उद्धरण - 1127
आपके और मेरे जीवन-सिद्धान्तों में बड़ा अन्तर है। आप भावों की आराधना करते हैं। मैं विचार का उपासक हूँ। आप निन्दा के भय से प्रत्येक आपत्ति के सामने सिर झुकायेंगे मैं अपनी विचार स्वतन्त्रता के सामने लोकमत की लेशमात्र भी परवा नहीं करता! जीवन आनन्द से व्यतीत हो यह हमारा अभीष्ट है। यदि संसार स्वार्थपरता कहकर इसकी हँसी उड़ाये निन्दा करे तो मैं उसकी सम्मति को पैरों तले कुचल डालूँगा। आपकी शिष्टता का आधार ही आत्मघात है। आपके घर में चाहे उपवास होता हो किन्तु कोई मेहमान आ जाये तो आप ऋण लेकर उसका सत्कार करेंगे। मैं ऐसे मेहमान को दूर से ही प्रणाम करूँगा।
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