उद्धरण - 1030

वाह! पाँव सुलग रहा है। मन उमँग रहा है। देह झुलस रही है लेकिन मन हरियाला है। अचानक रस की कौन -सी फुहार झर उठी है अन्दर से! भुमुरिया को कई प्रकार से अलापता है-भू-मुरिया भु-मू-उ-उ-ऊ रिया भुमुरि-इ-इया। धम्म-से बैठ गया है-बबूल की छैया में। कितनी अच्छी पकड़ है! भूमुर माने गरम भउर राख। जिनगानी जेठ-बैसाख का भूमुर है। ऊपर कोई छाँह नहीं। हाय रे जनम!

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