उद्धरण - 1144

चन्दर की निगाह में जाने क्या था एक अजब- सा पथराया सूनापन, एक जाने किस दर्द की अमंगल छाया, एक जाने किस पीड़ा की मूक आवाज, एक जाने कैसी पिघलती हुई सी उदासी और वह भी गहरी जाने कितनी गहरी और चन्दर था कि एकटक देखता जा रहा था, एकटक अपलक।

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