उद्धरण - 1160
मुझे कोई नहीं समझना चाहता कोई नहीं। नाच गिरोह जो चल रहे हैं चाहे वो रंडी पतुरिया के हों या लवंड़ो के सब मुझे छिछोरे लगते हैं। वे मुझे अपने जैसा बनाना चाहते हैं। उनकी छूत के डर से भागकर मैंने नया दल बनाया। इधर घर के लोग बाबू माई काका काकी मेरे नाम से रो रहे हैं कि मैं वही हो गया अब कुल-खानदान की नाक कटवा दी मैंने।
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