उद्धरण - 1068

मैं जिस बात से बचना चाहता था उसी से टकराना पड़ा। भाग्य को कौन बदल सकता है? विधि की प्रबल लेखनी से जो कुछ लिख दिया गया उसे कौन मिटा सकता है? अदृष्ट के पारावार को उलीचने में अब तक कौन समर्थ हुआ है?

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