उद्धरण - 1157
क्या जाने क्यों संगी जब से दुनिया का थोड़ा-बहुत हाल जानने लगा हूँ मुझसे अन्याय नहीं देखा जाता। जब किसी जबरे को किसी गरीब का गला दबाते देखता हूँ तो मेरे बदन में आग सी लग जाती है। यही जी चाहता है कि चाहे अपनी जान रहे या जाय इस जबरे का सिर नीचा कर दूँ। सिर पर एक भूत-सा सवार हो जाता है। जानता हूँ कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। पर मन काबू से बाहर हो जाता है।
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