उद्धरण - 50

‘जिसे वाणी व्यक्त नहीं कर सकती, किन्तु जो वाणी को अभिव्यक्ति प्रदान करती है, उसी को परम सत्य समझो उसे नहीं जिसकी लोग व्यर्थ उपासना करते हैं । जिसकी कल्पना करने में मन असमर्थ है, किन्तु जो मन की कल्पना करती है, उसी को परम सत्य समझो । जिसे देखने में नेत्र असमर्थ है, किन्तु जिसके द्वारा हम नेत्रों से देखते हैं, वही परम सत्य है ।

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