उद्धरण - 74

मैं जानता हूँ, दौलत से आराम और तकल्लुफ़ के कितने सामान जमा किये जा सकते हैं; मगर यह भी जानता हूँ कि दौलत इन्सान को कितना खुद-गरज बना देती है, कितना ऐश-पसन्द, कितना मक्कार, कितना बेगैरत।

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