उद्धरण - 297

तन के ठेले पर लदा हुआ यह जीवन का भारी बोझ खींचते मेरे प्राणों का भूखा अशक्त भैंसा अब बेदम होकर जेठ की चिलचिलाती धूप में तपती हुई सड़क पर गिर पड़ा; नियति की चाबुकों से उत्तेजित होकर भी उसमें उठने की ताब नहीं रही।

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