उद्धरण - 24

...पर मैं- मैं तो राह पर हूँ । मैं बढ़ता और बदलता हूँ- अपने राग-विराग से मुक्त होता हूँ- यानी राग-विराग के एक पुंज से मुक्त होता हूँ, दूसरे से संग्रन्थित, नये सम्पर्कों में पड़कर पुरानों से असम्पृक्त होता हूँ ।

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