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Showing posts from June, 2021

उद्धरण - 1180

आलोचना से टूट जाएगा, शाबासी इसे जड़ बना देगी जरूरत बस इतनी है कि जो भी संभावना इसके अन्दर है वह खिलती चली जाए।

उद्धरण - 1179

जैसे अवांछित जनसंख्या वृद्धि का समाधान महात्मा गांधी अखंड ब्रह्मचर्य में खोजने लगे थे। सारा विचार खुले तौर पर इतना हवाई है। लगता है आप पूरे समाज की सामान्य समझ का अपमान कर रहे हैं।

उद्धरण - 1178

मैंने सोचा कि अब अगर और कुछ बोलता हूँ तो यह विदग्धा न जाने उसमें कौन-सी शाखा-प्रशाखा निकालकर मुझे एक बार फिर निरूत्तर कर देगी। बुद्धिमान की नीति मौन होती है। मैं हँसकर चुप हो रहा।

उद्धरण - 1177

ज्ञानशंकर की दृष्टि में आत्म-संयम का महत्व बहुत कम था। उनका विचार था संयम और नियम मानव-चरित्र के स्वाभाविक विकास में बाधक हैं। वही पौधा सघन वृक्ष हो सकता है जो समीर और लू, वर्षा और पाले में समान रूप से खड़ा रहे। उसकी वृद्धि के लिए अग्निमय प्रचण्ड वायु उतनी ही आवश्यक है जितनी शीतल मन्द समीर, शुष्कता उतनी ही प्राण पोषक है जितनी आर्द्रता।

उद्धरण - 1176

आखिर धोखा दे गए न गाँव के लोग। तुम अब तो समझ गए होगे कि गाँव से सीधापन कब का उड़ गया। कई बार हम भी उनकी वेशभूषा देखकर उन्हें भोला समझ बैठते हैं। पता चलता है कि वे तो शातिर बदमाश को मात देते हैं।

उद्धरण - 1175

मुझे हमेशा लगता था कि नामवर ने किसी के बारे में नहीं सिर्फ अपने बारे में लिखा है और अपने बारे में का मतलब है जिसमें उसने अपने आप को सबसे अधिक पाया है। वे हमेशा महसूस करते थे कि साहित्य समूची मनुष्य-जाति का होता है और उस जाति में मुक्तिबोध और नागार्जुन ही नहीं रघुवीर सहाय और निर्मल वर्मा भी आते हैं।

उद्धरण - 1174

असल में एक राजा था हैराद। उसने अपने भाई को मारकर उसकी पत्नी से अपनी शादी कर ली। उसकी भतीजी थी सेलामी जो बहुत सुन्दर थी और बहुत अच्छा नाचती थीं। हैराद उस पर मुग्ध हो गया। लेकिन सेलामी एक पैगम्बर पर मुग्ध थी। पैगम्बर ने सेलामी के प्रणय को ठुकरा दिया। एक बार हैराद ने सेलामी से कहा कि यदि तुम नाचो तो मैं तुम्हें कुछ दे सकता हूँ। सेलामी नाची और पुरस्कार में उसने अपना अपमान करने वाले पैगम्बर का सिर माँगा! हैराद वचनबद्ध था। उसने पैगम्बर का सिर तो दे दिया लेकिन बाद में इस भय से कि कहीं राज्य पर कोई आपत्ति न आये उसने सेलामी को भी मरवा डाला।

उद्धरण - 1173

हालिवुडी चलताऊ से लेकर यूरोपीय सिद्धों तक सभी दिग्दर्शकों के यहाँ परम्परा यह है कि इस चमत्कारी चुम्बन के बाद नायिका नायक के प्रशस्त वक्षस्थल में सिर छिपा लेती है और अगर इसी प्रसंग को आगे बढ़ाना हो तो आगामी शाटों मे वह नायक की गोद में सिर रखकर लेटी हुई बालू या पानी पर वही ढाई-पौने तीन आखर लिखती रहती है अपनी अँगुलियों से। वह कुछ ऐसी बेवकूफी की बातें भी करती है जिन्हें सुनकर नायक और दर्शकों के मन में समान रूप से प्यार उमड़ता है।

उद्धरण - 1172

दुख और सुख का अनुपात घटनाओं से दूरी और निकटता के हिसाब से घटता-बढ़ता रहता है। कुछ दूर निकल आने पर दुखदायी क़िस्से भी मजेदार लगने लगते हैं। कभी-कभी तो जिसकी मृत्यु पर हम आठ-आठ आँसू रोये थे समय बीत जाने पर हँस हँसकर उसके क़िस्से सुनाने लगते हैं।

उद्धरण - 1171

ईश्वर और मृत्यु को छोड़ो, लोग बाबाओं, तांत्रिकों ज्योतिषियों, धर्मगुरुओं और पूजागृहों से डरते हैं।

उद्धरण - 1170

एक नामालूम-सा हीनताबोध ! तो क्या खरी-खरी बोलने को कहकर भी मन अपनी प्रसंसा ही सुनना चाह रहा था? शायद हाँ। उन्होंनें खुद को खुद से परे हटाकर देखा-लोभी मन!

उद्धरण - 1169

अपने देशवासियों का स्वभाव है कि आदर्श की पुरानी गाथाएँ सुनते सुनते वे प्रतीक को तथ्य मानने लगते हैं और आदर्श आचरण के प्रतीकात्मक कर्मकांड से वास्तविक ऐतिहासिक परिणामों की उम्मीद करने लगते हैं।

उद्धरण - 1168

सद्धर्म में कुतर्क का प्राबल्य बढ़ रहा है आयुष्मान! संयत बनकर आचार्यों के वाक्य का तात्पर्य अनुशीलन कर। कुतर्क सद्विचारों की दावाग्नि है।वत्स।

उद्धरण - 1167

अकाल मृत्यु कदाचित् हमारी दृष्टि में ईश्वर का सबसे बड़ा अन्याय है। यह विपत्ति हमारी श्रद्धा और भक्ति का नाश कर देती है, हमें ईश्वर-द्रोही बना देती है। संसार में हम नित्य घोर-से-घोर और विषम-से-विषम अन्याय देखा करते हैं हमें उनकी सहन पड़ गयी है। लेकिन हमारी अन्याय पीड़ित आँखें भी यह दारुण दृश्य सहन नहीं कर सकती। अकाल मृत्यु हमारे हृदय-पट पर सबसे कठोर दैवी आघात है। यह हमारे न्याय -ज्ञान पर सबसे भंयकर बलात्कार है।

उद्धरण - 1166

भँवर, गाँव उजाड़ देनेवाले उन पढ़े-लिखों से हम लाख दर्जा अच्छे हैं जो बूढ़े माँ-बापों और घरों को ढूह होने के लिए छोड़कर चले गए।

उद्धरण - 1165

आलोचना उनके लिए एक सम्पादक या पत्रिका के लिए लेख लिखना-भर नहीं थी। ऐसा लगता था जैसे वे कुछ व्यक्तियों के सामने नहीं उस इतिहास के सामने बैठे हों। वे उस वक्त अपने दोस्तों-मित्रों या दुश्मनों के नहीं उसके जवाबदेह होते थे। उनके आगे रचनाकार नहीं उसका रचा हुआ साहित्य होता था।

उद्धरण - 1164

मुझे लगता है कि हमदर्दी करना इस दुनिया में सबसे बड़ा पाप है। आदमी से हमदर्दी कभी नहीं करनी चाहिए।

उद्धरण - 1163

जब तक गंगा-कुरुक्षेत्र हैं तब तक ससुरा पीड़ा का तीर्थ बना रहे उस बालक का हृदय जिसने उत्तर दिया यह तुम हो अपने को झुठलाने की कोशिश करती हुई जैसे यह मैं हूँ अपने को झुठलाने की कोशिश करता हुआ।

उद्धरण - 1162

एक बड़ा सा भुतहा महल है जिसमें मैं एकदम अकेला हूँ। सब मुझे छोड़कर चले गये हैं। चारों ओर सन्नाटा है। किसी को इस बात की फिक्र नहीं कि मैं कहाँ हूँ। मैं कहाँ छूट गया हूँ। शाम का धुँधलका है। अँधेरा धीरे-धीरे गाढ़ा हो रहा है। मैं एक विशाल दरवाजे़ के सामने खड़ा हूँ। दरवाजा बंद है और मैं उसे हिला भी नहीं पा रहा हूँ। लोहे की भारी साँकल को बार बार उचक-उचककर छूने की कोशिश करता हूँ पर वह मेरे हाथों की पहुँच से बहुत ऊपर है। मैं उसे छू नहीं पाता। मैं चिल्लाने की कोशिश करता हूँ। पर मेरी आवाज़ मेरे ही गले में घुटकर रह गयी है।

उद्धरण - 1161

आधुनिकता वह है जिसके सामने पुराना मिट जाने में बेहतरी समझे। वह अपने आप चली जाये। जो आधुनिकता पुराने को ज़बरदस्ती मिटाती है, तबाह करती है- पुराने को बरबाद करके क़ाबिज़ होती है वह सच्ची आधुनिकता नहीं है।

उद्धरण - 1160

मुझे कोई नहीं समझना चाहता कोई नहीं। नाच गिरोह जो चल रहे हैं चाहे वो रंडी पतुरिया के हों या लवंड़ो के सब मुझे छिछोरे लगते हैं। वे मुझे अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उनकी छूत के डर से भागकर मैंने नया दल बनाया। इधर घर के लोग बाबू माई काका काकी मेरे नाम से रो रहे हैं कि मैं वही हो गया अब कुल-खानदान की नाक कटवा दी मैंने।

उद्धरण - 1159

दरअसल सहकारी खेती में यह होना ही था। खेती या तो किसान अपनी ज़मीन पर कर सकता है या मज़दूर बनकर दूसरे की ज़मीन पर। तीसरा तरीका़ रूस के सामुदायिक फार्मों का है। पर वहाँ क्या हुआ है मुझे नहीं मालूम लेकिन सहकारी खेती इन दो में से या इन तीनों में से कुछ भी नहीं है। किसान के लिए वह सिर्फ़ ऐसी ज़मीन है जो उसकी होते हुए भी उसकी नहीं है। या उसकी न होते हुए भी उसकी होने का भ्रम पैदा करती है। दरअसल वह सिर्फ भ्रष्ट कार्यकर्ताओं और उनसे भी ज्यादा भ्रष्ट सरकारी कारकुनों की संपत्ति है।

उद्धरण - 1158

वस्तुस्थिति यह है आयुष्मान् कि शून्यता या निरालम्ब या निर्वाण एक अनुभवगम्य वस्तु है। भाषा की कमजोरी है कि वह उस पदार्थ को कह नहीं सकती। यह तो केवल प्रज्ञप्ति के लिए एक कामचलाऊ शब्द व्यवहार किया गया है। तू उसके शब्दार्थ पर मत जा। मनन कर। यह गुह्य रहस्य है। केवल पुस्तक पढ़ने से तू इसे नहीं समझ पाएगा।

उद्धरण - 1157

क्या जाने क्यों संगी जब से दुनिया का थोड़ा-बहुत हाल जानने लगा हूँ मुझसे अन्याय नहीं देखा जाता। जब किसी जबरे को किसी गरीब का गला दबाते देखता हूँ तो मेरे बदन में आग सी लग जाती है। यही जी चाहता है कि चाहे अपनी जान रहे या जाय इस जबरे का सिर नीचा कर दूँ। सिर पर एक भूत-सा सवार हो जाता है। जानता हूँ कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। पर मन काबू से बाहर हो जाता है।

उद्धरण - 1156

कभी-कभी तो सोचता हूँ कि थानसिंह डोरिया फत्ते कुँवरपाल जैसे लोगों के बीच व्यवहार करना था तो पढ़ने की जरूरत क्या थी? साली विद्या विनय और दे गई। जिस नीचता तक वे उतर आते हैं हमें हमारी आत्मा धिक्कारने लगती है वहाँ तक पहुँचने पर।

उद्धरण - 1155

ज़ायका की इन्हीं कोटियों में सर्वोच्च कोटि थी- जा़यका चक्रवर्ती की। यह सम्मान केवल एक लेखक को दिया गया था जिसे अपनी दस-बारह पृष्ठों की कहानियाँ तक कंठस्थ रहती थीं और दुनिया के किसी भी विषय पर होनेवाली बात को खींचकर जबरन अपने कहानी-पाठ पर ले आता था।

उद्धरण - 1154

बुद्धि और तर्क के अलावा भावना और सहानुभूति का भी एक महत्व मुझे लगा।

उद्धरण - 1153

मौसम की खराबी की वजह से कल्पना की तमाम उड़ानें रद्द की जा रही हैं।

उद्धरण - 1152

एशिया की सबसे बड़ी मस्जिद ताजुल मस्जिद और सबसे छोटी मस्जिद डेढ़ सीढ़ी की मस्जिद भोपाल में ही थी। सिरोंज तब टोंक रियासत का हिस्सा था।

उद्धरण - 1151

तेज़ दौड़ते हुए हिरन सबको सुंदर लगते हैं लेकिन क्या शिकारी के ख़ौफ़ से भागते हुए हिरन भी वैसे ही सुंदर होते हैं। असलियत यह है कि ये जो लोग भाग रहे हैं- स्पीड में, शिकार के डर से दौड़ लगा रहे हैं। ये और बात है कि इन्हें ये बात पता नहीं है। ये जानते नहीं कि इनका आखेट हो रहा है।

उद्धरण - 1150

भिखारी को और किसी की उतनी परवाह ना थी सिर्फ माई के प्रति अपराधी महसूस कर रहे थे। वह माई जिसने धर्म और नैतिकता को छोड़कर कुछ नहीं सिखाया, जिसे अपने बेटे के चरित्र को लेकर हमेशा गुमान रहा करता था, कैसे सह पाई होंगी यह बज्जर की चोट!

उद्धरण - 1149

व्यक्ति कुछ नहीं होता संस्था उससे बड़ी होती है और संस्था से भी बड़ा होता है उसका अंतर्निहित सिद्धांत।

उद्धरण - 1148

तपस्या भी कैसी महिमाशालिनी होती है क्योंकि इसी तपस्या ने उनकी आकृति को तप्त कांचन के समान निर्मल बनाया है। उस कान्ति से एक अद्भुत शान्ति टपक रही थी।

उद्धरण - 1147

किन्तु जिस भाँति प्रकाश रश्मियाँ पानी में वक्रगामी हो जाती हैं उसी भाँति सदिच्छाएँ भी बहुधा मानवी दुर्बलताओं के सम्पर्क से विषम हो जाया करती हैं। सत्य और न्याय पैरों के नीचे आ जाता है लोभ और स्वार्थ की विजय हो जाती है।

उद्धरण - 1146

सच के पक्ष में कितने लोग गवाही देते हैं? इसका मुख्य कारण यह है कि पैसा तो उन्हें झूठे पक्ष से ही मिलेगा। यह बात हम भी खूब जानते हैं कि ये गवाह अपराधी को ही बचाने आए हैं लेकिन हम करें भी क्या? कानून का जो रवैया चला आ रहा है उसी के बीच से ही तो गुजरना पड़ेगा।

उद्धरण - 1145

उन दिनों इन लोगों के बीच एक शब्द चला था- जा़यका। जा़यका माने स्वाद। वह आदमी जो मूर्ख हो और जिसे पता न हो कि वह मूर्ख है और जिससे मिलने पर इतनी बोरियत हो के ज़ायका खराब हो जाए- ज़ायका बिगाड़ाधीश कहा जाता था। धीरे धीरे इस मंडली ने जा़यका को दार्शनिक अर्थ भी दे डाला। ज़ायका एक सार्वदेशिक, सार्वकालिक और सार्वजनीन तत्व हुआ। यह थोड़े -बहुत अनुपात में हर किसी में और हर जगह होता है।

उद्धरण - 1144

चन्दर की निगाह में जाने क्या था एक अजब- सा पथराया सूनापन, एक जाने किस दर्द की अमंगल छाया, एक जाने किस पीड़ा की मूक आवाज, एक जाने कैसी पिघलती हुई सी उदासी और वह भी गहरी जाने कितनी गहरी और चन्दर था कि एकटक देखता जा रहा था, एकटक अपलक।

उद्धरण - 1143

लेखक हो? तो काल्डवेल पढ़ो लूकाच पढ़ो मुझे परेशान मत करो।

उद्धरण - 1142

कहते हैं कुदसिया बेगम के ज़माने में ही भोपाल का रेलवे स्टेशन बनाने को खाका तैयार हुआ था। हालाँकि भोपाल में रेल नवाब शाहजहाँ बेगम के जमाने में आई। 18 नवम्बर 1884 को भोपाल में रेल लाइन का उद्घाटन हुआ। उद्घाटन सामारोह में इकतीस तोपों की सलामी दी गयी।

उद्धरण - 1141

जो जितना समृद्ध है वह उतना ही अधिक हिंसक है जो जितना ताक़तवर है उतना ही असहिष्णु है। आप कहोगे कि यह स्नायविक दुर्बलता है पर यह दुर्बलता भी उसी सामाजिक व्यवस्था के कारण पैदा हुई जो शक्ति, समृद्धि और हिंसा की पूजा करती है।

उद्धरण - 1140

न गहना न गुरिया बियाह पक्का कर गये ई कागज के टुकड़े से। अपना आप तो सोना और रूपिया और कपड़ा सब लीलै को तैयार और देत के दाँई पेट पिराता है जूता-पिटऊ का। अरे राम चाही तो जमदूत ई लहास की बोटी-बोटी करके रामजी के कुत्तन को खिलइहै।

उद्धरण - 1139

ऐसा नहीं था कि सुंदरी ने उनकी जिंदगी में कोई सूनापन या अधूरापन पैदा कर दिया हो फिर भी वह एक ऐसी छाया थी जो किसी भी क्षण किसी भी अप्रत्याशित दिशा से आकर उनके चारों ओर फैली हुई धूप को बुझा सकती थी।

उद्धरण - 1138

हिमालय के सिवा गंगा की धारा को कौन जन्म दे सकता है? महासमुद्र के सिवा कौस्तुभ-मणि को कौन उत्पन्न कर सकता है? धरित्री के सिवा और कौन है जो सीता को जन्म दे सके? मैं बड़भागी हूँ।

उद्धरण - 1137

इस समय उसकी अवस्था उस मनुष्य की सी हो रही थी जिसके झोपड़े में आग लगी हो और वह उसको बुझाने में असमर्थ होकर शेष भागों में भी आग लगा दे कि किसी प्रकार इस विपत्ति का अन्त हो । रोगी अपने रोग को असाध्य देखता है तो पथ्यापथ्य की बेड़ियों को तोड़कर मृत्यु की ओर दौड़ता है।

उद्धरण - 1136

भइया, सज्जन का संगी कोई बेवकूफ भी नहीं बनता आज के जमाने में। तुम तो साँच को आँच नहीं का नारा लगा रहे हो और अगला किसी भी मक्कारी से गुरेज नहीं मान रहा। ये जमाने दिल खोल देनेवालों के नहीं हैं।

उद्धरण - 1135

सुनो! मुझे रोज केवल चार आने की जरूरत पड़ती है। दो आने पान के लिए और दो आने चाय के लिए। गोदौलिया पैदल आता जाता हूँ। और उतने पैसे कम से कम साल दो साल के लिए है मेरे पास। मेरे लिए न तुम्हें चिन्ता करने की जरूरत है न रामजी को। तुम लोग घर देखो और वहाँ भी जरूरत हो मुझसे कहो।

उद्धरण - 1134

मिसेज ब्राउनिंग ने कहीं लिखा था कि वह मेरी जिन्दगी में रोशनी बनकर आया उसे देखते ही मैं समझ गयी कि यह वह आदमी है जिसके हाथ में मेरे दिल के सभी राज़ सुरक्षित रहेंगे। वह खेल नहीं करेगा और प्यार भी नहीं करेगा। जिन्दगी में आकर भी जिन्दगी से दूर और सपनों में बँधकर भी सपनों से अलग।

उद्धरण - 1133

प्यार बड़ा है इनसान ओछा। अपने प्यार के बड़प्पन को गुनो इनसान के ओछेपन को नहीं। तुमने एक गिरे हुए को सहारा देने के लिए प्यार का हाथ बढ़ाया उसने झटक दिया तो तुम क्यों इस धक्के से धूल चाटने लगो उसी की तरह?

उद्धरण - 1132

उर्दू के एक मशहूर लेखक मुल्ला रमूज़ी ने एक किताब लिखी थी-गुलाबी उर्दू। तो भोपाल की उर्दू गुलाबी उर्दू थीं। कई शब्द भोपाली के अपने थे और उन्हें बोलने के अंदाज़ भी उसके अपने थे। शब्द के बीच में आनेवाले (ह) का यहाँ लोप हो जाता था।

उद्धरण - 1131

विकास और आज की सभ्यता का भी यही शऊर है कि आने वाली पीढ़ियों और आने वाले समय के बारे में मत सोचो। आज सब दुह लो। भविष्य अंधकार का सामना करेगा, करने दो।

उद्धरण - 1130

शहनशाह की तरह देखते हैं सीवन को, नहीं शहनशाह क्या चीज़ है जो कहिए वेदव्यास की तरह। प्रकृति में तीन ही रंग है अभी नीला हरा और सफेद! सब कुछ टटका-टटका सब कुछ चटक-चटक! वर्षा रूपी धोबिन ने प्रकृति की सारी मैल धो डाली है-धोते-धोते ही बुढ़ा गई बेचारी। धोबी घर-घर नरक बिटोरत धोई साफ करि देत। घास बिना फसील सोभित है जिमि किसान के खेत। कोइरी धोवत साग के धोवत तमोली पान जजमनिका पुरोहित धोवत करमकांड के ज्ञान।

उद्धरण - 1129

तभी पिछले बीस सालों मे हर एक मुख्यमंत्री इस मुर्दा घोड़े पर सरकारी अनुदान के कोड़े बरसाता रहा है। एक आता है और कुटीर उद्योग के नाम पर पाँच लाख का अनुदान घोषित कर जाता है। दूसरा दस्तकार प्रशिक्षण के नाम पर दस लाख। फिर तीसरा सामाजिक वानिकी के नाम पर बीस लाख। पर इन लाखों का हो क्या रहा है? कोई नहीं जानता।

उद्धरण - 1128

आँख यद्यपि एक ही है पर उसमें एक चिक्कन शलाका द्वारा नित्य अंजन लगाया करते हैं। यद्यपि रात को रतौंधी के कारण देख नहीं सकते परन्तु अप्सराओं के अप्रत्याशित आगमन की आशा से रात भर प्रदीप जलाए रखते हैं। यद्यपि निद्रा में कुम्भकरण के प्रतिद्वन्द्वी हैं पर स्वप्न में नूपुर-क्वणन निरन्तर सुना करते हैं।

उद्धरण - 1127

आपके और मेरे जीवन-सिद्धान्तों में बड़ा अन्तर है। आप भावों की आराधना करते हैं। मैं विचार का उपासक हूँ। आप निन्दा के भय से प्रत्येक आपत्ति के सामने सिर झुकायेंगे मैं अपनी विचार स्वतन्त्रता के सामने लोकमत की लेशमात्र भी परवा नहीं करता! जीवन आनन्द से व्यतीत हो यह हमारा अभीष्ट है। यदि संसार स्वार्थपरता कहकर इसकी हँसी उड़ाये निन्दा करे तो मैं उसकी सम्मति को पैरों तले कुचल डालूँगा। आपकी शिष्टता का आधार ही आत्मघात है। आपके घर में चाहे उपवास होता हो किन्तु कोई मेहमान आ जाये तो आप ऋण लेकर उसका सत्कार करेंगे। मैं ऐसे मेहमान को दूर से ही प्रणाम करूँगा।

उद्धरण - 1126

इंसान नाइंसाफी कर रहा है तो हम हारकर बैठ जाएँगे? अरे इन बेईमानों को सेठ के मूत में नहाने दे। हमारे हाथ-पाँव तो हमसे कोई नहीं छीन लेगा। तुम्हारी उम्मीदें तो नहीं हारीं न ? हारता तो वह है जिसका मन मर जाता है जिसकी लड़ने की इच्छा खतम हो जाती है। मैं जानती हूँ कि तुम्हारे अपने लोग गद्दार निकल गए और तुम्हें मुँह की खानी पड़ी। फिर भी हम उठ खड़े होंगे। यह जंग बेवजह नहीं।

उद्धरण - 1125

इस प्रसंग में सबसे दर्दनाक घटना थी माँ की जिसे वे सबसे अधिक प्यार करते थे और जो अपने बड़े बेटे पर प्राण निछावर करती थी। उसकी जाँघ की हड्डी टूट गई थी। बुढ़ापे का फ्रैक्चर और वह भी मामूली नहीं। उसे तीन-चार महीने अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। भैया उन दिनों सागर में थे। उन्हें ख़बर दी गई। माँ उन्हें याद कर-करके रोती रहती थी। भैया आए आते ही सामान रखा और उसे देखने के लिए घर से चले। लेकिन गेट तक आकर रूक गए। मेरी ओर देखा और उनकी आँखें छलछला आई- माँ से बोल दो मैं आ गया हूँ। चिन्ता की कोई बात नहीं।

उद्धरण - 1124

अक्सर कब कहाँ और कैसे मन अपने को हार बैठता है यह खुद हमें पता नहीं लगता। मालूम तब होता है जब जिसके कदम पर हमने सिर रखा है वह झटके से अपने कदम घसीट ले। उस वक्त हमारी नींद टूट जाती है और तब हम जाकर देखते हैं कि अरे हमारा सिर तो किसी के कदमों पर रखा था और उनके सहारे आराम से सोते हुए हम सपना देख रहे थे कि हमारा सिर कहीं झुका ही नहीं।

उद्धरण - 1123

और क्या ऐसा है कि जब भी तुम अकेली होती हो या उदास दुखी मन में उतर आती है वही छवि? जीवन-व्यापार की हर भँवर उसी से उठती उसी में खो जाती प्रतीत होती है?

उद्धरण - 1122

भोपाल की चार चीज़े मशहूर थीं- ज़र्दा गर्दा पर्दा और नामर्दा। भोपाल में मोहल्लों के नाम दिनों के नाम पर थे। इतवार सोमवारा मंगलवारा बधुवारा। गुरूवारा की जगह जुमेराती था। शुक्रवारा और शनीवारा नहीं था। चारों दिशाओं में छह दरवाजे थे।

उद्धरण - 1121

आप यूं कह रहे हो गोया अधिक पैदावार के साथ स्वाद का नाश शाश्वत नियम है। जैसे यह मौत की तरह अटल है। क्यों नहीं इस तरह उत्पादन बढ़ाओ कि स्वाद बचा रहे या बेहतर हो जाये। संसार की हर प्रिय का रुप, रस, गंध, स्पर्श बचाते हुए तरक़्क़ी की मंज़िलें हासिल हों, ऐसी कोशिश नहीं होनी चाहिए?