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बच्चों को बीच-बीच में पीटते रहने को बहुत ज़रूरी काम माना जाता था। स्कूलों में मास्टर भी बच्चों को मौका और बहाना निकालकर पीट दिया करते थे। बच्चों को पीटना एक किस्म से एहतियात बरतने की तरह था कि कहीं बच्चा बिगड़ न जाये।

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