उद्धरण - 1156

कभी-कभी तो सोचता हूँ कि थानसिंह डोरिया फत्ते कुँवरपाल जैसे लोगों के बीच व्यवहार करना था तो पढ़ने की जरूरत क्या थी? साली विद्या विनय और दे गई। जिस नीचता तक वे उतर आते हैं हमें हमारी आत्मा धिक्कारने लगती है वहाँ तक पहुँचने पर।

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