उद्धरण - 1049

जैसे पृथ्वी और आकाश न डरते हैं, न क्षीण होते हैं, वैसे ही मेरे प्राण,तुम भी न डरो, न क्षीण हो। जैसे वायु और अंतरिक्ष न डरते हैं, न क्षीण होते हैं, वैसे ही मेरे प्राण,तुम भी न डरो, न क्षीण हो। जैसे मृत्यु और अमृत न डरते हैं, न क्षीण होते हैं, वैसे ही मेरे प्राण,तुम भी न डरो, न क्षीण हो। जैसे सत्य और अनृत न डरते हैं, न क्षीण होते हैं, वैसे ही मेरे प्राण,तुम भी न डरो, न क्षीण हो। जैसे भूत और भविष्य अभयशील हैं, क्षीण नहीं होते, वैसे ही मेरे प्राण,तुम भी न डरो, न क्षीण हो। उन शुरूआती दिनों में जब प्रेरणा का सबसे सशक्त स्रोत पुस्तकें थी वह सूक्त यहाँ तक कि उसकी याद भी उनकी धमनियों के रक्त-संचार को तेज़ कर देती थी।

Comments

Popular posts from this blog

उद्धरण - 797

उद्धरण - 549