उद्धरण - 1053
कहते हो उसे तुम जानते नहीं साहिर तुम्हारा दोस्त नहीं फिर भी साहिर और उसमें क्या बात हुई क्या नहीं इसकी सचाई का अकेला गवाह तुम्हें ही माना जाए? और मान लो यह झूठ भी हो लेकिन अगर यही झूठ मुझे सच से भी अधिक सच लगता हो तो तुमसे क्या? मुझे यह बताओ उससे जाकर पूछोगे कि ऐसे तमाम सच से भी अधिक सच लगनेवाले झूठों से क्या करेगा वह?
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