उद्धरण - 32
मैं जानता हूँ कि मैं असफलता के पथ पर हूँ । लेकिन भीतर कुछ कहता है कि उस पथ के अंत पर पहुँचकर जब पीछे देखुंगा तो कुल मिलाकर अपनी असफलता पर ग्लानि नहीं होगी, ना अपने को यह आश्वासन देना आवश्यक जान पड़ेगा कि इसकी पूर्ति अगले जन्म, या लोक में होगी- इसी लोक की उतनी मात्र उपलब्धि यथेष्ट होगी, ऐसा मुझे प्रत्यय है ।
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