उद्धरण - 1075

रामजी भैया मुझे अपने साथ लेकर गए थे दोपहर में उन्हें खाने के लिए भेजने! वे मचान पर खड़े होकर खेतों के बीच की पगडंडी देख रहे थे। न पगडंडी दिखाई पड़ रही थी न आदमी! बजरों के ऊपर एक तिरंगा हिलता-डुलता चला आ रहा था और झंडा गीत सुनाई पड़ रहा था।

Comments

Popular posts from this blog

उद्धरण - 797

उद्धरण - 549