उद्धरण - 1119
गाँधीवादी संस्कृति का आश्रम सिंद्धांत के तौर पर उन्हें हमेशा खिझाता रहा था पाखंड जैसा लगता था। अगर ज़्यादा उदार भाव से वे उसे पाखण्ड न मानते तो उसे एक अव्यावहारिक प्रयोग तो समझते ही थे। अब आज उन्हें अचंभा हुआ कि वे खुद इन संस्थाओं को प्रगति की गारंटी दे रहे हैं।
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