उद्धरण - 1080
गंगाजल नाई या कहार ढोकर ले आए थे, लकड़ी लोहार फाड़ रहा था। दूध-दही अहीर के घर से आया होगा, कलशा-परई कुम्हार दे गया होगा, दोना-पत्तल नट और डोम दे गए होंगे। आम के पल्लव एक मल्लाह का लड़का तोड़ कर गिरा रहा था, यह उसने खुद देखा अक्षत बनिया की दुकान से आया होगा कपड़े और दूसरी चीजों को भी ब्रह्मणों ने नहीं ही बनाया होगा। मगर ये सारे लोग अब इन्हें छू भी नहीं सकते।
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