उद्धरण - 1137

इस समय उसकी अवस्था उस मनुष्य की सी हो रही थी जिसके झोपड़े में आग लगी हो और वह उसको बुझाने में असमर्थ होकर शेष भागों में भी आग लगा दे कि किसी प्रकार इस विपत्ति का अन्त हो । रोगी अपने रोग को असाध्य देखता है तो पथ्यापथ्य की बेड़ियों को तोड़कर मृत्यु की ओर दौड़ता है।

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