उद्धरण - 2

हितैषी-गण हिन्दी की रक्षा के नाम पर उसके चारों ओर ऐसी दीवार खड़ी करके बैठे हैं कि वह न हिल-डुल सके, न बढ़ सके, न सॉंस ले सके और बाहर से कुछ ग्रहण करने की तो बात ही दूर ।

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