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Showing posts from April, 2020

उद्धरण - 311

सच-सच कहती हूँ, प्रमोद। किसी और से नहीं कहा, तुझे कहती हूँ। बेंत खाना मुझे अच्छा नहीं लगता है। न यहाँ अच्छा लगता है, न वहाँ अच्छा लगता है।

उद्धरण - 310

क्या यह जरुरी है कि ‘मैं प्यार करता हूँ’ इस वाक्य का अनिवार्य अनुवर्ती हो यह प्रश्न कि ‘किसे प्यार?’ और वह ‘कौन’ भी एक ही हो? क्या सारी मानवता को ही प्यार नहीं किया जा सकता, क्या प्यार को ही प्यार नहीं किया जा सकता।

उद्धरण - 309

उस में जीवन है, जीवन की लालसा है- ऐसी जो उसे कई दिशाओं में अन्वेषण को प्रेरणा देती है। पढ़ने में बहुत अच्छी है, लेकिन सोचता हूँ, आगे क्या? तो खेद होता है कि हमारे देश में लड़की के लिए सिवाय मास्टरी के या इधर कुछ-कुछ डाक्टरी के और कोई कैरियर ही खुला नहीं है।

उद्धरण - 308

हूँ, हिन्दी में क्या रखा है? अंग्रेजी में लिखकर कुछ प्रतिष्ठा भी बनेगी। अच्छी आमदनी न हो, तो कम से कम प्रतिष्ठा से ही आदमी सन्तोष कर लेता है। हिन्दी से क्या मिलेगा?

उद्धरण - 307

थोड़ी देर में उसका यह मतलब निकला कि काम के मारे नाक में दम है। इतना काम है कि अपराधों की जाँच नहीं हो पाती, मुक़दमों का चालान नहीं हो पाता, अदालतों में गवाही नहीं हो पाती। इतना काम है कि सारा काम ठप्प पड़ा है।

उद्धरण - 306

लेकिन और भी वजहें हैं : जैसे यह कि पिछली सरकार निकम्मी और भ्रष्ट थी। अविवेकी थी। उसकी योजनाओं और कार्यक्रमों के पीछे एकमात्र उद्देश्य होता था- सरकारी धन की लूट। उसके भ्रष्टाचार ने नये प्रस्तावों को चुना लगाया और उसके निकम्मेपन ने हमारे बचे हुए पर्यटन स्थलों में इतनी अव्यवस्था बढ़ा दी कि पहले जैसा महौल नहीं रहा।

उद्धरण - 305

यह तो किशोर को बाद में जाकर कई दशकों के बाद अहसास होता है कि जब शत्रु का चेहरा खोजने पर अपना ही चेहरा शीशे में नजर आने लगता है तो सारे सपने धुंधला जाते है।

उद्धरण - 304

ईश्वर भी शायद स्वेच्छाचारी नहीं है- उसे भी सृष्टि करनी ही है क्योंकि उन्माद से बचने के लिए सृजन अनिवार्य है; वह सृष्टि नहीं करेगा तो पागल हो जायेगा ।

उद्धरण - 303

रोटी, कपड़ा, आसरा, हम चिल्लाते हैं, ये सब ज़रूरी हैं, निस्सन्देह जीवन के एक स्तर पर ये सब निहायत ज़रूरी हैं लेकिन मानव-जीवन की मौलिक प्रतिज्ञा ये नहीं हैं; वह है केवल मानव का अदम्य, अटूट संकल्प.............