उद्धरण - 1145

उन दिनों इन लोगों के बीच एक शब्द चला था- जा़यका। जा़यका माने स्वाद। वह आदमी जो मूर्ख हो और जिसे पता न हो कि वह मूर्ख है और जिससे मिलने पर इतनी बोरियत हो के ज़ायका खराब हो जाए- ज़ायका बिगाड़ाधीश कहा जाता था। धीरे धीरे इस मंडली ने जा़यका को दार्शनिक अर्थ भी दे डाला। ज़ायका एक सार्वदेशिक, सार्वकालिक और सार्वजनीन तत्व हुआ। यह थोड़े -बहुत अनुपात में हर किसी में और हर जगह होता है।

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