उद्धरण - 41

दुनिया से कोई भी विश्वास एकदम ग़ायब नहीं हुआ है । रूप बदलकर वह जी ही रहा है । नहीं जीता होता तो अपने को ‘प्रोग्रेसिव‘ या प्रगतिशील कहने और मानने वाले लोग विरोधी के पुतले क्यों जलाते, मुर्दाबाद के नारे क्यों लगाते? आदिम मनोवृत्ति जी ही रही है! जिएगी!

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