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Showing posts from May, 2021

उद्धरण - 1120

आप तो उस बैल की तरह पीछे खींच रहे हैं जिसे पानी में पँवर के पार जाना हो। भिखारी ने मजाक में कौए की तरह गर्दन ऊपर-नीचे करके अपने सूत्रधार को देखा।

उद्धरण - 1119

गाँधीवादी संस्कृति का आश्रम सिंद्धांत के तौर पर उन्हें हमेशा खिझाता रहा था पाखंड जैसा लगता था। अगर ज़्यादा उदार भाव से वे उसे पाखण्ड न मानते तो उसे एक अव्यावहारिक प्रयोग तो समझते ही थे। अब आज उन्हें अचंभा हुआ कि वे खुद इन संस्थाओं को प्रगति की गारंटी दे रहे हैं।

उद्धरण - 1118

साधारणतः लोग जिस उचित-अनुचित के बँधे रास्ते से सोचते हैं उससे मैं नहीं सोचता। मैं अपनी बुद्धि से अनुचित-उचित की विवेचना करता हूँ। मैं मोह और लोभवश किए गए समस्त कार्यों को अनुचित मानता हूँ परन्तु हमेशा मैं अपने को इन दो रिपुओं से बचा नहीं सका हूँ।

उद्धरण - 1117

विद्या का फल तो यह होना चाहिए कि मनुष्य में धैर्य और सन्तोष का विकास हो, ममत्व का दमन हो, हृदय उदार हो न कि स्वार्थपरता, क्षुद्रता और शीलहीनता का भूत सिर चढ़ जाये।

उद्धरण - 1116

बेटा, बाप का कलेजा मोम का बना होता है। और बेटे को वह फौलाद का बना देखना चाहता है। तू ने किसी गलत काम में भी हाथ डाला होता तो मैं तब भी तेरे साथ होता जैसे साधजी उन कपूतों का संग दे रहा है। रुपया-पइसा सलाह-मशवरा ही है हमारे पास।

उद्धरण - 1115

जिन दिनों अमेरिका में विचारोंवाली कहानियाँ लिखी जा रही थीं और लोग किसी विचार को लेकर कोई फार्मूला तैयार कर रहे थे उसी बीच शेरवुड ऐंडरसन ने वाइन्सबर्ग ओहायों में एक छोटे-से कस्बे के लोगों के जीवन्त स्केचेज़ दिए। लोगों को यह नई चीज दिखी लोग उधर ही झुक गए। वह नई कहानियों का बाप बन बैठा।

उद्धरण - 1114

मानव-जाति दुर्बल नहीं है। अपने विकास-क्रम में वह उन्ही संस्थाओं, रीति -रिवाजों और परम्पराओं को रहने देती है जो उसके अस्तित्व के लिए बहुत आवश्यक होती है। अगर वे आवश्यक न हुई तो मानव उससे छुटकारा माँग लेता है।

उद्धरण - 1113

उसने खलीक को खलीक की ही एक रूबाई सुनाई जिसमें कहा गया है कि यह कविकुल श्रेष्ठ अपने नरक का सन्धान निर्माण स्वयं करेगा, कैसी भी सहायता इस सत्कार्य में उसे स्वीकार्य न होगी।

उद्धरण - 1112

दिन के उजाले में दिखती दुनिया में जितनी भी अच्छाइयाँ हैं सब रात की बदौलत हैं। रात में बुरे काम करनेवालों की आत्मा दिन में किसी शैतान के पास गिरवी रखी रहती हैं।

उद्धरण - 1111

आजकल विकास अपने आप में साध्य हो गया है। मै कहता हूं कि साध्य है मनुष्य की बेहतरी और विकास इसका उपाय है लेकिन इन दिनों पहिया उल्टा घूम रहा है।

उद्धरण - 1110

नाई देखते ही हजामत बढ़ जाती है। औरत जितनी भी गुणवती क्यों न हो भोगी के लिए उसका सिर्फ एक गुण है-भोगने की चीज़! नान्ह जातिवाला आदमी चाहे जितना भी ज्ञानी हो बड़ जातिवालों के लिए उसका सिर्फ एक उपयोग है-सेवा लेना।

उद्धरण - 1109

सर शहर के पार्कों में मैने देखा है गर्मी का मौसम आते-आते जाड़े के सारे रंग-बिरंगे फूल उजड़ जाते हैं। पर उनकी कुछ किस्में ऐसी भी होती हैं- जैसे पिटूनिया या वर्बीना जो गर्मी में भी बहुत दिन तक बची रहती है। वही हालत यहाँ भी है। पूरा बाग उजड़ चुका है। सिर्फ बाल विहार है जहाँ अभी तक हरियाली बाकी है। पर कब तक? ऐसा कब तक रहेगा?

उद्धरण - 1108

वह कुलभ्रष्टा स्त्री है उसके सद्गुणों का समाज में क्या मूल्य है? दुर्गणों की तो फिर भी कुछ-न-कुछ पूछ है ही। मैंने उसकी कोटरशायिनी आँखों को एक बार फिर देखा।

उद्धरण - 1107

भाई का अपने भाई की सिफारिश करना सर्वथा स्वाभाविक और मानव-चरित्रानुकूल है। इसे वह बहुत बुरा नहीं समझते थे किन्तु भाई का अहित करने के लिए नैतिक सिद्धान्तों का आश्रय लेना वह एक अमानुषिक व्यापार समझते थे।

उद्धरण - 1106

क्योंकि जवानों का जोश जितना गर्म होता है निराशा उतनी ही ठंडी। बुजुर्ग न जल्दी ताव पर चढ़ें और न हताशा में डूबें।

उद्धरण - 1105

पहली मई को मई दिवस था। पहली मई उनका जन्मदिन था। पहली मई से उनकी नौकरी खत्म हो रही थी।

उद्धरण - 1104

अपने अर्थशास्त्र के बावजूद वह यह समझता था कि आदमी की जिन्दगी सिर्फ आर्थिक पहलू तक सीमित नहीं और वह यह भी समझता था कि जीवन को सुधारने के लिए सिर्फ आर्थिक ढाँचा बदल देने-भर की जरूरत नहीं है। उसके लिए आदमी का सुधार करना होगा व्यक्ति का सुधार करना होगा।

उद्धरण - 1103

जमी हुई फिल्मी हस्तियों की पार्टी में विलायती दारू के साथ ईर्ष्या टूँगी जाती है और चरमोत्कर्ष बेहूदगी और बड़बोलेपन पर होता है। पिटी हुई और न उभर सकी हस्तियों की पार्टी शुरू ही बड़बोलेपन और बेहूदगी से होती है। लेकिन उसके चरमोत्कर्ष में देसी दारू के साथ-साथ भँड़ास भी बाहर उलट दी जाती है।

उद्धरण - 1102

कलारियाँ बंद होने के बाद लड़खड़ाते कदमों से घर लौटते और अक्सर रास्ता भूल जानेवाले लोगों को उसी तरह देखते जैसे एक धार्मिक आदमी ईश्वर को देखता है।

उद्धरण - 1101

शायद सुंदरता वह है जिसके बिछुड़ने पर, जिसके विदा होने पर हमें दुख हो, हम उदास हो जायें। और उसके होने पर हमें सुख हो, हम ख़ुश हो जायें, हमारी आंखें चमकने लगे। अफ़सोस की बात है कि आज बहुत कम चीजे़ ये तासीर पैदा करती हैं। सुंदरता तभी जन्म लेती है जब उसमें इन्सान, पशु, पक्षी किसी का भी जीवन भीतर से ख़ुशी पाये। इसलिए वही ख़ूबसूरत है जो भीतर से भी ख़ूबसूरत है।

उद्धरण - 1100

ये रेल का दैत उनहीं का बनावल है, नीचे कोइलौरी से कोइला निकाल लेते हैं ये माटी से लोहा बना लेते हैं। पानी को पेर कर बिजली बनाते हैं और समुन्दर को मथ कर रतन! तेलीफूँन से दूर-दूर तक बात कर लेते हैं। इतने परतापी कि इनके राज में सुरूज तक नहीं डूबता।

उद्धरण - 1099

उन्होंने तुरंत ऐतराज किया। वे खुद गाँवों को जहालत का गढ़ मानते थे पर उन्हें गवारा नहीं था कि उनके सामने कोई दूसरा आदमी गाँवों पर जहालत का आरोप लगाये और यह मानकर चले कि वे उससे सहमत होंगे।

उद्धरण - 1098

छह वर्ष के कठोर अनुभवों के बल पर मैं कह सकती हूँ कि तुम्हारी जड़ता ही अच्छी थी- मैं अभागिन थी जो तुम्हारा आश्रय छोड़कर चली आई। मेरे जीवन में जो कुछ घटा है उसे जानने की क्या जरूरत है?

उद्धरण - 1097

जिन्हें राष्ट्रीय उन्नति की धुन है वह प्रत्येक अवस्था में जाति-सेवा के लिए तैयार रहेंगे। मेरे विचार में जो लोग सच्चे अनुराग से काम करना चाहते हैं वह इस बन्धन से और भी खुश होंगे। इससे उन्हें अपनी अकर्मण्यता से बचने का एक साधन मिल जायेगा। और यदि हममें जाति-सेवा का अनुराग नहीं तो म्युनिसिपल हाल में बैठने की तृष्णा क्यों हो?

उद्धरण - 1096

बाबा अपना हुक्का सँभालने लगे। उन्हें माथे पर हाथ धरकर रोने की आदत नहीं। वैसे भी दुख को दुख की मुद्रा में लेकर कभी उन्होंने अपने आपको गम में नहीं डुबोया। हुक्का ताकत की ही नहीं तकलीफों को धुँआ के संग उड़ा देने की निशानी है।

उद्धरण - 1095

भैया नियमित शाम को पार्टी ऑफिस जाते। कभी द्विवेदी जी के यहॉं से होते हुए कभी उधर से लौटते द्विवेदी जी के यहाँ जाते। लेकिन मैंने देखा कि उनकी ज़िन्दगी का यह पहला या कहिए शायद अन्तिम भी - वक्त था जब वे पंडित जी के यहाँ जाने से बचना चाहते थे। और जाना काफी कम भी कर दिया था उन्होंने।

उद्धरण - 1094

वह यह जानता था कि समाज के सभी स्तम्भों का स्थान अपना अलग होता है। अगर सभी मन्दिर के कंगूरे का फूल बनने की कोशिश करने लगे तो नींव की ईंट और सीढ़ी का पत्थर कौन बनेगा?

उद्धरण - 1093

मनोहर देख रहा था उन बोतलों को जो अब नहीं पी जाएँगी, उस सितार को जो अब नहीं बजेगा और संगीतज्ञ पिता को जो अलग-थलग सोया हुआ था। देख रहा था विक्षिप्त उस माँ को जो स्कॉच व्हिस्की की बोतलें एक के बाद एक उँडेल रही थी अर्थी पर लेकिन जान रही थी कि वह जो अपने पर ही सोया हुआ है अब उठेगा नहीं।

उद्धरण - 1092

रात और दिन बनानेवाले की खोपड़ी अगर सीधी होती और ठीकठाक काम कर रही होती तो उसने रात जागने और भटकने के लिए बनाई होती और दिन सोने के लिए।

उद्धरण - 1091

जैसे तुम साथी की भावना में किसी की हिस्सेदारी पसंद नहीं करोगे वैसे ही शरीर में भी। जैसे तुम जिसे प्यार करते हो अपनी आत्मा की हर ख़ूबसूरती- अपनी आत्मा का समूचा अमृत उसे ही देना चाहते हो, वैसे ही शरीर का सारा वैभव, सारा सौन्दर्य उसे ही देना चाहोगे।

उद्धरण - 1090

”देखो भिखारी देखते-देखते समय की धारा कैसे बदल जाती है। गंगाजी की पुरनकी धारा में पानी नहीं रहा और यह जो नइकी धारा है यही असिल धारा हो गई। कल को यह धारा भी बदल जाएगी। तुम कहाँ जामे कहाँ जनमे कहाँ पले और आकर कहाँ आबाद हुए।”

उद्धरण - 1089

प्रशंसा की दुनिया में हर बात सही होती है यह भी थी। पर इतिहास के हिसाब से यह गल़त थी। पहला ग्रामदान बेतवा नदी के किनारे मँगरौठ नाम के गांव में पहले ही हो चुका था। अनेक सर्वोदयी यह बात जानते थे। पर किसी ने इस प्रशंसा का खंडन नहीं किया।

उद्धरण - 1088

बहुत छुटपन से ही मैं स्त्री का सम्मान करना जानता हूँ। साधारणतः जिन स्त्रियों को चंचल और कुलभ्रष्टा माना जाता है उनमें एक दैवी शक्ति भी होती है यह बात लोग भूल जाते हैं। सारे जीवन मैने स्त्री-शरीर को किसी अज्ञात देवता का मन्दिर समझा है। आज लोगों की आलोचना के डर से उस मन्दिर को कीचड़ में धँसा हुआ छोड़ जाना मेरे वश की बात नहीं है।

उद्धरण - 1087

क्रोध में आदमी अपने मन की बात नहीं कहता। वह केवल दूसरे का दिल दुखाना चाहता है।

उद्धरण - 1086

सर्वसम्मति से निणर्य हुआ कि स्कूल कब्रिस्तान में बनेगा। एक भीतरी बात और कि गाँव से लगा कब्रिस्तान मुसलमानों का महत्व दर्शाता है दूसरी यह कि मुसलमानों के भूतप्रेतों को आगे भी यही बसने दिया तो न मालूम वे कब नम्बरदार की जै जै बोलने लगें? कारण यह कि सक्का मुसलमान नम्बरदार के एहसान में दबे हैं। ऋण का एक इतिहास चला आ रहा है जिस तरह कांग्रेस से दबने का रवैया चला आ रहा है।

उद्धरण - 1085

मैंने आज तक ऐसे किसी आदमी की कल्पना नहीं की थी जिसके सारे दुखों, सारी परेशानियों, पराजयों, तिरस्कारों और अपमानों का विकल्प अध्ययन हो। चुनाव हारने और अच्छी-खासी नौकरी जाने का सियापा घर में हो और वह आदमी खर्राटे ले रहा हो या कमरा बन्द करके किसी लेख की तैयारी कर रहा हो या पढ़ी गई किताब से नोट्स ले रहा हो।

उद्धरण - 1084

चन्दर उन लड़को में से था जिनकी जिन्दगी बाहर से बहुत हल्की-फुल्की होते हुए भी अन्दर से बहुत गम्भीर और अर्थमयी होती है, जिनके सामने एक स्पष्ट उद्देश्य एक लक्ष्य होता है। बाहर से चाहे जैसे होने पर भी अपने आन्तरिक सत्य के प्रति घोर ईमानदारी यह इन लोगों की विशेषता होती है और सारी दुनिया के प्रति अगम्भीर और उच्छृंखल होने पर भी जो चीजें इनकी लक्ष्यपरिधि में आ जाती हैं उनके प्रति उनकी गम्भीरता साधना और पूजा बन जाती है।

उद्धरण - 1083

इस बात का पूरा अन्देशा है कि इस नावेल को कोई साला न छापे। छप भी जाए तो कोई साला न पढ़े। पढ़ भी ले तो कोई साला समझ न पाए। और समझ भी ले तो मारे जलन के कोई साला तारीफ न करे। मगर हमको है विश्वास हम होंगे कामयाब एक दिन। एक दिन देख लेना एक दिन।

उद्धरण - 1082

हर आत्मकथा का कुछ हिस्सा या बहुत बड़ा हिस्सा मनगढ़ंत या कल्पित होता है। और हर कथा या उपन्यास का कुछ हिस्सा या बहुत बड़ा हिस्सा आत्मकथात्मक होता है। बहुत कुछ बताने के अभिनय में बहुत कुछ छिपा जाने की चतुराई अंतर्निहित है। दोनों ही माल मिलावटी हैं। सोने में भी मिलावट न करो तो अच्छा गहना नहीं बनता फिर यह तो रचना है।

उद्धरण - 1081

मुझे बस नयेपन का अहंकार और उसकी बेमुरौव्वती असह्य हो गयी, मुझे नफ़रत हो गयी उससे। मेरी दिली ख़्वाहिश ऐसे समय में रहने की थी जहां नये पुराने दोनों की सुंदरताएं एक दूसरे को मज़बूती देती हों।

उद्धरण - 1080

गंगाजल नाई या कहार ढोकर ले आए थे, लकड़ी लोहार फाड़ रहा था। दूध-दही अहीर के घर से आया होगा, कलशा-परई कुम्हार दे गया होगा, दोना-पत्तल नट और डोम दे गए होंगे। आम के पल्लव एक मल्लाह का लड़का तोड़ कर गिरा रहा था, यह उसने खुद देखा अक्षत बनिया की दुकान से आया होगा कपड़े और दूसरी चीजों को भी ब्रह्मणों ने नहीं ही बनाया होगा। मगर ये सारे लोग अब इन्हें छू भी नहीं सकते।

उद्धरण - 1079

झीने खद्दर की बेशकीमती धोती और कुर्ते में सफेद खादी सिल्क की सदरी और कलफदार गाँधी टोपी के साथ उन्होनें अपने को मामूली आदमी बनाने की कोशिश की थी। कोशिश नाकामयाब थी और इसे वे किसी अंसतोष के बिना समझ भी रहे थे।

उद्धरण - 1078

ऐसा लगता था कि वह पान कम बेच रही थी मुस्कान ज्यादा। मुझे पहचानने की शक्ति का गर्व था। मैं हँसीवाली रूलाई और रूलाईवाली हँसी पहचानने में अपने को सिद्धहस्त समझता था।

उद्धरण - 1077

द्वेष में दूसरों को धनी समझने की विशेष चेष्टा होती है।

उद्धरण - 1076

अनुशासन पर धन हावी होता जा रहा था और राजनीति नोटों को देखकर अनुशासन से पल्ला छुड़ाने लगी थी।

उद्धरण - 1075

रामजी भैया मुझे अपने साथ लेकर गए थे दोपहर में उन्हें खाने के लिए भेजने! वे मचान पर खड़े होकर खेतों के बीच की पगडंडी देख रहे थे। न पगडंडी दिखाई पड़ रही थी न आदमी! बजरों के ऊपर एक तिरंगा हिलता-डुलता चला आ रहा था और झंडा गीत सुनाई पड़ रहा था।

उद्धरण - 1074

अपने व्यक्तिगत जीवन में डॉ शुक्ला अन्तर्विरोधों के व्यक्ति थे। पार्टियों में मुसलमानों और ईसाइयों के साथ खाने में उन्हें कोई एतराज नहीं था। लेकिन कच्चा खाना वे चौके में आसन पर बैठकर रेशमी धोती पहनकर खाते थे। सरकार को उन्होंने सलाह दी कि साधू और संन्यासियों को जबरदस्ती काम में लगाया जाए और मन्दिरों की जायदादें जब्त कर ली जाएँ लेकिन सुबह घंटे-भर तक पूजा जरूर करते थे।

उद्धरण - 1073

उनका कहना था कि जैसे अभी काँख सूँघकर तुममें कुछ ताजगी आई है, वैसे ही वहाँ की गन्ध सूँघकर तुम अपने तमाम बुर्जुआ बासीपन से छुटकारा पा जाओगे। उनका दावा था कि शैलेन्द्र के जो गीत इधर हिट हुए हैं वे खलीक के झोपड़े में चार घंटे बिताने पर मिली प्रेरणा के ही प्रसाद थे।

उद्धरण - 1072

जब से छुटि रेल कै गाड़ी कटिगा जंगल पहाड़, पैसा रहा सो गोड़े क सौंपेउँ पेटवा पीठि कै हाड़। (जब से ये रेल चली उसके रास्ते के जंगल और पहाड़ काट डाले गये। पास में से जो पैसा था उसे मैंने पैर को सौंप दिया याने उससे मैंने टिकट खरीद लिया। खाने के लिए पैसा बचा नहीं और पेट पीठ से जा लगा)

उद्धरण - 1071

ग़लत कह रहे हो कौन ऐसा होगा जिसे बच्चे, कोंपलें ओर ताज़ा खिले फूल अच्छे नही लगेंगे। लेकिन कल्पना करो कोई शिशु अपने से बड़ो को गालियां बकना शुरु कर दे या दौड़ा दौड़ा कर पीटना शुरु कर दे तो वह सुंदर लगेगा या तरस खाने योग्य? पुराने का जाना और नये को आकर पुराना होना और जाना इस नियम से मैं भी वाक़िफ़ हूं किंतु ऐसा भी नहीं होता कि किसी वृक्ष पर केवल नये पत्तों को ही रहने का अधिकार होता है। पतझड़ एक साथ पुरानी पत्तियों को नहीं उखाड़ देता है। इस तर्क से समाज में जो पिछड़े हैं, जो हाशिये पर हैं उनकी रुचियों, उनके रिवाजों, संस्कृतियों के लिए कोई जगह ही नहीं होनी चाहिए।

उद्धरण - 1070

चाँदनी रातों में चाँद के गिर्द जमा हुआ चिकना-चिकना उजाला कितना नरम कितना पवित्र! मन भागता उस ज्योतिर्लोक की ओर तारे-तारे पर पाँव रखते हुए टेढ़े चाँद के सामने आ खड़ा होता और चाँद को झूले की तरह झुला देता। जाने कब तक झूलता रहता चाँद।

उद्धरण - 1069

इधर उत्तर भारत में आचार्य शिशुओं की सी निश्छलता के साथ शिशुओं के ही भरोसे से कह रहे थे कि भूमिपतियों का हृदय बदलेगा वे अपनी ज़मीन भूमिहीनों में बाँटेंगे- जैसे अंतरिक्ष हवा को सूरज धूप को बाँटता है।

उद्धरण - 1068

मैं जिस बात से बचना चाहता था उसी से टकराना पड़ा। भाग्य को कौन बदल सकता है? विधि की प्रबल लेखनी से जो कुछ लिख दिया गया उसे कौन मिटा सकता है? अदृष्ट के पारावार को उलीचने में अब तक कौन समर्थ हुआ है?

उद्धरण - 1067

मुसीबत उन कठिनाइयों का नाम है जो दैवी और अनिवार्य कारणों से उत्पन्न हों। जान-बूझकर आग में कूदना मुसीबत नहीं है।

उद्धरण - 1066

धुन में बँधे आदमी को अपना निर्णय सौ फीसदी सही लगता है। तभी तो उसने आना-जाना कम कर दिया था और सारंग के मन में अपने लिए धिक्कार की भावना पैदा हुई थी- मुझे क्या हो गया है? मैं बदल गई हूँ? वह सारंग कहाँ गई जो गुरुकुल से अनुशासन भंग करने और लड़कियों को सिखाने के जुर्म में निकाली गई थी? गृहस्थ ने कमजोर कर दिया है मुझे जो सुरक्षा पर सुरक्षा ढूँढती हूँ?

उद्धरण - 1065

पढ़ने का सुख उसने तब जाना जब उसके बड़े बेटे को वज़ीफा मिला। उसी के पैसों में उसने बकरी खरीदी-अपने बच्चों के दूध पीने के लिए। वह चाहती थी कि उसके बेटे खूब पढ़े-बड़ा आदमी बनें! जिन्होंने उसे देखा था और बातें की थी वे नामवर के नामवर होने का श्रेय माँ को देते हैं। उसने अपने बेटों की पढ़ाई के लिए अपना गहना-गुरिया सारा कुछ बेच डाला था।

उद्धरण - 1064

आस्माँ के बादलों के दामन में अपने ख्वाब टाँक लेना और उनके सहारे जिन्दगी बसर करने का ख्याल है तो बड़ा नाजुक मगर रानी बड़ा खतरनाक भी है। आदमी बड़ी ठोकरें खाता है। इससे तो अच्छा है कि आदमी का नाजुकख्याली से साबिका ही न पड़े। खाते-पीते हँसते-बोलते आदमी की जिन्दगी कट जाए।

उद्धरण - 1063

सहानुभूति देकर अथवा जगाकर अगले को भावुकता के शिखर पर पहुँचाओ और फिर वहाँ से उसे एक यादगार धक्का दो। लखनवी कॉफी हाउस में कस्बे से आया हुआ मनोहर ऐसे ही धक्के खा-खाकर इटेलेक्चुअल सिनिसिज्म में दीक्षित हुआ था।

उद्धरण - 1062

महाराज का जयकारा लगता और फिर जनता लाठी मार-मारकर रावण को ढेर कर देती। बेजान पुतलों को पीटने में सब सूरमा थे। हमारा गुस्सा हमारी खीज इसी तरह अपने रास्ते तलाश लेती। बड़ी लड़ाइयाँ लड़ने की न तो तैयारी थी ना ही माद्दा।

उद्धरण - 1061

मैं इन्हें सांइस और तरक़्क़ी से जुड़ने के लिए इसलिए उत्साहित करता था कि मेरी निगाह में यही इंसानियत का भविष्य था। यही आदमी के लिए ज़रुरी था लेकिन ये तो ख़ुदग़र्ज़ और जंगली हो गये। जज़्बातों से शून्य हो गये। इन्हें बस पैसा, और अधिक पैसा चाहिए। ख़ुश रहने के लिए नहीं, दूसरों को पीछे छोड़ देने के लिए या दूसरों की भेड़चाल में शामिल हो जाने के लिए पैसा चाहिए।

उद्धरण - 1060

चकचक चाननी, पानी भरे बाभनी। लाल दुपट्टा ओढ़ के, मुनिया बइठल डाल पे मार गुलेला गाल पे, खून चुए रूमाल पे।

उद्धरण - 1059

वे स्वभाव के अड़ियल थे और इस अड़ियलपने को स्वाभिमान समझने के आदी थे। अपने जिस विवेक पर उन्हें बड़ा भरोसा था वह वास्तव में हर परिस्थिति में अपना हित समझने की चतुरता का ही दूसरा नाम था। उन्होंने विलायत जाकर बैरिस्टरी पढ़ी थी और अंग्रेजों की अनुशासन-प्रियता की कथाएँ या दंतकथाएँ उनके जीवन-दर्शन का मूलाधार थीं।

उद्धरण - 1058

स्नेह बड़ी दारूण वस्तु है ममता बड़ी प्रचंड शक्ति है; क्योंकि वृद्ध पिता के थके जीवन में भी एक और उपसर्ग आ जुटा और फिर भी वे अक्लान्त चित्त से मुझे सँभालते रहे। होम-वेदिका से उठकर जब वे अध्यापन के कुशासन पर बैठते तो मेरा धूलि-धूसर कलेवर प्रायः उनकी गोद में होता। मैंने उनसे जितना स्नेह पाया उतनी विद्या नहीं पाई।

उद्धरण - 1057

विपत्ति में भी जिस हृदय में सद्ज्ञान न उत्पन हो, वह सूखा वृक्ष है जो पानी पाकर पनपता नहीं बल्कि सड़ जाता है।

उद्धरण - 1056

मेरा बेटा पेट टाँगकर न आ गया होता। मर्द जात दस गली नाँखे तब भी नहीं जान सकता कोई। तू लुगाई की जात होकर मर्दों जैसा हौसला जुटा रही है? रेसमिया बैयर घी का मटका होती है आदमी की आँच पाए भसम उसी को होना पड़ता है। तू स्वाहा हो जाएगी।

उद्धरण - 1055

मास्टर के बड़े भाई थे सागर सिंह-सामाजिक व्यवहारकुशल और हँसमुख। वही घर के मालिक थे! छोटे भाई बाबूनन्दन गाने-बजाने वाले घुमन्तु और बैठकबाज थे। तीन भाई तीन रकम के थे। लेकिन ये तीनों भाई एक-दूसरे की बड़ी इज्जत करते थे।

उद्धरण - 1054

बादशाहों की मुअत्तर ख्वाबगाहों में कहाँ वह मजा जो भीगी- भीगी घास पर सोने में है, मुतमइन बेफिक्र लोगों की हँसी में भी कहाँ लुत्फ जो एक-दूसरे को देखकर रोने में है। कैफ बरदोश, बादलों को न देख बेखबर तू न कुचल जाय कहीं।

उद्धरण - 1053

कहते हो उसे तुम जानते नहीं साहिर तुम्हारा दोस्त नहीं फिर भी साहिर और उसमें क्या बात हुई क्या नहीं इसकी सचाई का अकेला गवाह तुम्हें ही माना जाए? और मान लो यह झूठ भी हो लेकिन अगर यही झूठ मुझे सच से भी अधिक सच लगता हो तो तुमसे क्या? मुझे यह बताओ उससे जाकर पूछोगे कि ऐसे तमाम सच से भी अधिक सच लगनेवाले झूठों से क्या करेगा वह?

उद्धरण - 1052

गप्पी एक रोशन दिमाग गप्पी था। उसका दिमाग कमाल का कारखाना था जिसमें निरन्तर गप्पों का उत्पादन होता रहता था। वह कुछ नहीं से बहुत कुछ बना सकता था। बित्तेभर की चीज़ को दस हाथ की बना सकता था। चिन्दी से पूरा थान बना सकता था। फूँक को तूफान बना सकता था।

उद्धरण - 1051

देश दुनिया की बात छोड़ों, यहीं इस चिरकुट से शहर में दर्जनों ऐसे हैं जो चांदी के प्याले प्लेट में चाय पीते हैं। एक शराब का ठेकेदार तो सोने के टी सेट में चाय पीता पिलाता हैं। कहता है कि इससे चाय के साथ स्वर्ण भी भीतर चला जाता है जिससे बुढ़ापा दूर भागता है और संभोग शक्ति में इज़ाफ़ा होता है।

उद्धरण - 1050

जुगनू को मुट्ठी में कैद कर लेता और उँगलियों में उभरती-मिटती ललछौंह आभा को अचरज से देखता । इस पर गाँव के सुहाग ने उसे बहुत डाँटा था कि उड़ कर कान में चला गया तो बहरे हो जाओगे।

उद्धरण - 1049

जैसे पृथ्वी और आकाश न डरते हैं, न क्षीण होते हैं, वैसे ही मेरे प्राण,तुम भी न डरो, न क्षीण हो। जैसे वायु और अंतरिक्ष न डरते हैं, न क्षीण होते हैं, वैसे ही मेरे प्राण,तुम भी न डरो, न क्षीण हो। जैसे मृत्यु और अमृत न डरते हैं, न क्षीण होते हैं, वैसे ही मेरे प्राण,तुम भी न डरो, न क्षीण हो। जैसे सत्य और अनृत न डरते हैं, न क्षीण होते हैं, वैसे ही मेरे प्राण,तुम भी न डरो, न क्षीण हो। जैसे भूत और भविष्य अभयशील हैं, क्षीण नहीं होते, वैसे ही मेरे प्राण,तुम भी न डरो, न क्षीण हो। उन शुरूआती दिनों में जब प्रेरणा का सबसे सशक्त स्रोत पुस्तकें थी वह सूक्त यहाँ तक कि उसकी याद भी उनकी धमनियों के रक्त-संचार को तेज़ कर देती थी।

उद्धरण - 1048

इस भटकन में मैंने कौन-सा कर्म नहीं किया? कभी नट बनता कभी पुतलियों का नाच दिखाता कभी नाट्य-मंडली संगठित करता और कभी पुराण-वाचक बनकर जनपदों को धोखा देता रहा; सारांश कोई कर्म छोड़ा नहीं।

उद्धरण - 1047

सर्वथा ज्ञानशंकर की ईर्ष्या-वृत्ति का ही दोष न था। ज्वालासिंह के बात-व्यवहार में वह पहले की-सी स्नेहमय सरलता न थी वरन् उसकी जगह एक अज्ञात सहृदयता एक कृत्रिम वात्सल्य एक गौरव युक्त साधुता पायी थी जो ज्ञानशंकर के घाव पर नमक का काम कर रही थी।

उद्धरण - 1046

पतझड़ में जिंदा पेड़ की पत्तियाँ जिस तेजी से गिरती हैं बसंत में कोंपलें उससे ज्यादा तेज रफ्तार से फूटती हैं। कोंपलें फूटी फूटकर हरिया आई। मचलने लगी हवा में बारिश में।

उद्धरण - 1045

पूरे गाँव में यही एक घर था जिसमें खेती-बाड़ी के सिवा बाहर से भी हर महीने सोलह रूपए की आय थी। और यह आय थी प्राइमरी स्कूल के मास्टर की। इन्हीं मास्टर का नाम नागर सिंह था और इन्हीं के बड़े बेटे हैं नामवर!

उद्धरण - 1044

धन्धे-व्यापार में सिफर। सिफर न होते तो जानते कि औरत के मामले में छपी हुई कीमत की अहमियत नहीं साथ में जो बारीक अक्षरों में लिखा होता है न कि स्थानीय टैक्स अतिरिक्त वही भारी पड़ जाता है।

उद्धरण - 1043

किस्मत से उसका कॉलेज भी ऐसा जिसमें दर्जों की खिड़कियों से आम की शाखें झाँका करती थी इसलिए हमेशा जब कभी मौका मिलता था क्लास से भाग कर गेसू घास पर लेटकर सपने देखने की आदी हो गयी थी। गेसू की कल्पना और भावुक सूक्ष्मता शायरी में व्यक्त हो जाती थी अतः उसकी जिन्दगी में काफी व्यावहारिकता और यथार्थ था लेकिन सुधा जो शायरी लिख नहीं सकती थी अपने स्वभाव और गठन में खुद ही एक मासूम शायरी बन गयी थी।

उद्धरण - 1042

बच्चों को बीच-बीच में पीटते रहने को बहुत ज़रूरी काम माना जाता था। स्कूलों में मास्टर भी बच्चों को मौका और बहाना निकालकर पीट दिया करते थे। बच्चों को पीटना एक किस्म से एहतियात बरतने की तरह था कि कहीं बच्चा बिगड़ न जाये।

उद्धरण - 1041

दरअसल मैं एक रोज़ दफ़्तर से लौटते समय वक़्त काटने के लिए एक पत्रिका ख़रीद लाया जिसमें मध्यवर्ग की- भारतीय मध्यवर्ग की- सफलताओं की दास्तान थी और बताया गया था कि इस मध्यवर्ग में बाईस लाख रु की घड़ियां और पच्चीस तीस हज़ार रुपयों के पेन ख़रीदने की ताक़त आ गयी है।

उद्धरण - 1040

पियास फिर से उगी आ रही है छिली हुई दाढ़ी की तरह।

उद्धरण - 1039

वे कॉफ़ी के प्याले को टकटकी बाँधकर देखते रहे। अचानक उन्हें लगा कि यह एक अभिनय है जो वे अपने आपको प्रभावित करने के लिए कर रहे हैं। तभी एक झटके के साथ उन्होंने सोचा कि सुदंरी की मौत का समाचार पाकर उन्हें वैसा झटका नहीं लगा जैसा कि उन्हें लगना चाहिए था जिसे महसूस करके वे अपने को एक सही संवेदनशील इन्सान मानने का संतोष प्राप्त् करते।

उद्धरण - 1038

यदि मैं कहूँ कि सरस्वती स्वयं आकर अपने पाणि-पल्लवों से मेरे पितृदेव के होमकालीन श्रम-सीकरों को पोंछा करती थीं तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति नहीं होगी क्योकि उषःकाल से लेकर सूर्योदय के दो मुहूर्तों तक निरन्तर हवन करने के बाद जब मेरे पिता पसीने से तर होकर उठते थे तो सीधे अध्यापन के कुशासन पर जा बैठते थे। यही उनका विश्राम था। इसी समय विद्यार्थियों को वेदाभ्यास कराते-कराते उनके श्रम-बिन्दु सूखते थे।

उद्धरण - 1037

मनुष्य जिस काम को हृदय से बुरा नहीं समझता उसके कुपरिणाम का भय एक गौरवपूर्ण धैर्य की शरण लिया करता है। मनोहर अब इस विचार से अपने को शान्ति देने लगा मैं बिगड़ जाऊँगा तो बला से पर किसी की धौंस तो सहूँगा नहीं। किसी के सामने सिर तो नीचा नहीं करता।

उद्धरण - 1036

सगी बहन भी होती तब भी तुम लापरवाही बरत सकते थे टाल सकते थे कि मेरी कौन सी घरवाली थी? घरवाली हो तब भी आदमी बहाना खोज सकता है कि मरने वाली चली गई केस-मुकदमा करके क्या होगा? गवाह-गिरफ्तारी के चक्कर में कौन फँसे? सजा हो भी जाए तब भी मरने वाला लौटता नहीं। मैं यह जानती हूँ कि औरत के मरने का गम ज्यादा देर भी नहीं मनाते। उम्र भर तो कौन मनाए?

उद्धरण - 1035

गेहूँ को ब्राह्मण देवता कहा जाता था!

उद्धरण - 1034

अब मोहतरमा तारीफ करूँ क्या उसकी ! अल्फाज ओछे पड़ते हैं मेरे। चाँद-सा खोपड़ा है माशाअल्लाह और चुसे हुए आम-से गाल। जिस्म से उसके सींको को रश्क है और कमर को उसकी सिजदे की आदत। पारसी सेठ बताया जाता है कोई। कभी साँझ-ढले अपनी इम्पाला गाड़ी में आपको सैर करा लाता है।

उद्धरण - 1033

मैं शादी से बहुत नफरत करती हूँ। शादी अपने को दिया जानेवाला सबसे बड़ा धोखा है। मैं उसके फूल तोड़कर फेंक देती हूँ। मुझे शादी से नफरत है शादी के बाद होने वाली आपसी धोखेबाजी से नफरत है और उस धोखेबाजी के बाद इस झूठमूठ की यादगार और बेईमानी के पागलपन से नफरत है। और ये गुलाब के फूल ये क्यों मूल्यवान हैं इसलिए न कि इसके साथ बर्टी की जिन्दगी की इतनी बड़ी ट्रैजेडी गुँथी हुई थी। अगर एक फूल के खूबसूरत होने के लिए आदमी की जिन्दगी में इतनी बड़ी ट्रैजेडी आना जरूरी है तो लानत है उस फूल की खूबसूरती पर!

उद्धरण - 1032

क़िस्से न होते तो कहानियाँ भी न होतीं। क़िस्सा क्या है? कहानी का कच्चा माल। क़िस्से को कहानी बनने में वक़्त लगता है एक पूरी प्रकिया से गुजरना पड़ता है।

उद्धरण - 1031

लेकिन बहुत जल्दी मोबाइल की घंटी ने हंसी का गिरेबान पकड़ लिया।

उद्धरण - 1030

वाह! पाँव सुलग रहा है। मन उमँग रहा है। देह झुलस रही है लेकिन मन हरियाला है। अचानक रस की कौन -सी फुहार झर उठी है अन्दर से! भुमुरिया को कई प्रकार से अलापता है-भू-मुरिया भु-मू-उ-उ-ऊ रिया भुमुरि-इ-इया। धम्म-से बैठ गया है-बबूल की छैया में। कितनी अच्छी पकड़ है! भूमुर माने गरम भउर राख। जिनगानी जेठ-बैसाख का भूमुर है। ऊपर कोई छाँह नहीं। हाय रे जनम!

उद्धरण - 1029

केतकी के बारे में कोई ख़ास बहस नहीं हुई। वह दूर के रिश्ते में उनकी भतीजी थी। उसने लंदन में आंतरिक साजसज्जा का प्रशिक्षण पाया था और इस वक्त अमरीकी बाज़ार में स्वच्छंद बर्छीबाजी़ करके-जिसे अंग्रेजी़ में फ्रीलांसिग कहते हैं- कुछ दिनों के लिए भारत आई थी। सरकारी खर्चे पर वह राजभवन तक आई और वहाँ की सुंदरता में अपनी कला का योगदान करके सरकारी ख़र्चे पर ही अमेरिका वापस चली गई।

उद्धरण - 1028

यद्यपि बाणभट्ट नाम से ही मेरी प्रसिद्धि है; पर यह मेरा वास्तविक नाम नहीं है। इस नाम का इतिहास लोग न जानते तो अच्छा था। मैंने प्रयत्नपूर्वक इस इतिहास से लोगों को अनभिज्ञ रखना चाहा है।

उद्धरण - 1027

न विद्या का दोष है न देश का अभाग यह हमारी फूट का फल है। सब अपना दोष है। विद्या से और कुछ नहीं होता तो दूसरों का धन ऐंठना तो आ जाता है। मूरख रहने से तो अपना धन गँवाना पड़ता है।

उद्धरण - 1026

बेटी की मइया सुख की नींद सोई है कभी? बूढी खेरापतिन इस व्यथा को गीत की लय में ढालने से पहले काँपती आवाज में यह सवाल जरूर पूछती हैं- घर की आबरू धिय-बेटी की देह में धजा की तरह नहीं गड़ी रहती भला?

उद्धरण - 1025

मास्टर ने बताया था कि चमारों की बस्तियॉं गन्दी बदबूदार और रोगाणुओं से भरी होती हैं। हवाएँ प्रायः पूरब पश्चिम और उत्तर से ही चलती हैं दक्खिन से नहीं। इसलिए रोग-व्याधि से गॉंव की मुक्ति चमटोल के दक्खिन बसने में ही है! देवी-देवताओं का वास भी उस दिशा में नहीं होता।

उद्धरण - 1024

दिक्कत यह है कि पढ़-पढ़कर इनके लिए साहित्य क्या ससुरा जीवन तक मौलिक नहीं रह गया। जब देखो गुरू यही कहते हैं कि सन्दर्भ : वह पुस्तक सन्दर्भ : वह नाटक सन्दर्भ : वह फिल्म। गोया किताबें इनके लिए जिन्दगी हो गई हैं और जिन्दगी इनकी ससुरी किताबी हो चली है।

उद्धरण - 1023

अपनी नाजुक टहनियों पर हँसते-मुसकराते हुए ये फूल जैसे अपने रंगों की बोली में आदमी से जिन्दगी का जाने कौन-सा राज कहना चाहते हैं। और ऐसा लगता है कि जैसे हर फूल के पास अपना व्यक्तिगत सन्देश है जिसे वह अपने दिल की पाँखुरियों में आहिस्ते से सहेज कर रखे हुए है कि कोई सुनने वाला मिले और वह अपनी दास्ताँ कह जाए।

उद्धरण - 1022

ज्य़ादा सतर्कता कभी कभी शातिर बना देती है बहक मुक्त करती है। बहक में उजाला है। बहक में रचने का सुख है। बहक में मजा़ ही मज़ा है।

उद्धरण - 1021

पहले वह डरीं कि यह उनके सामने कौन औरत बैठी है जो औरत नहीं शिराओं और झुर्रियों का विपुल संजाल है। जैसे झुर्रियों और शिराओं के बीच किसी औरत की डिज़ाइन बना दी गयी हैं।

उद्धरण - 1020

भरी दुपहरी जेठ की छाँहौ चाहति छाँह!

उद्धरण - 1019

वहाँ कुछ दिन पहले राज्यपाल-विरोधियों ने खबर फैलायी कि अगर कोई हरिजन राजभवन के सोफे पर बैठ जाए या कोआ पर्दा छू ले तो राज्यपाल उसका कपड़ा बदलवा डालते हैं। जो भी हो अफ़वाह इतनी ठेठ थी कि इसे फैलाने वाले तक इसे मजा़क की तरह पेश करते थे।

उद्धरण - 1018

देख रे बड़े दुख की बात बता रही हूँ। पुरूष का जन्म पाया है आलस छोड़कर काम कर। स्त्रियाँ चाहें भी तो आलस्यहीन होकर कहाँ काम कर सकती हैं? मेरे जीवन के वे दिन लज्जा और संकोच में ही निकल गए जब काम करने की ताकत थी। अब वृद्धावस्था में न तो उतना उत्साह रह गया है और न शक्ति ही।

उद्धरण - 1017

कहते हैं कि विद्या से आदमी की बुद्वि ठीक हो जाती है पर यहॉं उलटा ही देखने में आता है। यह हाकिम और अमले तो पढ़े-लिखे विद्वान् होते हैं लेकिन किसी को दया-धर्म का विचार नहीं होता।

उद्धरण - 1016

शोर ने मौत को चादर की तरह ढक लिया। दिन डूबने को था गाँव के घर खाली होते जा रहे थे। सारी जनता बिटौरा और घूरे के आसपास अँट गई।

उद्धरण - 1015

नाम जीयनपुर और जीवन का पता नहीं! हो सकता है जीवन की चाहत ने ही इसे जीयनपुर नाम दिया हो।

उद्धरण - 1014

आउट ऑफ कोर्स थ्योरी, हबीब-उल्लाह हास्टन लखनऊ अनवर्स्टी में सन् 1949 में बन्ने मियाँ ने प्रतिपादित की थी। इसमें कहा गया है कि जो ताल्बे-इलम इम्तहाने-जिन्दगी में कोर्स और कोर्स में भी महज इम्पोर्टेंट-इम्पोर्टेंट का घोटा लगाते हैं वही अव्वल दर्जे में पास होते हैं। बन्ने मियाँ ने इस थ्योरी को इश्किया मामलों पर भी लागू किया था और बताया था कि उन्हीं जवाँमर्दों के बिस्तर गरम हो पाते हैं जो सबसे पहले यह देखते हैं कि कौन लुगाई मुकद्दर बनानेवाले ने अपने सिलेबस में रखी है कौन नहीं? आउट ऑफ कोर्स लुगाई को पढ़ने में वक्त जाया होता है, नींद हराम होती है, सेहत खराब होती है, पैसा बरबाद होता है और सारी दौड़-धूप के बाद हाथ वही लगता है, समझें ना।

उद्धरण - 1013

जहाँ तक मैने समझा और पढ़ा है- प्रेम एक तरह की बीमारी होती है मानसिक बीमारी जो मौसम बदलने के दिनों में होती है मसलन क्वार-कार्तिक या फागुन-चैत। उसका सम्बन्ध रीढ़ की हड्डी से होता है। और कविता एक तरह का सन्निपात होता है।

उद्धरण - 1012

आख्यान के सारे ज़रूरी बंधन ढीले हो चुके थे। बंधन ढीले होते ही क़िस्से आवारगी शुरू कर देते हैं। एक हाथ आता है तब तक दूसरा नदारत। मेढकों को तौलने जैसा काम था। क़िस्सों को कतार में खड़ा करना मुमकिन नहीं।

उद्धरण - 1011

लगाव नहीं विफलता ने उन्हें यहां सें निकलने नहीं दिया था जिससे वह मां पिता पर गुस्सा उतारते थे, वार करते थे। अपना और उनका जीवन तबाह करते थे।

उद्धरण - 1010

मर ही जाता तो अच्छा होता। मुक्ति तो मिल जाती! बाप ने कैसे फटाकारा था उसे ! वही बाप जो बिगडै़ल बाभन राजपूतों के आगे कितने नरम सुर में बोलता है उसे काट खाने को दौड़ता है।

उद्धरण - 1009

जिस समय राजभवन के दीवानखाने में राज्य के मुख्यमंत्री महामहिम से मिलने का इंतजार कर रहे थे, खुद महामहिम अपने शयनकक्ष में एक सपना देख रहे थे। यह हलके बुखार में हलके नाश्ते के बाद की नींद का सपना था।

उद्धरण - 1008

बंगाल में दादी के साथ मजाक करने का रिवाज है दीदी इस बात को जानती थीं और कभी-कभी बड़ा करारा मजाक कर बैठती थीं। उन्हें राजगृह में एक सियार मिल गया था जो उन्हें देखकर तीन बार ठिठक-ठिठककर खड़ा हुआ-जैसे कुछ कहना चाहता हो! दीदी का विश्वास था कि वह बुद्धदेव का समसामयिक था और उसी युग की कोई बात कहना चाहता था; क्योंकि दीदी ने स्पष्ट ही उसके चेहरे पर एक निरीह करुण भाव देखा था। आहा उस युग के स्यार भी कैसे करुणावान होते हैं।

उद्धरण - 1007

रिसवत का पैसा देह फुला देता है।

उद्धरण - 1006

स्त्रियाँ जिंदगी के गीतों संस्कारजनित उत्सवों और रोजमर्रा की जररूतों के चलते अपने आपको प्राकृतिक लीला में उतार रही हैं! या कि भीतर से उमड़ते करुण खूँखार हाहाकार को पीकर महविनाश को चुनौती देती हुई जीने की अदम्य चेष्टा कर रही हैं। किस्से-कहानियाँ नहीं हैं गीतकथाएँ, जिंदगी और मौत के अनमिट दस्तावेज हैं।