उद्धरण - 1175
मुझे हमेशा लगता था कि नामवर ने किसी के बारे में नहीं सिर्फ अपने बारे में लिखा है और अपने बारे में का मतलब है जिसमें उसने अपने आप को सबसे अधिक पाया है। वे हमेशा महसूस करते थे कि साहित्य समूची मनुष्य-जाति का होता है और उस जाति में मुक्तिबोध और नागार्जुन ही नहीं रघुवीर सहाय और निर्मल वर्मा भी आते हैं।
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