उद्धरण - 51

नया साहित्यकार अपने को तात्कालिक परिस्थिति के प्रति समर्पित कर दे सकता है । युगधर्म के नाम पर क्षणधर्मी होकर एक खतरनाक किस्म का अवसरवादी हो जा सकता है और अपनी चिन्तन की स्वाधीनता खो दे सकता है, अतीतोन्मुख होकर फिर एक बीती हुई परिस्थिति का लाना चाह सकता है, एक रूमानी लालसा उसे रूढ़िवादी ही नहीं बल्कि प्रतिक्रियावादी बना दे सकती है ।

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