उद्धरण - 1070

चाँदनी रातों में चाँद के गिर्द जमा हुआ चिकना-चिकना उजाला कितना नरम कितना पवित्र! मन भागता उस ज्योतिर्लोक की ओर तारे-तारे पर पाँव रखते हुए टेढ़े चाँद के सामने आ खड़ा होता और चाँद को झूले की तरह झुला देता। जाने कब तक झूलता रहता चाँद।

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