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Showing posts from November, 2019

उद्धरण - 52

स्त्री को पुरूष के रूप में, पुरूष के कर्म में रत देखकर मुझे उसी तरह वेदना होती है, जैसे पुरूष को स्त्री के रूप में, स्त्री के कर्म करते देखकर। मुझे विश्वास है, ऐसे पुरूषों को आप अपने विश्वास और प्रेम का पात्र नहीं समझतीं और मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ, ऐसी स्त्री भी पुरूष के प्रेम और श्रद्धा का पात्र नहीं बन सकती ।

उद्धरण - 51

नया साहित्यकार अपने को तात्कालिक परिस्थिति के प्रति समर्पित कर दे सकता है । युगधर्म के नाम पर क्षणधर्मी होकर एक खतरनाक किस्म का अवसरवादी हो जा सकता है और अपनी चिन्तन की स्वाधीनता खो दे सकता है, अतीतोन्मुख होकर फिर एक बीती हुई परिस्थिति का लाना चाह सकता है, एक रूमानी लालसा उसे रूढ़िवादी ही नहीं बल्कि प्रतिक्रियावादी बना दे सकती है ।

उद्धरण - 50

‘जिसे वाणी व्यक्त नहीं कर सकती, किन्तु जो वाणी को अभिव्यक्ति प्रदान करती है, उसी को परम सत्य समझो उसे नहीं जिसकी लोग व्यर्थ उपासना करते हैं । जिसकी कल्पना करने में मन असमर्थ है, किन्तु जो मन की कल्पना करती है, उसी को परम सत्य समझो । जिसे देखने में नेत्र असमर्थ है, किन्तु जिसके द्वारा हम नेत्रों से देखते हैं, वही परम सत्य है ।

उद्धरण - 49

धन को आप किसी अन्याय से बराबर फैला सकते हैं। लेकिन बुद्वि को, चरित्र को और रूप को, प्रतिभा को और बल को बराबर फैलाना तो आपकी शक्ति के बाहर है। छोटे-बड़े का भेद केवल धन से ही तो नहीं होता। मैने बड़े-बड़े धन-कुबेरो को भिक्षकों के सामने घुटने टेकते देखा है और आपने भी देखा होगा ! रूप के चौखट पर बड़े-बड़े महीप नाक रगड़ते हैं क्या यह सामाजिक विषमता नहीं है? आप रूस की मिसाल देंगे ! वहाँ इसके सिवाय और क्या है कि मिल के मालिक ने राजकर्मचारी का रूप ले लिया है बुद्धि तब भी राज करती थी, अब भी करती है और अब हमेशा करेगी !

उद्धरण - 48

वैवाहिक जीवन के प्रभात में लालसा अपनी गुलाबी मादकता के साथ उदय होती है और हृदय के सारे आकाश को अपने माधुर्य की सुनहरी किरणों से रंजित कर देती है। फिर मध्याहृन का प्रखर ताप आता है, क्षण-क्षण पर बगूले उठते हैं और पृथ्वी कांपने लगती है। लालसा का सुनहरा आवरण हट जाता है और वास्तविकता अपने नग्न रूप में सामने आ खड़ी होती है। उसके बाद विश्राममय सन्ध्या आती है, शीतल और शान्त, जब हम थके हुए पथिकों की भाँति दिन-भर की यात्रा का वृत्तान्त कहते और सुनते हैं तटस्थ भाव से, मानो हम किसी ऊँचे शिखर पर जा बैठे हैं, जहाँ नीचे का जन-रव हम तक नहीं पहुँचता।

उद्धरण - 47

आप तो साहित्यकार हैं, आदर्श के लिए लिखते हैं । नाम का मोह तो आप को है नहीं । मेरी राय तो यही है कि आप ऐसी तरकीब कीजिए कि आप की चीज भी लोगों के सामने आ जाए और आपको कुछ लाभ भी मिल जाए । असल चीज तो यही है कि उत्तम साहित्य अधिक से अधिक लोगों के सम्मुख आए, लेखक के नाम से क्या आता जाता है? आखिर पुराणों, उपनिषदों के लेखकों का किसे पता है?

उद्धरण - 46

उन्होंने बताया कि वायु में ही समस्त वस्तु-जगत् का लय हो जाता हैः जब आग बुझती है तो वह वायु में ही लीन हो जाती है, जब सूर्य अस्त होता है तो वह भी वायु में ही विलीन हो जाता है जब जल सूख जाता है तो वायु में ही उसका विलय हो जाता है । इस प्रकार वायु में ही संसार के सम्पूर्ण पदार्थों का विलय हो जाता है ।

उद्धरण - 45

कौन कहता है कि हम-तुम आदमी हैं। हममें आदमियत कहाँ। आदमी वह है, जिनके पास धन है, अख्तियार है, इलम है। हम लोग तो बैल हैं और जुतने के लिए पैदा हुए हैं। उस पर एक दूसरे को देख नहीं सकता। एका का नाम नहीं। एक किसान दूसरे के खेत पर न चढे़ तो कोई जाफा कैसे करे, प्रेम तो संसार से उठ गया।

उद्धरण - 44

मैं कपड़े सी लेता हूँ, जूते गाँठ लेता हूँ, फर्नीचर जोड़ लेता हूँ, मिठाई पकवान बना लेता हूँ, जिल्दबंदी कर लेता हूँ। पंखे, साइकल, मोटर, बिजली के छोटे मोटे यंत्र- इनकी सफाई और थोड़ी बहुत मरम्मत कर लेता हूँ । विलायती ढंग के बाल काट सकता हूँ, चाभियाँ खो जावें तो ताले खोल दे सकता हूँ, सूत कात लेता हूँ, मामूली कढ़ाई कर लेता हूँ, मिट्टी के खिलौने बना लेता हूँ, काठ के ठप्पे खोदकर कपड़े छाप लेता हूँ, साँचे तैयार कर मूर्तियाँ बना लेता हूँ। प्रूफ देख लेता हूँ, कम्पोज कर लेता हूँ, प्रेस की मशीन चला लेता हूँ। फोटो खींचता हूँ, फिल्म और प्रिण्ट डेवलप कर लेता हूँ, हाथ से रंग लेता हूँ। घर की पूताई कर लेता हूँ, फावड़ा, कुल्हाड़ी, गैंती चला लेता हूँ, निराई कर लेता हूँ। बन्दूक पिस्तौल चला लेता हूँ। तैर लेता हूँ, दौड़ लेता हूँ, पहाड़ चढ़ लेता हूँ, क्रिकेट, टेनिस, बैडमिण्टन खेल लेता हूँ ।

उद्धरण - 43

मुश्किल यह है कि हिन्दी में लिखना जितना आसान है, उतना पढ़ना नहीं । लोग फटाफट लिख देते हैं । पढ़नेवाला मग़ज़ मारता रहता है । व्यक्तिगत अनुभव के बल पर कह सकता हूँ कि कुछ ऐसे लेखक हैं जिनकी एक पुस्तक पढ़कर समाप्त नहीं कर पाया तब तक उनकी चार पुस्तकें छप गई । अनाम भी कहीं वैसा ही लिक्खाड़ न निकले !

उद्धरण - 42

सिंह का काम तो शिकार करना है; अगर वह गरजने और गुर्राने के बदले मीठी बोली बोल सकता, तो उसे घर बैठे मनमाना शिकार मिल जाता। शिकार की खोज में जंगल में न भटकना पड़ता।

उद्धरण - 41

दुनिया से कोई भी विश्वास एकदम ग़ायब नहीं हुआ है । रूप बदलकर वह जी ही रहा है । नहीं जीता होता तो अपने को ‘प्रोग्रेसिव‘ या प्रगतिशील कहने और मानने वाले लोग विरोधी के पुतले क्यों जलाते, मुर्दाबाद के नारे क्यों लगाते? आदिम मनोवृत्ति जी ही रही है! जिएगी!

उद्धरण - 40

मुझमें ब्राह्णत्व का कोई भाव नहीं है, पर उनकी इस भावना को मैं समझ सका और ब्राह्णत्व से अलग करके भी उसे आदर्शवत अपने सम्मुख रखता रहा हूँ- कि यथा सम्भव दान में या ‘मुफ्त’ कुछ नहीं लूँगा ।

उद्धरण - 39

कृषक के जीवन का तो यह प्रसाद है। भोला के साथ वह छल कर था और यह व्यापार उसकी मर्यादा के अनुकूल था।

उद्धरण - 38

उन्होंने गम्भीर मुद्रा में बताया था कि यमराज के कार्यालय में चान्द्र गणना प्रचलित है, पर विधाता के दफ्तर में सौर गणना के हिसाब से काम होता है । यमरांज पितृयान-परम्परा पर चलते हैं और ब्रह्माजी देवयान-परम्परा पर ।

उद्धरण - 37

आशा में कितनी सुधा है!

उद्धरण - 36

तूफान में नाव को तैरते रखना ही सबसे बड़ा कर्तव्य होता है, लेकिन जब तूफान नहीं होता तब केवल तैरने से ही नाव कहीं नहीं पहुँच जाती, उसे खेना होता है, और ठीक दिशा में खेना होता है, जिसके लिए नक्शों की आवश्यकता होती है, और दिग्दर्शकों की, और कर्णधारों और समर्थ मल्लाहों की ।

उद्धरण - 35

लेकिन उसका सम्पूर्ण जीवन प्रकृति से स्थायी सहयोग है। वृक्षों में फल लगते हैं, उन्हें जनता खाती हैं; खेती में अनाज होता है, वह संसार के काम आता हैं; गाय के थन में दूध होता है, वह खुद पीने नहीं जाती, दूसरे ही पीते हैं; मेघों से वर्षा होती है, उससे पृथ्वी तृप्त होती है। ऐसी संगति में कुत्सित स्वार्थ के लिए कहाँ स्थान? होरी किसान था और किसी के जलते हुए घर में हाथ सेंकना उसने सीखा ही न था।

उद्धरण - 34

‘देवदत्त मर जाए‘ कहने से देवदत्त मर नहीं जाता, यह बात तो अब लोग कहने लगे हैं । बहुत आदिम काल में सोचते थे कि अगर ध्यानपूर्वक जप किया जाए तो देवदत्त पद नहीं । इस पद का अर्थ-पदार्थ- देवदत्त मर जाएगा । कोई चित्र बनाकर उसकी छाती में छुरा भोंके तो छुरा उस चित्र के अर्थ में- जीवन्त मनुष्य में- लग जाएगा!

उद्धरण - 33

विपन्नता के इस अथाह सागर में सोहाग ही वह तृण था, जिसे पकडे हुए वह सागर को पार कर रही थी। इन असंगत शब्दों ने यथार्थ के निकट होने पर भी, मानो झटका देकर उसके हाथ से वह तिनके का सहारा छीन लेना चाहा, बल्कि यथार्थ के निकट होने के कारण ही उनमें इतनी वेदना-शक्ति आ गयी थी। काना कहने से काने को जो दुःख होता है, वह क्या दो आँखों वाले आदमी को हो सकता है?

उद्धरण - 32

मैं जानता हूँ कि मैं असफलता के पथ पर हूँ । लेकिन भीतर कुछ कहता है कि उस पथ के अंत पर पहुँचकर जब पीछे देखुंगा तो कुल मिलाकर अपनी असफलता पर ग्लानि नहीं होगी, ना अपने को यह आश्वासन देना आवश्यक जान पड़ेगा कि इसकी पूर्ति अगले जन्म, या लोक में होगी- इसी लोक की उतनी मात्र उपलब्धि यथेष्ट होगी, ऐसा मुझे प्रत्यय है ।

उद्धरण - 31

अपनी सीमाओं, त्रुटियों, ओछाइयों को छिपाकर अपने को कुछ इस ढंग से दिखाना कि मैं सचमुच कुछ हूँ, यूँ ही तो किया है । छोटी-छोटी बातों के लिए संघर्ष को बहादुरी समझा है, पेट पालने के लिए छीना-झपटी को कर्म माना है, झूठी प्रशंसा पाने के लिए स्वाँग रचे हैं- इसी को सफलता मान लिया है । किसी बडे लक्ष्य को समर्पित नहीं हो सका, किसी का दुःख दूर करने के लिए अपने को उलीचकर दे नहीं सका । सारा जीवन केवल दिखावा, केवल भोंड़ा अभियन, केवल हाय-हाय करने में बीत गया ।

उद्धरण - 30

जब दूसरे के पाँवों-तले अपनी गर्दन दबी हुई है, तो उन पाँवों को सहलाने में ही कुशल है।

उद्धरण - 29

हर ईश्वर अपनी सृष्टि को देख कर हँसता है, पर कौन उससे अपने को काट लेता है। आपने मुझे नास्तिक बनाया था या नहीं, यह तो नहीं जानता- पर समझता हूँ कि ईश्वर भी सृष्टियों द्वारा अपना संघटन करता रहता है ।

उद्धरण - 28

सच मानिए कि हर हालत में साँप प्रकाशक ही है! बाकी यह लेखक की प्रतिभा पर निर्भर है कि वह मेंढक की तरह लील लिया जाता है, या कि छछूँदर की तरह ‘गीलै बनै न बनै बिनु गीलै’ की स्थिति में प्रकाशक के गले में अटका रहता है, या कि फिर नेवले की तरह उस पर हावी हो उठता है ।

उद्धरण - 27

योरोप प्रवास के समय अपने दैनन्दिन प्रवृत्ति के ब्यौरे के लिए लेखक ने एक खाता रखा था। परन्तु अधिकांश में उसमें एक मानसिक चर्चा का ही विवरण लिखा जाता रहा, ......... मान लिया गया है कि इसकी जिज्ञासाओं का स्वर निजी होने पर भी उनकी तत्व-वस्तु एक जमीन नहीं है। कोई विशेष क्रम नहीं रखा गया है- कम से कम कालानुक्रम तो नहीं ही है ।

उद्धरण - 26

... केवल आत्म-विस्मृति नहीं है बल्कि आरम्भ से ही एक अतिरिक्त आत्मचेतना का भाव है, क्योंकि सारी पुस्तक ही अपने विषय में है-- अपने व्यक्ति के, अपने जीवनानुभव के, अपनी रचना की प्रवृत्तियों के, अपने विश्वासों के और उन सूक्ष्म तत्वों के जिन्हें लेखक अपने कर्म के बुनियादी मूल्य या प्रतिमान मानता है ।..............आत्मनेपद निःसन्देह अत्यन्त आत्मचेतन (सेल्फकांशस) रचना है ।

उद्धरण - 25

विज्ञान में किसी वस्तु को हल्का करने के लिए उसे विरल कहते हैं और तब वह उड़ सकती है, पर मानवीय संवेदना में उसकी सघनता ही उसे एक स्तर पर ले जाती है जब वह धरातल से उठकर एक दिव्य वस्तु हो जाती है ।

उद्धरण - 24

...पर मैं- मैं तो राह पर हूँ । मैं बढ़ता और बदलता हूँ- अपने राग-विराग से मुक्त होता हूँ- यानी राग-विराग के एक पुंज से मुक्त होता हूँ, दूसरे से संग्रन्थित, नये सम्पर्कों में पड़कर पुरानों से असम्पृक्त होता हूँ ।

उद्धरण - 23

यों सूत्र आप चाहें तो कह दूंगा - स्वातन्त्र्य की खोज । फिर आप सूत्र की व्याख्या चाहेंगे और मैं कहूँगा कि वही तो शेखर है ।

उद्धरण - 22

ज्याँ क्रिस्तोफ के अनवरत आत्म-शोध और आत्म-साक्षात्कार का जो चित्र रोलाँ ने प्रस्तुत किया है, उससे मुझे अवश्य प्रेरणा मिली ।

उद्धरण - 21

प्रचलित नैतिकता का समर्थन-भर करने के लिए कला की साधना, कम से कम मुझे तो व्यर्थ मालूम होती है- और मेरा विश्वास है, किसी भी कला साधक को व्यर्थ मालूम होगी । क्योंकि कला को नैतिकता के प्रचलित रूप से कोई लगाव नहीं है - उसे तो नैतिकता के बुनियादी स्रोतों से मतलब है ।

उद्धरण - 20

शेखर में व्यक्तित्व का क्रमशः विकास होता है, नदी के द्वीप में व्यक्ति आरम्भ से ही सुगठित चरित्र लेकर आते हैं। हम जो देखते हैं वह अमुक स्थिति में उनका निर्माण या विकास नहीं, उनका उद्घाटन भर है ।

उद्धरण - 19

हमें लक्ष्य करना होगा कि जन-साहित्य सदा से और सबसे अधिक प्रतीकों और अन्योक्तियों के सहारे ही अपना प्रभाव उत्पन्न करता है ।

उद्धरण - 18

आज काव्य के पाठकों की जीवन-परिपाटियाँ इतनी भिन्न हो सकती हैं कि उन की विचार संयोजनाओं में समानता हो ही नहीं, ऐसे शब्द बहुत कम हों जिन से दोनों के मन में एक ही प्रकार के चित्र या भाव उदित हों ।

उद्धरण - 17

लम्बी कविताएँ भी होती हैं, हो सकती हैं, अच्छी भी हुई हैं, पर उनको कलात्मक एकता और गठन देने वाली चीज फिर दूसरी हो जाती है- भाव की संहति और तीव्रता नहीं । वह ढंग दूसरा है, और कहूँ कि मेरा वह नहीं है ।

उद्धरण - 16

यों भी मैं मानता हूँ कि भावना प्रधान कविता छोटी ही हो सकती है, नहीं तो अपने भावों का पैराफ्रेज़, होने लगता है ।

उद्धरण - 15

मेरे लिए रचना का यही आदर्श रहा हैः उसमें वस्तु-सत्य का, बाहरी यथार्थ का खरापन भी होना चाहिए, साथ ही आत्म-सम्बोध की, आभ्यन्तर यथार्थ की अर्थवत्ता भी होनी चाहिए ।

उद्धरण - 14

जो मुझे कहने के योग्य जान पड़ा है, उसे मैं न कहूँ ऐसी स्थिति में मैंने भरसक अपने को नहीं डाला है । उसको कम ही लोग समझेंगे इसलिए उससे इतर कुछ कहूँ या उसमें पानी मिलाकर उसे वितरित करूँ, यह प्रयत्न मैंने भरसक नहीं किया है ।

उद्धरण - 13

मैं उन व्यक्तियों में से हूँ- और ऐसे व्यक्तियों की संख्या दिन-प्रति-दिन घटती जा रही है, जो भाषा का सम्मान करते हैं और अच्छी भाषा को अपने आप में एक सिद्धि मानते हैं ।

उद्धरण - 12

रचना के लिए दो चीजें चाहिए : एक तो कलात्मक अनुभूति या संवेदना, दूसरे उसके प्रति वह तटस्थ भाव जो उसे सम्प्रेष्य बना सके ।

उद्धरण - 11

पर्यवेक्षण का क्षेत्र बढ़ाया जा सकता है, अनुभव की कमी को पूरा किया जा सकता है पर अनुभवगम्य यथार्थ से कट जाने पर उससे फिर सम्बन्ध जोड़ना कहीं कठिन होता है, और परिश्रम-साध्य होता है, अपने-आप तो कभी जुड़ ही नहीं सकता ।

उद्धरण - 10

उपन्यास अनिवार्यतया पूरे समाज का चित्र हो, यह माँग बिल्कुल गलत है।

उद्धरण - 9

कृति की महत्ता, या उसके स्थायित्व की सम्भावना, बाहर की बातों से कोई सम्बन्ध नहीं रखती, और लेखक के जीवन की घटनायें भी इस सन्दर्भ में बाहर की बातें हैं ।

उद्धरण - 8

अपने लिए, अर्थात् अपने को यह बात सप्रमाण दिखाने के लिए कि मेरी आस्था, मेरी निष्ठा, मेरे संवेदनाजाल की सम्पूर्णता और सच्चाई, मेरी इंटिग्रिटी उसमें अभिव्यक्त हुई है ।

उद्धरण - 7

लेकिन कसौटी मेरी समझ में यह होनी चाहिए कि क्या वह जिस भी वर्ग का चित्रण है, उसका सच्चा चित्र है - क्या उस वर्ग में ऐसे लोग होते हैं, उनका जीवन ऐसा जीवन होता है, संवेदनाएँ ऐसी संवेदनाएँ होती हैं- अगर हाँ तो उपन्यास सच्चा और प्रामाणिक है ।

उद्धरण - 6

यहाँ कहना होगा कि वे स्पष्ट कम ही कहे गए हैं, लेखक की ओर से तो बिल्कुल नहीं, पात्रों की उक्तियों या कर्मों में सीधे या प्रतीपभाव से ही वे प्रकट होते हैं ।

उद्धरण - 5

पात्र एक बार गढ़ा जाकर स्वतन्त्र अस्तित्व तो पा लेता है, पर स्वतंत्र का अर्थ असम्पृक्त तो शायद नहीं है ।

उद्धरण - 4

रचनाकार की प्रतिभा ढाके की मलमल का पचास हाथ का थान बुनने में नहीं है, उसे अँगूठी में से गुजार देने में ही है, यद्यपि शिल्पी होने के नाते वही मलमल भी बुनता है और अँगूठी तो उसकी है ही ।

उद्धरण - 3

हमारे साहित्य की दुर्बलता और विपन्नता के आप उत्तरदायी हैं, जैसे कि उसकी पुष्टता और समृद्धि के आप विधायक हैं। आप ही नहीं लेकिन आप भी ।

उद्धरण - 2

हितैषी-गण हिन्दी की रक्षा के नाम पर उसके चारों ओर ऐसी दीवार खड़ी करके बैठे हैं कि वह न हिल-डुल सके, न बढ़ सके, न सॉंस ले सके और बाहर से कुछ ग्रहण करने की तो बात ही दूर ।

उद्धरण -1

अगर साहित्य एक प्रशस्त उद्यान है जिसमें पेड़ फूलते-फलते हैं, तो पत्र-पुस्तक वह क्यारी है जिसमें पहले चारा या कलम तैयार की जाती है ।