उद्धरण - 1043
किस्मत से उसका कॉलेज भी ऐसा जिसमें दर्जों की खिड़कियों से आम की शाखें झाँका करती थी इसलिए हमेशा जब कभी मौका मिलता था क्लास से भाग कर गेसू घास पर लेटकर सपने देखने की आदी हो गयी थी।
गेसू की कल्पना और भावुक सूक्ष्मता शायरी में व्यक्त हो जाती थी अतः उसकी जिन्दगी में काफी व्यावहारिकता और यथार्थ था लेकिन सुधा जो शायरी लिख नहीं सकती थी अपने स्वभाव और गठन में खुद ही एक मासूम शायरी बन गयी थी।
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