लम्बे-चौड़े मैदान में एक ही स्थान पर खड़े रहकर जिन्दगी भर बाएँ-दाएँ करते रहने से बेहतर है अपनी सम्भावनाओं और क्षमताओं के लिए नए क्षितिज खोजना और किसी ऊपर पड़े खेत को हरा-भरा बनाना!
अगर पुराने जमाने की नगर देवता की और ग्राम-देवता की कल्पनाएँ आज भी मान्य होती तो मैं कहता कि इलाहाबाद का नगर देवता जरूर कोई रोमैण्टिक कलाकार है। ऐसा लगता है कि इस शहर की बनावट गठन जिन्दगी और रहन-सहन में कोई बँधे-बँधाये नियम नहीं कहीं कोई कसाव नहीं हर जगह एक स्वच्छन्द खुलाव एक बिखरी हुई-सी अनियमितता।
बाबू को ऐसे अस्वीकार से उतना ही खिसियाया दुख होने लगा जितना कि बढ़िया हड्डी ढूँढ़कर ड्राइंग-रूम में मालिक को दिखाने पहुँचे पालतू कुत्ते को मालकिन की दुत्कार से होता होगा।
क़िस्सा का नगर ऐसा नगर है जहाँ हमारे पूर्वज हमेशा जिन्दा रहते हैं। वे जिन्दा लोगों के साथ ज़िन्दा लोगों की तरह बोलते-बतियाते हँसते-गाते और बाज वक़्त नाराज़ भी होते हैं। हालाँकि क़िस्सों के शहर की गलियाँ चौराहे घर चीजें और लोगबाग ठीक-ठीक वैसे ही नहीं होते जैसे वो वास्तव में थे। क़िस्सों का नगर क़िस्सों ने रचा है उसमें आना है तो तथ्यों को ढूँढ़ने की जिद छोड़कर आओ।
बैगन को ‘भांटा‘ कहते, गुड़ को ‘भेली‘, लेटने को ओलरना, टायलट को पाखाना, पैर को गौड़, कच्छी को जांघिया की संज्ञा से नवाज़ते। कोई मोबाइल पर बात कर रहा होता तो कहते- हेल्लो बेल्लो कर रहा है।