उद्धरण - 105

एक बार उन्होंने किसी से कहा-“मैंने स्वयं यह नाम नहीं रखा है। दरसरल प्रभु स्वामी करपात्री जी महाराज मेरी विद्वता से प्रसन्न होकर मुझे ‘देवगुरू वृहस्पति’ संबोधन से पुकारने लगे थे, फिर यह चल निकला।“

Comments

Popular posts from this blog

उद्धरण - 797

उद्धरण - 549