क्या यह जरुरी है कि ‘मैं प्यार करता हूँ’ इस वाक्य का अनिवार्य अनुवर्ती हो यह प्रश्न कि ‘किसे प्यार?’ और वह ‘कौन’ भी एक ही हो? क्या सारी मानवता को ही प्यार नहीं किया जा सकता, क्या प्यार को ही प्यार नहीं किया जा सकता।
उस में जीवन है, जीवन की लालसा है- ऐसी जो उसे कई दिशाओं में अन्वेषण को प्रेरणा देती है। पढ़ने में बहुत अच्छी है, लेकिन सोचता हूँ, आगे क्या? तो खेद होता है कि हमारे देश में लड़की के लिए सिवाय मास्टरी के या इधर कुछ-कुछ डाक्टरी के और कोई कैरियर ही खुला नहीं है।
हूँ, हिन्दी में क्या रखा है? अंग्रेजी में लिखकर कुछ प्रतिष्ठा भी बनेगी। अच्छी आमदनी न हो, तो कम से कम प्रतिष्ठा से ही आदमी सन्तोष कर लेता है। हिन्दी से क्या मिलेगा?
थोड़ी देर में उसका यह मतलब निकला कि काम के मारे नाक में दम है। इतना काम है कि अपराधों की जाँच नहीं हो पाती, मुक़दमों का चालान नहीं हो पाता, अदालतों में गवाही नहीं हो पाती। इतना काम है कि सारा काम ठप्प पड़ा है।
लेकिन और भी वजहें हैं : जैसे यह कि पिछली सरकार निकम्मी और भ्रष्ट थी। अविवेकी थी। उसकी योजनाओं और कार्यक्रमों के पीछे एकमात्र उद्देश्य होता था- सरकारी धन की लूट। उसके भ्रष्टाचार ने नये प्रस्तावों को चुना लगाया और उसके निकम्मेपन ने हमारे बचे हुए पर्यटन स्थलों में इतनी अव्यवस्था बढ़ा दी कि पहले जैसा महौल नहीं रहा।
यह तो किशोर को बाद में जाकर कई दशकों के बाद अहसास होता है कि जब शत्रु का चेहरा खोजने पर अपना ही चेहरा शीशे में नजर आने लगता है तो सारे सपने धुंधला जाते है।
रोटी, कपड़ा, आसरा, हम चिल्लाते हैं, ये सब ज़रूरी हैं, निस्सन्देह जीवन के एक स्तर पर ये सब निहायत ज़रूरी हैं लेकिन मानव-जीवन की मौलिक प्रतिज्ञा ये नहीं हैं; वह है केवल मानव का अदम्य, अटूट संकल्प.............