उद्धरण - 1054

बादशाहों की मुअत्तर ख्वाबगाहों में कहाँ वह मजा जो भीगी- भीगी घास पर सोने में है, मुतमइन बेफिक्र लोगों की हँसी में भी कहाँ लुत्फ जो एक-दूसरे को देखकर रोने में है। कैफ बरदोश, बादलों को न देख बेखबर तू न कुचल जाय कहीं।

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