उद्धरण - 1159

दरअसल सहकारी खेती में यह होना ही था। खेती या तो किसान अपनी ज़मीन पर कर सकता है या मज़दूर बनकर दूसरे की ज़मीन पर। तीसरा तरीका़ रूस के सामुदायिक फार्मों का है। पर वहाँ क्या हुआ है मुझे नहीं मालूम लेकिन सहकारी खेती इन दो में से या इन तीनों में से कुछ भी नहीं है। किसान के लिए वह सिर्फ़ ऐसी ज़मीन है जो उसकी होते हुए भी उसकी नहीं है। या उसकी न होते हुए भी उसकी होने का भ्रम पैदा करती है। दरअसल वह सिर्फ भ्रष्ट कार्यकर्ताओं और उनसे भी ज्यादा भ्रष्ट सरकारी कारकुनों की संपत्ति है।

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