उद्धरण - 1047
सर्वथा ज्ञानशंकर की ईर्ष्या-वृत्ति का ही दोष न था। ज्वालासिंह के बात-व्यवहार में वह पहले की-सी स्नेहमय सरलता न थी वरन् उसकी जगह एक अज्ञात सहृदयता एक कृत्रिम वात्सल्य एक गौरव युक्त साधुता पायी थी जो ज्ञानशंकर के घाव पर नमक का काम कर रही थी।
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