उद्धरण - 1162

एक बड़ा सा भुतहा महल है जिसमें मैं एकदम अकेला हूँ। सब मुझे छोड़कर चले गये हैं। चारों ओर सन्नाटा है। किसी को इस बात की फिक्र नहीं कि मैं कहाँ हूँ। मैं कहाँ छूट गया हूँ। शाम का धुँधलका है। अँधेरा धीरे-धीरे गाढ़ा हो रहा है। मैं एक विशाल दरवाजे़ के सामने खड़ा हूँ। दरवाजा बंद है और मैं उसे हिला भी नहीं पा रहा हूँ। लोहे की भारी साँकल को बार बार उचक-उचककर छूने की कोशिश करता हूँ पर वह मेरे हाथों की पहुँच से बहुत ऊपर है। मैं उसे छू नहीं पाता। मैं चिल्लाने की कोशिश करता हूँ। पर मेरी आवाज़ मेरे ही गले में घुटकर रह गयी है।

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