उद्धरण - 1048

इस भटकन में मैंने कौन-सा कर्म नहीं किया? कभी नट बनता कभी पुतलियों का नाच दिखाता कभी नाट्य-मंडली संगठित करता और कभी पुराण-वाचक बनकर जनपदों को धोखा देता रहा; सारांश कोई कर्म छोड़ा नहीं।

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