उद्धरण - 1038
यदि मैं कहूँ कि सरस्वती स्वयं आकर अपने पाणि-पल्लवों से मेरे पितृदेव के होमकालीन श्रम-सीकरों को पोंछा करती थीं तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति नहीं होगी क्योकि उषःकाल से लेकर सूर्योदय के दो मुहूर्तों तक निरन्तर हवन करने के बाद जब मेरे पिता पसीने से तर होकर उठते थे तो सीधे अध्यापन के कुशासन पर जा बैठते थे। यही उनका विश्राम था। इसी समय विद्यार्थियों को वेदाभ्यास कराते-कराते उनके श्रम-बिन्दु सूखते थे।
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