उद्धरण - 26

... केवल आत्म-विस्मृति नहीं है बल्कि आरम्भ से ही एक अतिरिक्त आत्मचेतना का भाव है, क्योंकि सारी पुस्तक ही अपने विषय में है-- अपने व्यक्ति के, अपने जीवनानुभव के, अपनी रचना की प्रवृत्तियों के, अपने विश्वासों के और उन सूक्ष्म तत्वों के जिन्हें लेखक अपने कर्म के बुनियादी मूल्य या प्रतिमान मानता है ।..............आत्मनेपद निःसन्देह अत्यन्त आत्मचेतन (सेल्फकांशस) रचना है ।

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