उद्धरण - 193

तुम्हारा व्यक्तिगत प्रेम परम वैश्वानर के प्रेम की पहली सीढ़ी है । न वह उपेक्षणीय है, न लक्ष्य है । वह भगवान् की भेजी हुई एक ज्योति-किरण है जिससे अनन्त सम्भावनाओं के द्वार तक मार्ग साफ दिखाई दे जाता है । ऐसा ही समझकर अब मैं निश्चिन्त हो गया हूँ ।

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