभली तो आँखों की कोरें भीग आई। विपति के समय कोई है उनका। कोई है उनके साथ-साथ।

उद्धरण - 273

खंडित-निष्ठा उसकी नियति है।

उद्धरण - 272

कभी-कभी तो लगान में बढ़ायी गयी रकम गाँव की पैदावार से भी ज्यादा हो जावे है। महकमा जंगल तथा ज़मीनों को दनादन हड़प रया हैगा। चरागाहों को भी नहीं छोड़ते। जानवर भूखों मरे है। किसान ज़मीनें छोड़-छोड़ के भाग रहे हैं। अकाल बार-बार न पड़ेंगे तो और भला क्या होगा!

उद्धरण - 271

लेकिन यहीं से कहानी का करुण मोड़ आरम्भ हो गया। शादी होते ही स्निग्धा को लग गया कि उसने ग़लत निर्णय ले लिया है। जैसे मुँह से गलत बात निकालते ही हमें लग जाता है कि ग़लत बात निकल गयी।

उद्धरण - 270

गंगा और छोटी सरयू के संगम पर बसा यह छोटा-सा शहर और अंचल प्राचीनकाल से ही अनेक ऋषि-मुनियों की तपस्या-भूमि रहा है। यहाँ भृगु ऋषि और दरदर मुनि के मन्दिर हैं और इसे भृगुक्षेत्र भी कहते हैं।

उद्धरण - 269

देखों तो मोंडी हिंरस उठी। कैसी कठकरेज मतारी हती कि छोड़ गई पुतरिया-सी बिटिया कों। चिरइया-परेबा तक नही छोड़ते अपने अडी बच्चा।

उद्धरण - 268

यहाँ मुझे भारतजी की बात सही लगी कि जैनेंद्रजी ने स्त्री-पुरूष के संबंधों को जिस एकांतिक दृष्टि से देखा है उसका एक अनिवार्य आयाम बंटी भी है क्योंकि शकुन-अजय के संबंधों की टकराहट में सबसे अधिक पिसता बंटी ही है।

उद्धरण - 267

उनीसवीं सदी बूढ़ी हो चली थी; बूढ़ा भारत देश गुलामी की नयी और कठिन बेड़ियों से जकड़कर भी जवान हो रहा था एक नयी राह पर दौड़ रहा था। लोहे की सड़कों का जाल धीरे-धीरे फैलता ही जा रहा था उन पर धुआँ-गाड़ियाँ भी माल-मुसाफिर लेकर दौड़ने लगी थीं।

उद्धरण - 266

शायद स्निग्धा ने अपने किसी आशिक़ को उसकी बेवफ़ाई या बेरूखी का सबक़ सिखाने के लिए मुझसे शादी कर ली थी। हो सकता है उसने अपने अकडू बाप से बदला लेने के लिए मुझसे शादी कर ली हो। यह भी हो सकता है कि उसने सबके अनुमान ग़लत साबित करने और सबको चौंका देने के लिए ही ऐसा निर्णय ले लिया हो।

उद्धरण - 265

इतिहास भूलने की चीज नहीं हैं। इतिहास वह दर्पण है; जिसमें हम अपनी खूबियों और कमियों को देख सकते है। इनकी जानकारी हमें और ताकतवर बनाकर नए समय की नई चुनौतियों का सामना करने की बुद्धि देती है।

उद्धरण - 264

अई नोंने रहो। अपहरन काहे। अपहरन होता तो बऊ का न हो जाता। जे भी तो भर ज्वानी में विधवा हुई थीं। जे कहो कि मस्तानी हती। ज्वानी की मारी। सो बिना खसम के रहाई नहीं आई।

उद्धरण - 263

लेकिन एक बात मुझे इन बच्चों में समान लगी और वह यह कि ये सभी फालतू गैर-ज़रूरी और अपनी जड़ों से कटे हुए हैं। किसी एक व्यक्ति के साथ घटी घटना दया, करुणा और भावुकता पैदा कर सकती है लेकिन जब अनेक ज़िंदगियाँ एक जैसे साँचे में ही सामने आने लगती हैं तो दया और भावुकता के स्थान पर मन में धीरे-धीरे एक आतंक उभरने लगता है।

उद्धरण - 262

क्या आप समझती हैं, बिना दार्शनिक हुए ही कोई कवि हो सकता है? दर्शन तो केवल बीच की मंजिल है।

उद्धरण - 261

संसार में इलम की क़दर नहीं है, ईमान की क़दर है।

उद्धरण - 260

मैं तो कहता हूँ, जितना तुम अकेले खरच करते हो, उसी में गृहस्थी चल जायेगी। औरत के हाथ में बड़ी बरक्कत होती है।

उद्धरण - 259

क्या तुम इतना भी नहीं जानते कि नारी परीक्षा नहीं चाहती, प्रेम चाहती है। परीक्षा गुणों को अवगुण, सुन्दर को असुन्दर बनाने वाली चीज़ है; प्रेम अवगुणों को गुण बनाता है, असुन्दर को सुन्दर!

उद्धरण - 258

आज ही कोई महान गुरु उनके स्तर पर उतर आया है, अवतार हुआ है!

उद्धरण - 257

यह ऊपरी आमदनी की चाट आदमी को खराब कर देती है ठाकुर; लेकिन हम लोगों की आदत कुछ ऐसी बिगड़ गयी है कि जब तक बेईमानी न करें, पेट ही नहीं भरता।

उद्धरण - 256

बुद्धि-वैभव कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसके न होने पर दुःखी हुआ जाए और होने पर सुखी हुआ जाए!

उद्धरण - 255

कृपण लोगों में उत्सवों पर दिल खोलकर खर्च करने की एक प्रवृति होती है, वह उसमें भी सजग हो गयी। आखिर इसी दिन के लिए तो कौड़ी-कौड़ी जोड़ रहा था।

उद्धरण - 254

जाबाला ने पूछा था कि ‘कन्यादान‘ का अर्थ क्या है? पिता किसी को कन्या दे तो उसे कन्यात्व ही दे सकता है, पत्नीत्व नहीं दे सकता। यह शब्द ही ग़लत बनाया गया है।

उद्धरण - 253

नारी केवल माता है, और इसके उपरान्त वह जो कुछ है, वह सब मातृत्व का उपक्रम मात्र। मातृत्व संसार की सबसे बड़ी साधना, सबसे बड़ी तपस्या, सबसे बड़ा त्याग और सबसे महान् विजय है एक शब्द में उसे लय कहूँगा- जीवन का, व्यक्तित्व का और नारीत्व का भी।

उद्धरण - 252

यह चोट दिखाई नहीं देती, इसकी पीड़ा बड़ी मीठी होती है ! तुम्हारी पीड़ा मीठी लगती है न ?

उद्धरण - 251

शिष्टता उसके लिए दुनिया को ठगने का एक साधन थी, मन का संस्कार नहीं।

उद्धरण - 250

माँ, कोई भी कष्ट नहीं है, उसे देखने की इच्छा ही एक कष्ट है!

उद्धरण - 249

इस जनम में तो कोई आशा नहीं है भाई! हम राज नहीं चाहते भोग-विलास नहीं चाहते, खाली मोटा-झोटा पहनना, और मोटा-झोटा खाना और मरजाद के साथ रहना चाहते हैं। वह भी नहीं सधता।

उद्धरण - 248

जब उसने कहा कि उसका कोई अपना नहीं है इसलिए सब अपने हो गए हैं तो मेरे शरीर में भी रोमांच हो आया था ।

उद्धरण - 247

हमारा धर्म है हमारा भोजन। भोजन पवित्र रहे, फिर धर्म पर कोई आँच नहीं आ सकती।

उद्धरण - 246

महाराज, दोष तुम्हारा भी है और मेरा भी । राजा जब तक स्वयं जागरूक न हो तो राजकर्मचारी शिथिल हो जाते हैं, मुस्तैदी से काम नहीं करते ।

उद्धरण - 245

संसार में सबसे बड़े अधिकार सेवा और त्याग से मिलते हैं और वह आपको मिले हुए हैं।

उद्धरण - 244

पर वास्तव में गुरु वह है जिसके सामने जाने पर तेरे व्यक्तित्व का सर्वोत्तम पक्ष उजागर हो, जो तेरे भीतर सोए देवत्व को जगा दे ।

उद्धरण - 243

सत्य की एक चिनगारी असत्य के एक पहाड़ को भस्म कर सकती है।

उद्धरण - 242

देख रहे हो न, कि मृत्यु सबको निगलने के लिए मुँह बाए खड़ी है, और फिर भी लोग जीना चाहते हैं । सब मर जा सकता है पर जीने की इच्छा नहीं मरती ।

उद्धरण - 241

अकेले में आत्माराम या प्राणाराम होना भी एक प्रकार का स्वार्थ ही है ।

उद्धरण - 240

आत्मसेवियों में जो निर्लज्जता आ जाती है, वह कौल में भी थी।

उद्धरण - 239

अहंकार सेवा की महिमा को ही कम नहीं करता वह सेवा ही नहीं रहने देता ।

उद्धरण - 238

सुख के दिन आयें, तो लड़ लेना; दुख तो साथ रोने से ही कटता है।

उद्धरण - 237

वैश्वानर? सम्पूर्ण विश्व का रूप ही नर-रूप में आराध्य है । खंड-दृष्टि से नहीं पूर्ण-दृष्टि से देखना ही वैश्वानर की उपासना है ।

उद्धरण - 236

प्रेम जब आत्मसमर्पण का रूप लेता है, तभी ब्याह है; उसके पहले ऐयाशी है।

उद्धरण - 235

केवल अन्न-वितरण से तो काम नहीं चलेगा । फिर सारी प्रजा को भिक्षा पर आश्रित भी तो नहीं बनाया जा सकता । उन्हें काम देना होगा ।

उद्धरण - 234

महिला की सहानुभूति हार को जीत बना सकती है।

उद्धरण - 233

देख, धर्म कुछ मूल्यों से बनता है और मूल्यों का निर्णय परमतत्व की अपेक्षा में ही होता है ।

उद्धरण - 232

वैद्य एक बार रोगी को चंगा कर दे, फिर रोगी उसके हाथों विष भी खुशी से पी लेगा I

उद्धरण - 231

आँख क्या है? यह कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं हैं, उसी के देखने का साधन है- जो देख रहा है, वही आत्मा है । नासिका गन्ध ग्रहण करने के लिए है यह साधन है जो गन्ध ग्रहण करता है, वही आत्मा है । कान सुनने के लिए है, यह साधन है, जो सुनता है वही आत्मा है ।

उद्धरण - 230

शिष्ट प्रेम की दुर्बलता और निर्जीवता का उन्हें अनुभव हो चुका था !

उद्धरण - 229

ब्रह्माण्ड के चार देवता- अग्नि, सूर्य, चन्द्र, और जल- वायु के अधीन हैं और पिंड के चार इन्द्रिय- वाणी, चक्षु, श्रोतृ और मन-प्राण के अधीन है ।

उद्धरण - 228

जो व्यक्ति कर्म और वचन में सामंजस्य नहीं रख सकता, वह और चाहे जो कुछ हो सिद्धान्तवादी नहीं है।

उद्धरण - 227

मनु ने बताया है कि जब कोई वृद्धजन तरुण के सामने आता है तो तरुण का प्राण ऊपर उठने लगता हैं । तरुण जब उठकर अभिवादन करता है तो फिर प्राण यथास्थान लौट आता है ।

उद्धरण - 226

आश्चर्य अज्ञान का दूसरा नाम है।

उद्धरण - 225

आप बिना परीक्षा किए ही कोई बात मान लेते हैं? विचित्र है । यह तो नेयता हुई । यही शूद्र-धर्म है ।

उद्धरण - 224

गुड़ से मारने वाला जहर से मारने वाले की अपेक्षा कहीं सफल हो सकता है।

उद्धरण - 223

जाबाला की आँखें कान तक फैल गईं । वह मानो आँख और कान दोनों को मिलाकर सुनना चाहती थी ।

उद्धरण - 222

आज उसमें एक विचित्र आत्मविश्वास और होरी में एक विचित्र विनय का उदय हो गया था।

उद्धरण - 221

‘कन्या‘ शब्द से मैं परिचित हूँ, लेकिन वह होता क्या है, यह मैं नहीं जानता ।

उद्धरण - 220

लेकिन कोढ़। यह घिनौनी मौत, और उससे भी घिनौना जीवन।

उद्धरण - 219

सो, हंसों की इज्जत अभी बची हुई है और वे इतने विवेकवान् माने जाते हैं कि महाज्ञानी साधु-सन्त अब भी परमहंस कहलाले हैं ।

उद्धरण - 218

हम जिनके लिए त्याग करते हैं, उनसे किसी बदले की आशा न रखकर भी उनके मन पर शासन करना चाहते हैं, चाहे वह शासन उन्हीं के हित के लिए हो, यद्यपि उस हित को हम इतना अपना लेते हैं कि वह उनका न होकर हमारा हो जाता है। त्याग की मात्रा जितनी ही ज्यादा होती है, यह शासन-भावना भी उतनी ही प्रबल होती है और जब सहसा हमें विद्रोह का सामना करना पड़ता है, तो हम क्षुब्ध हो उठते हैं, और वह त्याग जैसे प्रतिहिंसा का रूप ले लेता है।

उद्धरण - 217

राजा तो कर्मचारियों की आँख से ही देखता है ।

उद्धरण - 216

अज्ञान की भाँति ज्ञान भी सरल, निष्कपट और सुनहले स्वप्न देखने वाला होता है। मानवता में उसका विश्वास इतना दृढ़, इतना सजीव होता है कि वह इसके विरूद्ध व्यवहार को अमानुषीय समझने लगता है। वह यह भूल जाता है कि भेड़ियों ने भेड़ों की निरीहता का जवाब सदैव पंजे और दाँतों से दिया है। वह अपना एक आदर्श संसार बनाकर उसको आदर्श मानवता से आबाद करता है और उसी में मग्न रहता है। यथार्थता कितनी अगम्य, कितनी दुर्बोध, कितनी अप्राकृतिक है, उसकी ओर विचार करना उसके लिए मुश्किल हो जाता है।

उद्धरण - 215

वह ऐसा स्पष्ट देख लेता है कि जैसे रथ के साथ घोड़ा जुता होता है वैसे ही उसका प्राण, उसका आत्मा इस शरीर रूपी रथ के साथ जुता हुआ है वह स्वयं शरीर नहीं है न शरीर तथा आत्मा का कोई मूलगत सम्बन्ध है ।

उद्धरण - 214

वह मोक्ष और उपासना अहंकार की पराकाष्ठा है, जो हमारी मानवता को नष्ट किये डालती है। जहाँ जीवन है, क्रीड़ा है, चहक है, प्रेम है, वहीं ईश्वर है; और जीवन को सुखी बनाना ही उपासना है, और मोक्ष है। ज्ञानी कहता है, ओठों पर मुस्कराहट न आये, आँखों में आँसू न आये। मैं कहता हूँ, अगर तुम हँस नहीं सकते और रो नहीं सकते, तो तुम मनुष्य नहीं हो, पत्थर हो। वह ज्ञान जो मानवता को पीस डाले, ज्ञान नहीं है, कोल्हू है।

उद्धरण - 213

तपस्या का फल यही न होता है मेरे प्यारे, कि आदमी में कोई ममता न बचे, ‘मम‘(मेरा) कहा जानेवाला कुछ न रहे, वह तो तुम्हें अनायास विधाता की ओर से मिल गया था।

उद्धरण - 212

जिसे संसार दुःख कहता है, वही कवि के लिए सुख है। धन और ऐश्वर्य, रूप और बल, विद्या और बुद्धि, ये विभूतियाँ संसार को चाहे कितना ही मोहित कर लें, कवि के लिए यहाँ ज़रा भी आकर्षण नहीं हैं, उसके मोद और आकर्षण की वस्तु तो बुझी हुई आशाएँ और मिटी हुई स्मृतियाँ और टूटे हुए हृदय के आँसू हैं। जिस दिन इन विभूतियों में उसका प्रेम न रहेगा, उस दिन वह कवि न रहेगा। दार्शनिक जीवन के इन रहस्यों से केवल विनोद करता है, कवि उनमें लय हो जाता है।

उद्धरण - 211

मुझे लगता है बेटा, जिसे लोग ‘आत्मा‘ कहते हैं वह इसी जिजीविषा के भीतर कुछ होना चाहिए । वे जो बच्चे हैं । किसी की टाँग सूख गई है, किसी का पेट फूल गया है, किसी की आँख सूज गई है- ये जी जाएँ तो इनमें बड़े-बड़े ज्ञानी और उद्यमी बनने की सम्भावना है । सम्भावना की बात कर रही हूँ । अगर यह सम्भावना नहीं होती तो शायद जिजीविषा भी नहीं होती । आत्मा उन्ही अज्ञात- अपरिचित-अननुध्यात सम्भावनाओं का द्वार है ।

उद्धरण - 210

जिसे तुम प्रेम कहती हो वह धोखा है, उद्दीप्त लालसा का विकृत रूप, उसी तरह जैसे सन्यास केवल भीख माँगने का संस्कृत रूप है। सच्चा आनन्द, सच्ची शान्ति केवल सेवा-व्रत में है। वही अधिकार का स्त्रोत है, वही शक्ति का उद्गम है। सेवा ही वह सीमेण्ट है, जो दम्पति को जीवनपर्यन्त स्नेह और साहचर्य में जोड़े रख सकता है, जिस पर बड़े-बड़े आघातों का कोई असर नहीं होता। जहाँ सेवा का अभाव है, वहीं विवाह-विच्छेद है, परित्याग है, अविश्वास है।

उद्धरण - 209

उन दिनों राजा लोग आश्रमों में कुलपति के आदेश के बिना नहीं जाते थे । साधारण लोगों पर ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं था । ऐसा माना जाता था कि तपस्या और स्वाध्याय के क्षेत्र में राजा का किसी प्रकार का दबाव धर्म-संगत नही है इसीलिए राजा को आश्रम में प्रवेश के लिए कुलपति की अनुमति और राजवेश का परित्याग, ये दो बातें आवश्यक मानी जाती थी।

उद्धरण - 208

मेरे जेहन में औरत वफ़ा और त्याग की मूर्ति है, जो अपनी बेज़बानी से, अपनी कुर्बानी से, अपने को बिलकुल मिटाकर पति की आत्मा का अंश बन जाती है। देह पुरूष की रहती है पर आत्मा स्त्री की होती है।

उद्धरण - 207

संसार में जहाँ कहीं सुन्दरता दिखती है, प्रेम दिखता है, वात्सल्य दिखता है, अनुराग दिखता है, वहीं यह अंगुलि-निर्देश भी प्रत्यक्ष हो जाता है । वह उपेक्षणीय नहीं है । निरर्थक भी नहीं है, लेकिन वही अन्त भी नहीं है । उसी के सहारे गन्तव्य तक पहुँचा जा सकता है ।

उद्धरण - 206

मैं विश्व-बन्धुत्व और विश्व-प्रेम पर केवल लेख लिख सकता हुँ, केवल भाषण दे सकता हूँ; वह उस प्रेम और त्याग का व्यवहार कर सकती है।

उद्धरण - 205

विवेक से सत्य और असत्य का भेद खुल जाता है; वैराग्य से असत्य को परित्याग करने की शक्ति मिलती है । असत्य को छोड़ देने पर केवल सत्य ही बचता है; इसलिए कभी-कभी पुराण-ऋषियों ने असत्य का त्याग करने का ही उपदेश दिया है ।

उद्धरण - 204

झील, नदी, समुद्र में डूब जाने की घटनाएँ; तैरना ना जानते हुए भी तैराकी की लययुक्त गति से मुग्ध होकर पानी में कूद पड़ा था और डूब गया था ।

उद्धरण - 203

बुरे कामों में ही सहयोग की ज़रूरत नहीं होती। अच्छे कामों के लिए भी सहयोग उतना ही ज़रूरी है।

उद्धरण - 202

इसी प्रकार ‘नाम‘ से लेकर ‘आशा‘ तक सब आरे प्राण- रूपी चक्र में समर्पित हैं । सबकुछ प्राण के सहारे चल रहा है, प्राण को लक्ष्य में रखकर चल रहा है, प्राण ही पिता है, प्राण माता है, प्राण भ्राता है, प्राण भगिनी है, प्राण आचार्य है, प्राण ब्रह्मण है ।

उद्धरण - 201

लेखक या कवि या साहित्यकार के नाते विशिष्ट रुप में दूसरों के बीच में आने में मुझे संकोच ही नहीं, ग्लानि भी होती है, क्योंकि वैसा कुछ वैशिष्ट्य है तो अपनी साधना के क्षेत्र में ।

उद्धरण - 200

जीतकर आप अपनी धोखेबाजियों की डींग मार सकते हैं; जीत में सबकुछ माफ है। हार की लज्जा तो पी जाने की ही वस्तु है।

उद्धरण - 199

विवाह में जो आपसी बातचीत होती है वही हिंकार है; सबको सूचित करना प्रस्ताव है; पति-पत्नी का साथ शयन उद्गीथ है, अलग-अलग शयन प्रतिहार है, प्रेमपूर्वक जीवन बिताना निधन है (निधन अर्थात् व्रत-समाप्ति) ।

उद्धरण - 198

समझौता अपनी समझ में, कम कर पाता हूँ। कभी जहाँ सोचता भी हूँ कि वही व्यावहारिक होगा, वहाँ भी नहीं कर पाता- यानी युक्ति जिसे मानती है, वह भावना ग्राह्य नहीं होता, और तब भावना को अमान्य नहीं कर पाता ।

उद्धरण - 197

द्वेष का मायाजाल बड़ी-बड़ी मछलियों को ही फँसाता है। छोटी मछलियाँ या तो उसमें फँसती ही नहीं या तुरन्त निकल जाती हैं।

उद्धरण - 196

यह कभी मत भूलना कि ऐसा तप वास्तविक तप नहीं है जिसमें समस्त प्राणियों के सुख-दुख से अलग रहकर केवल अपने-आप की मुक्ति का ही सपना देखा जाता है ।

उद्धरण - 195

मुझे तो जान पड़ता है कि हमारे देश के दुखों का एक कारण यह है कि हमारे पास मुर्खों की कमी है और समझदार हिसाबी बुद्धि के लोगों का बाहुल्य, जो कि पद का वेतन देखते हैं, काम नहीं ।

उद्धरण - 194

विष ने जैसे चेतना को आक्रान्त कर दिया हो। जैसे नशे में चेतना एकांगी हो जाती है, जैसे फैला हुआ पानी एक दिशा में बहकर वेगवान हो जाता है, वही मनोवृत्ति उसकी हो रही थी।

उद्धरण - 193

तुम्हारा व्यक्तिगत प्रेम परम वैश्वानर के प्रेम की पहली सीढ़ी है । न वह उपेक्षणीय है, न लक्ष्य है । वह भगवान् की भेजी हुई एक ज्योति-किरण है जिससे अनन्त सम्भावनाओं के द्वार तक मार्ग साफ दिखाई दे जाता है । ऐसा ही समझकर अब मैं निश्चिन्त हो गया हूँ ।

उद्धरण - 192

जंगलों, वीरानों और खण्डहरों में रहकर मानवेतर सृष्टि को कुछ अधिक निकट से देखने का सुयोग पा गया हूँ -उसे स्वीकार कर लिया इसलिए सुयोग कहता हूँ, नहीं तो दूसरे बहुत से लोग उसे केवल लाचारी कहते यह जानता हूँ ।

उद्धरण - 191

आप कृषकों के शुभेच्छु हैं, उन्हें तरह तरह की रियायत देना चाहते हैं, जमींदारों के अधिकार छीन लेना चाहते हैं, बल्कि उन्हें आप समाज का श्राप कहते हैं, फिर भी आप जमींदार हैं, वैसे ही जमींदार जैसे हजारों और जमींदार हैं।

उद्धरण - 190

कोहल मुनि भरत मुनि के प्रधान शिष्य थे । उन्हीं का सम्प्रदाय कोहलीय सम्प्रदाय कहा जाता है । ये लोग मानते हैं कि भरत मुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में केवल भारती वृत्ति का प्रवर्त्तन किया था, जिसमें शब्दों के द्वारा ही भाव प्रकट करने पर जोर दिया जाता है ।

उद्धरण - 189

सैनिक कर्म को मैं उच्च कोटि का मानव कर्म न समझता था, न अब समझता हूँ, न क्रान्तिकारी आन्दोलन के समय समझता था; न मैं यह मानता था कि वह मेरे लिए या मैं उसके लिए उपयुक्त हूँ । पर आपातकाल में उसे करना गलत भी नहीं मानता था ।

उद्धरण - 188

पुरानी कहावत है- नाटन खेती बहुरियन घर।

उद्धरण - 187

पति की कामना के लिए पति प्रिय नहीं होता, अपने आत्मा की कामना के लिए पति प्रिय होता है, पत्नी की कामना के लिए पत्नी प्रिय नहीं होती, अपने आत्मा की कामना के लिए पत्नी प्रिय होती है, पुत्रों की कामना के लिए पुत्र प्रिय नहीं होते, अपने आत्मा की कामना के लिए पुत्र प्रिय होते हैं ।

उद्धरण - 186

परिवर्तन के अनुकूल मानसिक स्वातन्त्र्य का वातावरण वहाँ हो, यह भी चाहूँगा। जिन देशों में वह अधिक हो, उन्हें अच्छा समझूँगा, क्योंकि उस स्वातन्त्र्य के बिना उन्नति और सुधार की गुंजाइश उतनी कम हो जाती है ।

उद्धरण - 185

बूढ़ों के लिए अतीत के सुखों और वर्तमान के दुःखों और भविष्य के सर्वनाश से ज्यादा मनोरंजक और कोई प्रसंग नहीं होता।

उद्धरण - 184

झूठी कहानियाँ गढ़-गढ़कर इनको भुलाता रहा हूँ । ये भी जानते हैं कि झूठ है, मैं भी जानता हूँ कि झूठ है । पर थोडे़ झूठ से इनके चेहरों पर थोड़ी देर के लिए चमक आ जाती है ।

उद्धरण - 183

फिर मरजाद भी तो पालना ही पड़ता है। खेती में जो मरजाद है, वह नौकरी में तो नहीं है।

उद्धरण - 182

अनुभव तो घटित का होता है, पर अनुभूति संवेदना और कल्पना के सहारे उस सत्य को आत्मसात् कर लेती है जो वास्तव में कृतिकार के साथ घटित नहीं हुआ है ।

उद्धरण - 181

उन्हें अनुभव होता कि सहानुभूति भी एक बडा औषध है ।

उद्धरण - 180

दुनिया में बहुत कुछ बदलना चाहता हूँ कुछ उखाड़-पछाड़कर भी, पर जीवन के प्रति मेरा बुनियादी भाव आक्रोश का नहीं है ।

उद्धरण - 179

जैसे जौ को राजा कहते हैं, गेहूँ को चमार; इसलिए न कि गेहूँ बड़े आदमी खाते हैं, जौ हम लोग खाते हैं।

उद्धरण - 178

माँ, आज समाधि नहीं लग पा रही है । आँखों के सामने केवल भूखे-नंगे बच्चे और कातर दृष्टिवाली माताएँ ही दिख रही हैं । ऐसा क्यों हो रहा है, माँ?

उद्धरण - 177

मानव जीवन के प्रति उपेक्षा का भाव मुझमें बिल्कुल नहीं है, उसे मैं नगण्य नहीं मानता ।

उद्धरण - 176

हम परिस्थितियों के शिकार बने हुए हैं।

उद्धरण - 175

‘प्रियता प्राण से ही तो प्रकट होती है तभी तो कहते हैं । प्राण-प्रिये! इसलिए प्राण ही प्रियता है । प्राण के प्रेम के कारण ही तो याज्ञिक जो व्यक्ति यज्ञ के योग्य नहीं उसे भी यज्ञ करा देते हैं जो दान देने योग्य नहीं उससे भी दान ले लेते हैं प्राण के प्रेम के कारण ही जहाँ जाते हैं। वहीं यह भय भी बना ही रहता है कि कही कोई मार न डाले ।

उद्धरण - 174

यह देखो, यह मेरा दर्द- यह दृष्टिकोण ही रचयिता का नहीं है; दर्द दिखाकर सहानुभूति चाहना तो जीवन की सहज प्रवृत्ति है जो अपने को पीड़ित समझने वाले हर व्यक्ति में मिल सकती है ।

उद्धरण - 173

जिसकी आत्मा में बल नहीं, अभिमान नहीं, वह और चाहे कुछ हो, आदमी नहीं है।

उद्धरण - 172

मुझे लगता है कि हर आदमी के लिए सत्य का रास्ता अलग अलग होता है । आवश्यक नहीं कि सब एक ही मार्ग से चलकर परम तत्व तक पहुँचें । सच्चाई से अगर अपने स्वाभाव के अनुरूप चलो तो किसी पक्ष को पकड़कर सत्य तक पहुँच सकते हो ।

उद्धरण - 171

मुझ में साधारण होकर जीने का कोई आग्रह नहीं है, केवल सहज होना चाहता हूँ ।

उद्धरण - 170

हम अपने भीतर पूरी तरह यह स्वीकार करने कि कभी भी यह समाप्त हो जा सकता है- यानि निस्संग हो जावें- और उतनी ही सम्पूर्णता से यह भी अनुभव करें कि वह समाप्त नहीं हुआ है, चल रहा है- यानि विस्मय में डूब जावें, मेरे निकट जीवनानन्द का यह नुस्खा है ।

उद्धरण - 169

हम देवतापन के उस दर्जे पर पहुँच गये हैं, जब हमें दूसरों के रोने पर हँसी आती है। इसे तुम छोटी साधना मत समझा।

उद्धरण - 168

पारिवारिक सम्बन्ध चाहे वे वास्तविक हों या कल्पित, मनुष्य के अवचेतन को पवित्र और निर्मल बनाते हैं । जिस दिन लोग इस बात को भूल जाएँगे, उस दिन समाज उच्छिन हो जाएगा ।

उद्धरण - 167

मैं भी आतंकवादी दल से सम्बद्ध रहकर भी ‘कन्विंस्ड’ आतंकवादी नहीं रहा, पर मुझे इसमें बड़ी दिलचस्पी रही कि आतंकवादी का मन कैसे बनता है ।

उद्धरण - 166

बडे आदमियों की ईर्ष्या और वैर केवल आनन्द के लिए है।

उद्धरण - 165

एकान्त का तप बड़ा तप नहीं है, बेटा! देखो, संसार में कितना कष्ट है, रोग है, शोक है, दरिद्रता है, कुसंस्कार है । लोग दुःख से व्याकुल हैं । उनमे जाना चाहिए । उनके दुःख का भागी बनकर उनका कष्ट दूर करने का प्रयत्न करो । यही वास्तविक तप है ।

उद्धरण - 164

अगर यह अप्रीतिकर घोर कर्म करणीय है, और मैं अनिवार्य समझता हूँ कि वह किया जाये, चाहता हूँ कि वह किया जाये, तो तटस्थता अथवा उपेक्षा कैसे उचित है, यह कैसे क्षम्य है कि उसे मैं दूसरों पर छोड़ दूँ?

उद्धरण - 163

मैं अगर अपना ब्याह करके घर में कलह नहीं बढाता, तो यह मेरी नीच स्वार्थपरता है; अगर ब्याह कर लूँ तो वह विलासान्धता होगी।

उद्धरण - 162

गृहस्थ लोग जमीन जोतकर चावल-गेहूँ आदि उगाते हैं । जो जमीन जोती जाती है उसे कृष्ट भूमि कहते हैं । पर तपस्वी लोग बिना जोती जमीन में जो पौधे अपने आप उगते हैं । और फिर स्वयं पककर झड़ जाते हैं । ऐसे दानों से ही काम चलाते हैं । इसी को अकृष्ट- पच्य अन्न कहते हैं । ये अग्नि की सहायता से उबाले जाते हैं ।

उद्धरण - 161

दर्द में भी जीवन में आस्था, जीवन का आश्वासन - जो शेली के सन्दर्भ से ध्वनित होता है; और दर्द से मजकर व्यक्तित्व का स्वतंत्र विकास, ऐसा स्वतंत्र कि दूसरों को भी स्वतंत्र करे- जो अज्ञेय के सन्दर्भ में ध्वनित होता है ।

उद्धरण - 160

हमारा दान और धर्म कोरा अहंकार है, विशुद्ध अहंकार।

उद्धरण - 159

उसी गुरु ने मुझे पद और पदार्थ का भेद बताया । तब तक मुझे ज्ञान नहीं था कि पद और पदार्थ को जोड़नेवाला एक पदार्थ है प्रत्यय । वह आत्मा का धर्म है । मैं तो जान गया, पर अभी मैं उसे उपलब्ध नहीं कर पाया ।

उद्धरण - 158

अच्छा गद्य पढ़ने में मुझे अनिर्वचनीय आनन्द मिलता है ।

उद्धरण - 157

आप की चाटुकारिता को कोई कितना सीरियसली ले, यह आप की पोशाक पर निर्भर है- अगर आप अच्छे कपड़े पहने हैं तो आपकी की हुई प्रशंसा ठीक है और स्वीकार्य है, आप पारखी पत्र-प्रतिनिधि् हैं, अगर रद्दी कपड़े पहने हैं तो वह काम निकालने के लिए की गई झूठी खुशामद है, आप टुटपुंजिए रिपोर्टर हैं और तिरस्कार के पात्र।

उद्धरण - 156

कितनी बार सुनेगा? मेरे दादा ससुर कहते थे - मेरी पतोहू की एक एक आंख कोहिनूर हीरा है। मेरे पास दो-दो कोहिनूर हुए न? रानी विक्टोरिया के पास तो एक ही है।

उद्धरण - 155

कितना कमीना है यह सन्तोष, जो दूसरों को हारते और टूटते हुए देखकर होता है- क्या यह एक अत्यन्त विकृत ढंग की जिजीविषा नहीं है ।

उद्धरण - 154

‘खा’’ कहकर दामू ने बड़ा अमरूद बातरा को दिया और दूसरा स्वयं खाने लगा । बातरा भी खाने लगी । और ज्यों-ज्यों वह खाती जाती थी, उसके भीतर जीवन-शक्ति जागृत होती जाती थी....

उद्धरण - 153

विवाह की ग्रन्थि दो के बीच की ग्रन्थि नहीं है, वह समाज के बीच की भी है। चाहने से ही वह क्या टूटती है! विवाह भावुकता का प्रश्न नहीं, व्यवस्था का प्रश्न है। वह प्रश्न क्या यों टाले टल सकता है? वह गाँठ है जो बँधी कि खुल नहीं सकती। टूट भले ही जाए, लेकिन टूटना कब किस का श्रेयस्कर है ?

उद्धरण - 152

इस समय मेरी दुनिया की सीमाएँ हैं, पीछे यह चट्टान, सामने वह बादल और उसके पीछे उदय होने वाला चाँद, इधर मैं, और उधर तुम.....

उद्धरण - 151

स्नेह एक चिकना और परिव्यापक भाव है कि उसमें व्यक्तित्व नहीं रहते। स्नेही अपने स्नेह-पात्र को कभी ‘याद’ नहीं करता, क्योंकि वह उसे कभी भूलता नहीं, वह उससे इतना अभ्यस्त हो जाता है कि उसे कभी ध्यान नहीं होता कि इसे भी देखूँ, इसे देखने के लिए एक अलग, एक विशिष्ट प्रयत्न करूँ।

उद्धरण - 150

वर्तमान शिक्षा-पद्धति रास्ते में पड़ी कुतिया है, जिसे कोई भी लात मार सकता है।

उद्धरण - 149

जितना ही जिंदगी भरपूर होती है उतना ही इन्सान को मौत का मज़ाक सूझता है। इस वक़्त वह जिंदगी से सराबोर था और उसमें मौत का एक मज़ाक कौंधा।

उद्धरण - 148

पत्रकार साहित्यकार नहीं है, यह वह समझता था, साहित्यकार जो क्षणिक है उस में से सनातन की छाप को, या जो सनातन है उस की तात्क्षणिक प्रासंगिकता को खोजता और उस से उलझता है, पर पत्रकार के लिए क्षणिक की क्षणिक प्रासंगिकता ही सनातन है।

उद्धरण - 147

किशोर रात को जब तकिए पर सिर रखता है तो बहुत देर तक आंखें बंद कर दोनों भौंहों के बीच उस बिंदु को देखता रहता है जिसमें से अंधेरे के चक्कर निकल कर बाहर की तरफ फैलते रहते हैं।

उद्धरण - 146

बूढ़ों को चिन्ता किस बात की- एक ही जगह बैठे-बैठे पगुराते रहते हैं । अतीत की स्मृतियाँ कुरेदकर जुगाली करते हैं और फिर निगल लेते हैं ।

उद्धरण - 145

वह चाहती थी, अच्छी तरह साफ-सुथरे इंसान की तरह जीवन बिताये, चाहती थी कि उसका अपना घर हो, जिसके बाहर गमले में दो फूल लगाये और भीतर पालने में दो छोटे-छोटे बच्चों को झुलाए, और चाहती थी कि कोई और उस पालने के पास खड़ा हुआ करे, जिसके साथ वह उन बच्चों को देखने का सुख और अपने हाथ का सेंका हुआ टुक्कड़ बाँट कर भोगा करे....कोई और जो उसका अपना हो- वैसे नहीं जैसे मालिक कुत्ते का अपना होता है, वैसे जैसे फूल खुशबू का अपना होता है ।

उद्धरण - 144

वह मर सकती हैं, तो क्या मैं नहीं मर सकता! बड़े मजे में मर सकता हूँ। बुआ को यह बिलकुल मालूम नहीं है कि मैं किस आसानी से मर सकता हूँ। उनको पता भी नहीं, पर सच्ची बात यह है कि उनके बाद मैं जी ही नहीं सकता, जीऊँगा ही नहीं।

उद्धरण - 143

चुना है! साहित्य से क्या होगा? साहित्य के सहारे जीवन थोड़े ही चलता है? और साहित्य तो दूसरे कामों के साथ साथ भी हो सकता है। क्या डॉक्टर और वकील और प्रोफेसर लेखक नहीं हो सकते?

उद्धरण - 142

मेरे व्यक्तिगत जीवन में मानव के समष्टिगत जीवन का भी इतना अंश है कि समष्टि उसे समझ सके और उसमें अपने जीवन की एक झलक पा सके। मेरे जीवन में भी व्यक्ति और टाइप का वह अविश्लेष्य घोल है, जिसके बिना कला नहीं है, और जिसके बिना फलतः उपन्यास नहीं है।

उद्धरण - 141

किसी ने ड्राइवर का ड्राइविंग लाइसेंस छीना, किसी ने रजिस्ट्रेशन-कार्ड; कोई बैकव्यू मिरर खटखटाने लगा, कोई ट्रक का हॉर्न बजाने लगा। कोई ब्रेक देखने लगा। उन्होंने फुटबोर्ड हिलाकर देखा, बत्तियाँ जलायी, पीछे बजनेवाली घण्टी टुनटुनायी। उन्होंने जो कुछ भी देखा, वह ख़राब निकला; जिस चीज़ को छुआ, उसी में गड़बड़ी आ गई।

उद्धरण - 140

पर्यटन के मूलाधार है-बच्चे, युवा और स्त्रियां। सभी जानते हैं कि इन वर्गो की अपने देश के इतिहास में रूचि समाप्त हो चुकी हैं। बच्चे कार्टूनों और विज्ञान में रूचि ले रहे हैं, युवा मस्ती और कैरियर में, स्त्रियां फ़ैशन और मनोरंजन में।

उद्धरण - 139

मेरे काम में एक विशेष प्रकार की प्रतिष्ठा की बड़ी आवश्यकता है, क्योंकि जर्नलिस्ट को यों ही लफंगा समझ लिया जाता है और इसलिए उसके लिए दामन बचा कर चलने की विशेष आवश्यकता है।

उद्धरण - 138

शनिवार को पीतल के लोटे में शनि देवता की लोहे की आकृति लिए मंदिर के बाहर खड़े होकर ऊंची आवाज में ‘शनि महाराज, शनि महाराज‘ पुकारने वाले डाकौत का स्वर चौरस्ते की इस चहल-पहल में मिल जाता है।

उद्धरण - 137

बुढ़िया का कवच भी नीरन्ध्र नहीं है, कहीं उसमें भी टूट है- कहीं न कहीं वह भी मृत्यु से डरेगी और रिरियाकर कहेगी कि नहीं मैं मरना नहीं चाहती । एक प्रबल, दुर्दमनीय उल्लास, एक विजय का गर्व मेरे भीतर उमड़ आया ।

उद्धरण - 136

वह यों ही वहाँ चल रही है; क्योंकि उसे भूख तो लगी है, लेकिन भीख माँगने का उसका मन नहीं होता है। उसमें आत्माभिमान अभी तक थोड़ा-थोड़ा बाकी है, और उसे यह भी दीखता है कि इस इतने बड़े बहुत यथार्थ और बहुत यथार्थवादी शहर कलकत्ते में आकर भी वह यथार्थता को ठीक-ठीक समझ नहीं पाई है, उसके हृदय में कुछ रस की माँग रहती है।

उद्धरण - 135

प्रमोद, सच्ची-सच्ची कहूँ तो मैं ही परायी हो गयी हूँ। तुम सब लोगों के लिए मैं परायी हूँ। तेरी माँ ने मुझे धक्का देकर पराया बना दिया है। पर मुझे जहाँ भेज दिया है, प्रमोद, मेरा मन वहाँ का नहीं है। तू एक काम करेगा?

उद्धरण - 134

तुम नहीं समझते, हमारी परिस्थिति कितनी भयंकर है, कितनी विवश है कि ऐसे-ऐसे संगीन अभियोगों की भी हम जॉच नहीं कर सकते, उसके प्रमाण में या सफाई में ही कुछ पूछताछ नहीं कर सकते, कुछ जान नहीं सकते!

उद्धरण - 133

जीवन वैचित्रय का दूसरा नाम है। जिनके जीवन एकरूपता के बोझ से कुचले जाकर नष्ट हो गये हैं, उनके जीवन में भी इतनी घटनाएँ हुई होंगी कि एक सुन्दर उपन्यास बन सके। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपनी जीवनी लिखने लगे, तो संसार में सुन्दर पुस्तकों की कमी न रहे।

उद्धरण - 132

बैल अपनी क़ाबिलियत से नहीं, बल्कि अभ्यास के सहारे चुपचाप सड़क पर गाड़ी घसीटे लिये जा रहे थे।

उद्धरण - 131

संपूर्णानंद ‘वृहस्पति’ का मस्तिष्क बाथरूम में बहुत उर्वर हो जाता था। उनके जीवन के तमाम महत्वपूर्ण निर्णय, दांव, कूटनीति, स्वप्न, कार्यक्रम आदि बाथरूम में ही जन्मे थे और वहीं पर उन्होंने इन सबको स्वरूप दिया था।

उद्धरण - 130

हम अपने भीतर पका कर व्यथा को सौन्दर्य बनाते हैं- यही सृष्टि का रहस्य है, बल्कि यह तुम ने मुझे बताया था। पकाने में समय बीत जाता है, हम बूढ़े भी हो जा सकते हैं, परास्त भी हो सकते हैं, हमारी आकांक्षाएँ अधूरी भी रह जा सकती हैं- पर उस सब का कोई महत्व नहीं है, बूढ़े होने का नहीं, हारने का नहीं- महत्व है उस आन्तरिक शान्ति का जो पकने में मिलती है, उस तन्मयता का...मैं तो यही अनुभव करती हूँ।

उद्धरण - 129

वह वहीं अंदर दुबकी रहती है और कहते हैं कि जिस समय आदमी मरता है वह एक फिल्म की रील की तरह अपनी जी हुई जिंदगी को फिर बचपन से अभी तक पूरी-पूरी देखता है। लेकिन रिलीज हुई फिल्म की तरह वह उसमें कुछ बदल नहीं सकता।

उद्धरण - 128

जीवन सर्वदा ही वह अन्तिम कलेवा है जो जीवन देकर खरीदा गया है और जीवन जलाकर पकाया गया है और जिसको साझा करना ही होगा क्योंकि वह अकेले गले से उतारा ही नहीं जा सकता- अकेले वह भोगे भुगता भी नहीं ।

उद्धरण - 127

उनके ओंठ नीले थे और जिस हाथ में बेंत था, वह काँप रहा था। उनका चेहरा मानों राख से पुत गया था। ऐसा लगता था कि माँ अगले क्षण अपने को ही बेंत से न उधेड़ने लगें।

उद्धरण - 126

हमारी सभ्यता मानव की शैशवावस्था को बढ़ाने का अनन्त प्रयास है। वह चाहती है सुरक्षा, पुरुषत्व माँगता है साहस!

उद्धरण - 125

इतना और ऐसा निजी वह नहीं है कि उसके दावे को आप ‘एक आदमी की निजू बात’ कहकर उड़ा सकें, मेरा आग्रह है कि उसमें मेरा समाज और मेरा युग बोलता है कि वह मेरे और शेखर के युग का प्रतीक है।

उद्धरण - 124

वे बताती थीं कि हमें एक अच्छा रेज़र-ब्लेड बनाने का नुस्खा भले ही ना मालूम हो, पर कूड़े को स्वादिष्ट खाघ पदार्थों में बदल देने की तरकीब सारी दुनिया में अकेले हमीं को आती है।

उद्धरण - 123

वह अपने एक साक्षात्कार में कह चुके हैं कि उनके पिता, बाबा तब दंग रह गये थे जब जन्मवर्ष में उन्होंने नवरात्र बिना अपनी मां का दूध पिये गुज़ार दिया था क्योंकि मां के स्तनाग्र पसीने के कारण अशुद्ध हो गये थे और उनमें नमक का स्वाद लग गया था जो निश्चित ही सेन्हा नमक सरीखा फलाहारी नहीं था।

उद्धरण - 122

प्यार मिलाता है, व्यथा भी मिलाती है, साथ भोगा हुआ क्लेश भी मिलाता है, लेकिन क्या ऐसा नहीं है कि एक सीमा पार कर लेने पर ये अनुभूतियाँ मिलाती नहीं, अलग कर देती हैं, सदा के लिए और अन्तिम रूप से?’’

उद्धरण - 121

बात कुछ ऐसी है कि कलकत्ता अंग्रेजों द्वारा बसाए जाने के समय से ही उत्तर और दक्षिण या देसी और फिरंगी कलकत्ता में बंटा रहा है। फिरंगियों के अपने देश लौट जाने के बाद दक्षिण कलकत्ता में रहना दिन-ब-दिन हैसियत का माप होता गया।

उद्धरण - 120

इस सन्दर्भ में ‘क्षण’ वही है जिसमें अनुभव तो है लेकिन जिसका इतिहास नहीं है, जिसका भूत-भविष्य कुछ नहीं है, जो शुद्ध वर्तमान है, इतिहास से परे, स्मृति के संसर्ग से अदूषित, संसार से मुक्त । अगर ऐसा नहीं है, तो वह क्षण नहीं है.....

उद्धरण - 119

‘मानव-समाज केवल किसी एक युग का समाज नहीं है; देश-काल की रंगत लाने वाले लोकाचारों- व्यवहारों और मुहावरों- यहाँ तक कि सम्बन्धों के- विषयगत या बाहरी यथार्थ के सभी उपकरणों के- नीचे, परे, गहरे में मानव-समाज की एक दूसरी पहचान मिल सकती है जो युगातीत है जो समाज की पहचान से बढ़कर मानव की पहचान है, जिसका यथार्थ सामाजिक यथार्थ- भर न होकर मानवीय यथार्थ है।’’

उद्धरण - 118

एक बात कहती थी कि झट भूल जाती थी। उस समय उनके मन में ठहरता कुछ नहीं था। न विचार न अविचार, जैसे भीतर बस हवा हो और मन हल्का-फुल्का बस उड़-उड़ आना चाहता हो।

उद्धरण - 117

मणिका- वह एक शक्ति का एक विकृत और भ्रष्ट रूप था, जो ग्लानि जनक था, पर तिरस्कार्य नहीं- उसकी उपेक्षा नहीं होती थी।- मणिका की- उसकी श्रेणी की- आत्मा रोगग्रस्त थी, किन्तु थी आत्मा और वह रोग भी एक उसका अकेला नहीं था, वह आधुनिक आत्मा का रूझान ही था।’’

उद्धरण - 116

उपर्युक्त कथन के बाद यह कहने की तो आवश्यकता नहीं होनी चाहिए कि यद्यपि शेखर का जीवन-दर्शन सामान्यतया उसके लेखक का भी जीवन-दर्शन है, तथापि उसमें जहॉ-तहॉ शेखर जिन रेशनलाइजेशन या फैलेसीज की शरण लेता है वे शेखर की ही हैं, उसके लेखक की नहीं।

उद्धरण - 115

प्रायः सभी में जनता का एक मनपसन्द पेय मिलता था जिसे वहाँ गर्द, चीकट, चाय की कई बार इस्तेमाल की हुई पत्ती और खौलते पानी आदि के सहारे बनाया जाता था।

उद्धरण - 114

संपूर्णानंद ‘वृहस्पति’ का दावा था कि राम का धनुष, कृष्ण का सुदर्शन चक्र, कालीदेवी का खंजर आज भी इस देश के एक स्थान पर मौजूद हैं जिनको जल्द ही विश्व के दर्शनार्थ वह प्रस्तुत करेंगे। उनकी जिस किताब में यह बात थी उसमें यह भी लिखा गया था कि इस कड़ी में वह हनुमान जी की गदा ढूंढ़ने की अभिलाषा रखते थे किंतु वह संभव नहीं। क्योंकि राम, कृष्ण स्वर्गारूढ़ होकर देवलोक चले गये जबकि हनुमान जी अपनी गदा लिये आज भी पृथ्वी पर विचरण कर रहे हैं और एक पल के लिए अपनी गदा को छोड़ते नहीं हैं।

उद्धरण - 113

तुम्हारे मौन से मुझे जो इतना कष्ट होता है, मैं जो तुम्हारे इस व्यवहार से मर्माहत हो रही हूँ उस का कारण यही है कि जो मुझे मिल चुका है उसी को और पाना चाहती हूँ। और यह लालच कितना अनुचित है....मैं क्यों उदास होऊँ? मान ही लो कि तुम उदासीन हो रहे हो, कि तुम मुझ से दूर चले जाओगे, तो भी विषाद क्यों- अवसाद क्यों? जो कुछ भी मैं चाह सकती, वह मैंने तुम्हारे साथ में पाया है- प्यार भी, वासना भी, दोनों का चरम सुन्दर रूप-तब और लालच क्यों? तुम्हारा मौन मुझे खलता है क्योंकि मैं अधिकाधिक माँगती हूँ और वह सम्भव नहीं है, वह उचित भी नहीं है, अतीत को कोई भविष्य नहीं बना सकता......’’

उद्धरण - 112

कई परिवारों में बदले हुए समय के साथ अपने इतिहास को धोने-पोंछने की एक गहरी इच्छा कुछ उसी तरह पनप जाती है, जिस तरह आधुनिक माताओं में अपने बच्चों को कीटाणुमुक्त रखने की गहरी चिंता।

उद्धरण - 111

हमारे लिए सबसे पहले अनुभव है- जो अनुभूत नहीं है वह समय नहीं है । सूर्य की गति समय नहीं है, बल्कि उस गति के रहते क्रमशः जो कुछ होता है उसका होते रहना ही समय की माप है ।

उद्धरण - 110

‘यथार्थ की पकड़ की इस शब्द-बहुल चर्चा में, लोग दो चीजें मानकर चलते जान पड़ते हैं जो दोनों ही प्रश्नाधीन हैं- पहली यह कि ‘यथार्थ’ सब ‘बाहर’ होता है, सतह पर होता है, दूसरी यह कि यह इकहरा या एकस्तरीय होता है । जो दीखता नहीं है, या थोड़ा और आगे बढ़कर कह लें, कि जो गोचर नहीं है, वह यथार्थ नहीं है, यह एक नये प्रकार का अन्धापन है जिसे यथार्थ-बोध का नाम दिया जा रहा है ।’’

उद्धरण - 109

नहीं भाई, पाप-पुण्य की समीक्षा मुझसे न होगी। जज हूँ, कानून की तराजू की मर्यादा जानता हूँ।

उद्धरण - 108

मेरे यहाँ आने वाले लोगों में बुद्धि तो है, पर चरित्र नहीं, इसके लिए मुझे भी दुख है। हमारे दाँत तो बड़े-बड़े हैं, पर आँतें नहीं हैं- कौर बहुत बड़ा ले लेते हैं पर पचा नहीं सकते। आपको खाने में अनिच्छा दीखती है, लेकिन सिस्टम ठीक-ठाक है।’’

उद्धरण - 107

वह केवल उन सूत्रों को खोजने का साधन है, जो होते हैं प्रत्येक जीवन में, किन्तु जिन्हें देखने की शक्ति सदा नहीं होती

उद्धरण - 106

शहर का किनारा। उसे छोड़ते ही भारतीय देहात का महासागर शुरू हो जाता था।

उद्धरण - 105

एक बार उन्होंने किसी से कहा-“मैंने स्वयं यह नाम नहीं रखा है। दरसरल प्रभु स्वामी करपात्री जी महाराज मेरी विद्वता से प्रसन्न होकर मुझे ‘देवगुरू वृहस्पति’ संबोधन से पुकारने लगे थे, फिर यह चल निकला।“

उद्धरण - 104

प्रकृति न? लेकिन सभ्यता नहीं। आप देखते नहीं कि सभ्यता किस दर्प से कहती है कि प्रकृति असभ्य है? क्योंकि सभ्यता अप्राकृतिक है।

उद्धरण - 103

उनके रिश्तेदारों- मित्रों में जो बे-गाड़ी थे, उनसे किशोर बाबू ने दुआ-सलाम तक करने का झंझट नहीं पाल रखा था।

उद्धरण - 102

हम सब मूलतया सूर्यापासक हैं; और हमारे चिन्तन में चाहे जो कुछ हो, हमारे जीवन में सूर्य ईश्वर का पर्याय है । सूर्य और ईश्वर, सूर्य और समय, इसलिए सूर्य और हमारा जीवन- जहाँ सूर्य नहीं है वहाँ समय भी नहीं है ।

उद्धरण - 101

बिना कहानी की सम्यक् परिभाषा के कहा जा सकता है कि कहानी एक क्षण का चित्र प्रस्तुत करती है । क्षण का अर्थ आप चाहे एक छोटा काल-खंड लगा लें, चाहे एक अल्पकालिक स्थिति, एक घटना, प्रभावी डायलॉग, एक मनोदशा, एक दृष्टि, एक बाह्य या आभ्यन्तर झाँकी, संत्रास, तनाव, प्रतिक्रिया, प्रक्रिया....इसी प्रकार चित्र का अर्थ आप वर्णन, निरूपण, संकेतन, सम्पुंजन, रेखांकन, अभिव्यंजन, रंजन, प्रतीकन, द्योतन, आलोकन, जो चाहे लगा लें- या इनके जो भी जोड़-मेल।’’

उद्धरण - 100

जब दस मनुष्यों के सम्पर्क में आएगा, कहीं तेरे स्वार्थ पर चोट पहुँचेगी । उस समय अपना मतलब साधने के लिए झूठ नहीं बोलेगा, किसी बात को छिपाने को प्रयत्न नहीं करेगा । तभी न मालूम हो सकेगा कि तू सत्य पर दृढ़ है? अकेले अकेले तो हर आदमी सत्यवादी और धर्मनिष्ठ होने का दावा कर सकता है ।

उद्धरण - 99

हुक्का-पानी सब तो था, बिरादरी में आदर भी था, फिर मेरा ब्याह क्यों नहीं हुआ? बोलो। इसलिए कि घर में रोटी न थी। रूपये हों तो न हुक्का-पानी का काम है, न जात-बिरादरी का। दुनिया पैसे की है, हुक्का-पानी कोई नहीं पूछता।

उद्धरण - 98

एक ही विषय का ध्यान, उसी की धारणा और उसी की समाधि-इसी का नाम एकाग्रता है। ध्यान किसी और का धारणा किसी दूसरे की, और समाधि किसी अन्य की हुई तो योग कहाँ हुआ? ध्यान, धारणा और समाधि एकाग्र हो जाएँ तो योग हो जाता है।

उद्धरण - 97

मैं परम्परा द्रोही नहीं हूँ, न भारत द्वेषी ही हूँ । ना ही मैं निराशावादी हूँ । और तात्कालिक लाभ या उपयोगिता या सफलता के नाम पर नैतिक मूल्यों की उपेक्षा मुझे कभी अभीष्ट नहीं रही- मेरा आग्रह सदैव अवसर वाद के विरुद्ध और नैतिक मूल्य की रक्षा का रहा है ।

उद्धरण - 96

महाजन की धमकियाँ और कारिन्दे की बोलियाँ इस समारोह में बाधा नहीं डाल सकतीं। घर में अनाज नहीं है, देह पर कपड़े नहीं है, गाँठ में पैसे नहीं है, कोई परवाह नहीं। जीवन की आनन्दवृति तो दबायी नहीं जा सकती, हँसे बिना तो जिया नहीं जा सकता।

उद्धरण - 95

यदि तुम्हारे मन में उस तरुणी के प्रति ऐसी भावना हो कि उसके सुख के लिए तुम अपना सर्वस्व निछावर कर सकते हो, अपने प्राण तक दे सकते हो, तो मेरा अनुमान है कि वह तुम्हारी प्रेम-भावना है।

उद्धरण - 94

आज का साहित्यकार अनुभव करता है कि उसकी कहीं जड़ें नहीं है, वह उच्छिन्न और अनाधार है, और इस प्रकार वह तात्कालिक परिस्थिति का खिलौना बन जाता है ।

उद्धरण - 93

डरपोक प्रणियों में सत्य भी गूँगा हो जाता है। वही सीमेण्ट, जो ईंट पर चढ़कर पत्थर हो जाता है, मिट्टी पर चढ़ा दिया जाय, तो मिट्टी हो जायेगा। गोबर की निर्भीक स्पष्टवादिता ने उस अनीत के बख्तर को बेध डाला, जिससे सज्जित होकर नोखेराम की दुर्बल आत्मा अपने को शक्तिमान समझ रही थी।

उद्धरण - 92

विवाह धर्म-सम्मत होता है और शास्त्र के नियमों के अनुसार मान्य भी। उद्वाह भी ऐसा ही होता है, परन्तु उद्वाह में पति पत्नी को और पत्नी पति का ऊपर की ओर वहन करती है, अर्थात परस्पर की आध्यात्मिक चेतना को परिष्कृत करती है।

उद्धरण - 91

तो मानव यंत्र के सहारे उन्नति करता है और यंत्र को नैतिकता से कोई मतलब नहीं है, पर मानव ऐसा नहीं हो सकता कि उसे भी नैतिकता से कोई मतलब न रहे । यह तो हो सकता है कि वह कुछ अनैतिक करे, यह भी हो सकता है कि वह भरसक अनैतिक कुछ न करे । लेकिन नीति और अनीति के विचार से ही वह मुक्त हो जाए, यंत्र के साथ यंत्र हो जाए, ऐसा उसके लिए कम से कम अभी तक सम्भव नहीं हुआ है; और मैं आशा भी करता हूँ कि कभी सम्भव नहीं होगा ।

उद्धरण - 90

अपना-अपना भला-बुरा सब समझते हैं। आदमी इसलिए नहीं जनम लेता कि सारी उम्र तपस्या करता रहे और एक दिन खाली हाथ मर जाय। सब जिन्दगी का कुछ सुख चाहते हैं, सबकी लालसा होती है कि हाथ में चार पैसे हों।

उद्धरण - 89

‘बेटा मनुष्य की शक्ति ही कितनी है? वह दो ही खेल खेलता है- प्रिय को देवता बना लेता है या फिर देवता को प्रिय बना लेता है।

उद्धरण - 88

कम्युनिज्म मुझे पसन्द नहीं है, यह ठीक है । राजनीति में वह आततायी हुआ है, दर्शन वह अधूरा और पंगु बनाने वाला है । और भारतीय कम्युनिज्म कदम -कदम पर देश विरोधी और परदेश-निर्देशित सिद्ध हुआ है ।

उद्धरण - 87

साँप में विष है, यह जानते हुए भी हम उसे दूध पिलाते है। तोते से ज्यादा निठुर जीव और कौन होगा; लेकिन केवल उसके रूप और वाणी पर मुग्ध होकर लोग उसे पालते हैं और सोने के पिंजरे में रखते हैं।

उद्धरण - 86

छान्दोग्य में एक-से-एक फक्क्ड़ और अक्खड़ विचारक मिलते हैं जो रूढ़ियों के बिल्कुल कायल नहीं। ऐसा लगता है कि छान्दोग्य और बृहदारण्यक समकालीन उपनिषदें हैं और दोनों के रचयिताओं में एक प्रकार की प्रच्छन्न प्रतिस्पर्द्धा है।

उद्धरण - 85

मैं समझता हूँ कि माकि्र्सज्म के नाम पर जो जुल्म हुआ है, उसकी जड़ में यह भूल है कि उसे व्यापक जीवन-दर्शन मान लिया गया - इतना ही नहीं, उसे अन्तिम मान लिया गया स्वयं उसी की शिक्षा के विरूद्ध ।

उद्धरण - 84

स्त्री पुरूष से उतनी ही श्रेष्ठ है, जितना प्रकाश अँधेरे से। मनुष्य के लिए क्षमा और त्याग और अंहिसा जीवन के उच्चतम आदर्श हैं। नारी इस आदर्श को प्राप्त कर चुकी है। पुरूष धर्म और अध्यात्म और ऋषियों का आश्रय लेकर उस लक्ष्य पर पहुँचने के लिए सदियों से ज़ोर मार रहा है; पर सफल नहीं हो सका।

उद्धरण - 83

जिस प्रकार एक सूत्र में बँधा हुआ पक्षी पहले प्रत्येक दिशा में उड़ने की चेष्टा करता है और कहीं शान्ति न पाकर उसी स्थान पर बैठ जाता है जहाँ पर कि वह बँधा हुआ है, ठीक उसी प्रकार सौम्य मन प्रत्येक दिशा में उड़ने के बाद कहीं शान्ति न पाकर श्वास पर ठहर जाता है, क्योंकि मन श्वास से ही बँधा हुआ है ।

उद्धरण - 82

मैं इसीलिए लिखता हूँ कि स्वयं जानना चाहता हूँ कि क्यों लिखता हूँ - लिखे बिना इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिल सकता है ।

उद्धरण - 81

कलह के दानव क्षेत्र में आना चाहती हैं तो उससे समाज का कल्याण न होगा। मैं इस विषय में दृढ़ हूँ। पुरूष ने अपने अभिमान में अपनी कीर्ति को अधिक महत्व दिया। वह अपने भाई का स्वत्व छीनकर और उसका रक्त बहाकर समझने लगा, उसने बहुत बड़ी विजय पायी। जिन शिशुओं को देवियों ने अपने रक्त से सिरजा और पाला उन्हें बम और मशीनगन और सहस्त्रों टैकों का शिकार बनाकर वह अपने को विजेता समझता है। और जब हमारी ही माताएँ उसके माथे पर केसर का तिलक लगाकर और उसे अपनी असीसों का कवच पहनाकर हिंसा क्षेत्र में भेजती हैं, तो आश्चर्य है कि पुरूष ने विनाश को ही संसार के कल्याण की वस्तु समझा और उसकी हिंसा-प्रवृति दिन-दिन बढ़ती गयी और आज हम देख रहे हैं कि यह दानवता प्रचण्ड होकर समस्त संसार को रौंदती, प्रणियों को कुचलती, हरी-भरी खेतियों को जलाती और गुलज़ार बस्तियों को वीरान करती चली जाती है।

उद्धरण - 80

मेरे भीतर जो प्राणवायु है, वह तुम्हें देखकर बहुत चंचल हो गया है । तुम्हें दिखाई नहीं देता, पर मेरे भीतर भयंकर आँधी बह रही है । मैं नहीं जानता कि वह मुझे उड़ाकर कहाँ ले जाएगी । पर वह उड़ा रही है। मैं उड़ रहा हूँ ।

उद्धरण - 79

मेरा विश्वास है कि सभी कृतिकार- क्योंकि सभी लेखक कृतिकार नहीं होते, न उनका सब लेखन कृति होता है ।

उद्धरण - 78

मर्द में वह सामर्थ्य ही नहीं है। वह अपने को मिटायेगा, तो शून्य हो जायेगा। वह किसी खोह में जा बैठेगा और सर्वात्मा में मिल जाने का स्वप्न देखेगा। वह तेजप्रधान जीव है, और अहंकार में यह समझकर कि वह ज्ञान का पुतला है, सीधा ईश्वर में लीन होने की कल्पना किया करता है। स्त्री पृथ्वी की भाँति धैर्यवान् है, शान्ति-सम्पन्न है, सहिष्णु है। पुरूष में नारी के गुण आ जाते हैं, तो वह महात्मा बन जाता है। नारी में पुरूष के गुण आ जाते हैं, तो वह कुलटा हो जाती है। पुरूष आकर्षित होता है स्त्री की ओर, जो सर्वांश में स्त्री हो।

उद्धरण - 77

बेटा, लड़ाई-झगड़ा तो जिन्दगी का धरम है। इससे जो अपने हैं, वह पराये थोड़े ही हो जाते हैं। जब घर में चार आदमी रहते हैं, तभी तो लड़ाई-झगड़े भी होते हैं। जिसके कोई है ही नहीं, उसके कौन लड़ाई करेगा?

उद्धरण - 76

ऋषि ने बताया था कि सत्य में तीन अक्षर हैं । एक ‘स‘ है, एक ‘ति‘ है और एक ‘अ‘ है । पहला और तीसरा अक्षर सत्य है और बीचवाला मिथ्या है । इसका मतलब बालक की समझ में नहीं आया, लेकिन उसने अपने मन में यह निष्कर्ष निकाला कि आदि सत्य है और अन्त सत्य है, बीच का प्रपंच सब मिथ्या है ।

उद्धरण - 75

यही देवता से उऋण होने की छटपटाहट वह विवशता है जो लिखाती है- फिर वह ऋण परिशोध तत्काल हो जाये या वर्षों बाद- यह दूसरी बात है ।

उद्धरण - 74

मैं जानता हूँ, दौलत से आराम और तकल्लुफ़ के कितने सामान जमा किये जा सकते हैं; मगर यह भी जानता हूँ कि दौलत इन्सान को कितना खुद-गरज बना देती है, कितना ऐश-पसन्द, कितना मक्कार, कितना बेगैरत।

उद्धरण - 73

हालाँकि ऋषियों के बीमार होने की खबर भी बहुत कम ही मिलती है, पर दाद- जैसे रोग तो उन्हें हो ही नहीं सकते । कहते हैं, दाद की बीमारी सभ्यता की देन है । लोग ज्यादा कपड़ा पहनने लगे और दाद की बीमारी आ धमकी ।

उद्धरण - 72

सुनने का शौक बहुत है, पर कोई पूछता है कि ‘संगीत में रुचि है या नहीं?’ तो हाँ कहते झिझक जाता हूँ..... ।

उद्धरण - 71

बस यही कि जो मन में हो वही मुख पर हो ! मेरे लिए रंग रूप और हाव-भाव और नाजो-अन्दाज का मूल्य उतना ही है, जितना होना चाहिए ! मै वह भोजन चाहता हॅूं जिससे आत्मा की तृप्ति हो ! उत्तेजक और शोषक पदार्थों की मुझे जरूरत नहीं !

उद्धरण - 70

‘महाभारत‘ इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि जो इसमें है वही अन्यत्र मिल सकता है जो इसमें नहीं हैं वह कहीं नहीं मिल सकता (यदिहास्ति तदन्यत्र, यन्नेहास्ति न तत्क्वचित्), बल्कि इसलिए कि यह बहुत भारी हैं- वज़नी! महाभारत में ही कहा गया है कि तराजू के एक पलडे़ पर वेद रखे गए, दूसरे पर यह पाँचवाँ वेद रखा गया, यही वज़नी साबित हुआ ।

उद्धरण - 69

मैं समझता हूँ कि सचमुच अगर सोचने बैठूँ कि कौन सा महत्वपूर्ण निर्णय मैंने भावना को छोड़कर शुद्ध तर्क के या विवेक के आधार पर किया था, तो शायद उत्तर नहीं पाऊँगा ।

उद्धरण - 68

एक रमणी के हाथों से शराब का प्याला पाकर वह कौन भद्र पुरूष होगा, जो इनकार कर दे? यह तो नारी-जाति का अपमान होगा, उस नारी-जाति का, जिसके नयन-बाणों से अपने हृदय को बिधवाने की लालसा पुरूष-मात्र में होती है, जिसकी अदाओं पर मर-मिटने के लिए बड़े-बड़े महीप लालायित रहते हैं।

उद्धरण - 67

नाम को सामाजिक स्वीकृति मिली होती है । नामी, नाम से ही पहचाना जाता है । जिस नाम को सामाजिक स्वीकृति नहीं प्राप्त हुई, वह निरर्थक शब्दमात्र है । अर्थ, नामी है ।

उद्धरण - 66

तो कहूँ कि जो स्नेही या हितैषी हैं, या जिनका मन खुला है, या जिनमें शुद्ध जिज्ञासा है, उनके सामने जवाब देने का, उन्हें समझाने को, समाश्वस्त करने को, उनकी शंकाओं का समाधन या निवारण करने को, बराबर तैयार हूँ । जिनका स्नेह या विश्वास मुझे मिला है, उनके प्रति अपना दायित्व बहुत बड़ा मानता हूँ!

उद्धरण - 65

मैं समाज का अंग बने रहना चाहता हूँ, एक प्रदर्शित जन्तु नहीं ।

उद्धरण - 64

विवाह को मैं सामाजिक समझौता समझता हूँ और उसे तोड़ने का अधिकार न पुरूष को है, न स्त्री को। समझौता करने के पहले आप स्वाधीन हैं, समझौता हो जाने के बाद आपके हाथ कट जाते हैं।

उद्धरण - 63

मैंने उन्हें बताया कि ‘हजार‘ वस्तुतः ‘सहस्त्र‘ शब्द में विद्यमान ‘हस्त्र‘ का ही फ़ारसी उच्चारण है और इस शब्द द्वारा आर्य भाषा के विस्तृत परिवेश की सूचना मिलती है तो वे मुग्ध हो गए।

उद्धरण - 62

सच पूछिए तो मैं भी आरम्भ में लेखन जीवी नहीं था । मेरी पहली पुस्तक जब छपी तब मैं जेल में सरकार की मेहमाननवाजी से लाभ उठा रहा था; और दूसरी पुस्तक यद्यपि छपी मेरे जेल से आ जाने के बाद तथापि प्रकाशक से उसके लिखा पढ़ी कुछ अनुग्रहशील सम्पादकों की मध्यस्थता से पहले ही हो गई थी ।

उद्धरण - 61

सम्पत्ति और सहृदयता में बैर है।

उद्धरण - 60

फिर भी झूठ तो झूठ ही होता है । इससे बचने का शिष्ट तरीका ’मौन’ है- ऐसा मौन जिससे सुनाने वाले को पता ही न चले कि सुनने वाले के मन में क्या प्रतिक्रिया हो रही है ।

उद्धरण - 59

पर कष्ट के दिन मैंने न जाने हों, लगातार दो चार दिन लाचारी की फाकाकशी के अवसर ना जाने हों, दुकानों के सामने खड़े होकर फल मिठाई आदि का बेबस काल्पनिक आस्वादन न किया हो, ऐसा नहीं है ।

उद्धरण - 58

संकट की चीज लेना पाप है, यह बात जन्म-जन्मान्तरों से आत्मा का अंश बन गयी थी।

उद्धरण - 57

महाभारत में कहीं लिखा है कि जो आदमी सतहत्तर वर्ष, सात महीने, सात दिन जी जाता है वह देवता बन जाता है, सो उनके विचार से मैं इतनी उमर पार कर गया था ।

उद्धरण - 56

पर एक गहरे स्तर पर एक अव्यक्त और अमुखर बन्धन हमें बाँधे हुए है, ऐसा मैं जानता हूँ। उतना ही काफी भी समझता हूँ- क्योंकि उतना शक्ति देता है, उससे अधिक जो होता है वह अवरोध करता है, व्यक्ति के विकास में बाधक होता है ।

उद्धरण - 55

रूपया ही सबकुछ नहीं है भैया, कुछ अपना धरम भी तो है।

उद्धरण - 54

वे परामर्श कम और स्वीकृति अधिक चाहते थे।

उद्धरण - 53

पिता ने ‘दान न लेने’ के सिद्धान्त को इतना उत्कट रुप दे दिया था कि जहाँ कुछ ‘दिए गए’ होने की बू भी हो, वहाँ वह बदले में दुगुना देकर शोध करते थे ।