उद्धरण - 192

जंगलों, वीरानों और खण्डहरों में रहकर मानवेतर सृष्टि को कुछ अधिक निकट से देखने का सुयोग पा गया हूँ -उसे स्वीकार कर लिया इसलिए सुयोग कहता हूँ, नहीं तो दूसरे बहुत से लोग उसे केवल लाचारी कहते यह जानता हूँ ।

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