उद्धरण - 119

‘मानव-समाज केवल किसी एक युग का समाज नहीं है; देश-काल की रंगत लाने वाले लोकाचारों- व्यवहारों और मुहावरों- यहाँ तक कि सम्बन्धों के- विषयगत या बाहरी यथार्थ के सभी उपकरणों के- नीचे, परे, गहरे में मानव-समाज की एक दूसरी पहचान मिल सकती है जो युगातीत है जो समाज की पहचान से बढ़कर मानव की पहचान है, जिसका यथार्थ सामाजिक यथार्थ- भर न होकर मानवीय यथार्थ है।’’

Comments

Popular posts from this blog

उद्धरण - 797

उद्धरण - 549