उद्धरण - 49

धन को आप किसी अन्याय से बराबर फैला सकते हैं। लेकिन बुद्वि को, चरित्र को और रूप को, प्रतिभा को और बल को बराबर फैलाना तो आपकी शक्ति के बाहर है। छोटे-बड़े का भेद केवल धन से ही तो नहीं होता। मैने बड़े-बड़े धन-कुबेरो को भिक्षकों के सामने घुटने टेकते देखा है और आपने भी देखा होगा ! रूप के चौखट पर बड़े-बड़े महीप नाक रगड़ते हैं क्या यह सामाजिक विषमता नहीं है? आप रूस की मिसाल देंगे ! वहाँ इसके सिवाय और क्या है कि मिल के मालिक ने राजकर्मचारी का रूप ले लिया है बुद्धि तब भी राज करती थी, अब भी करती है और अब हमेशा करेगी !

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