जैसे अवांछित जनसंख्या वृद्धि का समाधान महात्मा गांधी अखंड ब्रह्मचर्य में खोजने लगे थे। सारा विचार खुले तौर पर इतना हवाई है। लगता है आप पूरे समाज की सामान्य समझ का अपमान कर रहे हैं।
मैंने सोचा कि अब अगर और कुछ बोलता हूँ तो यह विदग्धा न जाने उसमें कौन-सी शाखा-प्रशाखा निकालकर मुझे एक बार फिर निरूत्तर कर देगी। बुद्धिमान की नीति मौन होती है। मैं हँसकर चुप हो रहा।
ज्ञानशंकर की दृष्टि में आत्म-संयम का महत्व बहुत कम था। उनका विचार था संयम और नियम मानव-चरित्र के स्वाभाविक विकास में बाधक हैं। वही पौधा सघन वृक्ष हो सकता है जो समीर और लू, वर्षा और पाले में समान रूप से खड़ा रहे। उसकी वृद्धि के लिए अग्निमय प्रचण्ड वायु उतनी ही आवश्यक है जितनी शीतल मन्द समीर, शुष्कता उतनी ही प्राण पोषक है जितनी आर्द्रता।
आखिर धोखा दे गए न गाँव के लोग। तुम अब तो समझ गए होगे कि गाँव से सीधापन कब का उड़ गया। कई बार हम भी उनकी वेशभूषा देखकर उन्हें भोला समझ बैठते हैं। पता चलता है कि वे तो शातिर बदमाश को मात देते हैं।
मुझे हमेशा लगता था कि नामवर ने किसी के बारे में नहीं सिर्फ अपने बारे में लिखा है और अपने बारे में का मतलब है जिसमें उसने अपने आप को सबसे अधिक पाया है। वे हमेशा महसूस करते थे कि साहित्य समूची मनुष्य-जाति का होता है और उस जाति में मुक्तिबोध और नागार्जुन ही नहीं रघुवीर सहाय और निर्मल वर्मा भी आते हैं।
असल में एक राजा था हैराद। उसने अपने भाई को मारकर उसकी पत्नी से अपनी शादी कर ली। उसकी भतीजी थी सेलामी जो बहुत सुन्दर थी और बहुत अच्छा नाचती थीं। हैराद उस पर मुग्ध हो गया। लेकिन सेलामी एक पैगम्बर पर मुग्ध थी। पैगम्बर ने सेलामी के प्रणय को ठुकरा दिया। एक बार हैराद ने सेलामी से कहा कि यदि तुम नाचो तो मैं तुम्हें कुछ दे सकता हूँ। सेलामी नाची और पुरस्कार में उसने अपना अपमान करने वाले पैगम्बर का सिर माँगा! हैराद वचनबद्ध था। उसने पैगम्बर का सिर तो दे दिया लेकिन बाद में इस भय से कि कहीं राज्य पर कोई आपत्ति न आये उसने सेलामी को भी मरवा डाला।
हालिवुडी चलताऊ से लेकर यूरोपीय सिद्धों तक सभी दिग्दर्शकों के यहाँ परम्परा यह है कि इस चमत्कारी चुम्बन के बाद नायिका नायक के प्रशस्त वक्षस्थल में सिर छिपा लेती है और अगर इसी प्रसंग को आगे बढ़ाना हो तो आगामी शाटों मे वह नायक की गोद में सिर रखकर लेटी हुई बालू या पानी पर वही ढाई-पौने तीन आखर लिखती रहती है अपनी अँगुलियों से। वह कुछ ऐसी बेवकूफी की बातें भी करती है जिन्हें सुनकर नायक और दर्शकों के मन में समान रूप से प्यार उमड़ता है।
दुख और सुख का अनुपात घटनाओं से दूरी और निकटता के हिसाब से घटता-बढ़ता रहता है। कुछ दूर निकल आने पर दुखदायी क़िस्से भी मजेदार लगने लगते हैं। कभी-कभी तो जिसकी मृत्यु पर हम आठ-आठ आँसू रोये थे समय बीत जाने पर हँस हँसकर उसके क़िस्से सुनाने लगते हैं।
एक नामालूम-सा हीनताबोध ! तो क्या खरी-खरी बोलने को कहकर भी मन अपनी प्रसंसा ही सुनना चाह रहा था? शायद हाँ। उन्होंनें खुद को खुद से परे हटाकर देखा-लोभी मन!
अपने देशवासियों का स्वभाव है कि आदर्श की पुरानी गाथाएँ सुनते सुनते वे प्रतीक को तथ्य मानने लगते हैं और आदर्श आचरण के प्रतीकात्मक कर्मकांड से वास्तविक ऐतिहासिक परिणामों की उम्मीद करने लगते हैं।
अकाल मृत्यु कदाचित् हमारी दृष्टि में ईश्वर का सबसे बड़ा अन्याय है। यह विपत्ति हमारी श्रद्धा और भक्ति का नाश कर देती है, हमें ईश्वर-द्रोही बना देती है। संसार में हम नित्य घोर-से-घोर और विषम-से-विषम अन्याय देखा करते हैं हमें उनकी सहन पड़ गयी है। लेकिन हमारी अन्याय पीड़ित आँखें भी यह दारुण दृश्य सहन नहीं कर सकती। अकाल मृत्यु हमारे हृदय-पट पर सबसे कठोर दैवी आघात है। यह हमारे न्याय -ज्ञान पर सबसे भंयकर बलात्कार है।
आलोचना उनके लिए एक सम्पादक या पत्रिका के लिए लेख लिखना-भर नहीं थी। ऐसा लगता था जैसे वे कुछ व्यक्तियों के सामने नहीं उस इतिहास के सामने बैठे हों। वे उस वक्त अपने दोस्तों-मित्रों या दुश्मनों के नहीं उसके जवाबदेह होते थे। उनके आगे रचनाकार नहीं उसका रचा हुआ साहित्य होता था।
जब तक गंगा-कुरुक्षेत्र हैं तब तक ससुरा पीड़ा का तीर्थ बना रहे उस बालक का हृदय जिसने उत्तर दिया यह तुम हो अपने को झुठलाने की कोशिश करती हुई जैसे यह मैं हूँ अपने को झुठलाने की कोशिश करता हुआ।
एक बड़ा सा भुतहा महल है जिसमें मैं एकदम अकेला हूँ। सब मुझे छोड़कर चले गये हैं। चारों ओर सन्नाटा है। किसी को इस बात की फिक्र नहीं कि मैं कहाँ हूँ। मैं कहाँ छूट गया हूँ। शाम का धुँधलका है। अँधेरा धीरे-धीरे गाढ़ा हो रहा है। मैं एक विशाल दरवाजे़ के सामने खड़ा हूँ। दरवाजा बंद है और मैं उसे हिला भी नहीं पा रहा हूँ। लोहे की भारी साँकल को बार बार उचक-उचककर छूने की कोशिश करता हूँ पर वह मेरे हाथों की पहुँच से बहुत ऊपर है। मैं उसे छू नहीं पाता। मैं चिल्लाने की कोशिश करता हूँ। पर मेरी आवाज़ मेरे ही गले में घुटकर रह गयी है।
आधुनिकता वह है जिसके सामने पुराना मिट जाने में बेहतरी समझे। वह अपने आप चली जाये। जो आधुनिकता पुराने को ज़बरदस्ती मिटाती है, तबाह करती है- पुराने को बरबाद करके क़ाबिज़ होती है वह सच्ची आधुनिकता नहीं है।
मुझे कोई नहीं समझना चाहता कोई नहीं। नाच गिरोह जो चल रहे हैं चाहे वो रंडी पतुरिया के हों या लवंड़ो के सब मुझे छिछोरे लगते हैं। वे मुझे अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उनकी छूत के डर से भागकर मैंने नया दल बनाया। इधर घर के लोग बाबू माई काका काकी मेरे नाम से रो रहे हैं कि मैं वही हो गया अब कुल-खानदान की नाक कटवा दी मैंने।
दरअसल सहकारी खेती में यह होना ही था। खेती या तो किसान अपनी ज़मीन पर कर सकता है या मज़दूर बनकर दूसरे की ज़मीन पर। तीसरा तरीका़ रूस के सामुदायिक फार्मों का है। पर वहाँ क्या हुआ है मुझे नहीं मालूम लेकिन सहकारी खेती इन दो में से या इन तीनों में से कुछ भी नहीं है। किसान के लिए वह सिर्फ़ ऐसी ज़मीन है जो उसकी होते हुए भी उसकी नहीं है। या उसकी न होते हुए भी उसकी होने का भ्रम पैदा करती है। दरअसल वह सिर्फ भ्रष्ट कार्यकर्ताओं और उनसे भी ज्यादा भ्रष्ट सरकारी कारकुनों की संपत्ति है।
वस्तुस्थिति यह है आयुष्मान् कि शून्यता या निरालम्ब या निर्वाण एक अनुभवगम्य वस्तु है। भाषा की कमजोरी है कि वह उस पदार्थ को कह नहीं सकती। यह तो केवल प्रज्ञप्ति के लिए एक कामचलाऊ शब्द व्यवहार किया गया है। तू उसके शब्दार्थ पर मत जा। मनन कर। यह गुह्य रहस्य है। केवल पुस्तक पढ़ने से तू इसे नहीं समझ पाएगा।
क्या जाने क्यों संगी जब से दुनिया का थोड़ा-बहुत हाल जानने लगा हूँ मुझसे अन्याय नहीं देखा जाता। जब किसी जबरे को किसी गरीब का गला दबाते देखता हूँ तो मेरे बदन में आग सी लग जाती है। यही जी चाहता है कि चाहे अपनी जान रहे या जाय इस जबरे का सिर नीचा कर दूँ। सिर पर एक भूत-सा सवार हो जाता है। जानता हूँ कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। पर मन काबू से बाहर हो जाता है।
कभी-कभी तो सोचता हूँ कि थानसिंह डोरिया फत्ते कुँवरपाल जैसे लोगों के बीच व्यवहार करना था तो पढ़ने की जरूरत क्या थी? साली विद्या विनय और दे गई। जिस नीचता तक वे उतर आते हैं हमें हमारी आत्मा धिक्कारने लगती है वहाँ तक पहुँचने पर।
ज़ायका की इन्हीं कोटियों में सर्वोच्च कोटि थी- जा़यका चक्रवर्ती की। यह सम्मान केवल एक लेखक को दिया गया था जिसे अपनी दस-बारह पृष्ठों की कहानियाँ तक कंठस्थ रहती थीं और दुनिया के किसी भी विषय पर होनेवाली बात को खींचकर जबरन अपने कहानी-पाठ पर ले आता था।
तेज़ दौड़ते हुए हिरन सबको सुंदर लगते हैं लेकिन क्या शिकारी के ख़ौफ़ से भागते हुए हिरन भी वैसे ही सुंदर होते हैं। असलियत यह है कि ये जो लोग भाग रहे हैं- स्पीड में, शिकार के डर से दौड़ लगा रहे हैं। ये और बात है कि इन्हें ये बात पता नहीं है। ये जानते नहीं कि इनका आखेट हो रहा है।
भिखारी को और किसी की उतनी परवाह ना थी सिर्फ माई के प्रति अपराधी महसूस कर रहे थे। वह माई जिसने धर्म और नैतिकता को छोड़कर कुछ नहीं सिखाया, जिसे अपने बेटे के चरित्र को लेकर हमेशा गुमान रहा करता था, कैसे सह पाई होंगी यह बज्जर की चोट!
किन्तु जिस भाँति प्रकाश रश्मियाँ पानी में वक्रगामी हो जाती हैं उसी भाँति सदिच्छाएँ भी बहुधा मानवी दुर्बलताओं के सम्पर्क से विषम हो जाया करती हैं। सत्य और न्याय पैरों के नीचे आ जाता है लोभ और स्वार्थ की विजय हो जाती है।
सच के पक्ष में कितने लोग गवाही देते हैं? इसका मुख्य कारण यह है कि पैसा तो उन्हें झूठे पक्ष से ही मिलेगा। यह बात हम भी खूब जानते हैं कि ये गवाह अपराधी को ही बचाने आए हैं लेकिन हम करें भी क्या? कानून का जो रवैया चला आ रहा है उसी के बीच से ही तो गुजरना पड़ेगा।
उन दिनों इन लोगों के बीच एक शब्द चला था- जा़यका। जा़यका माने स्वाद। वह आदमी जो मूर्ख हो और जिसे पता न हो कि वह मूर्ख है और जिससे मिलने पर इतनी बोरियत हो के ज़ायका खराब हो जाए- ज़ायका बिगाड़ाधीश कहा जाता था। धीरे धीरे इस मंडली ने जा़यका को दार्शनिक अर्थ भी दे डाला। ज़ायका एक सार्वदेशिक, सार्वकालिक और सार्वजनीन तत्व हुआ। यह थोड़े -बहुत अनुपात में हर किसी में और हर जगह होता है।
चन्दर की निगाह में जाने क्या था एक अजब- सा पथराया सूनापन, एक जाने किस दर्द की अमंगल छाया, एक जाने किस पीड़ा की मूक आवाज, एक जाने कैसी पिघलती हुई सी उदासी और वह भी गहरी जाने कितनी गहरी और चन्दर था कि एकटक देखता जा रहा था, एकटक अपलक।
कहते हैं कुदसिया बेगम के ज़माने में ही भोपाल का रेलवे स्टेशन बनाने को खाका तैयार हुआ था। हालाँकि भोपाल में रेल नवाब शाहजहाँ बेगम के जमाने में आई। 18 नवम्बर 1884 को भोपाल में रेल लाइन का उद्घाटन हुआ। उद्घाटन सामारोह में इकतीस तोपों की सलामी दी गयी।
जो जितना समृद्ध है वह उतना ही अधिक हिंसक है जो जितना ताक़तवर है उतना ही असहिष्णु है। आप कहोगे कि यह स्नायविक दुर्बलता है पर यह दुर्बलता भी उसी सामाजिक व्यवस्था के कारण पैदा हुई जो शक्ति, समृद्धि और हिंसा की पूजा करती है।
न गहना न गुरिया बियाह पक्का कर गये ई कागज के टुकड़े से। अपना आप तो सोना और रूपिया और कपड़ा सब लीलै को तैयार और देत के दाँई पेट पिराता है जूता-पिटऊ का। अरे राम चाही तो जमदूत ई लहास की बोटी-बोटी करके रामजी के कुत्तन को खिलइहै।
ऐसा नहीं था कि सुंदरी ने उनकी जिंदगी में कोई सूनापन या अधूरापन पैदा कर दिया हो फिर भी वह एक ऐसी छाया थी जो किसी भी क्षण किसी भी अप्रत्याशित दिशा से आकर उनके चारों ओर फैली हुई धूप को बुझा सकती थी।
हिमालय के सिवा गंगा की धारा को कौन जन्म दे सकता है? महासमुद्र के सिवा कौस्तुभ-मणि को कौन उत्पन्न कर सकता है? धरित्री के सिवा और कौन है जो सीता को जन्म दे सके? मैं बड़भागी हूँ।
इस समय उसकी अवस्था उस मनुष्य की सी हो रही थी जिसके झोपड़े में आग लगी हो और वह उसको बुझाने में असमर्थ होकर शेष भागों में भी आग लगा दे कि किसी प्रकार इस विपत्ति का अन्त हो । रोगी अपने रोग को असाध्य देखता है तो पथ्यापथ्य की बेड़ियों को तोड़कर मृत्यु की ओर दौड़ता है।
भइया, सज्जन का संगी कोई बेवकूफ भी नहीं बनता आज के जमाने में। तुम तो साँच को आँच नहीं का नारा लगा रहे हो और अगला किसी भी मक्कारी से गुरेज नहीं मान रहा। ये जमाने दिल खोल देनेवालों के नहीं हैं।
सुनो! मुझे रोज केवल चार आने की जरूरत पड़ती है। दो आने पान के लिए और दो आने चाय के लिए। गोदौलिया पैदल आता जाता हूँ। और उतने पैसे कम से कम साल दो साल के लिए है मेरे पास। मेरे लिए न तुम्हें चिन्ता करने की जरूरत है न रामजी को। तुम लोग घर देखो और वहाँ भी जरूरत हो मुझसे कहो।
मिसेज ब्राउनिंग ने कहीं लिखा था कि वह मेरी जिन्दगी में रोशनी बनकर आया उसे देखते ही मैं समझ गयी कि यह वह आदमी है जिसके हाथ में मेरे दिल के सभी राज़ सुरक्षित रहेंगे। वह खेल नहीं करेगा और प्यार भी नहीं करेगा। जिन्दगी में आकर भी जिन्दगी से दूर और सपनों में बँधकर भी सपनों से अलग।
प्यार बड़ा है इनसान ओछा। अपने प्यार के बड़प्पन को गुनो इनसान के ओछेपन को नहीं। तुमने एक गिरे हुए को सहारा देने के लिए प्यार का हाथ बढ़ाया उसने झटक दिया तो तुम क्यों इस धक्के से धूल चाटने लगो उसी की तरह?
उर्दू के एक मशहूर लेखक मुल्ला रमूज़ी ने एक किताब लिखी थी-गुलाबी उर्दू। तो भोपाल की उर्दू गुलाबी उर्दू थीं। कई शब्द भोपाली के अपने थे और उन्हें बोलने के अंदाज़ भी उसके अपने थे। शब्द के बीच में आनेवाले (ह) का यहाँ लोप हो जाता था।
शहनशाह की तरह देखते हैं सीवन को, नहीं शहनशाह क्या चीज़ है जो कहिए वेदव्यास की तरह। प्रकृति में तीन ही रंग है अभी नीला हरा और सफेद! सब कुछ टटका-टटका सब कुछ चटक-चटक! वर्षा रूपी धोबिन ने प्रकृति की सारी मैल धो डाली है-धोते-धोते ही बुढ़ा गई बेचारी। धोबी घर-घर नरक बिटोरत धोई साफ करि देत। घास बिना फसील सोभित है जिमि किसान के खेत। कोइरी धोवत साग के धोवत तमोली पान जजमनिका पुरोहित धोवत करमकांड के ज्ञान।
तभी पिछले बीस सालों मे हर एक मुख्यमंत्री इस मुर्दा घोड़े पर सरकारी अनुदान के कोड़े बरसाता रहा है। एक आता है और कुटीर उद्योग के नाम पर पाँच लाख का अनुदान घोषित कर जाता है। दूसरा दस्तकार प्रशिक्षण के नाम पर दस लाख। फिर तीसरा सामाजिक वानिकी के नाम पर बीस लाख। पर इन लाखों का हो क्या रहा है? कोई नहीं जानता।
आँख यद्यपि एक ही है पर उसमें एक चिक्कन शलाका द्वारा नित्य अंजन लगाया करते हैं। यद्यपि रात को रतौंधी के कारण देख नहीं सकते परन्तु अप्सराओं के अप्रत्याशित आगमन की आशा से रात भर प्रदीप जलाए रखते हैं। यद्यपि निद्रा में कुम्भकरण के प्रतिद्वन्द्वी हैं पर स्वप्न में नूपुर-क्वणन निरन्तर सुना करते हैं।
आपके और मेरे जीवन-सिद्धान्तों में बड़ा अन्तर है। आप भावों की आराधना करते हैं। मैं विचार का उपासक हूँ। आप निन्दा के भय से प्रत्येक आपत्ति के सामने सिर झुकायेंगे मैं अपनी विचार स्वतन्त्रता के सामने लोकमत की लेशमात्र भी परवा नहीं करता! जीवन आनन्द से व्यतीत हो यह हमारा अभीष्ट है। यदि संसार स्वार्थपरता कहकर इसकी हँसी उड़ाये निन्दा करे तो मैं उसकी सम्मति को पैरों तले कुचल डालूँगा। आपकी शिष्टता का आधार ही आत्मघात है। आपके घर में चाहे उपवास होता हो किन्तु कोई मेहमान आ जाये तो आप ऋण लेकर उसका सत्कार करेंगे। मैं ऐसे मेहमान को दूर से ही प्रणाम करूँगा।
इंसान नाइंसाफी कर रहा है तो हम हारकर बैठ जाएँगे? अरे इन बेईमानों को सेठ के मूत में नहाने दे। हमारे हाथ-पाँव तो हमसे कोई नहीं छीन लेगा। तुम्हारी उम्मीदें तो नहीं हारीं न ? हारता तो वह है जिसका मन मर जाता है जिसकी लड़ने की इच्छा खतम हो जाती है। मैं जानती हूँ कि तुम्हारे अपने लोग गद्दार निकल गए और तुम्हें मुँह की खानी पड़ी। फिर भी हम उठ खड़े होंगे। यह जंग बेवजह नहीं।
इस प्रसंग में सबसे दर्दनाक घटना थी माँ की जिसे वे सबसे अधिक प्यार करते थे और जो अपने बड़े बेटे पर प्राण निछावर करती थी। उसकी जाँघ की हड्डी टूट गई थी। बुढ़ापे का फ्रैक्चर और वह भी मामूली नहीं। उसे तीन-चार महीने अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। भैया उन दिनों सागर में थे। उन्हें ख़बर दी गई। माँ उन्हें याद कर-करके रोती रहती थी। भैया आए आते ही सामान रखा और उसे देखने के लिए घर से चले। लेकिन गेट तक आकर रूक गए। मेरी ओर देखा और उनकी आँखें छलछला आई- माँ से बोल दो मैं आ गया हूँ। चिन्ता की कोई बात नहीं।
अक्सर कब कहाँ और कैसे मन अपने को हार बैठता है यह खुद हमें पता नहीं लगता। मालूम तब होता है जब जिसके कदम पर हमने सिर रखा है वह झटके से अपने कदम घसीट ले। उस वक्त हमारी नींद टूट जाती है और तब हम जाकर देखते हैं कि अरे हमारा सिर तो किसी के कदमों पर रखा था और उनके सहारे आराम से सोते हुए हम सपना देख रहे थे कि हमारा सिर कहीं झुका ही नहीं।
भोपाल की चार चीज़े मशहूर थीं- ज़र्दा गर्दा पर्दा और नामर्दा। भोपाल में मोहल्लों के नाम दिनों के नाम पर थे। इतवार सोमवारा मंगलवारा बधुवारा। गुरूवारा की जगह जुमेराती था। शुक्रवारा और शनीवारा नहीं था। चारों दिशाओं में छह दरवाजे थे।
आप यूं कह रहे हो गोया अधिक पैदावार के साथ स्वाद का नाश शाश्वत नियम है। जैसे यह मौत की तरह अटल है। क्यों नहीं इस तरह उत्पादन बढ़ाओ कि स्वाद बचा रहे या बेहतर हो जाये। संसार की हर प्रिय का रुप, रस, गंध, स्पर्श बचाते हुए तरक़्क़ी की मंज़िलें हासिल हों, ऐसी कोशिश नहीं होनी चाहिए?